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हिंदू परंपरा पर रामकृष्ण मिशन का रुख बंगाल के चुनावों में इतनी अहमियत क्यों रखता हैं?
बंगाल के जन-जीवन को प्रभावित करने वाले तमाम हिन्दू धार्मिक संस्थानों में रामकृष्ण मिशन विशेष महत्व रखता है. सन 1863 में कोलकाता के एक बंगाली परिवार में जन्मे और एक सन्यासी के रूप में दीक्षित होने से पूर्व नरेंद्रनाथ दत्त के नाम से जाने जाने वाले स्वामी विवेकानंद द्वारा इस संगठन की स्थापना की गई.
जिन आध्यात्मिक संत रामकृष्ण परमहंस के नाम पर इस संगठन का नामकरण किया गया उनके अनगिनत शिष्यों में स्वामी विवेकानंद सर्वाधिक ख्याति पाने वाले शिष्य हैं. रामकृष्ण परमहंस कोलकाता में हुगली नदी के किनारे दक्षिणेश्वर के काली मंदिर के महंत थे और इस मंदिर की संरक्षक थीं निम्न जाति की एक विधवा महिला रानी राशोमनी लेकिन साथ ही वो एक धनवान और प्रभुत्वशाली जमींदार भी थीं.
1800 ईस्वी के आरंभिक वर्षों में किसी महिला और वह भी निचली जाति की एक विधवा महिला के इस कदर धनवान और ताकतवर होने की बात लगभग अनसुनी थी. ये वो जमाना था जब ब्राह्मणवादी कर्मकांडों के अनुसार एक जिंदा स्त्री को उसके मृत पति की जलती चिता पर बैठाकर उसके साथ ही जला देना पवित्र कर्म समझा जाता था. जातिगत भेदभाव का भी समाज में कट्टरता से पालन किया जाता था. रानी राशोमनी और स्वामी रामकृष्ण की ये कहानी दरअसल उन रूढ़िवादी ब्राह्मणों के खिलाफ संघर्ष की ही एक कहानी है जो सदियों से चले आ रहे जाति और लिंग के आधार पर होने वाले भेदभाव की प्रथा के टूटने की आशंका से बेहद डरे हुए थे. इस कहानी से बंगाल के ज्यादातर लोग अच्छी तरह वाकिफ़ हैं और ये कहानी बंगाल के एक टीवी सीरियल का विषय भी रह चुकी है. लेकिन पिछले कुछ सालों में रामकृष्ण मिशन का नाम कुछ दूसरे ही कारणों से चर्चा का विषय बन गया है.
ये बहुत पुरानी बात नही है जब आज से कुछ 10-11 साल पहले गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषणों में और सोशल मीडिया पर लगातार स्वामी विवेकानंद का हवाला देना शुरू किया. साल 2013 में नरेंद्र मोदी बेहद दिखावटी अंदाज़ में हावड़ा में दक्षिणेश्वर के काली मंदिर से कुछ ही दूर स्थित रामकृष्ण मिशन के मुख्यालय बेलूर मठ गए और यहीं से मिशन से उनके जुड़ाव की किंवदंती जोर पकड़ने लगी. साल 2020 में जब देश भर में एनआरसी और सीएए को लेकर खलबली मची तो एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बेलूर मठ पहुंच गए और इस बार वो एक पूरी रात वहीं पर ठहरे.
वहां पर उन्होंने आम जनता को संबोधित करते हुए एक भाषण दिया और अपने इस भाषण में उन्होंने सीएए का बचाव भी किया. जिस कारण उन्हें और रामकृष्ण मिशन के नेतृत्व को मिशन से ही जुड़े अनेक अनुयायियों की आलोचनाएं झेलनी पड़ीं. इसका कारण था मिशन का पूरी तरह गैर राजनैतिक होना. एक सन्यासी सारी सांसारिक मोह-माया से खुद को अलग करने के बाद ही सन्यासी बन पाता है. एक सन्यासी चुनावों में वोट तक नहीं डालता क्योंकि वोट डालने का मतलब होगा राजनैतिक दलों और राजनीति से जुड़ाव.
