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शाहजहांपुर बॉर्डर से ग्राउंड रिपोर्ट: आगे आंदोलन चलाने के लिए हर रोज तैयार हो रहे हैं पांच युवा
दिल्ली को जयपुर से जोड़ने वाले एनएच-8 पर करीब 100 किमी दूर स्थित है शाहजहांपुर बॉर्डर. यहां पहुंचने से पहले लंबा जाम लगा है. दिल्ली से जयपुर जाने वालों को कई गांवों से गुजरकर दोबारा इस हाईवे पर आना पड़ता है जिस पर किसान दो महीनों से ज्यादा से कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं. यात्री जयपुर जाने के लिए गूगल मैप या फिर लोगों से पूछकर अपना रास्ता तलाश रहे हैं. एक जगह हमें दो पुलिस वाले मिले जो लोगों को रास्ता बता रहे थे. कुछ जगहों पर लिखा है "जयपुर के लिए रास्ता".
यही हाल जयपुर से दिल्ली की ओर आने वालों का भी है. उन्हें भी कई किलोमीटर का चक्कर लगाकर गांव वाले रास्ते से होकर आना पड़ता है. बॉर्डर के पास ही रास्ते के किनारे जनरल स्टोर चलाने वाले सतेंद्र प्रसाद ट्रकों की लंबी लाइन की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, "यह हाल यहां रोज का है. यहां लोग तीन घंटे का सफर पांच से सात घंटे में पूरा कर रहे हैं."
कुछ देर बात करने के बाद वह अपना विजिटिंग कार्ड देते हुए कहते हैं, "आप दिल्ली से तो आ ही गए हैं लेकिन जब जयपुर से लौटें तो हमें कॉल कर लीजिएगा. इस जाम में फंसने की जरूरत नहीं है. पांच सात किलोमीटर लंबा पड़ेगा लेकिन मैं आपकों एक नए रास्ते से निकलवा दूंगा."
सतेंद्र बताते हैं, "किसानों को बैठे हुए यहां काफी दिन हो गए हैं इसलिए अब सरकार को इनकी बात मान लेनी चाहिए. हम किसान तो नहीं हैं लेकिन हमें पता है कि हम इनका खाकर ही यहां तक पहुंचे हैं. अगर यह बिल ठीक होते तो कोई किसान अपना घर छोड़कर सड़क पर नहीं बैठता."
बता दें कि राजस्थान के शाहजहांपुर बॉर्डर का आंदोलन सिंघु, टीकरी और गाजीपुर से थोड़ा अलग है. यहां लोगों की संख्या बाकी जगहों के मुकाबले काफी कम है. अन्य बॉर्डर के मुकाबले यहां उतनी चहल-पहल भी नहीं है. मीडिया का भी इस प्रदर्शनस्थल पर कम ध्यान है. यहां बैठे किसानों का भी यही कहना है कि आंदोलन स्थल पर स्थानीय (राजस्थान) मीडिया के लोग नहीं आते हैं, कभी-कभी दिल्ली के ही पत्रकार कवरेज के लिए आते हैं.
राजस्थान के जिला गंगानगर से आए 35 वर्षीय गुरप्रीत सिंह कहते हैं, "उन्होंने यहां से पहले हरियाणा के धारूहेड़ा में भी रास्ता जाम किया था. लेकिन लालकिले पर हुई 26 जनवरी की घटना के बाद से वह फिर से शाहजहांपुर बॉर्डर पर आ गए. तब से वह अपने 25-30 साथियों के साथ यहीं बैठे हैं."
यहां बैठे किसानों का नेतृत्व कौन कर रहा है? इस सवाल पर वह कहते हैं, "यहां संयुक्त मोर्चा जो कहता है वही होता है. यानी जो फरमान सिंघु बॉर्डर पर जारी होता है उसे यहां अमल में लाया जाता है. आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए युवाओं की ड्यूटी लगाई जा रही है. हर 10-15 दिन के बाद यहां लोग बदल जाते हैं. जो 15 दिन आंदोलन का हिस्सा रहता है उसके बाद वह अपने गांव चला जाता है और उनकी जगह पर दूसरे लोग आते हैं. यही क्रम यहां काफी समय से चल रहा है."
वह कहते हैं, "इस महीने के बचे दिनों तक यहां मेरी ड्यूटी लगाई गई है. उसके बाद यहां कुछ और लोग आ जाएंगे. गांव में रहने के दौरान हम अपना घर और खेती का काम देखेंगे. और 15 दिन बाद फिर आ जाएंगे. मीडिया दिखा रहा है कि शाहजहांपुर बॉर्डर पर लोग कम हो रहे हैं जबकि ऐसा नहीं है हकीकत यह है कि यहां से पांच लोग जाते हैं तो छह आते हैं और छह जाते हैं तो सात-आठ आते हैं. पहले हम जिस दिन गए थे तो चार लोग गए थे और हमारे गांव से फिर छह लोग यहां आए.”
आंदोलन जारी रखने के लिए रोजाना होती है मीटिंग
गुरप्रीत बताते हैं, "शाहजहांपुर बॉर्डर पर रोजाना एक से चार बजे तक सभा होती है. उसके बाद साढ़े पांच बजे फिर एक मीटिंग होती है. उसमें अगले दिन का प्रोग्राम तय होता है. आंदोलन को कैसे बढ़ाना है, कल क्या करना है यह सभी मीटिंग में एक दिन पहले ही तय होता है. इसके अलावा एक मीटिंग 11 से 12 बजे के बीच होती है. इसमें हम अपने नए साथियों के साथ विचार विमर्श करते हैं. नए लड़कों को माइक पर ट्रेनिंग देते हैं कि कैसे बोलना है क्या बोलना है. आंदोलन आगे चलाने के लिए हम और हमारे किसान साथी उनको तैयार कर रहे हैं. क्योंकि हर समय हम गला साफ नहीं कर सकते हैं, हम भी थक जाते हैं. आंदोलन में बोलने के लिए रोजाना पांच नए लड़के तैयार किए जाते हैं. इसके बाद साढ़े पांच बजे वाली मीटिंग होती है."
