Opinion
गुड बाय, मेरे प्यारे दोस्त
आज बृहस्पतिवार की सुबह, जैसे ही मैंने सीपीएम के नेता सीताराम येचुरी के बेटे के गुज़र जाने का टिकर देखा, मुझे विश्वास ही नहीं हुआ. लेकिन मुझे भय और अविश्वास ने घेर लिया क्योंकि मैं जानता था कि मेरा मित्र और सहकर्मी आशीष येचुरी, दिल्ली के एक अस्पताल के आईसीयू में पिछले 2 हफ्ते से कोविड-19 से लड़ रहा था. मैं उम्मीद कर रहा था कि शायद मैंने टिकर गलत पढ़ा हो. कुछ ही क्षणों बाद, उसके गुज़र जाने की खबर फिर से आई और मुझे एक दुख भरा एहसास हुआ कि जिस नम्र, हंसमुख और सरल व्यक्तित्व के आशीष को मैं जानता था, वो अब नहीं है.
वह स्वभाव से इतना नम्र और सरल था कि उसके बहुत से सहकर्मियों और उसे जानने वालों को यह भी नहीं पता था, कि वह देश के सबसे बड़े राजनेताओं में से एक का पुत्र है. आज के समय में, जब छोटे-मोटे पार्षदों और स्थानीय नेताओं के दूर के रिश्तेदार भी अपने "संबंधों" का फायदा उठाने से नहीं चूकते, आशीष कभी भी अपने वास्तविक राजनीतिक संबंधों के बखान में एक शब्द भी नहीं बोलता था.
आशीष के बारे में मैंने पहली बार तब जाना जब उसने 2 वर्ष पहले पुणे मिरर में सब एडिटर के नाते काम करना शुरू किया. वह और उसकी पत्नी पुणे में आने के बाद से जिस किराए के घर में रहे, उसे छोड़ने की मंशा से अपने लिए एक नया फ्लैट ढूंढ रहे थे. उसे पंचवटी इलाका वहां की हरियाली की वजह से पसंद आया और क्योंकि मैं उस इलाके में रहता था उसे किराए पर घर ढूंढने में मेरी मदद चाहिए थी. उसका साप्ताहिक अवकाश बृहस्पतिवार को होता था और उस दिन वह मेरे घर आता और हम कई घर मिलकर देखते, आखिरकार वह मेरे पास की एक बिल्डिंग में रहने आ गया. हम पारिवारिक मित्र बन गए और उसके बाद अक्सर मिलते थे. उसके बारे में सबसे अच्छी बात यह थी कि वह लोगों को अपने आसपास बहुत जल्दी सहज बना लेता था, इस हद तक की कोई उससे पहली बार भी मिलता तो उसकी आशीष के साथ प्रगाढ़ता बढ़ने में ज्यादा समय नहीं लगता था. आखिरी बार जब मैं उसे उसके घर पर मिला तो हमने राजनीति, पत्रकारिता और कोविड के खत्म होने के बाद साथ में केरल की एक यात्रा की बातें कीं.
जब मेरे खिलाफ एक गलत एफआईआर दाखिल की गई (जिसे हाल ही में मुंबई उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया) और पुलिस मेरे लैपटॉप और बाकी इलेक्ट्रॉनिक चीजों को बिना बात ज़ब्त करने पर तुली थी, उसमें बिना कुछ पूछे मदद की पेशकश की और कुछ चीजों को अपने घर रख भी लिया. देर रात को या सरकारी छुट्टी के दिन, ड्रिंक की तलाश में वह पहला व्यक्ति होता था जिसे मैं उस आपातकाल में फोन करता. एक बार मैं अपने एक स्कूल के दोस्त के साथ उसके पास कुछ काम के सिलसिले में गया लेकिन वह रात हमने उसके घर पार्टी करते हुए बिताई. आज जब मैंने उसके गुजर जाने की खबर निकट के व्हाट्सएप समूह में बताई तो, तो सभी भौचक्के रह गए. हालांकि उनमें से सभी आशीष को मेरे ज़रिए ही जानते थे, कुछ जो उससे व्यक्तिगत तौर पर मिल चुके थे, एक ही बात कह रहे थे कि "बहुत मस्त बंदा था यार."
पिछले महीने, हम मेरी सोसाइटी की तरफ जाने वाली सड़क पर मिले थे और उसने मुझे बताया था कि वे लोग 2 दिन के लिए दिल्ली जा रहे हैं क्योंकि एक रिश्तेदार की तबीयत ठीक नहीं है. हम चारों के निकटतम पारिवारिक व्हाट्सएप समूह में, उसका आखिरी संदेश, हाल ही में ऑपरेशन होने के बाद बहुत पीड़ा झेल रहे एक रिश्तेदार से सहानुभूति जताते हुए था. यह हमारे बीच हुईं कुछ आखिरी बातें थीं. अगर मुझे पता होता कि यह बातें, उससे होने वाली मेरी आखिरी बातें हैं, तो मैं उसे बताता कि वह कितना बेहतरीन व्यक्ति है और कैसे मैं हमारी केरल की यात्रा को लेकर उत्साहित हूं. वह यात्रा, जिसको लेकर हम आपस में मजाक कर रहे थे कि अगर वहां पर उसने लोगों को अपनी पहचान बताई तो तो वह एक मिनी सेलिब्रिटी होगा.
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