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उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य सेवा के मलबे में दबी गई पत्रकार विनय श्रीवास्तव की मौत
"अस्पताल वालों ने केवल एक डॉक्यूमेंट न होने के कारण उनको भर्ती नहीं किया," खीझे हुए हर्षित श्रीवास्तव ने उत्तर प्रदेश के लखनऊ से हमें फोन पर यह बात बताई. कुछ घंटे पहले ही उन्होंने अपने पिता विनय श्रीवास्तव को कोविड के कारण खोया था. उनकी आवाज दुःख और गुस्से से कांप रही थी. ये 17 तारीख़ की बात है और तब तक विनय श्रीवास्तव के वो टवीट्स जिन्हें पोस्ट किये पूरे 24 घंटे भी नहीं हुए थे, वायरल हो चुके थे.
65 वर्षीय पत्रकार विनय द्वारा टवीट्स की एक पूरी श्रृंखला ही पोस्ट कर दी गयी थी. इन ट्वीट्स में वो लगातार और बहुत जल्दी-जल्दी अपने ऑक्सीजन के गिरते स्तर के बारे में बता रहे थे और खुद को हस्पताल में भर्ती करने की विनती कर रहे थे. वो जिन लोगों और संस्थाओं से ये याचना कर रहे थे उनमें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी शामिल थे. लेकिन अंत तक कहीं से कोई मदद नहीं मिली और बहुत जल्द ही उनकी मौत हो गयी.
ट्विटर पर मानो उनकी मौत का सीधा प्रसारण चल रहा था और इन ट्वीट्स ने उत्तर प्रदेश की ढह चुकी स्वास्थ्य सेवाओं के तंत्र के साथ ही इसके कर्मचारियों, अधिकारियों की बेरहमी की भी पोल खोलकर रख दी.
पिछले कुछ हफ़्तों से भारत कोरोन वायरस महामारी की नयी लहर की निर्मम गिरफ़्त में है. इसी वजह से बीते 20 अप्रैल को देश भर में एक ही दिन में कुल 2,95,158 संक्रमितों और 2,023 मौतों का आंकड़ा दर्ज किया गया. उसी दिन 162 मौतों के आंकड़ों के साथ उत्तर प्रदेश अपेक्षाकृत कम प्रभावित लगता है लेकिन योगी आदित्यनाथ की सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर वास्तविक आंकड़ों को छिपाने को लेकर खबरें आने लगी हैं. हालांकि राज्य भर से आ रही रिपोर्ट्स, ढहती स्वास्थ्य सेवाओं, अपनी क्षमता से कई गुना ज्यादा भर चुके श्मशानों और सरकार की इससे निपटने की लापरवाहियों हर दिन उजागर हो रही है.
विनय की दर्दनाक मौत उत्तर प्रदेश की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था की तस्वीर बयां करती है. उन्हें केवल इसलिए हस्पताल में भर्ती नहीं किया गया क्योंकि वो मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) से अनुमति नहीं ले पाये. योगी आदित्यनाथ की सरकार ने किसी भी कोविड के मरीज को हस्पताल में भर्ती करने के लिए सीएमओ से अनुमति प्राप्त करना अनिवार्य र रखा था. हालांकि अब काफी लानत-मलानत के बाद इस व्यवस्था को वापस ले लिया गया है.
इसके पीछे का तर्क ये है कि इससे बेहतर समन्वय और निगरानी हो पायेगी. लेकिन आलोचकों का कहना है कि ये सब आंकड़ों को कम करके दिखाने के लिए ही किया जा रहा है.
विनय द्वारा सबसे पहले तीन हस्पतालों को एसओएस भेजा गया- जगरानी हस्पताल, रीजेंसी सुपर स्पेशिएलिटी हस्पताल, और बलरामपुर हस्पताल- तीनों ने उन्हें भर्ती करने से इंकार कर दिया. "कारण बेड्स की अनुपलब्धता और मरीज के कोविड से ग्रस्त होने को सुनिश्चित करने वाले सीएमओ के पत्र का न होना बताया गया," हर्षित ने स्पष्ट किया. " "यही दोनो कारण मेरे पिता की मौत के कारण बने."
हर्षित ने कुछ प्राइवेट डॉक्टरों को भी फोन किया लेकिन उन्होंने भी उनके पिता को देखने से इंकार कर दिया. "उनकी आरटीपीसीआर रिपोर्ट हमें आज मिली है," उनके पिता की मौत के बाद, 19 अप्रैल को उन्होंने हमें बताया. "और डॉक्टर्स हम से इस रिपोर्ट के बिना बात ही नहीं करते."
हर्षित का कहना है कि ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए उन्होंने करीब 40 प्राइवेट वैंडर्स को फोन किया पर कहीं भी बात नहीं बनी.
