Opinion
कॉप-26: ग्लासगो से शुरू होगा दुनिया का नया अध्याय
यह दुनिया के लिए बनने या बिगड़ने का वक्त है. स्कॉटलैंड के ग्लासगो में 26वें संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क सम्मेलन (कॉप26) के लिए जब नेताओं की जुटान होगी तो वे यह मानेंगे कि समय निकल चुका है. विज्ञान हमें पहले ही खतरनाक आपातकाल के बारे में बता चुका है जो कि हमें डरा रहा है. जलवायु वैज्ञानिकों की खोजबीन के आधार पर संयुक्त राष्ट्र प्रमुख के शब्दों में कहें तो यह वक्त “मानवता के लिए कोड रेड” है. हमें यह बताने के लिए वैज्ञानिकों की और अधिक जरूरत नहीं रही. हम दुनिया में जारी तबाही को देख सकते हैं- हर रोज चरम मौसमी आपदाओं का शिकार होने वाले किसी न किसी क्षेत्र की खबर होती है. जैसा मैं यह लिख रही हूं, मेरा दिमाग हिमालयी राज्य उत्तराखंड और दक्षिणी राज्य केरल की तस्वीरों को देखकर सुन्न हो चुका है, जहां पहाड़ दरक गए हैं और जिंदगी व घर दोनों नेस्तानाबूद हो चुके हैं. कुदरत का यह कोप हमें सोचने पर मजबूर कर रहा है कि हमारा भविष्य कैसा होगा और इस संकट से बचने के लिए हमें हर कीमत पर उपाय करने होंगे.
जैसा कि इस बार होने वाली कॉप 26 की बैठक कोविड-19 के कारण एक वर्ष की देरी से हो रही है, इस बैठक के पास खुद अपने एजेंडे और कामकाज को वापस पटरी पर लौटाने का कार्यभार है लेकिन तथ्य यह है कि जलवायु परिवर्तन पर बातचीत कहीं नहीं हो रही है. यदि आप यूएनएफसीसीसी के सचिवालय के लोगों के जरिए लिखे गए पत्रों को पढ़ेंगे तो आप समझ जाएंगे कि यह किसी दूसरे ग्रह के लोगों के जरिए लिखे गए हैं.
पिछले कुछ दशकों में जलवायु वार्ताओं को इस हद तक अस्थिर कर दिया गया है कि वे अपना मकसद खो चुके हैं. जलवायु परिवर्तन के प्रबंधन के लिए कथित तौर पर असंख्य समितियों, संस्थानों और निधियों का गठन किया गया है, लेकिन यह चक्रव्यूह सिर्फ पन्नों और शब्दों से भरे हुए हैं. आप कह सकते हैं कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों ने वैश्विक संस्थानों को पछाड़ दिया है या फिर यह संस्थान वास्तविकता से अलग हो गए हैं. यही कारण है कि ज्यादातर वार्ताएं अल्पविराम, पूर्ण विराम और अन्य विराम चिन्हों के साथ चर्चाओं और निर्णय पत्रों के झगड़ों में खो जाती हैं, जिसका अधिकांश वार्ताकारों के लिए भी कोई मतलब नहीं है. वार्ताएं सचमुच अर्थहीन हो गई हैं.
कॉप 26 का शीर्ष एजेंडा अपने नेतृत्व और आवाज को फिर से हासिल करने वाला होना चाहिए ताकि अमीर और गरीब दोनों के विश्वास को फिर से बनाया जा सके. इसका मतलब है कि हमें अभी ही कार्रवाई के एजेंडे को साफ करना है और जो करने की जरूरत है उस पर अधिक ध्यान केंद्रित करना है, इसे कल पर नहीं छोड़ सकते.
इस दिशा में पहला कदम अंतहीन प्रक्रिया को खत्म करना है, जो हर चीज को शून्य में बदल देती है. यह संयुक्त राष्ट्र से जलवायु वार्ता को बाहर निकालने के बारे में नहीं है. बल्कि वास्तव में मेरा मानना है कि इस तरह की वार्ता बहुपक्षवाद की मांग करती है, जिसके लिए वैश्विक संस्थानों को नेतृत्व की आवश्यकता होती है. जरूरत है कि संकट के पीछे खड़ी इन वार्ताओं को आकार लेना चाहिए और कार्यभार संभालना चाहिए. साथ ही विश्वास का निर्माण करना चाहिए और किसके जरिए और कैसे जो हासिल करने की आवश्यकता है उस पर तेजी से ध्यान केंद्रित करना चाहिए. केवल गरीबों को धमकाने से हटकर शक्तिशाली प्रदूषकों को भी ध्यान में रखना चाहिए.
