Lakhimpur Kheri
भाजपा के वो कार्यकर्ता जो लखीमपुर खीरी हिंसा में मारे गए
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में तीन अक्टूबर को जिन आठ लोगों की मौत हुई उनमें भाजपा के दो कार्यकर्ता, 26 वर्षीय शुभम मिश्रा और 32 वर्षीय श्याम सुंदर भी शामिल थे. मौत के बाद किसानों के शव तिकुनिया में घटना स्थल पर रखे गए. मांग थी कि जब तक गाड़ी चढ़ाने वालों पर कार्रवाई नहीं हो जाती, तब तक किसान मृतकों का दाह संस्कार नहीं करेंगे.
हिंसा के एक दिन बाद, सोमवार यानी 4 अक्टूबर को किसान नेता राकेश टिकैत लखीमपुर खीरी पहुंचे और उत्तर प्रदेश प्रशासन के साथ बातचीत की. समझौता हुआ कि मरने वाले चार किसानों के परिवारों को 45-45 लाख रुपए का मुआवजा और केंद्रीय मंत्री अजय मिश्र के बेटे आशीष मिश्र के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाएगी. इसके बाद किसानों के परिवार शव को अपने घर ले गए.
इस घटना में शुभम मिश्र और श्याम सुंदर के परिवार ने भी अपने सदस्य को खो दिए. दोनों की छोटी बेटियां हैं. घर पर बूढ़े माता-पिता और पत्नी है. लेकिन इन दोनों को अब तक मुआवजा देने की कोई बात नहीं हुई है. यहां तक की भाजपा द्वारा भी कोई आर्थिक सहायता इन तक नहीं पहुंची है.
एडीजी (लॉ एंड आर्डर) प्रशांत कुमार उस समझौते में मौजूद थे जिसमें मुआवजा तय हुआ था. उन्होंने न्यूज़लॉन्ड्री से पुष्टि की है कि भाजपा कार्यकर्ताओं के परिवारों को किसी भी मुआवजे का वादा नहीं किया गया है. उन्होंने कहा, “मुआवजे के लिए किसी ने या किसी पार्टी ने अपनी ओर से कोई मांग नहीं की है."
शुभम और श्याम सुंदर, दोनों ही गरीब परिवार से आते हैं, वह अपने पीछे भरा परिवार छोड़ गए हैं. श्याम सुंदर ने भाजपा के लिए आठ साल तो वहीं शुभम मिश्र पिछले पांच साल से भाजपा के लिए काम कर रहे थे.
हिंसा के दो दिन बाद 5 अक्टूबर को सोशल मीडिया पर एक वीडियो सामने आया. यह वीडियो 3 अक्टूबर का है. वीडियो में सफेद रंग की शर्ट पहने एक व्यक्ति दिखाई दे रहा है जिसके सिर से खून निकल रहा है और हाथ जोड़कर भीड़ के आगे बैठा हुआ है.
इस शख्स की पहचान 32 वर्षीय श्याम सुंदर के नाम से हुई. परिवार ने आखिरी बार श्याम सुंदर को जीवित इस वीडियो में ही देखा था.
3 अक्टूबर की सुबह 8 बजे श्याम सुंदर चाय पीकर घर से बनवीरपुर के लिए निकले थे. वह सिंघई इलाके में रहते थे जो कुश्ती मैच स्थल से करीब 25 किलोमीटर दूर है. श्याम, आशीष मिश्र के करीबी थे. वो दोनों एक दूसरे को बचपन से जानते थे. श्याम के पिता 65 वर्षीय बालकराम मिश्र बताते हैं, "मोनू (आशीष मिश्र) अकसर गांव आया करता था. मोनू के राजनीति में आने से पहले दोनों करीबी दोस्त थे. उनका रिश्ता भाई जैसा था."
लेकिन तीन अक्टूबर को कुछ ऐसा हुआ कि भाई समान आशीष अपने मृत दोस्त को पूछने तक नहीं आए. श्याम एक गरीब परिवार से आते हैं. उनका परिवार खेतों में मजदूरी करता है.
