Pakshakarita
'पक्ष'कारिता: सियासी उत्तरायण बनाम 'मंडल-कमंडल' का अखबारी दक्षिणायण
जब कूच हो रहा होता है
बहुतेरे लोग नहीं जानते
कि दुश्मन उनकी ही खोपड़ी पर
कूच कर रहा है
वह आवाज जो उन्हें हुक्म देती है
उन्हीं के दुश्मन की आवाज होती है
और वह आदमी जो दुश्मन के बारे में बकता है खुद दुश्मन होता है.
बरसों पहले लिखी बर्तोल्ट ब्रेष्ट की यह कविता असली दुश्मन को समझने का एक आसान नुस्खा है, बशर्ते 'दुश्मन' और 'हमारे' बीच अखबार न रहें. अखबार भ्रम और झूठ का पर्दा खड़ा करके हमें बरगलाते हैं. आइए, देखा जाय कैसे. बीते दो साल में महामारी की दो तगड़ी लहरों के बीच मुसलसल निरोग और महफूज रहे भारतवर्ष के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जान को महामारी का तीसरा साल लगते ही खतरा पैदा हो गया- महामारी से नहीं, सियासी दुश्मनों से. इस खतरे का मजमून किसी ने ट्विटर पर बड़े दिलचस्प ढंग से समझाया, ''मैं खतरे में हूं इसलिए मुझे वोट दो.'' नरेंद्र मोदी की सरकार के टिकाऊपन का स्थायी तर्क यह है कि ''हिंदू खतरे में है इसलिए मुझे वोट दो.'' जब हिंदू को खतरा समझ में नहीं आए, तब हिंदुओं के रक्षक की जान को खतरा बताया जाय.
जब यह विमर्श भी परवान नहीं चढ़ सके तो पखवाड़ा बीतते-बीतते राजधानी दिल्ली सहित श्रीनगर व पंजाब में आरडीएक्स और बम बरामद हो जाए. तर्ज बना- ''अब देश खतरे में है इसलिए मुझे वोट दो.'' गोया 'देश', 'हिंदू' और 'मैं' एक ही कोटि हों, बस अलग-अलग समय पर दुश्मन के बारे में बकने योग्य पर्यायवाची शब्द. अगर तीनों का संदर्भ नहीं बने, तो कोरोना नाम का दुश्मन रिक्त स्थान की पूर्ति करने के लिए वैसे ही उपलब्ध है जैसे घर में हरी सब्जी न होने पर सहज उपलब्ध आलू होता है!
तर्ज ये है कि लगातार एक अंजाने 'खतरे' और अदृश्य 'दुश्मन' की आवाज हमें अब दी जा रही है. 1 जनवरी से 15 जनवरी 2022 तक के हिंदी अखबारों का पहला पन्ना देख डालें. कोरोना के नए स्ट्रेन ओमिक्रॉन के स्थायी खतरे से भरे पन्नों के बीच संचारी खतरों की सुर्खियों की भरमार है- प्रधानमंत्री की सुरक्षा को खतरा, वैष्णो देवी में भगदड़ की खबर, बम की बरामदगी, ट्रेनों का हादसा और 'तीसरी लहर', 'लॉकडाउन', 'कर्फ्यू' जैसे शब्दों का प्रवाहमय प्रयोग. ऐसा लगता है कि इस मुल्क में हर दिन आदमी की जान सांसत में है.
'आंतरिक सुरक्षा' या मोटे तौर पर सुरक्षा ही वह व्यापक पृष्ठभूमि है जिसमें पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव फरवरी-मार्च में होने जा रहे हैं. इन राज्यों में चुनाव आचार संहिता लागू हो चुकी है और 'सुरक्षा' कारणों से चुनाव सम्बंधी तमाम परंपरागत आचार पर रोक लगाई जा चुकी है. बस चुनाव वास्तविक होंगे. चुनाव की पृष्ठभूमि वर्चुअल होगी. चूंकि मतदान से पहले तक सब कुछ वर्चुअल होना है, तो अखबारों के लिए बहुत संकट का दौर है. न रैली, न सभा, न भाषण, न गाली-गलौज. लिखें तो लिखें क्या? वो तो भला हो इमरान मसूद का जिन्होंने परीक्षा हॉल में सबसे पहले पर्चा जमा कर के निकल लेने वाले परीक्षार्थी की भूमिका निभा कर बाकी साथियों का संकोच हर लिया और दलबदल का एक सिलसिला चल पड़ा. झमाझम खबरें बरसने लगीं.