दूसरा, अत्यंत जरूरी है कि 2030 के लिए कार्बन उत्सर्जन की कटौती पर कार्रवाई को आगे बढ़ाने की सख्त जरूरत है. सुर्खियों में छाया हुआ चीन 2020 और 2030 के बीच पहले से ही सिकुड़े हुए कार्बन बजट के 30 प्रतिशत हिस्से पर कब्जा कर लेगा. हमें इस ताकत से सच कहने की जरूरत है कि चीन कल का अमेरिका है. इसके बाद शेष कार्बन बजट पर चर्चा करने की आवश्यकता है जो तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लिए जरूरी है. इसके अलावा हमें कार्बन बजट के सिर्फ बटंवारे पर ही नहीं बल्कि इसे कैसे आवंटित किया जाना चाहिए, इस पर भी ध्यान केंद्रित करना होगा. हम एक महत्वाकांक्षी समझौता नहीं कर सकते जब तक कि वह न्यायसंगत न हो. इसलिए कॉप 26 में समानता और जलवायु न्याय को मिटाने की कोशिश करने वाली अतीत की गलतियों को दोहराना नहीं चाहिए.
संभव है कि अमीर देशों के जरिए पेरिस समझौते की सराहना की जाए क्योंकि यह ऐतिहासिक उत्सर्जन के हर तरह के जिक्र को मिटाने में कामयाब रहा है. इस समझौते का उत्सव इसलिए मनाया जा सकता है क्योंकि इसमें कहा गया है कि नुकसान और क्षति पर किसी भी तरह की चर्चा को दायित्व तय करने या मुआवजे की मांग करने के तरीके के रूप में नहीं देखा जा सकता है. यह भी संभव है कि इसे सबसे अच्छी संधि कहा जाए क्योंकि इसने देशों को कम और अपर्याप्त राष्ट्रीय लक्ष्य निर्धारित करने की अनुमति दी और इस वजह से वित्त को अपनाने या उत्सर्जन को कम करने के लिए कुछ नहीं किया गया. लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. पांच वर्षों में हुई कई घटनाओं ने पेरिस समझौते को पीछे छोड़ दिया है.
तथ्य यह है कि दुनिया के कार्बन बजट को कुछ चंद देशों द्वारा अपने लिए इस्तेमाल किया गया है और बाकी दुनिया के लिए उसके केवल टुकड़े ही उपलब्ध हैं. दुनिया का यह हिस्सा विकास के अपने अधिकार और इसकी प्रक्रिया का प्रयोग करेगा तो वह उपलब्ध बजट से अधिक हो जाएगा. इसका मतलब है कि एक-दूसरे पर आश्रित इस दुनिया में सभी जोखिम में होंगे.
हम जानते हैं कि भारत जैसे देशों को वही गलतियां नहीं करनी चाहिए जो पहले से ही अमीरों ने की हैं. दुनिया को कम कार्बन विकास के रास्ते को सुरक्षित करने की जरूरत है. साथ ही अभी भी विकासशील देशों को इस परिवर्तन के लिए भुगतान किए जाने की जरूरत है.
उभरती हुई दुनिया के भविष्य को या उनके जरूरी उत्सर्जन के लिए उन्हें उंगली दिखाना या शर्मिंदा करना उनपर कोई प्रभाव नहीं छोड़ेगा. कॉप 26 में हमें इस असमानता की हकीकत का सामना करने और इसका समाधान निकालने की जरूरत है.
तीसरा एजेंडा है कि यह "कैसे" होगा? वित्त की उपलब्धता को पारदर्शी और मापने योग्य बनाया जाना चाहिए. इससे घाटे को दूर करने वाला यकीन पैदा होगा. इसलिए यह केवल वित्त के पैमाने पर चर्चा और सहमति नहीं है बल्कि इसके नियम भी बनाए जाने चाहिए ताकि इस फंड ट्रांसफर को गिना और सत्यापित किया जा सके. पारदर्शिता की आवश्यकता का प्रचार करना ही पर्याप्त नहीं है, उस पर कार्रवाई करने की जरूरत है.