"उदाहरण के तौर पर जैसे दो तीन दिन से सिर्फ इसलिए मीटिंग हो रही है कि गर्मी आ गई हैं तो इससे कैसे बचा जाए. क्योंकि अब यह तिरपाल तपने लगी हैं इसलिए अब घास वाली झोपड़ी तैयार कर रहे हैं ताकि ठंड रहे. ठंड तो निकल गई है अब हमें गर्मी में कैसे आंदोलन चलाना है इसकी तैयारी में लगे हैं. घास के अलावा जैसे दूध खराब होता है तो हम उसके लिए फ्रिज ला रहे हैं. कूलर और पंखे भी आ रहे हैं," उन्होंने कहा.
इनके साथ बैठे 56 वर्षीय स्वरूप सिंह कहते हैं, "यहां आए करीब तीन महीने हो गए हैं. सिर्फ पांच दिन घर गया था. बाकि समय यहीं बिताया है. हम 14 लोग एक साथ यहां आए थे, वो लोग आते-जाते रहते हैं लेकिन मैं यहीं हूं."
गंगानगर जिले के निवासी स्वरूप सिंह कहते हैं, "यहां पर लाइट पानी की अच्छी व्यवस्था है. किसी प्रकार की कोई दिक्कत नहीं है. हम यहां से तब तक नहीं जाने वाले हैं जब तक कि यह तीनों कृषि कानून वापस नहीं हो जाते."
हमने यह पूरा बॉर्डर पैदल पार किया. ताकि यहां की वास्तविक स्थिति और आगे की रणनीति का पता चल सके.
यहां कुछ युवक तिरपाल लगी एक ट्राली से सामान उतार रहे थे. उन्हें देखते ही लगता है कि वह कुछ देर पहले ही यहां पहुंचे हैं. न्यूज़लॉन्ड्री ने उनसे बात की.
उनमें राजस्थान के हनुमनगढ़ जिले के गांव सारनी से आए 23 वर्षीय बलजीत सिंह कहते हैं, "हम यहां कई बार आ चुके हैं बीच-बीच में चले जाते हैं, लेकिन आज फिर आए हैं, लक्कड़ और आटे की सेवा लेकर. हमारे यहां से 10-15 लड़के हमेशा बॉर्डर पर रहते हैं. हम आज 11 लोग आए हैं और यहां से आज ही 10 लोग गए हैं."
वह सामान से भरी ट्राली की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, "आज हम 40 कट्टे आटा, 30-40 कुंतल लकड़ी और कुछ चीनी लेकर आए हैं."
बलजीत सिंह बीए फाइनल करने के बाद अब एमए में एडमिशन लेने की तैयारी कर रहे हैं. साथ-साथ सरकारी नौकरी के फॉर्म भी भर रहे हैं. बलजीत सिंघु और टिकरी बॉर्डर पर चल रहे आंदोलन में भी गए थे. पंजाब में रहने वाले उनके रिश्तेदार टिकरी बॉर्डर पर बैठे थे.
उनके साथी 24 वर्षीय जसविंदर कहते हैं, "यह आंदोलन कितना भी लंबा चले अब हम यहां से जाने वाले नहीं हैं. हम ऐसे ही चेंज होते रहेंगे. जैसे सर्दी निकल गईं वैसे ही गर्मी भी निकल जाएगी. सर्दियों में हमें रजाई की जरूरत पड़ी थी लेकिन अब कूलर की जरूरत है तो कूलर उठा लाएंगे घर से, लेकिन हटेंगे नहीं. लोग कूलर लेकर भी आ रहे हैं और हम तंबू के अंदर पंखे की व्यवस्था भी कर रहे हैं. ज्यादा गर्मी पड़ेगी तो हम ट्राली में एसी भी लगा लेंगे, लेकिन जाएंगे नहीं. अभी गेहूं की फसल आ रही है. वह गर्मी में कटेगी. उसकी तूड़ी से हम अपनी झोपड़ी बनाएंगे उससे पता ही नहीं चलेगा कि कब निकल गईं गर्मी."
किसानों को सांसद हनुमान बेनीवाल के समर्थन की जरूरत नहीं
जिला हनुमानगढ़ से आए आत्मा राम सारनी कहते हैं, "हम हनुमान बेनीवाल का समर्थन नहीं करते हैं. हम किसी भी राजनीतिक पार्टी का समर्थन नहीं करते हैं. चाहे वह कोई भी पार्टी हो. अगर वह अपनी पार्टी छोड़कर हमारे साथ आते हैं तो उनका स्वागत है. बेनीवाल हमें समर्थन तो करते हैं लेकिन वह अपना झंडा लेकर यहां आते हैं उससे हमें परेशनी होगी. हमें वह झंडा बिल्कुल भी पसंद नहीं है. हम चाहते हैं कि वह अपना बोतल वाला निशान लेकर यहां न आएं."
"जो आदमी हमारे आंदोलन के चलते अपनी राजनीति चमकाना चाहता है हम उसे बिल्कुल भी पसंद नहीं करते हैं. हमें लाल झंडे वाले कमरेड भी पसंद नहीं हैं. हम सिर्फ तिरंगे झंडे और किसानी झंडे को समर्थन करते हैं बाकि किसी को नहीं. नेता बड़ा हो या छोटा लेकिन सिर्फ उसके पास किसान का ही झंडा होना चाहिए. यह किसानों का आंदोलन है हम इसे किसानों के आंदोलन की तरह ही देखते हैं." उन्होंने कहा.
वहीं साथ में खड़े हर्षदीप सिंह कहते हैं, "हम सब बीजेपी के हैं. हमने वोट भी बीजेपी को ही किया था. लेकिन अब बीजेपी हमारी जड़ें काट रही है इसलिए हम उसके साथ नहीं हैं. और न ही हम आने वाले समय में बीजेपी को वोट देंगे. क्योंकि अब किसान जाग गया है. किसान उल्लू नहीं हैं. पढ़े लिखे और समझदार भी किसान हैं. बारिश आए तूफान आए हम आंदोलन से नहीं जाने वाले हैं. हम यहीं रहेंगे. चाहें जो हो जाए. किसान 12 घंटे खेत में काम करता है और यहां तो सिर्फ बैठना है."
