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कोरोना: हमारा लोकतंत्र हमारी ही आंखों के सामने खत्म किया जा रहा है!
एक साल पहले जब देश में कोरोना की पहली लहर उठी थी तब तब्लीग़ी जमात के काफी सारे लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए थे. यह तो याद होगा ही कि कैसे मीडिया ने इस मामले को उछाला था. 72 घंटे के भीतर देश के कोने-कोने से तब्लीगियों को ढूंढ ढूंढ कर निकाला गया. दिल्ली में मौजूद मरकज़ की इमारत से बसों में भरकर जमातियों को कोविड सेंटर भेजा गया था. सरकार ने इस पूरे मामले की कठोर निंदा की और कोरोना फैलाने के लिए तब्लीगियों को ज़िम्मेदार ठहराया.
कल कुंभ का दूसरा शाही स्नान था. अनुमान है कि लगभग 21 लाख श्रद्धालुओं ने डुबकी लगाई. 2019 में हुए अर्ध कुंभ मेले में लगभग 5 करोड़ लोगों ने भाग लिया था. उस हिसाब से 14 और 27 अप्रैल को होने वाले स्नान तक 1 करोड़ से ज़्यादा लोग कुंभ मेले में डुबकी लगाएंगे. एक छोटे से राज्य उत्तराखंड, जहां आज तक लगभग 27 लाख कोरोना के टेस्ट हुए है, वो इन 1 करोड़ श्रद्धालुओं में से कितनों के टेस्ट कर पाएंगे, वो आप खुद सोच लीजिये.
आज ही के दिन भारत में कोरोना के रिकॉर्ड 170000 नए केस आये, और लगभग 900 लोगों की जानें गयी. भारत में कोरोना की आरओ वैल्यू फिलहाल 1.32 है यानी 100 व्यक्ति औसतन 132 व्यक्तियों को कोरोना फैला रहे हैं. बड़ी बात नहीं है कि देश आने वाले दिनों में प्रतिदिन 2-3 लाख केस और 3-4 हज़ार मौतें देखे. कल तक भारत में लगभग 10 करोड़ लोगों को कोरोना की पहली वैक्सीन लगी थी. किसी भूल में मत रहिएगा- भारत में वैक्सीनेशन की रफ़्तार बेहद धीमी है. इस रफ़्तार से हम अगले 5 महीनों में 30 करोड़ लोगों को वैक्सीन नहीं लगा पाएंगे, जिसका टारगेट खुद सरकार ने जुलाई के अंत तक रखा था.
ऐसे में यह समझने में बहुत दिमाग की ज़रूरत नहीं है कि इतनी बड़ी संख्या में कुम्भ में लोगों का भाग लेना कितना ज़्यादा खतरनाक हो सकता है. यही साधु-संत और श्रद्धालु जब कोरोना लेकर वापस अपने गांव-शहर जाएंगे तो सोचिये देश में कितनी तबाही मच सकती है. कितने शहरों में हैल्थ सिस्टम कोलेप्स हो सकता है, कितने अस्पतालों में आईसीयू बेड्स, ऑक्सीजन, वेन्टिलेटर की कमी पड़ सकती है.
तो क्या मेरे इस आर्टिकल का मकसद यह बताना था कि मरकज के लोगों को बेवजह फंसाया गया? जी नहीं. सरकार और मीडिया ने तब्लीगी जमात का मसला उछाल कर ठीक किया था. जब पूरे विश्व में कोरोना कहर बरपा रहा था, देश में लॉकडाउन लगा था, तब वह लोग धर्म के नाम पर कोरोना फैला रहे थे. ऐसी गैर-ज़िम्मेदारी भरे बर्ताव की भर्तसना होनी चाहिए और हुई भी. यह एक सत्य है कि दिल्ली जैसे अनेक शहरों में कोरोना के नियंत्रण से बाहर निकलने का एक बड़ा कारण तब्लीग़ी जमात के लोग थे. मैं खुद दक्षिण-पूर्वी दिल्ली (जहां मरकज़ की बिल्डिंग है) कलेक्टर ऑफिस में कार्यरत था और उस ज़िले में कोरोना देखते ही देखते काबू से बाहर हो गया. बहुत से क्षेत्रों में कम्युनिटी स्प्रेड का मुख्य कारण जमात के लोग थे.
पर वहीं चीज़ आज क्यों नहीं हो रही? यह तो समझाने की ज़रूरत नहीं है कि कुम्भ मेले में इतनी भीड़ हर तरीके से गलत है. इतनी भीड़ को मैनेज कोई भी राज्य नहीं कर सकता. फिर आज मीडिया और सरकार चुप क्यों है? क्यों सरकार ने 25 स्पेशल ट्रेनों का इंतज़ाम और किया है? क्यों उत्तराखंड के मुख्यमंत्री स्वयं इस मेले में हिस्सा ले रहे हैं?
