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टोल-प्लाज़ा और जियो मोबाइल नेटवर्क का विरोध असल में ‘कॉमन गुड’ को निजीकरण से बचाना है
देश की राजधानी दिल्ली से लगने वाली तमाम अंतरराज्यीय सरहदों पर खम ठोककर बैठे हजारों किसान हर रोज़ अपने आंदोलन के माध्यम से देश भर में नए-नए राजनैतिक कार्यक्रम ले रहे हैं. हर रोज़ उनकी दूरदृष्टि, लोकतान्त्रिक तौर तरीकों और मर्यादाओं में रहकर अपनी बात कहने और मनवाने की परिपक्व सलाइयतें सामने आ रही हैं.
हर रोज़ उनका आंदोलन अपने साथ देश भर से लोगों को जोड़ रहा है. तमाम मजदूर संघ, विक्रेता- व्यापारी, ट्रांसपोर्टर्स, आड़तिये (जिन्हें असल में यह सरकार बिचौलिया कहती है), मंडियों के संचालक और आम शहरी भी साथ आ रहे हैं. यह आंदोलन देखते- देखते सरकार के साथ- साथ खुले तौर पर अब कोरपोरेट्स को निशाने पर ले चुका है. किसान आंदोलन यह समझ बनाने में कामयाब होता दिख रहा है कि मौजूदा भारत सरकार अनिवार्य तौर पर, अपनी मंशा, नीयत और कार्यवाहियों में कोरपोरेट्स की ‘दलाल सरकार’ है.
अब तक जो भी ‘सुधार’ इस सरकार ने बहुमत के बल पर बहुमत के लिए बताते हुए किए हैं वो अंतत: कोरपोरेट्स के दिमाग की उपज हैं और उन्हीं के मुनाफे के लिए हैं. ये सुधार चाहे श्रम- क्षेत्र में हों, बैंकिंग में हों, कर- क्षेत्र में हों, या कृषि क्षेत्र में हों. यहां तक की अब तक उठाए कदम जिन्हें मीडिया सैन्य शब्दावली से अलंकृत करती आयी है और जिन्हें ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का नाम दिया गया है या जिन्हें ‘मास्टर स्ट्रोक’ कहा जाता रहा है वो दरअसल देश के संसाधनों को पूंजीपतियों के अधीन किए जाने की मंशा से ही उठाए गए हैं. इस फेहरिस्त में नोटबंदी से होते हुए जीएसटी और कोरोना का भय दिखाते हुए देशव्यापी लॉकडाउन जैसे अविवेकी लगने वाले लेकिन शातिराना कदम भी शामिल हैं.
आंदोलन की तीव्रता और अवधि बढ़ने के साथ- साथ यह बात लगभग सतह पर आतीं जा रही हैं कि सरकार द्वारा ‘अन्न और पानी’ जैसी ज़िंदा रहने के लिए बुनियादी चीजों पर कोरपोरेट्स को जीवन पर्यंत एकाधिकार व नियंत्रण दिलाने के लिए ही ये कानून लाये गए हैं. और किसान आंदोलन में उठे सवालों पर प्रतिक्रिया देने मात्र के लिए इस सरकार के मंत्रियों ने इन क़ानूनों को पहली दफा पढ़ना शुरू किया है. अन्यथा न तो ये कानून सरकार या संबंधित मंत्रालय के मंत्री ने बनाए हैं और न ही इन पर किसी से चर्चा हुई है.
बीच कोरोना संकट में जब पूरा देश लगभग बंद किया जा चुका था तब किस मंशा से इन्हें अध्यादेशों के माध्यम से किसानों पर जबरन थोपा गया? इन सवालों का जबाव देना वाकई, सरकार को बहुत मुश्किल हो रहा है. हालांकि यह जानना दिलचस्प होगा कि ‘इन सवालों का जवाब देना सरकार को नागवार गुज़र रहा है’ या ‘जवाब ही देना’ नागवार गुज़र रहा है? बीते छह सालों में इनकी न तो कोई परीक्षा ही हुई न ही इन्हें जवाब देने की आदत रही है. कालक्रम को लेकर हालांकि अभी भी विद्वानों में मतभेद हैं कि पहले मीडिया ने सवाल पूछना बंद किया या सरकार ने सवालों के जवाब देना बंद किया?
