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दीदी से खुश लेकिन मोदी से प्रभावित: आरएसएस से जुड़े एक समाज सेवी संगठन की महिलाओं के साथ एक दिन
अगले महीने, चुनाव का मौसम हम सबकी जिंदगियों पर हावी होने वाला है. इस कभी न खत्म होने वाले विवादों, भीड़ से भरी रैलियों के दृश्य और चुनाव के समय नेताओं के बीच होने वाली नई-नई अदावत की मूसलाधार में सराबोर होने के बीच, इस समय हमें सोचना चाहिए की असल में चुनावी पत्रकारिता किसलिए होती है.
नेताओं के विशेष इंटरव्यू और जोरदार रैलियां चुनाव के समय के समाचार चक्र का अटूट हिस्सा हैं. लेकिन हम पत्रकारों के लिए अपने पाठकों और दर्शकों को उनके साथी देशवासी कैसे हैं, यह दिखाने का भी यह अच्छा समय है. कौन है वह मोदी वोटर जिसके बारे में हम समाचार चैनलों के स्टूडियो में सुनते हैं? ममता के किसी समर्थक के दिमाग में ईवीएम का बटन दबाते हुए क्या चल रहा है?
ममता बनर्जी की महिला समर्थकों और पश्चिम बंगाल में हिंदुत्व के उदय के बारे में बहुत चर्चा हो चुकी है. यह दोनों ही रास्ते पश्चिम बर्दवान जिले के इच्छापुर गांव में साफ टकरा रहे हैं.
50 के दशक में दो अमेरिकी आर्किटेक्ट ओके द्वारा डिजाइन की गई औद्योगिक नगरी दुर्गापुर के पास, इच्छापुर एक छोटी सी ग्राम पंचायत है. दुर्गापुर की चौड़ी सड़कों और फैलाव से आगे, इच्छापुर का रास्ता एक हिचकोले से भरी निराशा का है. गांव को जाने वाली सड़क कच्ची मिट्टी की है, और जब गांव आता है तो ऐसा लगता है कि उसे बनाने वालों ने काम बीच में ही रोक दिया.
इस जगह पर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनुषांगिक संगठन सेवा भारती ने 1989 में अपना काम विवेकानंद विकास परिषद नाम के एनजीओ के साथ शुरू किया था. ऐसा आरएसएस के संस्थापक डॉ केशवराव बलिराम हेडगेवार के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में किया गया था. आज यह एनजीओ, एक साथ, एक कंप्यूटर प्रोग्रामिंग केंद्र, महिलाओं के लिए एक स्वयंसेवी संस्था, सिलाई ट्रेनिंग केंद्र और बच्चों के 12वीं तक के स्कूल चलाने के काम आता है, स्कूल में ज्यादातर हाशिए पर रहने वाले आदिवासी समाजों के बच्चे पढ़ते हैं.
इच्छापुर की महिलाएं यह केंद्र चलाने में मदद करती हैं. यहां पर कक्षाओं के नाम नेताजी रूम और विवेकानंद रूम हैं. अंदर की दीवारों पर स्वामी विवेकानंद भगिनी निवेदिता डॉ हेडगेवार और डॉक्टर अंबेडकर के पोस्टर लगे हुए हैं और बंगाली अस्मिता की त्रिमूर्ति सुभाष चंद्र बोस रविंद्र नाथ टैगोर और स्वामी विवेकानंद के छोटे कैलेंडर टंगे हुए हैं.
अपर्णा मुखर्जी यहां 3 साल से काम कर रही हैं. वह कक्षा 5 से कक्षा 8 तक के बच्चों को पढ़ाती हैं और एक स्वयंसेवी समूह का हिस्सा हैं जो बाजार में 10 रुपए में बिकने वाले स्नैक्स के पैकेट बनाता है. तो इस बार, वोट डालते समय अपर्णा के दिमाग में क्या खास बातें चल रही हैं?
वह जवाब में कहती हैं, "मैं पैसों के लिए अपने पति के आगे हाथ नहीं फैलाना चाहती. यहां कितनी महिलाएं हैं जो ग्रेजुएट हैं जिनके पास डिग्री है लेकिन नौकरियां नहीं हैं. पढ़े लिखे होने और न होने में कोई अंतर नहीं है."
