Ground Report Videos
‘अस्पताल की लापरवाही से मैंने एक ही दिन में दो भाइयों को खो दिया’
‘‘मैं यह महसूस कर सकता हूं कि मेरा छोटा भाई तड़प-तड़प कर मरा होगा. उसकी आवाज़ नहीं निकल रही थी. फोन पर हम पूछते कि डॉक्टर आए? दवा दिए? तो वो जवाब ना में ही देता था. उसे इलाज नहीं मिला. मर गया. बड़े भाई के साथ भी यही हुआ. उन्हें तो कोरोना वार्ड में लेकर हमें ही जाना पड़ा था. सुबह के सात बजे, दस मिनट के अंतर से मेरे दोनों भाइयों की मौत की खबर आई. हमारा पूरा परिवार टूट गया.’’ यह कह कर हुए 44 वर्षीय प्रवीण कुमार अपने बुजुर्ग पिता की तरफ देखने लगते हैं. उन्हें भी तेज़ खांसी आ रही थी.
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिला मुख्यालय से बारह किलोमीटर दूर जंघेड़ा शमसपुर गांव के रहने वाले प्रवीण के घर पर सन्नाटा पसरा हुआ है. उनके बड़े भाई 47 वर्षीय अरविन्द कुमार और छोटे भाई 32 वर्षीय अश्विनी कुमार की कोरोना से 27 अप्रैल को मोत हो गई. अरविंद जिला अस्पताल सेठ बलदेव दास बाजेरिया में और अश्विनी पीजीआई में भर्ती थे.
प्रवीण अपने भाइयों के असमय निधन के लिए सरकारी अस्पतालों पर लापरवाही का आरोप लगाते हैं. पास में ही बैठी उनकी बहन कहती हैं, ‘‘पता होता कि वो लोग इलाज नहीं कर रहे हैं. मरीजों को मार दे रहे हैं तो हम अस्पताल भेजते ही नहीं. मेरे भाई हट्ठे-कट्ठे थे. जिस दिन मेरा छोटा भाई मरा उसी दिन उसका जन्मदिन था.’’
उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड में जूनियर इंजीनियर पद पर तैनात प्रवीण कुमार बताते हैं, ‘‘22 अप्रैल को छोटे भाई को बुखार आया था. गांव के ही डॉक्टर से दवाई लेकर खा लिया. बुखार कम हो गया लेकिन शाम को बुखार फिर बढ़ गया. उसने हल्के में लिया. 24 अप्रैल तक यह सब चलता रहा. दवा लेता ठीक हो जाता फिर बुखार आ जाता. 24 अप्रैल को उसकी स्थिति बिगड़ गई. सांस लेने में परेशानी होने लगी. उसकी छाती में बलगम जम गया था जिससे वो बोल भी नहीं पा रहा था, उठने-बैठने में परेशानी हो रही थी.’’
परिवार इस हालत में उन्हें लोकर सहारनपुर शहर गया. वहां सक्षम अस्पताल वालों ने बताया गया कि ऑक्सीजन लेवल 80 हो गया है. उनके पास ऑक्सीजन नहीं थी इसलिए उन्होंने मरीज को भर्ती नहीं किया. इसी तरह कई अस्पतालों में भटकने के बाद ये लोग पीजीआई पहुंचे. तब तक मरीज का कोरोना टेस्ट नहीं हुआ था.पीजीआई के इमरजेंसी वार्ड में उन्हें भर्ती कर दिया गया. रात ढाई बजे सैंपल लिया गया. 25 अप्रैल को उनकी रिपोर्ट पॉजिटिव आई तब उन्हें कोरोना वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया.
बड़े भाई अरविंद तब तक ठीकठाक थे. वो सहारनपुर में ही एक फैक्ट्री में काम करते थे. उनके जुड़वां बेटे हैं. वहीं अश्विनी की शादी जून में तय थी. वे प्रवीण के साथ ही उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड में संविदा पर लाइनमैन का काम करते थे.