17 अप्रैल की शाम तक विनय का ऑक्सीजन सैचुरेशन 57 प्रतिशत के डरावने स्तर तक गिर गया- 95 प्रतिशत से कम होने पर हस्पताल में भर्ती होने की सलाह दी जाती है- और हर्षित ने पागलों की तरह हर उस सरकारी हैल्पलाइन पर फोन किया जो उन्हें पता चली. कहीं से कोई जवाब नही मिला. कुछ घंटों बाद विनय के ऑक्सीजन का स्तर 31 प्रतिशत तक गिर गया और जल्द ही उनकी मौत हो गयी.
"स्थिति भयावह है," गुस्से से भरे हुए हर्षित ने कहा. "इस सरकार ने जो वक़्त अयोध्या में मंदिर बनाने में लगाया वही वक़्त अस्पताल खोलने में लगाया जा सकता था."
अगर हर्षित के पिता जीवित होते तो वो जरूर उनकी इस बात का समर्थन करते. अपनी मौत से करीब 15 दिन पहले विनय ने एक वैश्विक महामारी के दौरान आयोजित की गई चुनावी रैलियों के औचित्य पर सवाल उठाये थे.
हस्पतालों में ऑक्सीजन नदारद
विनय और हर्षित के हस्पतालों में बेड पाने का संघर्ष निरर्थक साबित हुआ. फलस्वरूप अनेक पत्रकार उत्तर प्रदेश सरकार पर बरस पड़े. कुछ खुद को पेश आई मुश्किलों की कहानियां सुनाने लगे.
ऐसे ही कुछ कारणों से बीते 16 अप्रैल को अपनी मां को खो देने वाले लखनऊ के एक स्वतंत्र पत्रकार, राजीव श्रीवास्तव ने "फर्जी आंकड़ों और जमीनी हक़ीक़त से बेख़बर नेतृत्व", को इस सब का दोषी ठहराया.
“आरटीपीसीआर टेस्ट की रिपोर्ट आने में चार दिन लग जाते हैं और मेरी मां को सांस लेने में तकलीफ हो रही थी इसलिए हमने गोमती नगर के एक निजी हस्पताल से उनको भर्ती करने का आग्रह किया," राजीव ने बताया.
जिस वक्त 12 अप्रैल को उन्हें हस्पताल में भर्ती किया गया तब उनका ऑक्सीजन का स्तर 78 प्रतिशत था. जिस वाहन से ऑक्सीजन लाया जाना था उसका एक टायर पंक्चर हो गया और इसलिए करीब एक घंटे तक ऑक्सीजन की आपूर्ति नही हो पायी," राजीव ने आगे बताया.
जब तक ऑक्सीजन की आपूर्ति दोबारा शुरू हुई तब तक उनकी मां की मौत हो चुकी थी.
पर ऐसा क्या हुआ कि अचानक हस्पताल में ऑक्सीजन खत्म हो गया? "आमतौर पर हस्पतालों को रोजाना 18-20 सिलेंडरों की जरूरत पड़ती है लेकिन जिस दिन कोविड के मरीजों की तादाद बेतहाशा बढ़ गयी उस दिन करीब 150-200 सिलेंडरों की जरूरत पड़ गयी," उन्होंने पूरे हालात को समझाते हुए बताया.
भारत समाचार टीवी के लिए काम करने वाले रिपोर्टर अभिषेक पांडेय इस वैश्विक महामारी की शुरुआत से ही लखनऊ में इसको कवर कर रहे हैं. "समूचे तंत्र की असफलता" के कारण शहर में इस समय एक "भयावह स्थिति" है." मैं करीब-करीब रोजाना ही ऐसे लोगों से मिलता हूं जो मुझसे पूछते हैं कि क्या मैं अस्पताल में बेड दिलाने में उनकी मदद कर सकता हूं," उन्होंने कहा.
उत्तर प्रदेश में हस्पतालों में बेड और एम्बुलेंस सेवाएं इंटिग्रेटेड कमांड कंट्रोल सेंटर (आइसीसीसी) द्वारा आवंटित की जाती हैं. इस कंट्रोल सेंटर की स्थापना योगी सरकार द्वारा अनुशंसा पत्र और आरटीपीसीआर परिणामों के आधार पर मार्च, 2020 में कई गयी थी. अब जबकि संक्रमण में तेजी आ गई है तो ऐसे में आइसीसीसी के पास करीब 6000 आवेदन प्रतिदिन आते हैं और फोन लाइन्स जाम हो जाती हैं. जब हाल के दिनों में अभिषेक ने सिर्फ एक सीएमओ के जरिए आइसीसीसी के संचालन पर चिंता जाहिर की तो उन्हें बताया गया कि ‘वीआईपी' के कॉल दबाव बढ़ा देते हैं.
जब उनसे "समूचे तंत्र की असफलता" का आशय पूछा गया तो उन्होंने उत्तर दिया कि देश में वैक्सीन आ जाने के बाद योगी सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं के आधारभूत ढांचे के नवीनीकरण को अपने एजेंडे से हटा लिया." "अभी कुछ दिनों पहले ही संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस में एक ऑक्सीजन प्लांट लगाया गया है. यह इससे बहुत पहले ही लगाया जा सकता था," उन्होंने एक उदाहरण दिया.