"अब हम ऐसे काम कर रहे हैं जैसे किसी परिवार में तीन लोग हैं तो उनमें से दो घर पर हैं और एक यहां आंदोलन में है. किसान सर्दियों में खेत में पानी लगाता है. यहां तो कोई ऐसी परेशानी भी नहीं है. हमें यहां गर्मी सर्दी के कोई मतलब नहीं है." उन्होंने कहा.
एक झोपड़ी में कुछ लोग तास खेल रहे थे. झोपड़ी के बाहर कुछ लोग आग जलाकर ताप रहे थे. दूर से ही कहते हैं आओ बैठो. चाय ले लो.
यहां तास खेल रहे 65 वर्षीय नरेश कुमार शर्मा से न्यूज़लॉन्ड्री ने बात की. जिला अलवर, तहसील रामगढ़, गांव मालपुर निवासी शर्मा कहते हैं, "जब से यह हड़ताल हुई है हम तब से यहीं बैठे हैं. मैं 1979 में पुलिस में भर्ती हुआ था. 1987 में सरकार में भ्रष्टाचार के चलते नौकरी छोड़ दी थी. इस सरकार को अन्नदाता की सुननी चाहिए. यहां एक तिहाई लोग किसान और मजदूर हैं. हमें यहां बैठे हुए 90 दिन होने जा रहे हैं. 90 दिन में तो मुजरिम की भी सुनवाई हो जाती है. संविधान की कद्र करना भारतीय नागरिक का कर्तव्य है. प्रतिज्ञा करते समय नेता कहते हैं कि समस्त भारतीय मेरे भाई बहन हैं सिर्फ यह कहने के लिए हैं लेकिन असलियत में हैं नहीं."
इसी बीच नरेश कुमार शर्मा हमसे सिंघु, टिकरी और गाजीपुर में बैठे किसानों का हाल जानते हैं, और कहते हैं, "मोदी को हमारे बारे में सुनना चाहिए. हमने ऐलान कर दिया है कि यह आंदोलन लंबा चलेगा और हम इस दौरान न तो राष्ट्रीय संपत्ति का नुकसान करना चाहते हैं. और न ही हम किसी की निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना चाहते हैं. हम सिर्फ आंदोलन के जरिए अपना हक मांगते हैं. मोदीजी अगर हमें हक देते हैं तो यह बहुत बढ़िया है. राजा प्रजा के पिता सामान होता है. वह भगवान स्वरूप होता है, सभी उसके लिए सामान होने चाहिए. मोदी के साथ ऐसा नहीं है इसलिए हम ऐसे व्यक्ति का विरोध कर रहे हैं."
हम अपनी फसल को बेचेंगे नहीं चाहें सड़े या गले
65 वर्षीय मिश्री लाल मीणा, तहसील सिकरा जिला दौसा से आए हैं. वह कहते हैं, "हम लोग काफी दिन से यहां पड़े हैं. एक दिन के लिए बीच में चले गए थे, फिर हम गांव से कलेक्शन करके. खाद्य सामग्री लेकर आ गए हैं. पिकअप में समान भरकर लाए हैं. किसान खाद्य सामग्री के लिए हमारा बहुत सहयोग कर रहे हैं. हमारा यह तय हुआ है कि आगामी दिनों में कई बहुत बड़ी सभाएं होने वाली हैं. उनमें हम कई बड़े फैसले ले सकते हैं. जैसे- हमारा जो अनाज होगा जो हम पैदा करते हैं. उसके एक भी दाने को हम बाजार में नहीं बेचेंगे चाहे वह घर में गले या सड़े. चाहे हमें वह जानवरों को ही क्यों न खिलाना पड़े. लेकिन अब हम उसे बेचेंगे नहीं. चाहे हमें ब्याह शादी का लॉकडाउन करना पड़े. एक दो साल पीछे करने पड़ें शादियां लेकिन जब तक यह तीनों काले कानून वापस नहीं हो जाते हैं तब तक हम पीछे नहीं हटेंगे. चाहें इसके लिए हमें कुछ भी करना पड़े."
आपकी लड़ाई तो सरकार से है लेकिन अगर बाजार में फसल नहीं आएगी तो उससे तो आम आदमी भी परेशान होंगे? इस सवाल पर वह कहते हैं, "ऐसे तो हमारे बहुत सारे गरीब भाई हैं. हम उनके लिए लंगर चला रहे हैं. ऐसे ही हम उनके लिए भी लंगर चलाएंगे. हम कमेटियां भी बनाएंगे इसके लिए हम गांव-गांव, घर-घर और शहर-शहर जाकर पूछेंगे कि यहां कितने गरीब हैं. हम एसी और कूलर में बैठने वाले को एक भी दाना नहीं देंगे. यह ऐसी में बैठने वाले हमारा ही खाते हैं और हमारा ही नाश करते हैं."
"हम इसके लिए एक राष्ट्रीय सम्मेलन करेंगे जिसमें हम यह फैसला लेंगे. इसकी अभी कोई तारीख फिक्स नहीं हुई हैं. हमारे किसान नेता अभी जगह-जगह मीटिंग कर रहे हैं. हम सभी जगहों पर घूम रहे हैं जहां भी आंदोलन चल रहे हैं. हम सिंघु, टिकरी और गाजीपुर बॉर्डर पर भी गए थे. हमने अपने बच्चों से भी कह दिया है कि अब हमें भूल जाओ. हमारी तुमको कोई जरूरत नहीं है लेकिन हमें जरूरत है किसानों की. हमारे खिलाफ जो काले कानून बनाए गए हैं. इनके लिए हम लड़ाई लड़ेंगे इसलिए हमें भूल जाइए. और अगर जरूरत पड़ी तो आप भी आ जाओगे." उन्होंने कहा.
आंदोलन में कम क्यों हो रहे हैं लोग
आंदोलन में लोग कम क्यों हो रहे हैं? इस सवाल पर राजस्थान के करोड़ी से आए 70 वर्षीय शोभाराम कहते हैं. "मीटिंग चल रही हैं. हम उन्हें भी सफल बनाने का काम कर रहे हैं. साथ ही फसलों का मौसम भी है. इसलिए खेत का काम भी देखना पड़ रहा है. किसान आते और जाते रहते हैं. क्योंकि खेत में पानी देना भी जरूरी है."