प्रवीण के परिवार के लिए 25 अप्रैल का दिन मुश्किलों भरा रहा. वे कहते हैं, ‘‘दोपहर 12 बजे छोटे भाई अश्विनी को कोरोना वार्ड में शिफ्ट किया गया. उसे पांचवीं मंजिल पर रखा गया था. देर रात तक उसके पास कोई भी डॉक्टर नहीं गया. वो बोल नहीं पा रहा था ठीक से. हम जब भी फ़ोन करते तो हां और ना में जवाब देता था. उसका ऑक्सीजन लेवल गिर रहा था. शाम को उसने बताया कि कोई भी डॉक्टर या नर्स उसे देखने तक नहीं गया था. यह लापरवाही नहीं है तो क्या है? हमने उसकी हिम्मत बढ़ाई. रात निकल गई. दूसरे दिन सुबह 12 बजे तक कोई भी उसके पास देखने नहीं आया. वो फोन पर कहता था कि मुझे कोई यहां देख नहीं रहा. मेरे पास आ जाओ. हम ऊपर जा सकते नहीं थे. मैं आज महसूस कर सकता हूं कि मेरा भाई तड़प-तड़प कर मरा होगा.’’ यह कहते हुए प्रवीण रोने लगते हैं.
''उसे पीने को भी कुछ मिल नहीं रहा था. बड़े भाई उसके पास जूस लेकर गए. वे तब तक ठीक थे. उनको सीजनल खांसी थी. उस दिन लिफ्ट खराब थी तो वे सीढ़ियों से पांचवें फ्लोर तक गए, जहां छोटे भाई को रखा गया था. जूस देकर जब लौट रहे थे तो उनकी सांस उखड़ने लगी. तेज खांसी शुरू हो गई. शाम तक बेतहाशा खांसी होने लगी. इधर छोटा भाई आईसीयू में जा चुका था. उधर हम बड़े भाई को लेकर कई अस्पतालों में भाग रहे थे. लेकिन किसी ने भी भर्ती नहीं किया. किसी ने कहा ऑक्सीजन नहीं है, किसी ने बोला बेड नहीं है. अंत में हम जिला अस्पताल सेठ बलदेव दास बाजेरिया लेकर पहुंचे. वहां पर कोरोना टेस्ट हुआ तो उनकी रिपोर्ट भी पॉजिटिव आई.’’ प्रवीण बताते हैं.
प्रवीण कहते हैं, ‘‘पॉजिटिव आने के बाद अस्पताल कर्मचारियों ने हमें कोरोना वार्ड की तरफ इशारा कर दिया. हमें लगा की कोई डॉक्टर या यहां काम करने वाला लेकर जाएगा, लेकिन कोई भी नहीं आया. हमें ही उन्होंने कोरोना वार्ड में ले जाने के लिए बोला गया. हम मज़बूर थे. भाई को कोरोना वार्ड में लेकर पहुंचे. वहां काफी गंदगी थी. इधर-उधर मास्क पड़ा हुआ था. हमने बेड का चादर ठीक कर भाई को रखा. उनका भी ऑक्सीजन लेवल कम हो रहा था. अस्पताल वालों ने कहा खुद ही लगाओ ऑक्सीजन मास्क. वे छू तक नहीं रहे थे. न जाने किस बात के डॉक्टर थे. बड़े भाई को भर्ती कर मैं भाभी को छोड़ने गांव लौट आया.’’
‘काली सुबह’
प्रवीण के एक भाई जिला अस्पताल में दूसरा भाई पीजीआई में भर्ती थे. 27 अप्रैल की सुबह-सुबह वे शहर जाने के लिए निकले तब उन्हें उम्मीद थी कि उनके भाई ठीक होंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
प्रवीण बताते हैं, ‘‘सुबह के करीब सात बजे मैं जिला अस्पताल अपने बड़े भाई को देखने पहुंचा. वहां पहुंचते ही पता चला कि रात में ही उनकी मौत हो चुकी थी. दस मिनट भी नहीं हुए की एक रिश्तेदार का फोन आया. जो पीजीआई में काम करते थे. उन्होंने बताया की छोटे भाई की भी देर रात मौत हो गई. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूं. हम तीन भाई थे. दो एक साथ ही दुनिया से चले गए. मैं टूट गया. मेरे आंखों के सामने अंधेरा छा गया.’’
घर के सामने लगी फुलवारी की तरफ इशारा करते हुए प्रवीण की बहन कहती हैं, ‘‘ये मेरे छोटे भाई ने लगाया था. उसे पेड़-पौधे लगाने का बेहद शौक था. दो महीने बाद उसकी शादी तय थी.’’