खैर किसान आंदोलन ने सरकार को यह याद तो दिलाया ही है कि लोकतन्त्र में ‘जवाबदेही’ एक गहना है जैसे सवाल पूछना. आप केवल सवाल पूछते रहेंगे और जवाब नहीं देंगे तो यह ‘गहना’ होकर भी आप पर खिलेगा नहीं. सरकार को भी हठ छोड़कर इस बेशकीमती आभूषण को धारण करना चाहिए. लोकतन्त्र अगर सवालों से ज़िंदा है तो जवाब देने की अनिवार्यता उसमें ‘सांसें’ भरती हैं. जिसे जवाबदेही कहा जाता है. ऐसे ही लोकतंत्र जीवंत होते हैं. बहरहाल, लोकतन्त्र की ऐसी दुहाइयां सुन- सुन कर ही इस सरकार के सर चढ़े और मुंह लगे अफ़सरानों की त्यौरियां चढ़ जाती हैं और वो झल्लाकर इस रत्नजड़ित प्रक्रिया को ‘टू मच डेमोक्रेसी’ कह देते हैं.
‘इस टू मच डेमोक्रेसी’ के नागरिक अब उन लोगों के पते ठिकाने ढूंढ रहे हैं जिन्होंने अपनी सेवा के लिए ऐसी सरकार बनवाई है. सरकार को ये नागरिक, किसान और उनके आंदोलन थोड़ी देर के लिए अपना हिस्सा या अपना ही विस्तार मान भी लें लेकिन वो इस बात के लिए अब कतई तैयार नहीं हैं कि उनके दिये जनादेश को उन्हीं के खिलाफ इस्तेमाल करने की छूट व्यापारियों को दी जाये. जिनका एक और केवल उद्देश्य है और वो है मुनाफा कमाना.
यह किसान आंदोलन बार बार अपनी कार्यवाहियों व रणनीतियों से यह साबित कर रहा है कि यह आंदोलन देश के ‘कॉमन गुड’ यानी साझा (सामुदायिक) संसाधनों को बचाने की लड़ाई बन गयी है.
थोड़ा अलग तरीके से लेकिन ये किसान नागरिक इस ‘राष्ट्र -राज्य’ को चंद पूंजीपतियों के चंगुल से निकालने की कोशिश कर रहे हैं ताकि इसे फिर से आधुनिक कल्याणकारी राज्य बनाया जा सके जिसकी कल्पना की गयी थी और जो उस स्वरूप में लंबे समय तक रहा भी. जो संप्रभु है और जिसमें तमाम शक्तियां निहित हैं लेकिन इन तमाम शक्तियों का स्रोत इसकी जनता है.
12 दिसंबर को जब किसान आंदोलन ने राजमार्गों और अन्य मार्गों पर लगे ‘टोल- प्लाज़ा’ फ्री करवाने का राजनैतिक कार्यक्रम लिया और कई मार्गों पर मौजूद ‘टोल प्लाज़ा’ पर पहुंचना शुरू किया तो सरकार इस वसूली के पक्ष में खड़ी दिखलाई पड़ी. आंदोलन की वजह से टोल-प्लाज़ा की दैनंदिन गतिविधियों में, उसकी आवक में कोई कमी न आ जाये इसलिए सरकार ने भारी पुलिस बल वहां लगा दिया. सवाल इस रूप में अब सतह पर है कि टोल प्लाज़ा पर वसूली की व्यवस्था बनाए रखने के लिए सरकार किसके साथ खड़ी दिखी? जिसका जवाब उस सतह से थोड़ा ऊपर आ गया है– उन पूंजीपतियों के साथ जिन्होंने ये सड़कें बनायीं. जो जीवन पर्यंत इस निवेश से मुनाफा कमाते रहना चाहते हैं.