उनके परिवार में माता-पिता, पत्नी, दो बच्चे, तीन भाई और चार बहनें हैं. जब हम उनके घर पहुंचे तो पीली साड़ी में श्याम की पत्नी जमीन पर पड़ी थीं. श्याम सुंदर का नाम सुनते ही वह जोर-जोर से रोने लगती हैं. उनकी आंखे सूज गई हैं. उनकी ढाई साल की बेटी पास में चारपाई पर सोई थी और दूसरी बड़ी बेटी अपनी मां को जमीन पर रोते हुए देख रही थी.
वहीं आंगन में पिता, बहनें और दोस्त मायूस चेहरा लेकर बैठे हुए थे.
उस दिन श्याम सुंदर केंद्रीय मंत्री के गृह नगर बनवीरपुर में आशीष मिश्र द्वारा आयोजित कुश्ती मैच में भाग लेने के लिए घर से निकले थे. शाम करीब चार बजे खबर आने लगी कि कुश्ती मैच स्थल से महज दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित तिकुनिया इलाके में हिंसा हो गई है.
“हमारे गांव के कई लोग दंगल देखने गए थे. इसलिए गांव में हिंसा की खबर फैल गई. तभी हमें भी पता चला,” श्याम सुंदर के पिता 65 वर्षीय बालक राम मिश्रा ने कहा.
शाम 5 बजे श्याम सुंदर के दोस्त करण सिंह का फोन आया. “मुझे बताया गया था कि श्याम घायल हो गया था. मुझे यकीन नहीं हुआ. सोशल मीडिया और टीवी पर तरह-तरह के वीडियो आने लगे. फिर मुझे बताया गया कि उसे इलाज के लिए लखीमपुर लाया जा रहा है," करण बताते हैं.
रात 9 बजे तक करण सिंह लखीमपुर खीरी जिला अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में पहुंच चुके थे लेकिन वहां पहुंचते ही उन्हें पोस्टमार्टम वार्ड में बुला लिया गया. "जब मैं वहां गया, तो मैंने श्याम, हरी ओम और रमन कश्यप का शव देखा. हरी ओम भी मेरा दोस्त था. श्याम का शव रमन कश्यप के शव के ठीक बगल में था. मैंने तुरंत हरी ओम के परिवार को सूचित किया,” करण सिंह कहते हैं.
4 अक्टूबर की सुबह श्याम सुंदर का उनके गांव में अंतिम संस्कार किया गया.
श्याम सुंदर पिछले 12 वर्षों से आशीष मिश्र के मित्र थे. लेकिन भाजपा में उनकी सक्रिय भागीदारी आठ साल पहले शुरू हुई थी. "वह इस क्षेत्र में मंडल मंत्री (क्षेत्र के नेता) थे और यहां होने वाले किसी भी मुद्दे को देखते थे," करण सिंह ने बताया. करण खुद पांच साल से भाजपा से जुड़े हुए हैं.
घटना के बाद से, अजय मिश्र के परिवार के साथ लंबे संबंधों के बावजूद, श्याम सुंदर के परिवार का केंद्रीय मंत्री या उनके बेटे से संपर्क नहीं हुआ है. यह पूछे जाने पर कि क्या वे इस बात से परेशान हैं, श्याम सुंदर के पिता ने तुरंत कहा, "वे व्यस्त होंगे. ठीक है. हम समझते हैं."
यह पूछे जाने पर कि क्या उन्हें संदेह है कि आशीष मिश्र कार में श्याम सुंदर के साथ थे या नहीं, इस सवाल का जवाब "नहीं" मिलता है. "नहीं आशीष वहां नहीं था," श्याम सुंदर के पिता बालक राम मिश्र ने कहा.
श्याम सुंदर के परिवार ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि मृतक किसानों के परिवारों की तरह, वे भी मुआवजा चाहते हैं.
26 वर्षीय शुभम मिश्रा की शादी को तीन साल बीत गए हैं. उनकी एक छोटी बेटी है. न्यूज़लॉन्ड्री की टीम सुबह 10 बजे शुभम के घर पहुंची. उनके घर के बाहर कुर्सियों पर लोग बैठे थे. जबकि गली सुनसान पड़ी थी. शुभम के पिता, दोस्त और भाई घर के बाहर कुर्सी पर बैठे थे. वहीं शुभम की पत्नी और मां इस हालत में नहीं थे कि किसी से बात कर सकें. हमें देखते ही शुभम की दादी रोकर जमीन पर गिर गईं.