जवाब बेहद आसान है. दिक्कत ना मुसलामानों में है, दिक्कत ना हिन्दुओं में. गलत उस समय जमाती भी थे, गलत आज साधू संत भी हैं. धार्मिक कट्टरता कुछ मुसलामानों में भी है, कुछ हिन्दुओं में भी है. धार्मिक कट्टरता एक साल पहले भी थी, आज भी है. बस फर्क यह है कि उस समय आपको गुमराह किया गया यह कहकर कि देखो भारत में कोरोना मुसलमानों ने फैलाया है. तब सरकार को अपनी नाकामियां छुपाने, और हमें बेवक़ूफ़ बनाने के लिए एक बढ़िया मुद्दा मिल गया था. आज सरकार उसी तर्क से कुम्भ पर प्रतिबंध नहीं लगाएगी.
क्या यह सब सिर्फ इस सरकार पर लागू होता है? पूर्व में देश ने अनेक सरकारों को यही सब करते देखा है. उन सरकारों में और इस सरकार में एक बहुत बड़ा अंतर है. अंतर है देश के बाकी संस्थानों का, जिन्हें बड़े ही व्यवस्थित तरीके से खोखला किया गया है.
मुझसे अकसर मेरे आसपास के लोग पूछते थे कि इन संस्थानों की स्वतंत्रता से आम आदमी के जीवन में क्या फर्क पड़ जाएगा? हमारे देश में लोकतंत्र क्यों ज़रूरी है? जवाब आपके सामने है. लोकतंत्र ज़रूरी है नियंत्रण और संतुलन के लिए. लोकतंत्र ज़रूरी है सरकार को जनता की सेवा में झुकाए रखने के लिए. लोकतंत्र ज़रूरी है सरकार की जवाबदेही के लिए. वो जवाबदेही जो चुनाव में पांच साल में एक बार आती है, पर लोकतंत्र होने पर हर दिन रहती है. जब इस तरह से धार्मिक सम्मेलनों का गैर ज़िम्मेदारी से आयोजन हो रहा होगा, राजनेता धड़ल्ले से चुनावी रैलियां कर रहे होंगे, कोरोना काल में सभाओं में आने वाली भीड़ की संख्या का व्याख्यान कर रहे होंगे, उन्हें ठीक करने के लिए ज़रूरी है लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थान.
वही लोकतंत्र, जो आज इस देश में नहीं है. वहीं संस्थान जिन्हें सुनियोजित ढंग से खत्म कर दिया गया. आज मेरे ननिहाल पक्ष के लगभग हर परिवार में कोरोना का एक मरीज है. गनीमत है कि कोई भी अस्पताल में भर्ती नहीं है. होते तो क्या होता यह कल्पना भी नहीं करना चाहता, पर आप में से कइयों के होंगे. कइयों को रेमडेसिवीर का इंजेक्शन नहीं मिल रहा होगा. कइयों के अपने, अस्पतालों की दयनीय हालत के चलते अपनी जान गवाएंगे लेकिन उनकी आवाज़ उठाने वाला कोई नहीं होगा.
क्या उस मीडिया से, जिसने आजतक देश के प्रधानमंत्री से एक अनस्क्रिप्टेड सवाल नहीं पूछा, कुछ उम्मीद की जा सकती है? अपने 7 साल के कार्यकाल में मोदी ने आज तक एक प्रेस कांफ्रेंस नहीं की, आपको लगता है वो आज प्रेस बुलाकर देश की जनता की शंकाओं को दूर करेंगे? बताएंगे कि देश ने पिछले 1 साल में कितने वेंटिलेटर, आईसीयू और ऑक्सीजन बेड्स बढ़ाए? या फिर क्यों देश में अचानक रेमडेसिवीर की किल्लत पड़ रही है? या फिर क्यों कुम्भ मेले पर सरकार ने प्रतिबन्ध नहीं लगाया?
क्या आज हमारे सुप्रीम कोर्ट में इतनी ताकत है की वो कुम्भ मेले और चुनावी रैलियों पर प्रतिबन्ध लगा पाए? इस देश के चीफ जस्टिस जो एक भाजपा समर्थक की स्पोर्ट्स बाइक चलाते हों, जो बालात्कार के आरोपी से यह पूछते हों कि क्या वो पीड़िता से शादी करेगा, क्या उनसे यह उम्मीद की जा सकती है कि वो सरकार की मर्ज़ी के खिलाफ आर्डर निकालेंगे?
क्या उस चुनाव आयोग से, जो अपनी ईवीएम तक नहीं संभाल पा रहा, उम्मीद की जा सकती है कि वो चुनावी रैलियों पर प्रतिबन्ध लगाएगा? या मास्क ना पहनने पर गृहमंत्री पर जुर्माना ठोकेगा?