चुनावी मौसम में अखबार लहलहा उठे, लेकिन ये बहार भी देर-सवेर थमनी ही थी. पहले चरण के लिए नामांकन की आखिरी तारीख करीब आते ही डबल और ट्रिपल दलबदल देखने में आ रहा है. कुछ की घर वापसी भी हो रही है. ऐसे अनिश्चय के क्षण में अखबारों ने खबरों की पूर्ति करने के लिए 'एजेंडा रिपोर्टिंग' का पुराना रास्ता खोद निकाला है. इस एजेंडा सेटिंग के चक्कर में तथ्य और सूचनाओं की ऐसी-तैसी हो गई है.
हिंदुत्व का स्थायी एजेंडा बरास्ते सुरक्षा
बात की शुरुआत हिंदी पत्रकारिता के स्थायी कलंक दैनिक जागरण से (संदर्भ 2022 की वार्षिकी). उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कंधे पर बंदूक रखकर दैनिक जागरण ने स्पष्ट लिख दिया है कि प्रधानमंत्री की सुरक्षा का मुद्दा यूपी में चुनावी मुद्दा हो सकता है. ऐसी अटकलपच्चू खबरों से अखबारों के दुष्प्रचार कौशल का पता लगता है. यह हमारी जिंदा स्मृति का हिस्सा है कि नरेंद्र मोदी नाम के व्यक्ति (मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री तक) की सुरक्षा को खतरे का तर्क अब 20 साल पुराना हो चुका है.
सन् 2002 में अक्षरधाम मंदिर पर हमले से लेकर 2004 में इशरत जहां एनकाउंटर और पटना के गांधी मैदान ब्लास्ट से लेकर मोदी की 'हत्या' की साजिश रचने वाला भीमा-कोरेगांव प्लॉट और अब पंजाब का ताजा प्रकरण- महज एक शख्स को महसूस हुए इन 'खतरों' के चक्कर में जाने कितने लोगों की जान गई और कितने जेल गए लेकिन एक बार भी उन्होंने अपनी सुरक्षा का मुद्दा चुनाव के साथ नहीं जोड़ा (क्योंकि वह अंग्रेजी में 'अंडरस्टुड' था). जागरण ने वो बात कह दी, जो 'अंडरस्टुड' होनी चाहिए थी. सोचिए, अखबार कितने सयाने हो गए हैं. या हो सकता है कि पाठक ही इतना मूर्ख बना दिया गया हो कि उसे घटनाओं का परिप्रेक्ष्य समझाना पड़ता हो! दोनों ही स्थितियों में दोष तो अखबार का ही है.
एक नजर में यह खबर दुष्प्रचार जान पड़ सकती है, लेकिन मामला इतना सामान्य नहीं है. उपर्युक्त खबर दरअसल एजेंडा सेटिंग का एक पूरक प्रयोग है. 15 जनवरी, 2022 का संपादकीय देखिए- शीर्षक है 'आंतरिक सुरक्षा को चुनौती'. उसके बाद के ओप-एड व विचार पन्ने देखिए- सुरक्षा चिंताओं से लबरेज हैं. इसका मतलब यह हुआ कि सुरक्षा का मसला चुनावी मुद्दा अपने आप नहीं बन रहा, बल्कि इसी अखबार के द्वारा सचेत रूप से बनाया जा रहा है. यह बीमारी कुछ और हिंदी अखबारों में आप देख सकते हैं, खासकर अमर उजाला और पंजाब केसरी आदि में.
इस व्यापक पृष्ठभूमि को स्थापित करने की प्रक्रिया में अखबार का संपादक यह भूल जाता है कि राजनीतिक प्रक्रियाएं स्वतंत्र रूप से संचालित होती हैं. वे किसी अखबार के एजेंडा निर्माण का मोहताज नहीं हैं. बेशक दैनिक जागरण हिंदी प्रदेश में दक्षिणपंथी सत्ताओं का मुखपत्र है और इसके मालिकान, संपादकगण व पत्रकारगण सत्ता के बेहद करीबी भी होंगे लेकिन इसके चलते मुगालता नहीं पालना चाहिए कि अखबार जैसा सोच रहा है वैसा ही राजनीतिक दल भी सोच रहा है. ऐसे मुगालतों के चक्कर में बड़ी गलतियां हो जाती हैं, जैसा 13 जनवरी को हुआ. दैनिक जागरण के पहले पन्ने की लीड खबर देखिए- योगी आदित्यनाथ के लिए अयोध्या की सीट की खबर छापी गई है.
अखबार के स्टेट ब्यूरो की बाइलाइन से छपी खबर पूरे दावे के साथ बता रही है कि भाजपा नेतृत्व ने तय कर लिया है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अयोध्या से चुनाव लड़ेंगे. अब दावा पक्का है, तो इसको एजेंडे में फिट करना भी बनता है. इसीलिए शीर्षक के ऊपर एक और पंक्ति जगमगा रही है:
रणनीति: हिंदुत्व का रंग गाढ़ा कर राम मंदिर से उत्तर प्रदेश में भगवा लहर चलाने की तैयारी
जाहिर है कि एजेंडा केवल एक रणनीतिगत वाक्य से स्थापित नहीं होगा, तो डेस्क को काम पर लगाया जाता है कि अयोध्या के आसपास ऐसी सीटों का आकलन किया जाए जहां योगी के चुनाव लड़ने का असर पड़ेगा. खबर फैलती है और भीतर के पन्नों में जो शक्ल लेती है उसे भी देखें.