फिलहाल पूरे बंगाल में हाई वोल्टेज चुनावी अभियान जोर-शोर से चल रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जिस इंसान को मोदी जी सत्ता की गद्दी से उतार फेंकना चाहते हैं, मतलब कि तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर जीतने वाली वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के चेहरे वाले होर्डिंग और बैनर हर तरफ दिखाई पड़ रहे हैं. हावड़ा की संकरी गालियां पूरी तरह बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस के झंडों से पट चुकी हैं. हालांकि साथ ही कहीं-कहीं दिख जाने वाले लाल निशान गली-मुहल्लों में सीपीआई (एम) की मौजूदगी को दर्ज कराते हैं. पार्टियों के झंडे, बैनर, पोस्टर, होर्डिंग, दीवारों पर बनी पेंटिंग सब बेलूर मठ से कुछ दूर पहले से ही दिखने बंद हो जाते हैं. राज्य में चल रहे चुनावों का कोई नामोनिशान मठ के भीतर नहीं दिखाई पड़ता.
जब मैं सूरज ढलने के कुछ ही देर बाद मठ के महासचिव स्वामी सुविरानंद से मिलने के लिए चलने लगा तो मैंने पाया कि पूरा परिसर बेहद शांत है और यहां वाकई एकांत का माहौल है. आखिरकार मैं स्वामी सुविरानंद के दफ़्तर में पहुंचा जहां वो अभी तक फाइलों को देखने और दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने में व्यस्त थे. मिशन की पूरे भारत में और विदेशों में मिलाकर कुल 200 से ज्यादा शाखाएं हैं जिनकी जिम्मेदारियों का निर्वाहन मुख्य रूप से स्वामी सुविरानंद ही करते हैं. सुविरानंद जी तमाम गतिविधियों, खास तौर पर शिक्षा, राहत पहुंचाने, पुनर्वास और स्वास्थ्य सुविधाओं के क्षेत्र आदि के लिए कार्यसूची बनाने और उनके संचालन का काम बखूबी करते हैं.
हिंदुस्तान की राजनीति में हिंदुत्व जैसे हावी हो चुके मुद्दे और बंगाल की राजनीति में भी इस मुद्दे को लगातार हवा मिलते जाने के कारण हिन्दू संस्कृति पर रामकृष्ण मिशन का रुख बहुत महत्व रखता है. हर रोज समाचारों में हमारे आस-पास मौजूद दक्षिणपंथी हिंदुत्ववादी और ध्रुवीकरण की राजनीति को गा-गाकर बढ़ावा देने की कोशिशें देखने को मिलती हैं. इस तरह की राजनीति की जड़ों में हिन्दू रीति-रिवाजों की एक खास किस्म की समझ काम करती है. कई बार ये केवल एक मंत्री, सांसद या विधायक के बयानों के रूप में सामने आती है जिसमें गौ-मूत्र को कोविड से लेकर कैंसर तक को ठीक करने वाली दवा के तौर पर पेश किया जाता है या फिर कोई दावा किया जाता है कि इंटरनेट, हवाई जहाज या एटम बम कई हजार साल पहले महाभारत काल में भी मौजूद थे
किसी दिन सिर्फ पानी पीने के लिए मंदिर में घुसने के कारण एक मुस्लिम बालक की पिटाई भी हो सकती है, किसी दिन नगर निगम के अधिकारियों द्वारा मंगलवार को जबरदस्ती मीट की दुकानों को बंद करवाने की कार्रवाई हो सकती है और किसी दिन ये एक व्यक्ति पर प्रतिबंधित मांस खाने के शक के आधार पर ही भीड़ द्वारा उसकी पीट-पीटकर हत्या भी हो सकती है. ये एक केंद्रीय मंत्री का "गोली मारो सालों को" जैसे नारे लगवाना भी हो सकता है या किसी कॉमेडियन की बिना कोई आपत्तिजनक चुटकुला सुनाए गिरफ्तारी भी हो सकती है या फिर उदारवादियों का गढ़ माने जाने वाले एक विश्वविद्यालय में घुसकर वहां के छात्रों पर खुल्लमखुल्ला हमला भी हो सकता है, वो भी तब जब उसके फाटकों पर भारी सुरक्षा बल तैनात हों.
