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'सांप्रदायिक हिंसा ज्वालामुखी से निकलने वाले लावे की तरह है': जाकिया जाफरी मामले में कपिल सिब्बल
सर्वोच्च न्यायालय में बुधवार को कांग्रेस के पूर्व विधायक एहसान जाफरी की पत्नी जाकिया अहसान जाफरी की याचिका पर सुनवाई की, जिसमें उन्होंने 2002 के गुजरात दंगों के संबंध में विशेष जांच दल की उस रिपोर्ट को चुनौती दी थी जिसमें गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी सहित 64 लोगों को 'क्लीन चिट' दी गई थी.
न्यायमूर्ति एएम खानविलकर, न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी और न्यायमूर्ति सीटी रविकुमार की पीठ ने जाकिया के वकील कपिल सिब्बल के तर्कों को विस्तार से सुना, जिन्होंने एसआईटी की क्लोजर रिपोर्ट की सत्यता पर सवाल उठाए थे.
जाकिया के अलावा मामले में अन्य याचिकाकर्ता सिटिजन फॉर जस्टिस एंड पीस हैं, जो एक मानवाधिकार समूह है, जिसका नेतृत्व कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ कर रही हैं.
सुनवाई के दौरान जाकिया के वकील कपिल सिब्बल ने कोर्ट से कहा, "एसआईटी ने कोई जांच नहीं की. मैं इसे कुछ दिनों में साबित कर दूंगा."
बता दें कि 28 फरवरी, 2002 के गुलबर्ग हाउसिंग सोसाइटी हत्याकांड के दौरान अहमदाबाद में मारे गए 68 लोगों में जाकिया के पति भी शामिल थे. 8 जून, 2006 को जाकिया ने नरेंद्र मोदी, कई विधायकों और राजनीतिक नेताओं सहित 63 लोगों के खिलाफ शिकायत दर्ज की थी.
जब उनकी शिकायत का कोई जवाब नहीं मिला तो जाकिया ने गुजरात उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर कहा कि उनकी शिकायत को प्राथमिकी माना जाए. उच्च न्यायालय ने 2 नवंबर, 2007 को उनकी प्रार्थना खारिज कर दी और बाद में जाकिया ने उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया.
तब तक शीर्ष अदालत ने गुजरात दंगों के मामले की जांच के लिए एक एसआईटी का निर्देश दे दिया था. अपने निष्कर्षों में, 8 फरवरी, 2012 को एसआईटी ने एक रिपोर्ट में गोधरा नरसंहार के बाद सांप्रदायिक दंगे भड़काने में राज्य के पदाधिकारियों द्वारा 'बड़ी साजिश' रची जाने की संभावना को खारिज कर दिया था.
जाकिया ने गुजरात उच्च न्यायालय के समक्ष एसआईटी के फैसले का विरोध किया था. उनकी चुनौती को 2017 में खारिज कर दिया गया. उन्होंने एक बार फिर विशेष अनुमति याचिका के जरिए एसआईटी की रिपोर्ट को चुनौती देने के लिए शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया. तब से उनके मामले की सुनवाई पांच बार स्थगित हो चुकी है.
‘इतने सारे सबूतों के बावजूद एसआईटी क्या कर रही थी?’
पिछली दो तारीखों पर सिब्बल ने कहा था कि एसआईटी की रिपोर्ट गुलबर्ग सोसाइटी हत्याकांड तक सीमित नहीं है. यही नहीं, जाकिया की शिकायत और क्लोजर रिपोर्ट भी केवल एक मामले तक ही सीमित नहीं है.
लाइव लॉ के अनुसार सिब्बल ने कहा, "मेरे पास एक कानूनी उपाय होना चाहिए, वह उपाय क्या है? मजिस्ट्रेट इसे नहीं देखते, सत्र न्यायालय इसे नहीं देखता! इसे कौन देखेगा? यह मैं आने वाली पीढ़ियों पर छोड़ता हूं कि वह पता लगाएं कि इसे कौन देखेगा!”
बुधवार को उन्होंने कहा कि जाकिया का मामला 2002 में गुजरात के 19 जिलों में लगभग 300 घटनाओं में 'आपराधिक दायित्व और प्रशासनिक जवाबदेही' का आह्वान करता है. सिब्बल ने इस ओर ध्यान आकर्षित किया कि संविधान में निहित अनुच्छेद 21 कहता है कि 'किसी भी व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अतिरिक्त उसके जीवन और वैयक्तिक स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है'.
"प्रक्रिया निष्पक्ष और न्यायोचित होनी चाहिए, और यह इस मामले का केंद्र बिंदु है," उन्होंने कहा. "सवाल यह है कि क्या एसआईटी ने उन सबूतों की जांच के लिए कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया का पालन किया है, जिनकी अवहेलना की गई और कभी जांच नहीं की गई?"
एसआईटी को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, "आप बयान दर्ज नहीं करते हैं. आरोपी का बयान स्वीकार किया और क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की. कोई फोन जब्त नहीं किया गया, कभी कॉल डिटेल रिकॉर्ड की जांच नहीं की गई, कभी जांच नहीं की गई कि रिकॉर्ड क्यों नष्ट किए गए. यह कभी नहीं देखा कि पुलिसकर्मियों ने क्यों कार्रवाई नहीं की.” उन्होंने ऐसे सबूतों की सूची दी जिन्हें उनके अनुसार एसआईटी ने अनदेखा कर दिया था.
सिब्बल ने 2007 में तहलका पत्रिका के लिए आशीष खेतान द्वारा दंगों के आरोपियों पर किए गए स्टिंग ऑपरेशन का भी हवाला दिया. खेतान एक मामले में अभियोजन पक्ष के गवाह थे और एसआईटी ने अन्य आरोपियों के संबंध में उनके फुटेज का सहारा भी लिया, लेकिन जाकिया के मामले में ऐसा नहीं किया.