ठीक इसी तरह जब रिलायंस कंपनी के जियो के बहिष्कार की अपील किसान आंदोलन ने की है तो वह भी सार्वजनिक संसाधन यानी सेटेलाइट से पैदा होने वाली तरंगों पर निजी स्वामित्व के खिलाफ है. ये भी फिलहाल के लिए सच है कि रिलायंस जियो के बहिष्कार का अगर किसी को फायदा होगा भी तो भी निजी कंपनियां मसलन एयरटेल या आइडया वोडाफोन को ही होगा क्योंकि भारत संचार निगम लिमिटेड जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी को पहले ही अंबानी के यहां रेहन पर रखा जा चुका है. लेकिन वायु तरंगों की साझा हकदारी का सवाल यहां भी उठा तो है ही.
‘न्यू इंडिया’ का नागरिक समाज या जनता अब ‘प्रचार आधारित धारणाओं’ के वशीभूत हो चुकी है अन्यथा वह इस कार्यक्रम में छिपे उन संकेतों को समझ जाती जो वाकई एक राज्य के तौर पर भारतीय गणराज्य को पुनर्स्थापित करने की कोशिश कर रहा है. संविधान की शक्ति का स्रोत अगर देश की जनता है तो ठीक उसी तरह राज्य की शक्ति के कई स्रोतों में से एक स्रोत उसे हासिल ‘एमिनेंट डोमेन’ का वो डोक्ट्राईन है जो यह स्थापित करता है कि राज्य की भौगोलिक सरहदों के भीतर जो कुछ भी है वह अंतत: राज्य का है. तमाम चल-अचल संसाधनों पर अंतत: राज्य की प्रभुसत्ता है. इस सत्ता का इस्तेमाल राज्य सार्वजनिक उद्देश्य के लिए अपने विवेक से कर सकती है. कई बार सामरिक या आपदा महत्व के लिए इस तरह के अनंत अधिकार राज्य के लिए अनिवार्य भी होते हैं और राज्य इनका इस्तेमाल करते रहे हैं.
आधुनिक राष्ट्र राज्य की संप्रभुता और स्व-प्रभुता के लिए इस डोक्ट्राइन को लगभग अपरिहार्य मान लिया गया है. हालांकि नव उदरवादी आर्थिक नीतियां देश में लागू होने के बाद इसी एक शक्ति का दुरुपयोग सबसे ज़्यादा हुआ है और खेदजनक बात है कि इनका इनका दुरुपयोग निर्बल जनता के खिलाफ उनकी संपत्ति के हक़-अधिकारों को बलात हड़पने के लिए हुआ है. इससे भी ज़्यादा अफसोसजनक बात यह रही कि इस एक शक्ति का इस्तेमाल बीते तीन दशकों में पूंजीपतियों के हितों में ही किया गया.
टोल-प्लाज़ा की अवधारणा और उसका चलन वास्तव में राज्य को मिली इस अनंत शक्ति में सेंध लगाने जैसा है. टोल पर निजी प्रभुत्व सार्वजनिक कार्यों के निजीकरण की परिणति है. इन्फ्रास्ट्रक्चर या अधो- संरचना जो कभी सार्वजनिक क्षेत्र की ज़िम्मेदारी रही है और जिसे अलग- अलग तरीकों से देश की जनता द्वारा दिये गए करों से पूरा किया जाता रहा है. अब सड़क निर्माण क्योंकि निजी कंपनियां कर रही हैं तो इसके एवज़ में टोल का अधिकार उन्हें मिल रहा है। यह टोल-प्लाज़ा असल में कॉमन गुड या सार्वजनिक- साझा संसाधनों का निजीकरण ही है. इससे स्पष्ट है कि अगर देश की सरहद के अंदर सब कुछ चल-अचल राज्य का है तो किसी हाईवे पर वसूली का अधिकार राज्य के बजाय किसी निजी व्यक्ति या कंपनी को क्यों होना चाहिए?
इस लिहाज से देखें तो यह आंदोलन वास्तव में ‘कॉमन गुड’ के निजीकरण के खिलाफ है और इसलिए सिर्फ किसानों का नहीं बल्कि सभी का आंदोलन है.