ये पूरा दुस्साहस भरा कांड टीवी पर लाइव दिखाया जा सकता है. यह एक साम्प्रदायिक कत्लेआम भी हो सकता है और सबूत मिटाने के लिए एक बलात्कार पीड़ित दलित लड़की की लाश को उसके परिवार की मर्जी के खिलाफ सरकारी अधिकारियों द्वारा जलाने की घटना को अंजाम देना भी हो सकता है. आखिर ये कैसा संयोग है कि इन सारी घटनाओं को अंजाम देने वाले लोग खुद को चिल्ला-चिल्लाकर मोदी सर्मथक बताते हैं. इन लोगों द्वारा किए गए कृत्यों का रामाकृष्ण मिशन के मत और चरित्र से क्या लेना-देना है?
ये सब समझने के लिए मैंने मिशन के सर्वोच्च पदाधिकारी से मिशन के मूल उपदेशों के बारे में बात की. स्वामी सुविरानंद के अनुसार- “स्वामी रामकृष्ण सामाजिक सद्भाव के पैगम्बर थे. प्रसिद्ध साहित्यकार क्रिस्टोफर आईशरवुड ने ही उनका बखान करते हुए उनके बारे में ये शब्द कहे थे. स्वाभाविक तौर पर श्रीरामकृष्ण हमारे स्वामी हैं और चूंकि सद्भाव उनके जीवन का मूलभूत सिद्धांत था तो ऐसे में अलग से इसका ज़िक्र करने की कोई जरूरत नहीं कि निश्चित तौर पर हम लिंग, जातियों, नस्लों, समुदायों, ऊंच-नीच के बीच कोई भेद नही करते.”
लिंग के मामले को छोड़कर भेदभाव न करने की नीति अन्य मामलों में और भी साफ तौर पर दिखाई देती है. हालांकि लिंग के मामले में ये गौर करने वाली बात है कि '18-30 साल के कम से कम स्नातक, नौजवान पुरुषों को ही यदि वो स्नातकोत्तर, डॉक्टरेट आदि न भी हों तो, सन्यासियों की परंपरा में शामिल होने की अनुमति है. 'यदि कोई स्नातक की परीक्षाएं पास करने से पहले ही जुड़ जाता है तो उसकी स्नातक की पढाई पूरी करवाई जाती है. ब्रह्मचर्य का पालन एक आवश्यक शर्त है.' जो लोग एक ब्रह्मचारी का जीवन जीने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ हैं केवल वही इसके लिए आयें.' हालांकि सन्यासी बनने के लिए किसी भी व्यक्ति की धर्म और जाति को लेकर कोई पाबंदी नहीं है. “पूरे विश्व में हम एकमात्र ऐसी सन्यासी परंपरा के लोग हैं जिनके यहां दुनिया भर के सभी प्रमुख धर्मों के लोग सन्यासी हैं. आप किसी भी धर्म का नाम लीजिए और मैं आपको उसी धर्म के एक व्यक्ति का उदाहरण दूंगा जो हमारे यहां सन्यासी है,” सुविरानंद ने दावा किया.
मैंने इस्लाम और ईसाई धर्म का नाम लिया और उन्होंने बताया कि उनके यहां ईरान और इराक के मुस्लिम सन्यासी हैं और उनमें से 84 साल के एक सन्यासी तो बेलूर मठ में ही हैं.
मैने पूछा कि क्या वो अभी भी मुसलमान ही हैं?
'हम धर्म-परिवर्तन नहीं कराते,' सुविरानंद जी ने उत्तर दिया. 'लेकिन उन्हें स्वामी रामकृष्ण के सिद्धांत अपने हृदय में उतारने होंगे. स्वामी रामकृष्ण धर्म की सार्वभौमिकता में विश्वास करते थे, समावेशी होने के लिए, सद्भाव के लिए, केवल सहिष्णुता के लिए ही नहीं बल्कि स्वीकृति के लिए भी... वो किसी को भी अस्वीकृत नहीं करते थे और सभी को स्वीकार करते थे. इसीलिए यहां सभी को जगह दी गयी है, और हम सब विकसित हो रहे हैं, हम सभी आध्यात्मिक रूप से भाई हैं, हम सब आपस में एक ही माता-पिता से जन्में भाईयों से भी ज्यादा सगे भाई हैं, फिर चाहे कोई इराक से हो, अमेरिका से हो या दुनिया के किसी भी देश से हो.'