मैंने शौचालय में लाशें देखी हैं
जनतंत्र टीवी के लखनऊ के 38 वर्षीय संवादाता आशीष कुमार सिंह अप्रैल के पहले सप्ताह में लोक बंधु हस्पताल के एल 2 वार्ड में भर्ती थे. सरकार ने वर्गीकरण करने के लिए हल्के लक्षण वाले मरीजों के एल-1 वार्ड्स, गंभीर समस्या वाले मरीजों के लिए एल-2 वार्ड्स और बेहद जटिल समस्याओं से जूझ रहे मरीजों के लिए एल-3 वार्ड्स बनाए हैं.
आशीष चार दिनों के लिए हस्पताल में थे और उनका कहना है कि "वहां सब कुछ अस्त-व्यस्त था." मेरे परिवार के लोग सुबह 9:30 बजे खाना दे जाते और मुझे ये 2:30 बजे दोपहर तक मिलता. मेरे एल-2 वार्ड में खाना पहुंचाने के लिए आने वाले अस्पताल के कर्मचारियों को पीपीई किट पहननी पड़ती और शिफ्ट्स की अदला-बदली के बीच यह भी तय नही हो पाता था कि कौन खाना पहुंचायेगा और कब?"
आशीष तीन बेड और केवल एक शौचालय वाले वार्ड में थे.
"अस्पताल के कर्मचारी इस कदर लापरवाह थे," उन्होंने आरोप लगाया, "वो लाशों को मुर्दाघर में ले जाये जाने तक शौचालय में ही रखते थे."
उत्तर प्रदेश एक्रेडिटेड जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष हेमंत तिवारी के पास तो हाल के दिनों में साथी पत्रकारों की मदद की गुहार वाली फोन कॉल्स की बाढ़ आ चुकी है. मार्च के आखिरी सप्ताह से अब तक अकेले राज्य की राजधानी लखनऊ शहर से ही 50 पत्रकार जांच में कोरोना वायरस पॉजिटिव आ चुके हैं.
एसोसिएशन के पूर्व उपाध्यक्ष अजय श्रीवास्तव भी उन्हीं लोगों में से एक हैं. जब वो बीमार हुए तो उन्होंने सीएमओ और डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को फोन किया लेकिन करीब पूरे एक दिन तक उनकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नही आयी. "करीब 10 घंटों तक मुझे एक ट्रस्ट के अस्पताल में रखा गया. आखिरकार जब मैं मजिस्ट्रेट तक अपनी बात पहुँचा पाने में समर्थ हुआ तो मैंने उन्हें सीएमओ को मेरा फोन उठाने और मुझे अस्पताल में भर्ती कराने के लिए अनुशंसा पत्र जारी करने को कहा," उन्होंने आगे बताया. आगरा के एक रिपोर्टर बृजेंद्र पटेल ने भी बेड न मिल पाने पर पिछले सप्ताह हेमंत को फोन किया था. "वो उस वक़्त मेडिकल कॉलेज के बाहर खड़े थे जब उन्होंने मुझसे कॉल करके पूछा कि क्या मैं उन्हें अस्पताल में भर्ती कराने में उनकी मदद कर सकता हूं," हेमंत ने यह जोड़ते हुए बताया कि उन्होंने तुरंत डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को कॉल किया, लेकिन उधर से कोई प्रतिक्रिया नही आयी.
45 वर्षीय बृजेन्द्र को अंततः बेड तो मिल गया लेकिन सात दिनों के बाद कोविड से उनकी मृत्यु हो गयी. ताविषी श्रीवास्तव के मामले में भी ऐसा ही हुआ. ताविषी लखनऊ में पायनियर के लिए राजनैतिक रिपोर्टिंग करती थीं. उन्होंने मदद के लिए अंधाधुंध फोन किये पर कोई मदद नहीं मिली. वो 70 साल से अधिक उम्र की थीं.
"लगभग तीन दशक पहले उत्तर प्रदेश की राजनैतिक रिपोर्टिंग में कदम रखने वाली वो पहली महिला पत्रकार थीं, " हेमंत ने याद करते हुए कहा. "उन्हें वक़्त पर इलाज नहीं मिला."
ताविषी के दिल्ली के मित्रों के हस्तक्षेप करने के बाद ही उन्हें बेड मिल पाया लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी.
"सोचिए ये पत्रकारों के साथ हो रहा है जिनकी अब भी थोड़ी-बहुत सुनवाई है, आम लोगों की क्या दशा होगी?" उन्होंने पूछा. हेमंत ने इस भयावह स्थिति के लिए कुछ हद तक मीडिया को ही जिम्मेदार ठहराया. यदि मीडिया सरकार को उत्तरदायी बनाये रखती तो उत्तर प्रदेश को यह आपदा नहीं झेलनी पड़ती," उन्होंने कहा. "मैंने अपने 36 साल के कैरियर में स्वास्थ्य सेवाओं की कभी भी इतनी दयनीय दशा नहीं देखी है," हेमंत ने कहा.
मार्तण्ड सिंह लखनऊ के पत्रकार हैं.
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