टोल प्लाज़ा ने यातायात को बहुत मंहगा किया है. आज पूरे देश में ऐसे ही मार्ग बन चुके हैं जिन्हें किसी निजी कंपनी ने बनाया है और उस पर गुजरने वालों से टैक्स वसूला जा रहा है. व्यावहारिक रूप से आज लगभग एक से डेढ़ रुपये प्रति किलोमीटर केवल इन मार्गों पर चलने के लिए हर नागरिक अदा कर रहा है. इस बात पर अक्सर यह सुना जाता है कि- ठीक है कुछ टैक्स भले लगा लेकिन रोड तो बढ़िया था. अब सवाल है कि अपने नागरिकों को अच्छी सड़क मुहैया कराना राज्य का दायित्व था और यह भी ज़रूरी नहीं था कि सड़कें ठीक वैसी ही हों जो इन निजी पूंजीपतियों ने भविष्य में टोल वसूले जाने के लिए बनायी हैं. थोड़ा कम गुणवत्ता की भी सड़कें हो सकती थीं लेकिन राज्य अपने दायित्व को निभा सकता था और अगर सड़क की मरम्मत वगैरह के लिए राजस्व जुटाने की बात भी है तो राज्य वह वसूल करता ही.
टोल-प्लाज़ा राज्य की बुनियादी शक्तियों में एक ऐसी पूंजीवादी दखल है जिससे देश के तमाम नागरिक हर रोज़ दो-चार होते ही हैं. हालांकि राज्य की संचालन की ज़िम्मेदारी के लिए चुनी गयी सरकारें खुद इन्हें लेकर बेपरवाह हैं या जान-बूझकर राज्य की अवधारणा को कमजोर कर रही हैं. यह स्पष्ट होता जा रहा है कि सरकारों पर कॉर्पोरेटी नियंत्रण अब राज्य को भी अपने मुनाफे की हवस में निगलते जा रहा है. किसान आंदोलन ने इस मूल बात को भी समझ लिया है. आखिर अनिवार्य रूप से राज्य के एकाधिकार में पूंजीपतियों को समानान्तर अधिकार कैसे दिये जा सकते हैं? इस आंदोलन के इस कदम को हालांकि एक इवेंट के तौर पर देखा गया और इसके मूल संकेतों को जैसे छिपा दिया गया. ज़रूरत इन्हें पहचानने और समर्थन देने की है.
देश की राजधानी दिल्ली से लगने वाली तमाम अंतरराज्यीय सरहदों पर खम ठोककर बैठे हजारों किसान हर रोज़ अपने आंदोलन के माध्यम से देश भर में नए-नए राजनैतिक कार्यक्रम ले रहे हैं. हर रोज़ उनकी दूरदृष्टि, लोकतान्त्रिक तौर तरीकों और मर्यादाओं में रहकर अपनी बात कहने और मनवाने की परिपक्व सलाइयतें सामने आ रही हैं.
हर रोज़ उनका आंदोलन अपने साथ देश भर से लोगों को जोड़ रहा है. तमाम मजदूर संघ, विक्रेता- व्यापारी, ट्रांसपोर्टर्स, आड़तिये (जिन्हें असल में यह सरकार बिचौलिया कहती है), मंडियों के संचालक और आम शहरी भी साथ आ रहे हैं. यह आंदोलन देखते- देखते सरकार के साथ- साथ खुले तौर पर अब कोरपोरेट्स को निशाने पर ले चुका है. किसान आंदोलन यह समझ बनाने में कामयाब होता दिख रहा है कि मौजूदा भारत सरकार अनिवार्य तौर पर, अपनी मंशा, नीयत और कार्यवाहियों में कोरपोरेट्स की ‘दलाल सरकार’ है.