क्या ही 'जमीनी' रिपोर्टिंग है कि 'चुनाव कार्यालय की खोज शुरू हो गई है' और 'गुजराती रणनीतिकारों ने संभाला मोर्चा'! अब संकट ये है कि दो दिन बाद 15 तारीख को आई भारतीय जनता पार्टी की आखिरी सूची में योगी आदित्यनाथ को वापस उनकी गोरखपुर शहर की सीट से लड़ाए जाने की बात दर्ज है. क्या वही सारे तर्क अब गोरखपुर के लिए दिए जाएंगे जो अयोध्या के लिए दिए जा रहे थे? वरिष्ठ पत्रकार एमके वेणु का एक ट्वीट पढ़कर पता चला है कि दैनिक जागरण ही नहीं, कई टीवी चैनल भी मान चुके थे कि योगी अयोध्या से लड़ने जा रहे हैं. मैं तो टीवी देखता नहीं, लेकिन वेणु का यह ट्वीट बहुत मौजूं सवाल कर रहा है.
'सामाजिक न्याय' का काउंटर एजेंडा
तथ्य के आगे एजेंडा को रखने की यह दिक्कत केवल जागरण या (वेणु के कहे मुताबिक) 'गोदी एंकरों' तक ही सीमित नहीं है. यह समस्या उनके साथ भी बराबर है जो दक्षिणपंथी सत्ताओं के घोषित वैचारिक प्रवक्ता नहीं हैं. चुनाव के मौसम में आप अच्छे से अच्छे बुद्धिजीवी से पूछ लीजिए कि संघ के साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद की काट क्या हो सकती है, जवाब मिलेगा 'सामाजिक न्याय'. इस 'सामाजिक न्याय' का व्यावहारिक अर्थ है जातियों में बंटे समाज की दरारों को और उभार दिया जाना ताकि सभी जातियों को एकल हिंदू पहचान में बांधने की कोशिश नाकाम की जा सके. हिंदी पट्टी का बौद्धिक आलस्य देखिए कि 'मंडल बनाम कमंडल' के 30 साल पुराने मुहावरे से निकले इस तर्क में आज तक न कोई तब्दीली आई न इस पर कोई पुनर्विचार किया गया. जाहिर है, 'सामाजिक न्याय' की राजनीति का पतन ऐसे ही नहीं हुआ होगा. उदाहरण देखिए.
राजस्थान पत्रिका की इस खबर में 'मंडल बनाम कमंडल' की जो वापसी दिख रही है, वह हिंदी पत्रकारिता में बीते हफ्ते भर से संक्रामक रोग की तरह आई है. हिंदुस्तान दैनिक के संपादक शशि शेखर को भी मंडल-कमंडल की वापसी का दौर दिख रहा है. यह बीमारी फैली कैसे? खुद शशि शेखर के शब्दों में:
"स्वामी प्रसाद मौर्य के बाद दारा सिंह चौहान, धर्म सिंह सैनी और अब तक 11 विधायकों ने इस्तीफा देकर साबित करने की कोशिश की कि सरकार दलित-पिछड़ा विरोधी है. भाजपा के प्रवक्ताओं ने उन्हें दलबदलू और अवसरवादी साबित करने की कोशिश की, पर पांच वर्ष पूर्व इन नेताओं का उपयोग भगवा दल ने भी चुनाव जीतने के लिए किया था."
आखिरी वाक्य में 'उपयोग' पर ध्यान दीजिएगा- आशय यह है कि ये तमाम पिछड़े नेता भाजपा में स्वेच्छा से नहीं गए थे बल्कि इनका उपयोग किया गया था, इस बार उनका समाजवादी पार्टी में वापस आना यह साबित करता है कि सरकार दलित-पिछड़ा विरोधी है. यानी जिस मंडल-कमंडल की वापसी का एजेंडा सत्ता-विरोधी मीडिया सेट कर रहा है, उसका जमीनी आधार कोई डेढ़ दर्जन नेताओं का भाजपा छोड़कर सपा में आना है.
