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जलवायु परिवर्तन: दुनियाभर में 180 करोड़ लोगों पर खतरे की आशंका
जलवायु परिवर्तन के खिलाफ जितना जल्द ठोस कदम उठाए जाएंगे, उनकी मदद से सदी के अंत तक 180 करोड़ से ज्यादा लोगों को उष्णकटिबंधीय तूफानों का सामना करने से बचाया जा सकता है. इस पर हाल ही में किए एक शोध से पता चला है कि आने वाले कुछ दशकों में जिस तरह से जनसंख्या और वैश्विक तापमान में वृद्धि हो रही है उसके चलते पहले की तुलना में कहीं ज्यादा लोगों को उष्णकटिबंधीय चक्रवातों का सामना करना पड़ सकता है.
देखा जाए तो यह उष्णकटिबंधीय चक्रवात पहले ही दुनिया की सबसे विनाशकारी प्राकृतिक आपदाओं में से एक हैं. जिनके चलते पहले से हर साल करीब 15 करोड़ लोगों का जीवन खतरे में है. गौरतलब है कि इन उष्णकटिबंधीय चक्रवातों को उत्तरी अटलांटिक में हरिकेन और उत्तर पश्चिमी प्रशांत महासागर में टाइफून के नाम से जाना जाता है.
बढ़ती आबादी और तापमान में हो रही वृद्धि ने इस जोखिम को और बढ़ा दिया है. विशेष रूप से पूर्वी अफ्रीकी देशों और अमेरिका के तटवर्ती इलाकों में इनसे सबसे ज्यादा खतरा है. अनुमान है कि जिस तेजी से आबादी बढ़ रही है उसके चलते कुछ पूर्वी अफ्रीकी देशों में तूफान का यह खतरा 300 फीसदी और अमेरिका में 100 फीसदी तक बढ़ जाएगा, जबकि अरब प्रायद्वीप में भी यह खतरा पहले के मुकाबले काफी बढ़ जाएगा. यह जानकारी हाल ही में जर्नल नेचर क्लाइमेट चेंज में प्रकाशित एक शोध में सामने आई है.
शोध से पता चला है कि यदि विश्व के औसत तापमान में एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है तो इन तूफानों का सामना करने वाले लोगों की संख्या पहले की तुलना में करीब 26 फीसदी बढ़ जाएगी. यह आंकड़ा करीब 3.3 करोड़ होगा. अनुमान है कि 2050 तक वैश्विक आबादी अपने चरम पर पहुंच जाएगी, उसके बाद इसमें गिरावट आना शुरू हो जाएगी.
यदि 2050 तक जलवायु परिवर्तन को कम करने पर विशेष ध्यान न दिया गया तो अनुमान है कि इसके चलते तापमान में हो रही वृद्धि 2 डिग्री सेल्सियस के करीब पहुंच जाएगी. जिसके चलते लोगों के इन तूफानों की जद में आने का खतरा करीब 41 फीसदी बढ़ जाएगा. इसका मतलब है कि तापमान में हो रही इस वृद्धि के चलते भविष्य में और 5.2 करोड़ लोग इन तूफानों का सामना करने को मजबूर हो जाएंगे.
बढ़ते जोखिम को कम करने के लिए जल्द उठाने होंगे कड़े कदम
वहीं दूसरी तरफ यदि जलवायु में आने वाले बदलावों को रोकने के लिए पुरजोर कोशिश की जाती है और उसके बाद सदी के अंत तक हम तापमान में हो रही वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस पर रोकने में कामयाब रहते हैं तो भी इन तूफानों का सामना करने को मजबूर लोगों की संख्या में 20 फीसदी का इजाफा होना तय है, जो करीब 2.5 करोड़ के करीब होगा.
ऐसे में शोधकर्ताओं का अनुमान है कि यदि जलवायु में आ रहे बदलावों को रोकने के लिए अभी ठोस कदम उठाएं गए तो सदी के अंत तक करीब 180 करोड़ लोगों को इन तूफानों से बचाया जा सकता है.
हाल ही में विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) द्वारा जारी एक रिपोर्ट के हवाले से पता चला था कि पिछले 50 वर्षों में मौसम और जलवायु से जुड़ी आपदाओं में अब तक 20 लाख से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है, साथ ही इनसे करीब 266 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है, जिसमें तूफानों से होने वाला नुकसान भी शामिल है.
यदि इस अवधि की 10 सबसे विनाशकारी आपदाओं की बात करें तो उनमें उष्णकटिबंधीय तूफान, सूखे के बाद दूसरे स्थान पर थे, जिनमें करीब 577,232 लोगों की जान गई थी, जोकि पिछले 50 वर्षों के दौरान मौसम और जलवायु सम्बन्धी आपदाओं में मारे गए लोगों का करीब 38 फीसदी है. इस रिपोर्ट में भी तापमान में हो रही वृद्धि को उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की संख्या और तीव्रता में हो रही वृद्धि के लिए जिम्मेवार माना है.
वहीं यदि तापमान में हो रही वृद्धि की बात करें तो संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी एक हालिया रिपोर्ट से पता चला है कि इस बात की करीब 40 फीसदी संभावनाएं है कि अगले पांच वर्षों में वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार कर जाएगी.
गौरतलब है कि 2020 अब तक का सबसे गर्म वर्ष था जब तापमान में हो रही वृद्धि 1.28 डिग्री सेल्सियस दर्ज की गई थी. जबकि संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रकाशित "एमिशन गैप रिपोर्ट 2020" के अनुसार सदी के अंत तक तापमान में हो रही वृद्धि 3.2 डिग्री सेल्सियस के पार चली जाएगी. ऐसे में उष्णकटिबंधीय तूफानों के बढ़ते खतरे से बचने के लिए यह जरूरी है कि तापमान में हो रही वृद्धि को रोकने के लिए जितना जल्द हो सके ठोस कदम उठाएं जाएं.
(डाउन टू अर्थ से साभार)
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