58 वर्षीय कल्याण सिंह जिला अलवर से आए हैं. वह कहते हैं, "गर्मी का मौसम आ रहा है हमारे टेंटों में अब भभका लगेगा. इसलिए अब इन्हें हटाकर यहां गर्मियों वाले टेंट लेगेंगे. अब हम छप्पर लगाने की तैयारी कर रहे हैं. यह आंदोलन आर पार चलेगा. जब तक यह तीनों कानून वापस नहीं हो जाते हैं. हम हटने वाले नहीं हैं. हम सारे काम यहीं करेंगे. हम इस रोड पर जरूरत पड़ी तो खेती भी कर सकते हैं अगर सरकार नहीं मानी तो. अभी बजट इकट्ठा करके देश भर में महापंचायत चल रही हैं. ऐसे ही सभी किसान संगठन मिलकर उसमें तय करेंगे कि आगे कि क्या रणनीति है."
टिकरी बॉर्डर पर लोगों का प्यार मिला, लेकिन भाषा समझ नहीं आई तो वापस आ गया
हमारी मुलाकात यहां आंदोलन के सबसे बुजुर्ग किसान 92 वर्षीय कंवर सिंह से हुई. न्यूज़लॉन्ड्री ने उनसे बात की.
जिला अलवर निवासी सिंह कहते हैं, "उन्होंने आजादी की लड़ाई देखी है. उस समय सात लाख लोगों ने कुर्बानी दी थी. आज की लड़ाई में और उस लड़ाई में सिर्फ इतना फर्क है कि तब अंग्रेजों से लड़ाई थी लेकिन यह किसानों की लड़ाई है जो गांधीवादी नीति से जारी है. वो क्रांति थी."
अपने पास खड़े लोगों को देखकर इशारा करते हुए कहते हैं, "तब इनका जन्म भी नहीं हुआ था जब मैंने आजादी की लड़ाई देखी थी. मेरे बराबर के सब मर लिए. और मुझसे बड़ा तो कोई है ही नहीं हमारे यहां."
जो लड़ाई अब लड़ रहे हैं उसे जीत पाएंगे या नहीं? इस सवाल पर वह कहते हैं, "हमें सौ प्रतिशत जीत मिलेगी. मैं यहां से पहले टिकरी बॉर्डर पर भी गया था. वहां सब हरियाणा और पंजाब के लोग बैठे हैं. मेरी समझ में उनकी पंजाबी भाषा नहीं आई. फिर मैं वहां से चला आया. वो प्यार तो बहुत करते थे लेकिन वो जब बात करते थे तो कुछ समझ नहीं आता था इसलिए मैं वहां से आ गया. रास्ते में मुझे एक जगह सवारी नहीं मिली तो मैं वहां से पैदल चलकर ही यहां पहुंचा. यह बात अखबारों में भी छपी है. बहरोड़ से पैदल चलकर आया था. वह यहां से 35 किलोमीटर है."
उनकी कुछ बातें हमें समझ नहीं आ रही थीं इस दौरान उनके साथ खड़े 52 वर्षीय जरनैल सिंह हमें समझाते रहे.
बाद में जरनैल सिंह कहते हैं, "जब हमारे बुजुर्ग इतनी मेहनत कर रहे हैं तो हम तो अभी जवान हैं. इसलिए जब तक यह तीनों कानून वापस नहीं हो जाते हैं तब तक हम यहां से नहीं जाएंगे. यह बहुत बड़ा आंदोलन है ना आजतक किसी ने देखा है और शायद ही आगे कोई देख पाए."
जिला भिवानी के मिराड़ से आए सिंह कहते हैं, "अब हमारा भाईचारा बहुत बढ़ गया है. देश के अंदर जो भाईचारा बढ़ा है यह सब मोदीजी की देन है वरना हमें तो पता ही नहीं था कि भाईचारा भी कुछ होता है. मोदीजी यह तीन काले कानून लाए नहीं होते तो यह भाईचारा भी नहीं बढ़ता."
क्या इन कानूनों से पहले कोई भाईचारा नहीं था? इस सवाल पर वह कहते हैं, "भाईचारा तो था लेकिन इस तरह से पहले कोई इकट्ठा नहीं हुआ. भाषा नहीं समझे लेकिन अब भाषा भी समझ रहे हैं और सारे काम साथ में मिलकर कर रहे हैं."
उनकी बात को रोकते हुए बुजुर्ग कंवर सिंह एक बार फिर कहते हैं, "पहले अगर कोई दलित हमसे टकरा जाता था तो हम नहाया करते थे. कपड़ा टच होने पर भी हमें बुरा लगता था, कपड़े बदलने पड़ते थे. यह बहुत पुरानी बातें हैं."
वहीं झुंझुनू जिला उदयपुर वाटी तहसील के सापोली गांव से आए राम लाल यादव कहते हैं, "मैं यहां तीन दिन पहले ही आया हूं. अब तक का आंदोलन सफल रहा है और आगे भी यह आंदोलन जारी रहेगा शांतिप्रिय तरीके से. मेरे गांव के 60 से ज्यादा लोग यहां मौजूद हैं."
उनके साथी दिनेश कुमार गुर्जर कहते हैं, "वह भी राजस्थान के उदयपुर वाटी तहसील से ही हैं. उन्हें यहां पर आए हुए पांच दिन हो गए हैं. यहां और भी काफी लोग आने वाले हैं.” 20 वर्षीय दिनेश कुमार ने मैथ से बीएससी की हुई है. आगे अब मास्टर्स की तैयारी कर रहे हैं साथ ही सरकारी नौकरी की भी तैयारी में लगे हैं.
उन्हीं के एक साथी रवि कहते हैं, "शुरू में यहां परेशानी होती थी एक दूसरे को जानते नहीं थे लेकिन अब सबको जानने लगे हैं. घर जैसा माहौल हो गया है. अब यहां न खाने की दिक्कत है ना सोने रहने की. सभी बहुत बढ़िया है. बड़े बुजुर्गों के साथ बैठकर बातें होती हैं. ज्ञान मिलता है.”