"कैसे" का एजेंडा बाजारों पर चर्चा से भी जुड़ा हुआ है. इसमें पेरिस समझौते का अनुच्छेद-6 शामिल है, जो कि कॉप 26 की मेज पर है. मौजूदा प्रयास एक बाजार उपकरण बनाने के लिए स्मार्ट और सस्ता तरीका खोजने का है जो विकासशील दुनिया से कार्बन खरीद की लागत कम करेगा. साथ ही सस्ते, जटिल और कठोर ‘स्वच्छ विकास तंत्र’ (सीडीएम) को दोहराने की अनुमति फिर से नहीं दी जानी चाहिए. जिस तरह क्योटो प्रोटोकॉल के सीडीएम को अंतिम रूप दिया गया था उसके विपरीत वास्तविकता में हमें इस बार सभी देशों को उत्सर्जन में कमी के लक्ष्य को तय करना होगा.
इसलिए, कोई कारण नहीं है कि किसी भी देश को कार्बन उन्मूलन के लिए अपने सस्ते विकल्पों को "व्यापार" करने और "बेचने" के लिए सहमत होना चाहिए. बल्कि बदलाव के लिए जलवायु वित्त का इस्तेमाल किया जाना चाहिए. वहीं, बाजार का उपयोग परिवर्तनकारी कार्रवाई के लिए किया जाना चाहिए ताकि इस उपकरण के माध्यम से कार्बन कटौती लाने वाली प्रभावी परियोजनाओं का भुगतान किया जा सके. बाजार को सार्वजनिक नीति और मंशा से संचालित होना चाहिए और कार्बन ऑफसेट के नाम पर नए घोटालों को ईजाद करने के लिए नहीं छोड़ा जाना चाहिए.
यह वक्त है कि आरईडीडी+ या प्रकृति-आधारित समाधानों पर चर्चा गूढ़ तरीके से होनी चाहिए. हमें सचमुच चीजों को बड़े दायरे में देखना होगा. हमारे पास कार्बन उत्सर्जन प्रभाव को कम करने के लिए गरीब देशों और समुदायों की पारिस्थितिक संपदा का इस्तेमाल करने का अवसर है. जैसे पेड़ और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र कार्बन डाइऑक्साइड को पृथक करते हैं. इसलिए, इसे कार्बन स्टिक के रूप में नहीं बल्कि गरीबों की आजीविका और आर्थिक कल्याण के अवसरों के रूप में देखा जाना चाहिए. खासतौर से वनों के लिए कार्बन को कम करने के नियमों को इन सब बातों का ख्याल दिमाग में रखते हुए सोच -समझकर और आधुनिकता के साथ विकसित करना चाहिए.
यह सारी चीजें फिर दुनिया को अनुकूलन, जलवायु परिवर्तन के कारण हो रही नुकसान व क्षति की बहस में लाकर खड़ा करती हैं, जबकि यह एजेंडा पूरी तरह से बिना किसी पैसे या प्रभाव के संस्थानों, समितियों, निधियों की बहुलता में खो गया है. इस एजेंडे को बचाने की जरूरत है. यदि आप दुनिया के जरिए अभी तक अनुकूलन लक्ष्य की प्रगति को मापने के लिए तकनीकी पेपर को समझने की कोशिश करें तो आपको यह समझ में आएगा कि मैं क्या कह रही हूं. हम सभी जानते हैं कि हमारे बीच एक बड़ी चीज खड़ी है जिस पर हम चर्चा नहीं करना चाहेंगे, वह है वित्त. अब मुख्य तौर पर चर्चा अनुकूलन और नुकसान व क्षति पर होनी चाहिए. जलवायु परिवर्तन जनित चरम मौसम की घटनाओं के कारण देशों और समुदायों को होने वाले भयावह नुकसान की गणना करने के लिए हमें किसी रॉकेट साइंस की आवश्यकता नहीं है. यही कारण है कि कॉप 26 को वार्ता में पूर्वाग्रहों और कमजोर नेताओं से हारना नहीं चाहिए. आइए उम्मीद करते हैं कि यह कॉप बाहर खड़ा है और इसकी गिनती अलग होगी. यह हमारे समय की मांग है.
(साभार- डाउन टू अर्थ)
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