अब तक जो भी ‘सुधार’ इस सरकार ने बहुमत के बल पर बहुमत के लिए बताते हुए किए हैं वो अंतत: कोरपोरेट्स के दिमाग की उपज हैं और उन्हीं के मुनाफे के लिए हैं. ये सुधार चाहे श्रम- क्षेत्र में हों, बैंकिंग में हों, कर- क्षेत्र में हों, या कृषि क्षेत्र में हों. यहां तक की अब तक उठाए कदम जिन्हें मीडिया सैन्य शब्दावली से अलंकृत करती आयी है और जिन्हें ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का नाम दिया गया है या जिन्हें ‘मास्टर स्ट्रोक’ कहा जाता रहा है वो दरअसल देश के संसाधनों को पूंजीपतियों के अधीन किए जाने की मंशा से ही उठाए गए हैं. इस फेहरिस्त में नोटबंदी से होते हुए जीएसटी और कोरोना का भय दिखाते हुए देशव्यापी लॉकडाउन जैसे अविवेकी लगने वाले लेकिन शातिराना कदम भी शामिल हैं.
आंदोलन की तीव्रता और अवधि बढ़ने के साथ- साथ यह बात लगभग सतह पर आतीं जा रही हैं कि सरकार द्वारा ‘अन्न और पानी’ जैसी ज़िंदा रहने के लिए बुनियादी चीजों पर कोरपोरेट्स को जीवन पर्यंत एकाधिकार व नियंत्रण दिलाने के लिए ही ये कानून लाये गए हैं. और किसान आंदोलन में उठे सवालों पर प्रतिक्रिया देने मात्र के लिए इस सरकार के मंत्रियों ने इन क़ानूनों को पहली दफा पढ़ना शुरू किया है. अन्यथा न तो ये कानून सरकार या संबंधित मंत्रालय के मंत्री ने बनाए हैं और न ही इन पर किसी से चर्चा हुई है.
बीच कोरोना संकट में जब पूरा देश लगभग बंद किया जा चुका था तब किस मंशा से इन्हें अध्यादेशों के माध्यम से किसानों पर जबरन थोपा गया? इन सवालों का जबाव देना वाकई, सरकार को बहुत मुश्किल हो रहा है. हालांकि यह जानना दिलचस्प होगा कि ‘इन सवालों का जवाब देना सरकार को नागवार गुज़र रहा है’ या ‘जवाब ही देना’ नागवार गुज़र रहा है? बीते छह सालों में इनकी न तो कोई परीक्षा ही हुई न ही इन्हें जवाब देने की आदत रही है. कालक्रम को लेकर हालांकि अभी भी विद्वानों में मतभेद हैं कि पहले मीडिया ने सवाल पूछना बंद किया या सरकार ने सवालों के जवाब देना बंद किया?
खैर किसान आंदोलन ने सरकार को यह याद तो दिलाया ही है कि लोकतन्त्र में ‘जवाबदेही’ एक गहना है जैसे सवाल पूछना. आप केवल सवाल पूछते रहेंगे और जवाब नहीं देंगे तो यह ‘गहना’ होकर भी आप पर खिलेगा नहीं. सरकार को भी हठ छोड़कर इस बेशकीमती आभूषण को धारण करना चाहिए. लोकतन्त्र अगर सवालों से ज़िंदा है तो जवाब देने की अनिवार्यता उसमें ‘सांसें’ भरती हैं. जिसे जवाबदेही कहा जाता है. ऐसे ही लोकतंत्र जीवंत होते हैं. बहरहाल, लोकतन्त्र की ऐसी दुहाइयां सुन- सुन कर ही इस सरकार के सर चढ़े और मुंह लगे अफ़सरानों की त्यौरियां चढ़ जाती हैं और वो झल्लाकर इस रत्नजड़ित प्रक्रिया को ‘टू मच डेमोक्रेसी’ कह देते हैं.
‘इस टू मच डेमोक्रेसी’ के नागरिक अब उन लोगों के पते ठिकाने ढूंढ रहे हैं जिन्होंने अपनी सेवा के लिए ऐसी सरकार बनवाई है. सरकार को ये नागरिक, किसान और उनके आंदोलन थोड़ी देर के लिए अपना हिस्सा या अपना ही विस्तार मान भी लें लेकिन वो इस बात के लिए अब कतई तैयार नहीं हैं कि उनके दिये जनादेश को उन्हीं के खिलाफ इस्तेमाल करने की छूट व्यापारियों को दी जाये. जिनका एक और केवल उद्देश्य है और वो है मुनाफा कमाना.