ये नेता क्या वैचारिक रूप से 'भटक' गए थे पांच साल पहले जो आज पटरी पर आ गए हैं? इन्हें अचानक चुनाव से पहले ही अपनी भटकन का अहसास क्यों हुआ? क्या इन नेताओं का दल बदलना सामाजिक न्याय की राजनीति के मजबूत होने का संकेत है और मतदाता भी ऐसा ही मान रहा है? क्या इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उत्तर प्रदेश का आगामी चुनाव सवर्ण बनाम पिछड़ा के मुद्दे पर आकर खड़ा हो गया है और इससे सत्ता विरोधी गठबंधन की हवा बन चुकी है?
ऊपर के सारे सवालों के जवाब अगर 'हां' में हैं तो सामाजिक न्याय की राजनीति के लिए इससे बड़ा खतरा और कुछ नहीं हो सकता. सदिच्छाएं अपनी जगह हैं, सदिच्छा को राजनीति नहीं बनाया जा सकता. पत्रकारिता तो बिलकुल भी नहीं. वरना ऐसी गलतियां होकर रहेंगी जैसी जनसत्ता ने सदिच्छापूर्ण जल्दबाजी में कर दी है. एजेंडे को खबर के आगे रखने की फिसलन के तमाम उदाहरणों में यह खबर महज एक है.
जिस तरह पार्टी बदल लेने का मतलब विचार बदल लेना नहीं होता, वैसे ही मुलाकात का मतलब सहमति बन जाना नहीं होता, ये बात पत्रकारों को खबर लिखने से पहले समझनी चाहिए वरना सिर मुंड़ाते ओले पड़ने की नौबत आ सकती है. पाठक जब इस खबर को 15 जनवरी को पढ़ रहे होंगे तब तक रिश्ता बनने से पहले ही टूट चुका था.
वैसे, दिलचस्प यह है कि जिस तरह हिंदू एकता और हिंदुत्व के राष्ट्रवाद से निपटने के लिए सामाजिक न्याय वाले जाति की दरारों को उभारने में यकीन रखते हैं ठीक उसी तरह जातिगत राजनीति को वास्तविक खतरा मानते हुए हिंदुत्व के वाहक भी पलटकर सक्रिय हो जाते हैं. इधर मंडल की वापसी का हल्ला क्या मचा, उधर विश्व हिंदू परिषद जातिगत विभाजनों को समाप्त कर के सबको हिंदू बनाने के अभियान में लग गया.
मंडल-कमंडल का रहस्य
'मंडल बनाम कमंडल' की राजनीति अपनी जगह, लेकिन सुधि पत्रकारों को ऐसे सरलीकरणों से बचना चाहिए और अपनी बौद्धिक खुराक लेते रहनी चाहिए ताकि एक असंवैधानिक पहल को काटने के लिए दूसरे असंवैधानिक औजार के चक्कर में न फंसें. यह समझना जरूरी है कि जिस तरह धर्म की राजनीति धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक मूल्य की दुश्मन है उसी तरह धर्म की राजनीति को काटने के लिए की जाने वाली जाति की राजनीति भी समानता और बंधुत्व के संवैधानिक मूल्य की दुश्मन है. कीचड़ से कीचड़ को धोया तो क्या धोया?
संदर्भ के लिए पत्रकारों को एरिक हॉब्सबॉम का एक पुराना व्याख्यान पढ़ने की सलाह दे रहा हूं. 1996 के अपने एक चर्चित व्याख्यान में इतिहासकार हॉब्सबॉम ने बहुत साफ शब्दों में बताया था कि कैसे पहचान की कोई भी राजनीति अंतत: दक्षिणपंथ के गड्ढे में गिरने को अभिशप्त है. इस लेख को पढ़कर शायद पत्रकार बंधुओं को समझ में आ सके कि मंडल और कमंडल परस्पर विरोधी नहीं, एक-दूसरे के पूरक हैं. आप जितना जाति-जाति करेंगे, हिंदुत्व की राजनीति उतना मजबूत होगी. हिंदुत्व का एजेंडा और जातिगत राजनीति का एजेंडा देखने में एक-दूसरे की काट लगता है लेकिन दोनों की लड़ाई दरअसल नूराकुश्ती है.
अभी पूरा चुनाव सिर पर है. दैनिक जागरण आदि को अपना एजेंडा चलाने दें. कम से कम आप और हम भ्रष्ट व लोभी नेताओं के महज दल बदल लेने से सामाजिक न्याय जैसे पवित्र शब्द को परिभाषित करना बंद करें. ध्यान रखें कि हिंदुस्तान या राजस्थान पत्रिका आदि जो एजेंडा सेट कर रहे हैं, वह दैनिक जागरण के एजेंडे से अलहदा नहीं है. और हां, शुरुआत में लिखी ब्रेष्ट की कविता को हमेशा याद रखें- उत्तरायण हो चुका है लेकिन हिंदी की पत्रकारिता अब भी दक्खिन दिशा ही बह रही है, इसलिए अखबार आपको असली दुश्मन का नाम कभी नहीं बताएंगे.
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