वह सिंघु बॉर्डर पर भी गए थे. वहां के लोग भी यहां पर आते हैं.
दिल्ली को जयपुर से जोड़ने वाले एनएच-8 पर करीब 100 किमी दूर स्थित है शाहजहांपुर बॉर्डर. यहां पहुंचने से पहले लंबा जाम लगा है. दिल्ली से जयपुर जाने वालों को कई गांवों से गुजरकर दोबारा इस हाईवे पर आना पड़ता है जिस पर किसान दो महीनों से ज्यादा से कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं. यात्री जयपुर जाने के लिए गूगल मैप या फिर लोगों से पूछकर अपना रास्ता तलाश रहे हैं. एक जगह हमें दो पुलिस वाले मिले जो लोगों को रास्ता बता रहे थे. कुछ जगहों पर लिखा है "जयपुर के लिए रास्ता".
यही हाल जयपुर से दिल्ली की ओर आने वालों का भी है. उन्हें भी कई किलोमीटर का चक्कर लगाकर गांव वाले रास्ते से होकर आना पड़ता है. बॉर्डर के पास ही रास्ते के किनारे जनरल स्टोर चलाने वाले सतेंद्र प्रसाद ट्रकों की लंबी लाइन की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, "यह हाल यहां रोज का है. यहां लोग तीन घंटे का सफर पांच से सात घंटे में पूरा कर रहे हैं."
कुछ देर बात करने के बाद वह अपना विजिटिंग कार्ड देते हुए कहते हैं, "आप दिल्ली से तो आ ही गए हैं लेकिन जब जयपुर से लौटें तो हमें कॉल कर लीजिएगा. इस जाम में फंसने की जरूरत नहीं है. पांच सात किलोमीटर लंबा पड़ेगा लेकिन मैं आपकों एक नए रास्ते से निकलवा दूंगा."
सतेंद्र बताते हैं, "किसानों को बैठे हुए यहां काफी दिन हो गए हैं इसलिए अब सरकार को इनकी बात मान लेनी चाहिए. हम किसान तो नहीं हैं लेकिन हमें पता है कि हम इनका खाकर ही यहां तक पहुंचे हैं. अगर यह बिल ठीक होते तो कोई किसान अपना घर छोड़कर सड़क पर नहीं बैठता."
बता दें कि राजस्थान के शाहजहांपुर बॉर्डर का आंदोलन सिंघु, टीकरी और गाजीपुर से थोड़ा अलग है. यहां लोगों की संख्या बाकी जगहों के मुकाबले काफी कम है. अन्य बॉर्डर के मुकाबले यहां उतनी चहल-पहल भी नहीं है. मीडिया का भी इस प्रदर्शनस्थल पर कम ध्यान है. यहां बैठे किसानों का भी यही कहना है कि आंदोलन स्थल पर स्थानीय (राजस्थान) मीडिया के लोग नहीं आते हैं, कभी-कभी दिल्ली के ही पत्रकार कवरेज के लिए आते हैं.
राजस्थान के जिला गंगानगर से आए 35 वर्षीय गुरप्रीत सिंह कहते हैं, "उन्होंने यहां से पहले हरियाणा के धारूहेड़ा में भी रास्ता जाम किया था. लेकिन लालकिले पर हुई 26 जनवरी की घटना के बाद से वह फिर से शाहजहांपुर बॉर्डर पर आ गए. तब से वह अपने 25-30 साथियों के साथ यहीं बैठे हैं."
यहां बैठे किसानों का नेतृत्व कौन कर रहा है? इस सवाल पर वह कहते हैं, "यहां संयुक्त मोर्चा जो कहता है वही होता है. यानी जो फरमान सिंघु बॉर्डर पर जारी होता है उसे यहां अमल में लाया जाता है. आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए युवाओं की ड्यूटी लगाई जा रही है. हर 10-15 दिन के बाद यहां लोग बदल जाते हैं. जो 15 दिन आंदोलन का हिस्सा रहता है उसके बाद वह अपने गांव चला जाता है और उनकी जगह पर दूसरे लोग आते हैं. यही क्रम यहां काफी समय से चल रहा है."
वह कहते हैं, "इस महीने के बचे दिनों तक यहां मेरी ड्यूटी लगाई गई है. उसके बाद यहां कुछ और लोग आ जाएंगे. गांव में रहने के दौरान हम अपना घर और खेती का काम देखेंगे. और 15 दिन बाद फिर आ जाएंगे. मीडिया दिखा रहा है कि शाहजहांपुर बॉर्डर पर लोग कम हो रहे हैं जबकि ऐसा नहीं है हकीकत यह है कि यहां से पांच लोग जाते हैं तो छह आते हैं और छह जाते हैं तो सात-आठ आते हैं. पहले हम जिस दिन गए थे तो चार लोग गए थे और हमारे गांव से फिर छह लोग यहां आए.”
आंदोलन जारी रखने के लिए रोजाना होती है मीटिंग
गुरप्रीत बताते हैं, "शाहजहांपुर बॉर्डर पर रोजाना एक से चार बजे तक सभा होती है. उसके बाद साढ़े पांच बजे फिर एक मीटिंग होती है. उसमें अगले दिन का प्रोग्राम तय होता है. आंदोलन को कैसे बढ़ाना है, कल क्या करना है यह सभी मीटिंग में एक दिन पहले ही तय होता है. इसके अलावा एक मीटिंग 11 से 12 बजे के बीच होती है. इसमें हम अपने नए साथियों के साथ विचार विमर्श करते हैं. नए लड़कों को माइक पर ट्रेनिंग देते हैं कि कैसे बोलना है क्या बोलना है. आंदोलन आगे चलाने के लिए हम और हमारे किसान साथी उनको तैयार कर रहे हैं. क्योंकि हर समय हम गला साफ नहीं कर सकते हैं, हम भी थक जाते हैं. आंदोलन में बोलने के लिए रोजाना पांच नए लड़के तैयार किए जाते हैं. इसके बाद साढ़े पांच बजे वाली मीटिंग होती है."