शुभम के पड़ोसी और बचपन के दोस्त प्रवीण मिश्र ने बताया, “2 अक्टूबर को शुभम मिश्रा को बुखार हो गया था. वह बिस्तर पर था और कहीं भी बाहर जाने से इनकार कर रहा था. बावजूद इसके, अगली सुबह 9 बजे शुभम मिश्रा आशीष मिश्र द्वारा आयोजित कुश्ती मैच में भाग लेने के लिए 80 किलोमीटर बनवीरपुर के लिए रवाना हुआ था."
शाम 4:30 बजे तक, प्रवीण मिश्र के पास एक स्थानीय पत्रकार मित्र का फोन आया जिसने उन्हें सूचित किया कि शुभम हिंसा के दौरान घायल हो गए हैं. प्रवीण ने शुभम के परिवार को तुरंत सूचित किया. परिवार के सभी लोग घबरा गए, वहीं शुभम का फोन भी बंद था.
रात 9 बजे तक शुभम के पिता, चाचा, उनके बड़े भाई और प्रवीण मिश्र पोस्टमार्टम वार्ड में पहुंचे जहां उन्होंने उसके शव की पहचान की. शुभम का अंतिम संस्कार 4 अक्टूबर की सुबह किया गया.
शुभम के पिता विजय मिश्रा के मुताबिक, “शुभम की हाल ही में आशीष मिश्र से दोस्ती हुई थी. शुभम हमेशा एक वफादार भाजपा समर्थक था. पिछले एक साल से शुभम इस क्षेत्र में बूथ अध्यक्ष (बूथ प्रभारी) के रूप में काम कर रहा था. शुभम ने भाजपा के लिए काम करने के अलावा एक निजी कंपनी के वित्त विभाग में भी काम किया था. वो खुद का व्यवसाय शुरू करने वाला था."
शुभम के परिवार के पास 7 से 8 एकड़ जमीन है जिस पर वे गन्ने की खेती करते हैं.
शुभम का परिवार और दोस्त उन्हें एक मिलनसार व्यक्ति के रूप में याद करते हैं जो आसानी से सभी के साथ घुल- मिल जाते थे. “वो आसानी से दोस्त बना लेता था. सब उसे बहुत पसंद करते थे. इसलिए उसे भाजपा में पद भी दिया गया.” प्रवीण मिश्र बताते हैं.
वहीं श्याम सुंदर की मां और पत्नी ने मीडिया से मिलने से इनकार कर दिया. शुभम के पिता ने हमें बताया कि 4 अक्टूबर को परिवार ने केंद्रीय मंत्री अजय मिश्र टेनी से बात की और उनके बेटे की हत्या करने वालों की जांच की मांग की. उन्होंने मुआवजे का आश्वासन दिया है.
लखीमपुर खीरी हिंसा की घटना ने जमीन पर लोगों को बांटने का काम भी कर दिया है. विजय मिश्रा घर के बाहर मीडियाकर्मियों से बातचीत करते हुए कहते हैं, "ये लोग किसान नहीं थे. ये लोग आतंकवादी थे."
शुभम का परिवार गम से अधिक गुस्से में है. “उन आतंकवादियों को किसान के रूप में क्यों दिखाया जा रहा है और हमें भाजपा कार्यकर्ता के रूप में दिखाया जा रहा है? क्या हम किसान नहीं हैं? जो लोग उस दिन विरोध कर रहे थे, वे किसान नहीं हैं, वे खालिस्तानी हैं,” विजय मिश्रा ने कहा.
बता दें कि नवंबर 2020 की बात है जब किसानों का विरोध दिल्ली पहुंचा था. तब आंदोलन को बदनाम करने के लिए सबसे पहले 'खालिस्तानी' शब्द का इस्तेमाल किया गया. वहीं भाजपा से जुड़े लोगों ने 'खालिस्तानी' शब्द को किसानों के विरोध से जोड़ा. इसे भाजपा आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने शुरू किया था. मीडिया के कुछ लोगों ने #AndolanmeinKhalistan जैसे हैशटैग का इस्तेमाल किया था.
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