सिब्बल ने कहा, "यह सबसे हानिकारक और चिंताजनक तथ्य है कि एसआईटी ने तहलका की स्टिंग ऑपरेशन रिपोर्ट को अनदेखा किया"
सिब्बल ने बताया कि नरोदा पाटिया मामले में सीबीआई और गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा इन टेपों को प्रमाणित किया गया था. उन्होंने स्टिंग ऑपरेशन रिपोर्ट के अंश भी पढ़े.
जब पीठ ने उनसे पूछा कि क्या स्टिंग रिपोर्ट के बयानों से किसी 'बड़ी साजिश' के बारे में कुछ पता चलता है, तो सिब्बल ने कहा, "बात यह है कि एसआईटी ने इसकी जांच नहीं की. तो आप एक 'बड़ी साजिश' को कैसे सिद्ध कर सकते हैं?”
उन्होंने कहा कि साजिश के मामलों में कोई प्रत्यक्ष सबूत नहीं है; यह केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की जांच, सबूत इकट्ठा करने, बयान दर्ज करने आदि के माध्यम से पता लगाया जा सकता है. लेकिन एसआईटी ने ऐसा कुछ नहीं किया, उन्होंने कहा.
सिब्बल ने यह भी उल्लेख किया कि कैसे नरोदा गाम मामले में गिरफ्तार किए गए विहिप नेता जयदीप पटेल को आधिकारिक तौर पर साबरमती ट्रेन में मारे गए 54 लोगों के शव सौंप दिए गए थे.
"यह एक गंभीर मुद्दा है," सिब्बल ने कहा. इसकी विस्तार से जांच होनी चाहिए कि क्या हुआ था, उन्होंने कहा.
एसआईटी ने शवों को सौंपने के लिए एक मामलातदार को जिम्मेदार ठहराया था. सिब्बल ने कहा, “क्या आप कभी कल्पना कर सकते हैं कि एक राष्ट्रीय त्रासदी के समय मामलातदार जैसा निम्न स्तर का अधिकारी यह निर्णय ले रहा है, और वह विहिप को शव सौंपने का फैसला करता है? असंभव! क्या इस स्थिति में सबूतों की जांच करने की आवश्यकता नहीं थी? आप सिर्फ बयान दर्ज करते हैं और फिर भूल जाते हैं."
दंगों के बाद गुजरात के सहायक पुलिस महानिदेशक आर बी श्रीकुमार ने सरकार के खिलाफ बयान दिया था. उनका दावा था कि पुलिस को अपने कर्तव्यों का पालन करने से रोका गया था. सिब्बल ने पीठ को याद दिलाया कि श्रीकुमार की गवाही को एसआईटी ने इस आधार पर खारिज कर दिया था कि वह पदोन्नति से वंचित रह गए थे.
सिब्बल ने कहा, "उनकी गवाही की पुष्टि अन्य अधिकारियों ने की थी और इसलिए इसे खारिज नहीं किया जा सकता था."
उन्होंने आगे कहा, “क्या एसआईटी आरोपियों को बचाने की कोशिश कर रही है? इसे सबूत इकट्ठा करना था, बयान दर्ज करना था और फिर प्रथम दृष्टया एक निष्कर्ष पर आना था. अनुच्छेद 21 कहता है कि आपको विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया से लोगों की रक्षा करनी होगी. यदि आप इसका उल्लंघन करते हैं, तो आप एक आरोपी हैं. एसआईटी को यह बताना होगा कि उन्होंने ऐसा कुछ क्यों नहीं किया.”
'सिर्फ इस मामले के लिए नहीं बल्कि भविष्य के बारे में'
हत्याकांड में पुलिस की भूमिका पर सिब्बल ने बताया कि कैसे विहिप के आचार्य गिरिराज किशोर को पुलिस ने सोला सिविल अस्पताल पहुंचाया.
"क्या लॉर्डशिप यह कल्पना कर सकते हैं?" सिब्बल ने कहा. “कानून-व्यवस्था पर ध्यान देने की बजाय पुलिस विहिप के एक पदाधिकारी की रक्षा कर रही है? उस व्यक्ति को जो सामूहिक उन्माद फैलाने की कोशिश कर रहा था और (गोधरा के मृतकों के) अंतिम संस्कार में 5,000 लोगों की भड़काऊ भीड़ के साथ था.”
उन्होंने मामले से पल्ला झाड़ने के लिए मजिस्ट्रेट की खिंचाई भी की. सिब्बल ने कहा, 'सच्चाई क्या है, झूठ क्या है, इसकी जांच की जरूरत है. “मजिस्ट्रेट इसे नहीं देख रहे हैं, उच्च न्यायालय इस पर ध्यान नहीं दे रहा है. यह हैरान करने वाला है.”
गुजरात दंगों, दिल्ली दंगों और विभाजन के बीच समानताएं बताते हुए सिब्बल ने कहा, “इस तरह से निर्दोष व्यक्तियों पर हमला क्यों होता है? यह विधि शासन नहीं है. यह साजिश नहीं तो और क्या है?
अंत में उन्होंने कहा, "सांप्रदायिक हिंसा ज्वालामुखी से निकलने वाले लावे की तरह है. यह संस्थागत हिंसा है... वह लावा जहां भी छूता है, पृथ्वी को दाग देता है. और भविष्य में बदला लेने के लिए उपजाऊ जमीन तैयार करता है."
यह सुनवाई गुरुवार को भी जारी रहेगी.
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