Report
2019 में भारत की जीडीपी से भी है ज्यादा थी प्लास्टिक उत्पादन की सामाजिक लागत
2019 में जितनी प्लास्टिक का उत्पादन किया था यदि उसकी समाज और पर्यावरण पर पड़ने वाली लागत को देखें तो वो करीब 271 लाख करोड़ रुपए (3.7 लाख करोड़ डॉलर) आंकी गई है, जो भारत की जीडीपी से भी ज्यादा है. यह जानकारी हाल ही में डब्ल्यूडब्ल्यूएफ द्वारा जारी रिपोर्ट में सामने आई है. यह लागत प्लास्टिक के अनुमानित जीवनकाल पर आधारित है जिसमें इसका उत्पादन, उपभोग और निपटान शामिल है.
रिपोर्ट के अनुसार यदि अभी कार्रवाई नहीं की गई तो 2040 तक यह लागत बढ़कर 520.2 लाख करोड़ रुपए (7.1 लाख करोड़ डॉलर) पर पहुंच जाएगी, जो 2018 में वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य पर किए गए कुल खर्च का करीब 85 फीसदी है. वहीं 2019 में जर्मनी, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया की जितनी कुल जीडीपी था, उससे भी ज्यादा है.
हाल के दशकों में प्लास्टिक का उत्पादन तेजी से बढ़ा है, एक शोध से पता चला है कि हम 1950 से लेकर अब तक 830 करोड़ टन से अधिक प्लास्टिक का उत्पादन कर चुके हैं जिसके 2025 तक दोगुना हो जाने का अनुमान है. दुनिया भर में हर मिनट 10 लाख पीने के पानी की बोतलें खरीदी जाती हैं जो प्लास्टिक से बनी होती है.
रिपोर्ट के मुताबिक प्लास्टिक पर्यावरण और समाज को कितना नुकसान पहुंचा रहा है, सरकारें इसका ठीक तरह से आंकलन करने में विफल रही हैं. यही वजह है कि इसका ठीक तरह से प्रबंधन नहीं हो रहा है, जिसकी बढ़ती पर्यावरण, सामाजिक और आर्थिक लागत का बोझ देश उठा रहे हैं.
आज भी कई देशों में इनसे जुड़े नियमों का अभाव है. यही नहीं कई जगहों पर आज भी अनजाने में ही सही पर इन्हें सब्सिडी दी जा रही है. रिपोर्ट की मानें तो प्लास्टिक की पर्यावरण और समाज द्वारा चुकाई जाने वाली कीमत उसकी प्राथमिक उत्पादकों द्वारा भुगतान किए गए बाजार मूल्य से कम से कम 10 गुना ज्यादा है.
अनुमान है कि यदि ऐसा ही चलता रहा तो 2040 तक प्लास्टिक का उत्पादन दोगुना हो जाएगा. इसी तरह समुद्र में पहुंचने वाला प्लास्टिक प्रदूषण भी तीन गुना बढ़कर 2.9 करोड़ टन पर पहुंच जाएगा. इससे समुद्रों में मौजूद कुल प्लास्टिक की मात्रा 60 करोड़ टन पर पहुंच जाएगी. इसी तरह यदि प्लास्टिक के पूरे जीवनचक्र की बात करें तो उससे जितनी ग्रीनहाउस गैसों (जीएचजी) का उत्सर्जन हो रहा है वो वैश्विक कार्बन बजट का करीब 20 फीसदी तक होगा, जिस पर ध्यान न दिया गया तो जलवायु संकट और बढ़ सकता है.
जलवायु के लिए भी बड़ा खतरा है प्लास्टिक
2019 में एक टन प्लास्टिक की उत्पादन लागत करीब 1,000 डॉलर थी. हालांकि इसके पूरे जीवनचक्र में जो कीमत हमें चुकानी पड़ती है, वो इससे कहीं ज्यादा थी. उदाहरण के लिए इसके जीवनचक्र में जो ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होगा, उसकी कीमत करीब 12.5 लाख करोड़ रुपए (17,100 करोड़ डॉलर) बैठेगी. वहीं 2019 में जितना प्लास्टिक निर्मित किया गया है, उससे उत्पन्न होने वाले कचरे के प्रबंधन पर करीब 2.3 लाख करोड़ रुपए (3,200 करोड़ डॉलर) का खर्च आएगा.
यही नहीं प्लास्टिक को पूरी तरह नष्ट होने में सैकड़ों से हजारों वर्ष लग जाते हैं. जैसे-जैसे यह छोटे-छोटे कणों में टूटता है, इसे इकट्ठा करना मुश्किल हो जाता है. इसकी वजह से यह पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है. अनुमान है कि 2019 में जितना प्लास्टिक उत्पादन किया गया है, उतना यदि प्रदूषण के रूप में समुद्रों तक पहुंच जाता है तो उससे पर्यावरण को करीब 226.8 लाख करोड़ रुपए (3.1 लाख करोड़ डॉलर) जितना नुकसान होगा.
हालांकि रिपोर्ट के अनुसार, प्लास्टिक की लागत का यह जो अनुमान लगाया गया है वो इससे कहीं ज्यादा हो सकता है, क्योंकि मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण पर इसके पड़ने वाले प्रभावों का पूरी तरह से अनुमान लगा पाना आसान नहीं है.
क्या है समाधान
इसमें कोई शक नहीं की प्लास्टिक ने हमारी कई तरीकों से मदद की है. प्लास्टिक एक सस्ता विकल्प है, यही वजह है कि इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है. पर इस प्लास्टिक के साथ समस्याएं भी कम नहीं हैं. आज जिस तेजी से इस प्लास्टिक के कारण उत्पन्न हुआ कचरा बढ़ता जा रहा है, वो अपने आप में एक बड़ी समस्या है जिसने न केवल धरती बल्कि समुद्रों को भी अपने आगोश में ले लिया है.
ऐसे में इस समस्या पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है. कई प्रमुख संगठनों ने इससे निपटने के लिए सर्कुलर इकोनॉमी को अपनाने का प्रस्ताव दिया है, जिसका उद्देश्य प्लास्टिक को पर्यावरण में पहुंचने से रोकना है. अनुमान है कि इसकी मदद से हम महासागरों में प्रवेश करने वाले प्लास्टिक की मात्रा को 80 फीसदी तक कम कर सकते हैं. साथ ही इससे होने वाले जीएचजी उत्सर्जन को 25 फीसदी तक कम किया जा सकता है.
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ने भी संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देशों से एक वैश्विक संधि पर बातचीत शुरू करने का आग्रह किया है, जो प्लास्टिक के जीवनचक्र के सभी चरणों से निपटने के लिए आवश्यक है, जिससे 2030 तक महासागरों में बढ़ते प्लास्टिक प्रदूषण को रोका जा सके.
(डाउन टू अर्थ से साभार)
Also Read
-
The sacred geography they bulldozed: How Modi’s vision erased Kashi
-
Locked doors, dry taps, bidis and bottles: The ‘World City’ facade of Delhi’s toilets
-
I-T dept cracked down on non-profits with a law that didn’t apply. Tribunals kept saying no
-
Hafta letters: To bleep or not to bleep? Subscribers have their say on Subramanian Swamy interview
-
एक्स, यूट्यूब, इंस्टाग्राम पर एक्शन, सवाल पूछने वालों पर सरकार की सख्ती का आरोप