सदस्यता की केवल एक ही शर्त है, उन वस्तुओं का त्याग जिन्हें उनके शब्दों में 'काम और कंचन' कहा जाता है और फिर वो खुद ही उनका अंग्रेजी में अनुवाद कर उनको 'लस्ट एंड गोल्ड' बताते हैं.
मिशन के संस्थानों में मांसाहारी खाना खाना कोई वर्जित काम नहीं है. सुविरानंद जी ने बताया, "अधिकांश आश्रमों के अधिकांश अनुयायियों को शाकाहारी भोजन की आदत है पर मुख्यालय से हम कभी भी ऐसा कोई विशेष निर्देश जारी नहीं करते कि अमुक आश्रम शाकाहारी रहेगा और अमुक आश्रम मांसाहारी. हमें सचमुच बंगाल के हिन्दू घरों में पकाए जाने वाले पारंपरिक भोजन से कोई समस्या नही है."
मछली और चावल बंगाली हिंदुओं का मुख्य भोजन है. अंडा, दो तरह का मुर्गे और बकरे का मांस भी पारंपरिक खान-पान का पसंदीदा हिस्सा है.
आज 2021 के भारत में जब हिंदुत्व के नाम पर दक्षिणपंथियों द्वारा मांसाहारी खान-पान और मंदिर में किसी अन्य धर्म के व्यक्ति का प्रवेश वर्जित करने जैसी कार्रवाइयां कर एक सांस्कृतिक युद्ध छेड़ दिया गया है तब मिशन के ये सारे कदम सामाजिक तौर पर बेहद प्रगतिशील लगते हैं. 1897 ई० में जिस वक्त स्वामी विवेकानंद द्वारा रामकृष्ण मिशन की स्थापना की गई उस समय की सामाजिक रवायतों पर गौर करने पर वो दौर भी काफी कट्टरता भरा लगेगा.
सुविरानंद जी कहते हैं, “श्री रामकृष्ण और स्वामी विवेकानंद अपने समय के हिसाब से निश्चित तौर पर बेहद प्रगतिशील थे. केवल वही नहीं बल्कि सभी बड़े चिंतक, संत और सिद्ध पुरुष हमेशा ही अपने समय से आगे रहे हैं. इसीलिए अगर आप विवेकानंद की जीवनी पढ़ेंगे तो पायेंगे कि उन्होंने बहुत सारा उत्पीड़न झेला, उन्हें गलत समझा गया, यातनाएं दी गयीं, बेइज्जत किया गया, और यहां तक कि बहुत सारी जगहों पर तो उनके खिलाफ झूठी अफवाहें भी फैलायी गयीं क्योंकि उस दौर में इतनी कम उम्र के किसी भी सन्यासी को समाज की मान्यता मिलना मुश्किल था. और ये तो हमेशा ही होता है. ईसा मसीह को गलत समझा गया, चैतन्य को गलत समझा गया, श्रीकृष्ण को गलत समझा गया, श्रीराम को गलत समझा गया, रामकृष्ण को गलत समझा गया, विवेकानंद को गलत समझा गया.”
सुविरानंद जी बताते हैं कि जब पश्चिम की यात्रा से लौटकर स्वामी विवेकानंद वापस दक्षिणेश्वर मंदिर आए तो उन्हें भी मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश नहीं करने दिया गया क्योंकि मान्यता थी कि उन्होंने 'काला पानी' को पार किया था और इसलिए अब 'मलेच्छ' (जाति बहिष्कृत या बर्बर) बन गए थे.