सामने खड़े लड़कों की तरफ इशारा करते हुए प्रवीण कहते हैं, ‘‘ये दोनों मेरे बड़े भाई के जुड़वां लड़के हैं. मेरे भाइयों की मौत इलाज नहीं होने के कारण हुई है. यह बात मैं एक सरकारी कर्मचारी होते हुए भी कह रहा हूं कि अस्पताल प्रशासन ने जमकर लापरवाही की. आपने पीजीआई में हो रहे लापरवाही वाला वीडियो देखा ही होगा. (वो हमें एक वीडियो दिखाते हैं ). मेरे भाई का ऑक्सीजन लेवल गिर रहा था, लेकिन उसे कोई दवाई देने तक नहीं गया. जिला अस्पताल में तो और भी बुरा हाल है. मेरे भाइयों की मौत सरकारी लापरवाही के कारण हुई. मैं मानता हूं कि डॉक्टर्स पर दबाव हैं, लेकिन यहां डॉक्टर मरीजों को ठीक से देख तक नहीं रहे हैं.’’
डर की वजह से नहीं हुआ बाकियों का टेस्ट
एक परिवार में दो लोगों की मौत कोरोना की वजह से हो गई. क्या इसके बाद बाकी परिजनों का कोरोना टेस्ट हुआ. ये सवाल जब हमने प्रवीण कुमार से किया तो वे कहते हैं, ‘‘भाभी क्वारंटाइन है. दो मौतों के बाद घर में डर फ़ैल गया जिसके बाद टेस्ट नहीं कराया गया. घर पर किसी की तबीयत खराब भी नहीं है. हमने पूरे घर को सेनेटाइज कराया है. अभी सब ठीक हैं. उनको गुजरे भी अब दस दिन से ज़्यादा समय हो गया.’’
लेकिन यह सरकारी लापरवाही का एक और चेहरा है. एक परिवार में दो लोगों की मौत कोरोना की वजह से हो गई लेकिन प्रशासन या स्वास्थ्य विभाग से कोई भी टेस्ट करने नहीं आया. जबकि यह लम्बे समय से नियम का हिस्सा रहा है कि किसी कोरोना पॉजिटिव आने के बाद उसके संपर्क में रहे लोगों का प्रशासन टेस्ट करता हैं.
पीजीआई में बदहाली की शिकायत करने वाले प्रवीण अकेले नहीं
सहारनपुर में गुरुवार को कोरोना के 880 नए मामले सामने आए जिसमें से 13 मरीजों की मौत हुई. 13 मरीजों के मौत के साथ जिले में कोरोना से मरने वालों की संख्या 301 हो गई. जिले में कुल संक्रमित मरीजों की संख्या 22,311 हो गई है.
सहारनपुर में पिलखुआ में बना राजकीय मेडिकल कॉलेज यानी पीजीआई कोरोना का सबसे बड़ा अस्पताल है. यहां जिले में अभी सबसे ज़्यादा मरीज भर्ती हैं. गुरुवार को जिन 13 लोगों की मौत हुई उनमें से 11 सिर्फ पीजीआई से ही थे.
यहां के आसपास के गांवों के लोगों में एक बात बैठ गई है कि पीजीआई में इलाज के लिए गए सौ में 90 लोगों की मौत हो जाती है. यह बात हमें कई गांव में लोगों से सुनने को मिलती है. लोग अस्पताल कर्मचारियों की लापरवाही का जिक्र करते नजर आते हैं.
जब रात दस बजे पीजीआई में न्यूजलॉन्ड्री की टीम पहुंची तो एक एम्बुलेंस आकर रुकी. जिसमें एक मरीज ऑक्सीजन की कमी के कारण परेशान से थे. परिजन भर्ती करने की गुजारिश कर रहे थे. उनसे बात करने आए डॉक्टर ने कहा, ‘‘हमारे पास छह बेड खाली है, लेकिन वेंटिलेटर नहीं है. कई स्वास्थकर्मी यहां से डर कर भाग गए हैं.’’