"उदाहरण के तौर पर जैसे दो तीन दिन से सिर्फ इसलिए मीटिंग हो रही है कि गर्मी आ गई हैं तो इससे कैसे बचा जाए. क्योंकि अब यह तिरपाल तपने लगी हैं इसलिए अब घास वाली झोपड़ी तैयार कर रहे हैं ताकि ठंड रहे. ठंड तो निकल गई है अब हमें गर्मी में कैसे आंदोलन चलाना है इसकी तैयारी में लगे हैं. घास के अलावा जैसे दूध खराब होता है तो हम उसके लिए फ्रिज ला रहे हैं. कूलर और पंखे भी आ रहे हैं," उन्होंने कहा.
इनके साथ बैठे 56 वर्षीय स्वरूप सिंह कहते हैं, "यहां आए करीब तीन महीने हो गए हैं. सिर्फ पांच दिन घर गया था. बाकि समय यहीं बिताया है. हम 14 लोग एक साथ यहां आए थे, वो लोग आते-जाते रहते हैं लेकिन मैं यहीं हूं."
गंगानगर जिले के निवासी स्वरूप सिंह कहते हैं, "यहां पर लाइट पानी की अच्छी व्यवस्था है. किसी प्रकार की कोई दिक्कत नहीं है. हम यहां से तब तक नहीं जाने वाले हैं जब तक कि यह तीनों कृषि कानून वापस नहीं हो जाते."
हमने यह पूरा बॉर्डर पैदल पार किया. ताकि यहां की वास्तविक स्थिति और आगे की रणनीति का पता चल सके.
यहां कुछ युवक तिरपाल लगी एक ट्राली से सामान उतार रहे थे. उन्हें देखते ही लगता है कि वह कुछ देर पहले ही यहां पहुंचे हैं. न्यूज़लॉन्ड्री ने उनसे बात की.
उनमें राजस्थान के हनुमनगढ़ जिले के गांव सारनी से आए 23 वर्षीय बलजीत सिंह कहते हैं, "हम यहां कई बार आ चुके हैं बीच-बीच में चले जाते हैं, लेकिन आज फिर आए हैं, लक्कड़ और आटे की सेवा लेकर. हमारे यहां से 10-15 लड़के हमेशा बॉर्डर पर रहते हैं. हम आज 11 लोग आए हैं और यहां से आज ही 10 लोग गए हैं."
वह सामान से भरी ट्राली की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, "आज हम 40 कट्टे आटा, 30-40 कुंतल लकड़ी और कुछ चीनी लेकर आए हैं."
बलजीत सिंह बीए फाइनल करने के बाद अब एमए में एडमिशन लेने की तैयारी कर रहे हैं. साथ-साथ सरकारी नौकरी के फॉर्म भी भर रहे हैं. बलजीत सिंघु और टिकरी बॉर्डर पर चल रहे आंदोलन में भी गए थे. पंजाब में रहने वाले उनके रिश्तेदार टिकरी बॉर्डर पर बैठे थे.
उनके साथी 24 वर्षीय जसविंदर कहते हैं, "यह आंदोलन कितना भी लंबा चले अब हम यहां से जाने वाले नहीं हैं. हम ऐसे ही चेंज होते रहेंगे. जैसे सर्दी निकल गईं वैसे ही गर्मी भी निकल जाएगी. सर्दियों में हमें रजाई की जरूरत पड़ी थी लेकिन अब कूलर की जरूरत है तो कूलर उठा लाएंगे घर से, लेकिन हटेंगे नहीं. लोग कूलर लेकर भी आ रहे हैं और हम तंबू के अंदर पंखे की व्यवस्था भी कर रहे हैं. ज्यादा गर्मी पड़ेगी तो हम ट्राली में एसी भी लगा लेंगे, लेकिन जाएंगे नहीं. अभी गेहूं की फसल आ रही है. वह गर्मी में कटेगी. उसकी तूड़ी से हम अपनी झोपड़ी बनाएंगे उससे पता ही नहीं चलेगा कि कब निकल गईं गर्मी."
किसानों को सांसद हनुमान बेनीवाल के समर्थन की जरूरत नहीं
जिला हनुमानगढ़ से आए आत्मा राम सारनी कहते हैं, "हम हनुमान बेनीवाल का समर्थन नहीं करते हैं. हम किसी भी राजनीतिक पार्टी का समर्थन नहीं करते हैं. चाहे वह कोई भी पार्टी हो. अगर वह अपनी पार्टी छोड़कर हमारे साथ आते हैं तो उनका स्वागत है. बेनीवाल हमें समर्थन तो करते हैं लेकिन वह अपना झंडा लेकर यहां आते हैं उससे हमें परेशनी होगी. हमें वह झंडा बिल्कुल भी पसंद नहीं है. हम चाहते हैं कि वह अपना बोतल वाला निशान लेकर यहां न आएं."
"जो आदमी हमारे आंदोलन के चलते अपनी राजनीति चमकाना चाहता है हम उसे बिल्कुल भी पसंद नहीं करते हैं. हमें लाल झंडे वाले कमरेड भी पसंद नहीं हैं. हम सिर्फ तिरंगे झंडे और किसानी झंडे को समर्थन करते हैं बाकि किसी को नहीं. नेता बड़ा हो या छोटा लेकिन सिर्फ उसके पास किसान का ही झंडा होना चाहिए. यह किसानों का आंदोलन है हम इसे किसानों के आंदोलन की तरह ही देखते हैं." उन्होंने कहा.
वहीं साथ में खड़े हर्षदीप सिंह कहते हैं, "हम सब बीजेपी के हैं. हमने वोट भी बीजेपी को ही किया था. लेकिन अब बीजेपी हमारी जड़ें काट रही है इसलिए हम उसके साथ नहीं हैं. और न ही हम आने वाले समय में बीजेपी को वोट देंगे. क्योंकि अब किसान जाग गया है. किसान उल्लू नहीं हैं. पढ़े लिखे और समझदार भी किसान हैं. बारिश आए तूफान आए हम आंदोलन से नहीं जाने वाले हैं. हम यहीं रहेंगे. चाहें जो हो जाए. किसान 12 घंटे खेत में काम करता है और यहां तो सिर्फ बैठना है."