अपर्णा, सेवा भारती के इस एनजीओ से पिछले 3 साल से जुड़ी हैं, वे कहती हैं कि उन्हें यहां किया जाने वाला सामाजिक काम पसंद है लेकिन इससे उनके वोट के चुनाव पर कोई फर्क नहीं पड़ता. वह बताती हैं, "मैंने 2019 में मोदी को वोट दिया था लेकिन मुझे लगता है उन्होंने कीमतें कम करने के लिए कुछ नहीं किया." इसके साथ ही वह ये जोड़ना नहीं भूलतीं कि राज्य के स्तर पर, वह ममता सरकार से खुश हैं, खास तौर पर स्वास्थ्य साथी हेल्थ कवर जैसी योजनाओं से.
अपने सेवा भारती के काम से अपर्णा 500 रुपए महीना कमाती हैं. उनकी रोज की चिंताओं में से एक भी पश्चिम बंगाल के हिंदुत्व के मनभावन मुद्दों में से नहीं हैं, 2019 में उनका वोट किसी मनगढ़ंत "मुस्लिम कब्ज़े" से लड़ने के लिए नहीं बल्कि अपनी आर्थिक परतंत्रता से लड़ने के लिए था.
हमारी बातचीत के दौरान शुरू में ही उन्होंने आत्मनिर्भर शब्द का प्रयोग किया था और कहा था कि किसी हद तक, सेवा भारती महिलाओं को ऐसा करने में मदद करती हैं. लेकिन जब उनसे आरएसएस के काम के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि उसके बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है क्योंकि यह सब अधिकतर दुर्गापुर में होता है. हालांकि अपर्णा का बेटा संघ का सदस्य बन गया है. वे कहती हैं कि उन्हें महालय के दौरान प्रचारकों के द्वारा निकाला गया जुलूस पसंद है.
इस एनजीओ में अपर्णा की तीन और सहकर्मी प्रधानमंत्री के आत्मनिर्भर नारे पर जोर देती हैं क्योंकि वह उनके मुख्य उद्देश्य से मिलता जुलता है.
कक्षा पांच से कक्षा आठ को पढ़ाने वाली अनीता कोरमोकर कहती हैं कि वह एक सरकारी अध्यापिका बनना चाहती हैं. उन्हें सेवा भारती में काम करके क्या अच्छा लगता है? वे कहती हैं, "हमारे गांव में कई औरतें हैं जो अपने दस्तखत में अपना नाम भी ठीक से नहीं लिख सकतीं. मैं बस ये चाहती हूं कि यह सभी महिलाएं कम से कम दस्तखत करना सीख जाएं. मैं चाहती हूं कि इस गांव की सभी माताएं और बहनें अच्छी शिक्षा पाएं जिससे कि वह और स्वतंत्र हों और तरक्की करें."
विष्णु प्रिया शाह 30 रुपए किलो के हिसाब से कागज के थैले बनाते हैं और महीने में 300 से 500 रुपए कमा लेती हैं. दीदी के लिए उनका संदेश है कि, वह उनके एक कमरे के घर में उन्हें छोटा सा व्यापार शुरू करने में मदद करें. उनके घर में श्री कृष्ण के चित्रों और गीता और कृष्ण के संदेशों की 3 किताबों से भरा छोटा सा मंदिर, अलग ही ध्यान खींचता है.
वे बताती हैं, "मैंने 100 रुपए प्रति किताब देखकर यह तीनों ख़रीदीं." विष्णु प्रिया किताब के संदेश से बहुत प्रभावित हुई हैं, और उसके बारे में बात करते हुए श्रद्धा से अपनी आंखें बंद कर लेती हैं और हाथ जोड़ लेती हैं. वह कहती हैं कि दलगत राजनीति निरर्थक है. उनका कहना है, "क्या मायने रखता है कि हम इंसान के रूप में एक-दूसरे के लिए कितने अच्छे हो सकते हैं. मैं कर्म और हम यहां क्यों आए हैं इस बारे में सोचती हूं."
यह भी कहती हैं कि वह दीदी के काम से खुश हैं और मोदी के आत्मनिर्भरता के वादे से प्रभावित हैं.
जितनी भी महिलाओं से हम मिले, उनमें से आरती चटर्जी, आरएसएस-भाजपा की राजनीति से सबसे ज्यादा वैचारिक मेल रखने वाली हैं. उनकी गुज़ारिश पर उनका नाम बदल दिया गया है. आरती सेवा भारती में काम नहीं करती और वहां कभी-कभी ही जा पाती हैं क्योंकि उनका कपड़े सिलने का काम के चलते उनके पास खाली समय नहीं है. हमसे बात करते हुए भी वह अपनी सिलाई मशीन पर फटाफट एक ब्लाउज़ सिल रही हैं.