डॉक्टर अपनी बात कहते रहे और मरीज के परिजन अपनी. इसी बीच गार्ड से कुछ नौजवान बहस कर रहे थे. दरअसल इसमें से एक आर्यन सिंह के पिता का बीते एक सप्ताह से अंदर इलाज चल रहा हैं. आर्यन गार्ड से इसलिए लड़ रहे थे क्योंकि शाम सात बजे के करीब में उन्होंने अपने पिताजी को पानी और खाना भेजा था, लेकिन तीन घंटे बाद तक वह उन तक नहीं पहुंचा था.
आर्यन बताते हैं, ‘‘एक तो अंदर उन्हें पानी नहीं मिल पा रहा है. हम बाहर से खरीदकर दिए, लेकिन तीन घंटे हो गए उन तक पानी नहीं पहुंचा है. मेरे पिताजी बता रहे थे कि एक रोज उनके बेड के आसपास दो लाश पूरी रात पड़ी रही, लेकिन कोई उठाने नहीं आया. जब हम उनसे देरी का कारण पूछते हैं तो वे कहते हैं की ना हमारे पास वार्ड बॉय है और ना ही डॉक्टर हैं. कोई सुनने को तैयार नहीं है.’’
आर्यन सिंह के साथ अस्पताल आए उनके दोस्त प्रशांत सिंह कहते हैं, ‘‘यहां पर मरीजों की ठीक से देखभाल नहीं हो रही है. अगर हम ऑक्सीजन की बात करते हैं तो रात को आठ बजे निकाल दी जाती है. सुबह सात बजे जब मरीज फोन करके अपने परिजनों को बताते है. उसके बाद इधर-उधर फोन करने पर ऑक्सीजन लगता है. डॉक्टर हाथ जोड़कर कहते हैं हमारे पास ऑक्सीजन नहीं है.’’
सहारनपुर के दालमंडी पुल के पास रहने वाले 63 वर्षीय नरेश अग्रवाल के बेटे 32 वर्षीय मोहित अग्रवाल का बीते एक सप्ताह से पीजीआई में इलाज चल रहा है. मोहित के साथ-साथ उनकी गर्भवती पत्नी भी कोरोना पॉजिटिव हैं और उनका घर में ही इलाज चल रहा है. अग्रवाल कोरोना वार्ड से सौ मीटर दूर अस्पताल परिसर में खुले आसमान के नीचे चादर बिछा कर दिन-रात गुजार रहे हैं. बाकी परिजनों की तरह ये भी पीजीआई पर लापरवाही का आरोप लगाते हैं.
वो न्यूजलॉन्ड्री को बताते हैं, ‘‘यहां कोई डॉक्टर मरीजों के पास जा ही नहीं रहा है. मेरे बेटे का ऑक्सीजन लेवल 45 है. कम से कम उसके पास तो जाना चाहिए. एक सप्ताह से यहां भर्ती है लेकिन कोई बदलाव नहीं उसके स्वास्थ्य में. मैंने एसडीएम को पचास बार से ज़्यादा फोन किया. एसडीएम ने कहा कि मैं अंदर हूं और डॉक्टर को देखने के लिए बोल रहा हूं. पता नहीं डॉक्टर से बोला या नहीं बोला. मैंने कई बार डॉक्टर से बहस की लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है. हम बहुत परेशान हैं.’’
मरीजों के परिजनों के मुताबिक अस्पताल में मरीजों के पास डॉक्टर नहीं जा रहे हैं. वार्ड बॉय उनकी देखभाल नहीं कर रहे हैं. उन्हें समय पर खाना और पानी तक नहीं मिल पाता है. दूसरी तरफ परिजनों को अपने मरीजों को देखने तक की इजाजत नहीं है. परिजनों को मरीज के स्थिति में बारे में जानकारी तब मिलती है जब वे या तो मर जाते हैं या ठीक हो जाते हैं. न्यूजलॉन्ड्री ने इसको लेकर पीजीआई प्रशासन से बात करने की कोशिश की.
Also Read: मेरठ: ऑक्सीजन नहीं मिली, अस्पताल के बाहर मौत
Also Read
-
‘Genuine’ vs ‘political’: The social media campaign pitting Ranchi protests against CJP
-
A day inside a Delhi SIR camp: Forms, confusion and long days
-
The crisis after the flood in Assam villages: Lost livestock, missed crop, and wait for aid
-
‘One-shot exam wrong way to select students’: Former education secy R Subrahmanyam
-
Arundhati Roy: ‘Message from Jantar Mantar is bigger than electoral defeat’