"अब हम ऐसे काम कर रहे हैं जैसे किसी परिवार में तीन लोग हैं तो उनमें से दो घर पर हैं और एक यहां आंदोलन में है. किसान सर्दियों में खेत में पानी लगाता है. यहां तो कोई ऐसी परेशानी भी नहीं है. हमें यहां गर्मी सर्दी के कोई मतलब नहीं है." उन्होंने कहा.
एक झोपड़ी में कुछ लोग तास खेल रहे थे. झोपड़ी के बाहर कुछ लोग आग जलाकर ताप रहे थे. दूर से ही कहते हैं आओ बैठो. चाय ले लो.
यहां तास खेल रहे 65 वर्षीय नरेश कुमार शर्मा से न्यूज़लॉन्ड्री ने बात की. जिला अलवर, तहसील रामगढ़, गांव मालपुर निवासी शर्मा कहते हैं, "जब से यह हड़ताल हुई है हम तब से यहीं बैठे हैं. मैं 1979 में पुलिस में भर्ती हुआ था. 1987 में सरकार में भ्रष्टाचार के चलते नौकरी छोड़ दी थी. इस सरकार को अन्नदाता की सुननी चाहिए. यहां एक तिहाई लोग किसान और मजदूर हैं. हमें यहां बैठे हुए 90 दिन होने जा रहे हैं. 90 दिन में तो मुजरिम की भी सुनवाई हो जाती है. संविधान की कद्र करना भारतीय नागरिक का कर्तव्य है. प्रतिज्ञा करते समय नेता कहते हैं कि समस्त भारतीय मेरे भाई बहन हैं सिर्फ यह कहने के लिए हैं लेकिन असलियत में हैं नहीं."
इसी बीच नरेश कुमार शर्मा हमसे सिंघु, टिकरी और गाजीपुर में बैठे किसानों का हाल जानते हैं, और कहते हैं, "मोदी को हमारे बारे में सुनना चाहिए. हमने ऐलान कर दिया है कि यह आंदोलन लंबा चलेगा और हम इस दौरान न तो राष्ट्रीय संपत्ति का नुकसान करना चाहते हैं. और न ही हम किसी की निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना चाहते हैं. हम सिर्फ आंदोलन के जरिए अपना हक मांगते हैं. मोदीजी अगर हमें हक देते हैं तो यह बहुत बढ़िया है. राजा प्रजा के पिता सामान होता है. वह भगवान स्वरूप होता है, सभी उसके लिए सामान होने चाहिए. मोदी के साथ ऐसा नहीं है इसलिए हम ऐसे व्यक्ति का विरोध कर रहे हैं."
हम अपनी फसल को बेचेंगे नहीं चाहें सड़े या गले
65 वर्षीय मिश्री लाल मीणा, तहसील सिकरा जिला दौसा से आए हैं. वह कहते हैं, "हम लोग काफी दिन से यहां पड़े हैं. एक दिन के लिए बीच में चले गए थे, फिर हम गांव से कलेक्शन करके. खाद्य सामग्री लेकर आ गए हैं. पिकअप में समान भरकर लाए हैं. किसान खाद्य सामग्री के लिए हमारा बहुत सहयोग कर रहे हैं. हमारा यह तय हुआ है कि आगामी दिनों में कई बहुत बड़ी सभाएं होने वाली हैं. उनमें हम कई बड़े फैसले ले सकते हैं. जैसे- हमारा जो अनाज होगा जो हम पैदा करते हैं. उसके एक भी दाने को हम बाजार में नहीं बेचेंगे चाहे वह घर में गले या सड़े. चाहे हमें वह जानवरों को ही क्यों न खिलाना पड़े. लेकिन अब हम उसे बेचेंगे नहीं. चाहे हमें ब्याह शादी का लॉकडाउन करना पड़े. एक दो साल पीछे करने पड़ें शादियां लेकिन जब तक यह तीनों काले कानून वापस नहीं हो जाते हैं तब तक हम पीछे नहीं हटेंगे. चाहें इसके लिए हमें कुछ भी करना पड़े."
आपकी लड़ाई तो सरकार से है लेकिन अगर बाजार में फसल नहीं आएगी तो उससे तो आम आदमी भी परेशान होंगे? इस सवाल पर वह कहते हैं, "ऐसे तो हमारे बहुत सारे गरीब भाई हैं. हम उनके लिए लंगर चला रहे हैं. ऐसे ही हम उनके लिए भी लंगर चलाएंगे. हम कमेटियां भी बनाएंगे इसके लिए हम गांव-गांव, घर-घर और शहर-शहर जाकर पूछेंगे कि यहां कितने गरीब हैं. हम एसी और कूलर में बैठने वाले को एक भी दाना नहीं देंगे. यह ऐसी में बैठने वाले हमारा ही खाते हैं और हमारा ही नाश करते हैं."
"हम इसके लिए एक राष्ट्रीय सम्मेलन करेंगे जिसमें हम यह फैसला लेंगे. इसकी अभी कोई तारीख फिक्स नहीं हुई हैं. हमारे किसान नेता अभी जगह-जगह मीटिंग कर रहे हैं. हम सभी जगहों पर घूम रहे हैं जहां भी आंदोलन चल रहे हैं. हम सिंघु, टिकरी और गाजीपुर बॉर्डर पर भी गए थे. हमने अपने बच्चों से भी कह दिया है कि अब हमें भूल जाओ. हमारी तुमको कोई जरूरत नहीं है लेकिन हमें जरूरत है किसानों की. हमारे खिलाफ जो काले कानून बनाए गए हैं. इनके लिए हम लड़ाई लड़ेंगे इसलिए हमें भूल जाइए. और अगर जरूरत पड़ी तो आप भी आ जाओगे." उन्होंने कहा.
आंदोलन में कम क्यों हो रहे हैं लोग
आंदोलन में लोग कम क्यों हो रहे हैं? इस सवाल पर राजस्थान के करोड़ी से आए 70 वर्षीय शोभाराम कहते हैं. "मीटिंग चल रही हैं. हम उन्हें भी सफल बनाने का काम कर रहे हैं. साथ ही फसलों का मौसम भी है. इसलिए खेत का काम भी देखना पड़ रहा है. किसान आते और जाते रहते हैं. क्योंकि खेत में पानी देना भी जरूरी है."