उनकी सबसे बड़ी चिंता महिलाओं की सुरक्षा है. वे कहती हैं, "आदमी लोग यहां शराब पीते हैं और दिक्कत पैदा करते हैं. और इसका कारण यह है की हर सड़क के कोने पर एक बार है. अगर यह बार बंद हो जाएं तो चीजें सुधर सकती हैं और महिलाओं के लिए बाहर निकलना सुरक्षित हो सकता है."
वह देश के हालातों से ज्यादा प्रभावित नहीं हैं. वे पूछती हैं, "वह देश जो चावल 2 रुपए किलो बेच रहा हो क्या विकसित देश होगा? हर कोई दुकान पर जाकर बाजार के दाम 20 रुपए किलो के हिसाब से चावल खरीद सकने के लिए सक्षम होना चाहिए."
इसका मतलब आरती की मुख्य इच्छा, राज्य पर अपनी मूलभूत जरूरतों के लिए निर्भर न होकर खुद चीजों को खरीदने के सक्षम होना है. पश्चिम बंगाल के बीजेपी नेताओं में से उन्हें आरएसएस के पूर्व प्रचारक दिलीप घोष सबसे ज्यादा अच्छे लगते हैं क्योंकि, "भाई जैसे हैं वैसे ही दिखाई पड़ते हैं, कोई नकाब नहीं है."
आरती अपना नाम इसलिए नहीं बताना चाहतीं क्योंकि उन्हें, अपने राजनीतिक मत को प्रकट करने के परिणाम से डर है. वह भी ऐसे राज्य में जहां, हाल ही में राज्य में तृणमूल कांग्रेस और भाजपा दलों के बीच के मतभेद, खूनी झड़पों में तब्दील हो गए. वे कहती हैं, "डर तो है और मैं नहीं चाहती कि मेरा पति, मेरे नजरिए की वजह से मुसीबत में फंसे."
वह तीन तलाक के मुद्दे पर मोदी सरकार के मुस्लिम महिलाओं को मदद करने, और प्रधानमंत्री ने चीन की फौजों का लद्दाख से कैसे पलायन करवाया इससे बहुत प्रभावित हैं. लद्दाख में भारत की जीत का जिक्र करते हुए वह कहती हैं, "चीन और पाकिस्तान को अब हम से डर लगता है."
मोदी सरकार के अंदर, भारत की सैन्य शक्ति की जानकारी उन्हें आजतक, एबीपी आनंद, जी बांग्ला और zee24ghanta जैसे समाचार चैनलों से मिलती है. अगर इच्छापुर में 80 के दशक से आरएसएस का धीरे-धीरे सुदृढ से होने वाला काम, उन्हें हिंदुत्व की छतरी के नीचे भाजपा के फायदे के लिए लाया है, तो समाचार चैनल संघ परिवार को इसमें पछाड़ दे रहे हैं."
हमारा समय उनके साथ खत्म होने तक अपर्णा और आरती के बीच थोड़ी सी बहस तृणमूल कांग्रेस के काम के बारे में हो जाती है. कि वे संघ से जुड़े एक एनजीओ में काम करती हैं, लेकिन इस चुनाव में अपर्णा हमें दीदी की प्रचारक ज्यादा दिखाई पड़ती हैं. जो अपने सहकर्मियों को ममता सरकार की प्रशंसा करने के लिए कहती हैं और उन्हें राज्य सरकार की जिंदगी में बेहतरी लाने वाली योजनाओं की याद दिलाती हैं.
जब वे आरती के साथ ऐसा करने की कोशिश करती हैं तो उन्हें डांट पड़ती है. आरती उन्हें बताती हैं कि इन योजनाओं से कुछ नहीं होने वाला, "तुम्हें स्वास्थ्य साथी से 200-250 से रुपए फायदे के तौर पर मिल जाएंगे लेकिन उसके बाद कुछ नहीं, तुम देख लेना तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा."
हमारी बातचीत के दौरान पहली बार अपर्णा के अंदर ममता के अच्छे काम के लिए कुछ झिझक और उनके समर्थन में कुछ ढीलापन दिखाई पड़ता है- जब दूसरा उन्हें जोर-जोर से बोल कर एक बात भी नहीं करने देता. यह कुछ वैसा ही है जैसा उन टीवी पर होने वाली डिबेटों में होता है जब विपक्ष के प्रवक्ता का माइक बंद कर दिया जाता है, यह देखना आरती को पसंद है.
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