क्या उस पुलिस से, जो सरकार का हथियार है, जो दंगों में बिना सरकारी अनुमति के हिलती तक नहीं, अपने आकाओं के आदेश मात्र से देश-द्रोह और यूएपीए जैसी संकीर्ण धाराओं में लोगों को गिरफ्तार कर लेती है, कुछ भी उम्मीद की जा सकती है?
याद है जब देश में कोयला 3G घोटाला हुआ था, या फिर निर्भया की घटना हुई थी, तब कैसे मीडिया ने सरकार को कटघरे में खड़ा किया था? कैसे प्रेस कांफ्रेंस और इंटरव्यू में मनमोहन सिंह पर सवालों की बौछार होती थी? क्या यह चीज़ आज हमारे प्रधानमंत्री या गृहमंत्री के साथ होने की कल्पना भी कर सकते है? याद करिये 1975 का वो समय, जब इलाहबाद हाईकोर्ट ने देश के प्रधानमंत्री का चुनाव परिणाम पलटते हुए उन्हें चुनावी कदाचार करने के लिए किसी भी पद पर रहने से प्रतिबंधित कर दिया था? याद करिये 1993 में टीएन शेषन को, जिन्होंने किसी का खौफ खाये बिना देश में चुनाव का हुलिया बदल कर रख दिया.
यह सब क्या आज होना मुमकिन है? जवाब आपको भी पता है. मुमकिन नहीं है क्योंकि बड़े ही व्यवस्थित ढंग से एक-एक कर सारे संस्थानों को कॉम्प्रोमाइज कर दिया गया है. इन संस्थानों में अपने लोगों को लाया गया, विरोध करने वालों को किनारे किया गया, राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर हर प्रकार के विरोध को दबाया गया.
जब यह सब हो रहा था, तब आपमें से ज़्यादातर लोग चुप थे. कुछ तो यह भी सोचते थे कि देश में टू मच डेमोक्रेसी है. शायद विकास का पहिया ऐसे ही आगे बढ़ेगा. उस पहिये की कोरोना के पहले ही दयनीय हालत थी, अब तो सोचने का भी मतलब नहीं है. कुछ को तो सही में लगता था कि देश मुसलामानों के कारण पीछे जा रहा है. आज जब इन्हीं लोगों में से कुछ बेहद कठिन परिस्थितियों से गुज़र रहे हैं, तब उनकी आवाज़ उठाने वाला कोई नहीं है. आज जब यहीं लोग अस्पताल की लाइनों में जूझ रहे हैं, अपनों को मरते हुए देख रहे हैं, तब इनके दुख पर मरहम लगाने वाला कोई नहीं है. कल जब कुम्भ और चुनावी रैलियों के कारण आपके परिवार में किसी को कोरोना होगा और उसकी जान को खतरा हो जाएगा, तब किस पर चिल्लायेंगे? कल जब देश में त्राहि मचेगी, और आपके किसी अपने को इलाज के लिए अस्पताल में बेड नहीं मिलेगा, तब किसे बोलेंगे? कौन होगा आपको आवाज़ देने के लिए?
जब तक आप सवाल पूछना नहीं शुरू करेंगे, जब तक आप हिन्दू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद के चक्कर में बेवक़ूफ़ बनते रहेंगे, जब तक आप हमारी संस्थाओं के साथ चल रहे खिलवाड़ को लेकर चुप रहेंगे, तब तक ऐसे ही देश पीछे जाता रहेगा. कुछ लोग अभी भी यह सोचकर खुश हैं कि हमारे जीवन में तो कुछ फर्क नहीं पड़ रहा. शायद ना पड़ रहा हो. पर वक्त-वक्त की बात है, फर्क पड़ेगा. आज किसी और का टाइम आया है कल आपका टाइम भी आएगा. अभी किसानों के नाम पर रातों-रात बिल पास कराये जा रहे हैं, कल आपके नाम पर कराये जाएंगे. अभी किसी और की 21 साल की बेटी को देशद्रोह के नाम पर फर्जी केस में फंसा रहे हैं, कल आपके बच्चों को भी फसाएंगे. अभी फटी हुई जींस को लड़कियों के संस्कार से जोड़ रहे हैं, कल आपकी बेटी को घर से बाहर निकलने से भी रोकेंगे. अभी हिंदू-मुस्लिम कर रहे हैं, कल ब्राह्मण-दलित करेंगे. यह रुकने वाले नहीं हैं. इन्हें रोक सकने वाला हमारा लोकतंत्र हमारी ही आंखों के सामने खत्म किया जा रहा है.
मानकर चलिएगा कि एक दिन आपकी भी बारी आएगी. तब लोकतंत्र नहीं होगा, आपको बचाने के लिए. समझ रहे है या अब भी नहीं?
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