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अपने बच्चों के लिए पोषक आहार खरीदने में असमर्थ है दुनिया की 42 फीसदी आबादी
एक ओर तो हम विकास की बड़ी-बड़ी बाते करते हैं वहीं दूसरी ओर देखें तो दुनिया में अभी भी करीब 42 फीसदी आबादी पौष्टिक आहार खरीदने में असमर्थ है. जिसका मतलब है कि 300 करोड़ से ज्यादा लोग अपने और अपने परिवार के लिए ऐसा आहार खरीदने के काबिल नहीं हैं जो उन्हें और उनके बच्चों को पर्याप्त पोषण दे सकता है.
यही नहीं खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) का अनुमान है कि अगर आपदा या आर्थिक संकट के चलते लोगों की आय में एक तिहाई कमी आती है तो और 100 करोड़ लोग पोषक आहार को खरीदने में असमर्थ हो जाएंगे. इसके अलावा यदि परिवहन व्यवस्था में व्यवधान आता है तो करीब 84.5 करोड़ लोगों को पहले की तुलना में अपने आहार के लिए कहीं ज्यादा कीमत चुकानी होगी. यह जानकारी हाल ही में खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) द्वारा जारी रिपोर्ट 'द स्टेट ऑफ फूड एंड एग्रीकल्चर 2021' में सामने आई है.
कृषि और खाद्य व्यवस्था के लिए बड़ा खतरा है जलवायु परिवर्तन और महामारियां
रिपोर्ट की मानें तो जलवायु परिवर्तन, महामारियां, कृषि और अर्थव्यवस्था पर छाया संकट खाद्य व्यवस्था के लिए एक बड़ा खतरा है जिनसे निपटने के लिए तैयार रहने की जरूरत है और यह बात हाल ही में आई कोविड-19 महामारी ने साबित भी कर दी है. इस तरह के अकस्मात आए खतरे दुनिया में खाद्य सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा हैं. इसके चलते दुनिया में भुखमरी का संकट पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा बढ़ गया है.
एफएओ द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक 2020 में करीब 76.8 करोड़ लोग भुखमरी का शिकार थे, जोकि वैश्विक आबादी का करीब 10 फीसदी हिस्सा है. यदि 2019 की तुलना में देखें तो 2020 में और 11.8 करोड़ लोग भुखमरी का शिकार हैं, जबकि 2015 की तुलना में इस आंकड़े में 15.3 करोड़ का इजाफा हो चुका है.
रिपोर्ट के अनुसार दुनिया 2030 तक भुखमरी और कुपोषण के लिए तय लक्ष्यों को हासिल कर लेगी इस बात की संभावनाएं महामारी से पहले भी न के बराबर थी. महामारी ने इस समस्या को और विकराल बना दिया है. सिर्फ महामारी ही नहीं जलवायु परिवर्तन, संघर्ष और वैश्विक तौर पर खाद्य कीमतों में हो रही बढ़ोतरी अपने आप में एक बड़ी समस्या है, जो खाद्य उत्पादन और आपूर्ति श्रंखला को प्रभावित करती रही हैं. उससे भी बड़ी समस्या यह है कि इस तरह के झटकों की बारम्बारता और गंभीरता दिनों-दिन बढ़ती जा रही है.
कमजोर देशों में 60 फीसदी आबादी को जीविका देती है कृषि
कृषि और खाद्य व्यवस्था हमारे लिए कितनी महत्वपूर्ण है इसका अंदाजा आप अपनी भोजन की थाली से ही लगा सकते हैं, हालांकि वैश्विक स्तर पर देखें तो यह हर वर्ष औसतन 1,100 करोड़ टन खाद्य उत्पादन करती है. यही नहीं इससे अन्य उत्पाद भी प्राप्त होते हैं जिनमें 3.2 करोड़ टन नेचुरल फाइबर, 400 करोड़ क्यूबिक मीटर लकड़ी जैसे उत्पाद शामिल हैं. यदि 2018 में कृषि उत्पादों के कुल आर्थिक मूल्य को देखें तो वो करीब 260.9 लाख करोड़ रुपए के बराबर था.
सिर्फ इतना ही नहीं दुनिया में करोड़ों लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर हैं. अकेले प्राथमिक उत्पादन वैश्विक स्तर पर 25 फीसदी से ज्यादा लोगों को रोजगार देता है. उप-सहारा अफ्रीका में 50 फीसदी से ज्यादा आबादी रोजगार के लिए कृषि पर निर्भर है, जबकि कमजोर देशों की करीब 60 फीसदी आबादी अपनी जीविका के लिए कृषि के सहारे है.
खाद्य व्यवस्था से जुड़ी गतिविधियां जैसे खाद्य भंडारण और प्रसंस्करण से लेकर कृषि उत्पादों का परिवहन, खुदरा बिक्री और खपत भारत सहित कई अर्थव्यवस्थाओं की रीढ़ हैं. यहां तक की यूरोपियन यूनियन में भी खाद्य और पेय उद्योग वहां किसी भी अन्य निर्माण क्षेत्र से अधिक लोगों को रोजगार देता है.
कैसे कर सकते हैं इन खतरों का मुकाबला
ऐसे में रिपोर्ट का मानना है कि इन खतरों से निपटने के लिए यदि अभी से उचित तैयारी न की गई तो इस तरह के खतरे हमारी कृषि और खाद्य व्यवस्था को दिन प्रतिदिन कमजोर करते रहेंगे. एफएओ के अनुसार इन खतरों से निपटने के लिए विविधता बहुत मायने रखती है. बात चाहे इनपुट स्रोतों, उत्पादन, बाजारों और आपूर्ति श्रृंखलाओं की हो इनके लिए विवधता बहुत मायने रखती है जो इन खतरों से उपजे संकट से निपटने के लिए रास्ते बना सकती हैं. इसी तरह छोटे और मध्यम कृषि खाद्य उद्यमों, सहकारी समितियों, संघ और समूहों के विकास का समर्थन करने से घरेलू कृषि खाद्य मूल्य श्रृंखलाओं में विविधता बनाए रखने में मदद मिलती है.
इनसे निपटने का एक अन्य महत्वपूर्ण कारक कनेक्टिविटी है. कृषि खाद्य नेटवर्क के बीच बेहतर कनेक्टिविटी इस तरह के व्यवधानों को तेजी से दूर कर सकने में मददगार हो सकती है. आखिर में कमजोरों को सशक्त करके दुनिया से भुखमरी की समस्या को दूर किया जा सकता है. इसके लिए जरूरी है कि संकट के समय में लोगों को आय के साधन उपलब्ध कराए जाएं, उनकों दी गई मदद और सामाजिक सुरक्षा के लिए चलाए जा रहे कार्यक्रम मुश्किल समय में कमजोरों के लिए जीवनदायी हो सकते हैं.
(डाउन टू अर्थ से साभार)
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