58 वर्षीय कल्याण सिंह जिला अलवर से आए हैं. वह कहते हैं, "गर्मी का मौसम आ रहा है हमारे टेंटों में अब भभका लगेगा. इसलिए अब इन्हें हटाकर यहां गर्मियों वाले टेंट लेगेंगे. अब हम छप्पर लगाने की तैयारी कर रहे हैं. यह आंदोलन आर पार चलेगा. जब तक यह तीनों कानून वापस नहीं हो जाते हैं. हम हटने वाले नहीं हैं. हम सारे काम यहीं करेंगे. हम इस रोड पर जरूरत पड़ी तो खेती भी कर सकते हैं अगर सरकार नहीं मानी तो. अभी बजट इकट्ठा करके देश भर में महापंचायत चल रही हैं. ऐसे ही सभी किसान संगठन मिलकर उसमें तय करेंगे कि आगे कि क्या रणनीति है."
टिकरी बॉर्डर पर लोगों का प्यार मिला, लेकिन भाषा समझ नहीं आई तो वापस आ गया
हमारी मुलाकात यहां आंदोलन के सबसे बुजुर्ग किसान 92 वर्षीय कंवर सिंह से हुई. न्यूज़लॉन्ड्री ने उनसे बात की.
जिला अलवर निवासी सिंह कहते हैं, "उन्होंने आजादी की लड़ाई देखी है. उस समय सात लाख लोगों ने कुर्बानी दी थी. आज की लड़ाई में और उस लड़ाई में सिर्फ इतना फर्क है कि तब अंग्रेजों से लड़ाई थी लेकिन यह किसानों की लड़ाई है जो गांधीवादी नीति से जारी है. वो क्रांति थी."
अपने पास खड़े लोगों को देखकर इशारा करते हुए कहते हैं, "तब इनका जन्म भी नहीं हुआ था जब मैंने आजादी की लड़ाई देखी थी. मेरे बराबर के सब मर लिए. और मुझसे बड़ा तो कोई है ही नहीं हमारे यहां."
जो लड़ाई अब लड़ रहे हैं उसे जीत पाएंगे या नहीं? इस सवाल पर वह कहते हैं, "हमें सौ प्रतिशत जीत मिलेगी. मैं यहां से पहले टिकरी बॉर्डर पर भी गया था. वहां सब हरियाणा और पंजाब के लोग बैठे हैं. मेरी समझ में उनकी पंजाबी भाषा नहीं आई. फिर मैं वहां से चला आया. वो प्यार तो बहुत करते थे लेकिन वो जब बात करते थे तो कुछ समझ नहीं आता था इसलिए मैं वहां से आ गया. रास्ते में मुझे एक जगह सवारी नहीं मिली तो मैं वहां से पैदल चलकर ही यहां पहुंचा. यह बात अखबारों में भी छपी है. बहरोड़ से पैदल चलकर आया था. वह यहां से 35 किलोमीटर है."
उनकी कुछ बातें हमें समझ नहीं आ रही थीं इस दौरान उनके साथ खड़े 52 वर्षीय जरनैल सिंह हमें समझाते रहे.
बाद में जरनैल सिंह कहते हैं, "जब हमारे बुजुर्ग इतनी मेहनत कर रहे हैं तो हम तो अभी जवान हैं. इसलिए जब तक यह तीनों कानून वापस नहीं हो जाते हैं तब तक हम यहां से नहीं जाएंगे. यह बहुत बड़ा आंदोलन है ना आजतक किसी ने देखा है और शायद ही आगे कोई देख पाए."
जिला भिवानी के मिराड़ से आए सिंह कहते हैं, "अब हमारा भाईचारा बहुत बढ़ गया है. देश के अंदर जो भाईचारा बढ़ा है यह सब मोदीजी की देन है वरना हमें तो पता ही नहीं था कि भाईचारा भी कुछ होता है. मोदीजी यह तीन काले कानून लाए नहीं होते तो यह भाईचारा भी नहीं बढ़ता."
क्या इन कानूनों से पहले कोई भाईचारा नहीं था? इस सवाल पर वह कहते हैं, "भाईचारा तो था लेकिन इस तरह से पहले कोई इकट्ठा नहीं हुआ. भाषा नहीं समझे लेकिन अब भाषा भी समझ रहे हैं और सारे काम साथ में मिलकर कर रहे हैं."
उनकी बात को रोकते हुए बुजुर्ग कंवर सिंह एक बार फिर कहते हैं, "पहले अगर कोई दलित हमसे टकरा जाता था तो हम नहाया करते थे. कपड़ा टच होने पर भी हमें बुरा लगता था, कपड़े बदलने पड़ते थे. यह बहुत पुरानी बातें हैं."
वहीं झुंझुनू जिला उदयपुर वाटी तहसील के सापोली गांव से आए राम लाल यादव कहते हैं, "मैं यहां तीन दिन पहले ही आया हूं. अब तक का आंदोलन सफल रहा है और आगे भी यह आंदोलन जारी रहेगा शांतिप्रिय तरीके से. मेरे गांव के 60 से ज्यादा लोग यहां मौजूद हैं."
उनके साथी दिनेश कुमार गुर्जर कहते हैं, "वह भी राजस्थान के उदयपुर वाटी तहसील से ही हैं. उन्हें यहां पर आए हुए पांच दिन हो गए हैं. यहां और भी काफी लोग आने वाले हैं.” 20 वर्षीय दिनेश कुमार ने मैथ से बीएससी की हुई है. आगे अब मास्टर्स की तैयारी कर रहे हैं साथ ही सरकारी नौकरी की भी तैयारी में लगे हैं.
उन्हीं के एक साथी रवि कहते हैं, "शुरू में यहां परेशानी होती थी एक दूसरे को जानते नहीं थे लेकिन अब सबको जानने लगे हैं. घर जैसा माहौल हो गया है. अब यहां न खाने की दिक्कत है ना सोने रहने की. सभी बहुत बढ़िया है. बड़े बुजुर्गों के साथ बैठकर बातें होती हैं. ज्ञान मिलता है.”
वह सिंघु बॉर्डर पर भी गए थे. वहां के लोग भी यहां पर आते हैं.
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