मिशन ने अपनी प्रगतिशील परम्पराएं अभी भी जारी रखी हुई हैं. इसका आदर्श वाक्य "आत्मानो मोक्षर्थम जगत हित्य च" है. जिसका अर्थ है 'स्वयं के लिए मोक्ष और संसार के लिए कल्याण'. यहां शिक्षा और सीखने पर भी खास ध्यान दिया जाता है.
सुविरानंदजी मिशन के स्वामी विद्यानाथनंद या महान महाराज जैसे सन्यासियों के उदाहरण देते हैं जो जाने-माने गणितज्ञ हैं, आईआईटी कानपुर से स्नातक हैं और बर्कले स्थित कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री हासिल करने के साथ ही वेदांत दर्शन के बेहतरीन व्याख्याताओं के घराने 'वेदांता सोसायटी ऑफ न्यूयॉर्क' की टीम से भी जुड़े हैं.
सुविरानंद जी ने बताया, 'स्वामीजी (विवेकानंद) चाहते थे कि वेदांत विज्ञान की भाषा बोले और विज्ञान मानवता के कल्याण की. विज्ञान और धर्म में निश्चित रूप से कोई भी अंतर्विरोध न होना स्वाभाविक है. विवेकानंद ने कहा है धार्मिक सिद्धांतों को विज्ञान की प्रयोगशाला में फेंक दो और उनका परीक्षण करो. अगर ये परीक्षण में खरा उतरते हैं तो स्वीकार करो अन्यथा इन्हें इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दो. एक धर्म जो वैज्ञानिक प्रश्नों या वैज्ञानिक प्रक्रियाओं का उत्तर नहीं दे सकता वो धर्म हो ही नहीं सकता. एक धर्म जिसमें कोई वैज्ञानिक चेतना नहीं है वो धर्म नहीं अंधविश्वास है.'
तो आखिर धर्म है क्या? उन्होंने इसका जवाब दिया, "धर्म के दो पहलू हैं. धर्म का एक पहलू है धार्मिक अनुष्ठान जिसमें बेल पत्र, तुलसी, चंदन की लकड़ियां, मंत्र और आराधना है ताकि किसी एक विशेष देवी या देवता को प्रसन्न किया जा सके. और दूसरा पहलू है आध्यात्म. कोई अनुष्ठान नहीं... यह अहं का उत्कर्ष है."
वो आगे कहते हैं, “अहं हमारे जीवन में खलनायक है. फिर जो भी समस्याएं हो चाहे व्यक्तिगत स्तर पर, राष्ट्रीय स्तर पर, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, व्यष्टि स्तर पर या समष्टि स्तर पर, प्रत्येक समस्या की जड़ में अहं ही है और वो भी अपरिपक्व अहं. इसका उत्कर्ष कर इसको परिपक्व अहं में परिवर्तित करना है. 'स्व' से पार पा लो और ईसा मसीह हो जाओ. इसीलिए अपरिपक्व अहं का परिपक्व अहं तक उत्कर्ष ही आध्यात्म की तीर्थयात्रा है. इस कारण ही स्वामीजी कहते हैं कि प्रत्येक आत्मा में अलौकिक होने का सामर्थ्य है. आप राम, रहीम या जोसेफ़ कोई भी हो सकते हैं इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता आप उसी अलौकिकता से निकली एक किरण हैं.”
उन्होंने आगे कहा, "सनातन धर्म एक ऐसा धर्म है जो सहिष्णुता और स्वीकार्यता सिखाता है. ये धर्म कहता है, "एकं सद विप्रा बहुधा वदन्ति." सत्य एक है परंतु मनीषी इसे अनेक नामों से पुकारते हैं."
या फिर जैसा कि श्री रामकृष्ण कहते हैं, 'जोतो मोत तोतो पाथ'. संसार में जितने मत हैं उतने ही पथ हैं. यही सनातन धर्म की परिभाषा है जिसका नाम लेकर कुछ हुड़दंगबाज उसी नफ़रत के जहर की वकालत कर रहे हैं जिसे पीने के कारण, स्वामी सुविरानंद के शब्दों में कहें तो लगता है कि 'अपरिपक्व अहं' अभी बहुत लंबे वक़्त तक बना रहेगा.
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