यह किसान आंदोलन बार बार अपनी कार्यवाहियों व रणनीतियों से यह साबित कर रहा है कि यह आंदोलन देश के ‘कॉमन गुड’ यानी साझा (सामुदायिक) संसाधनों को बचाने की लड़ाई बन गयी है.
थोड़ा अलग तरीके से लेकिन ये किसान नागरिक इस ‘राष्ट्र -राज्य’ को चंद पूंजीपतियों के चंगुल से निकालने की कोशिश कर रहे हैं ताकि इसे फिर से आधुनिक कल्याणकारी राज्य बनाया जा सके जिसकी कल्पना की गयी थी और जो उस स्वरूप में लंबे समय तक रहा भी. जो संप्रभु है और जिसमें तमाम शक्तियां निहित हैं लेकिन इन तमाम शक्तियों का स्रोत इसकी जनता है.
12 दिसंबर को जब किसान आंदोलन ने राजमार्गों और अन्य मार्गों पर लगे ‘टोल- प्लाज़ा’ फ्री करवाने का राजनैतिक कार्यक्रम लिया और कई मार्गों पर मौजूद ‘टोल प्लाज़ा’ पर पहुंचना शुरू किया तो सरकार इस वसूली के पक्ष में खड़ी दिखलाई पड़ी. आंदोलन की वजह से टोल-प्लाज़ा की दैनंदिन गतिविधियों में, उसकी आवक में कोई कमी न आ जाये इसलिए सरकार ने भारी पुलिस बल वहां लगा दिया. सवाल इस रूप में अब सतह पर है कि टोल प्लाज़ा पर वसूली की व्यवस्था बनाए रखने के लिए सरकार किसके साथ खड़ी दिखी? जिसका जवाब उस सतह से थोड़ा ऊपर आ गया है– उन पूंजीपतियों के साथ जिन्होंने ये सड़कें बनायीं. जो जीवन पर्यंत इस निवेश से मुनाफा कमाते रहना चाहते हैं.
ठीक इसी तरह जब रिलायंस कंपनी के जियो के बहिष्कार की अपील किसान आंदोलन ने की है तो वह भी सार्वजनिक संसाधन यानी सेटेलाइट से पैदा होने वाली तरंगों पर निजी स्वामित्व के खिलाफ है. ये भी फिलहाल के लिए सच है कि रिलायंस जियो के बहिष्कार का अगर किसी को फायदा होगा भी तो भी निजी कंपनियां मसलन एयरटेल या आइडया वोडाफोन को ही होगा क्योंकि भारत संचार निगम लिमिटेड जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी को पहले ही अंबानी के यहां रेहन पर रखा जा चुका है. लेकिन वायु तरंगों की साझा हकदारी का सवाल यहां भी उठा तो है ही.
‘न्यू इंडिया’ का नागरिक समाज या जनता अब ‘प्रचार आधारित धारणाओं’ के वशीभूत हो चुकी है अन्यथा वह इस कार्यक्रम में छिपे उन संकेतों को समझ जाती जो वाकई एक राज्य के तौर पर भारतीय गणराज्य को पुनर्स्थापित करने की कोशिश कर रहा है. संविधान की शक्ति का स्रोत अगर देश की जनता है तो ठीक उसी तरह राज्य की शक्ति के कई स्रोतों में से एक स्रोत उसे हासिल ‘एमिनेंट डोमेन’ का वो डोक्ट्राईन है जो यह स्थापित करता है कि राज्य की भौगोलिक सरहदों के भीतर जो कुछ भी है वह अंतत: राज्य का है. तमाम चल-अचल संसाधनों पर अंतत: राज्य की प्रभुसत्ता है. इस सत्ता का इस्तेमाल राज्य सार्वजनिक उद्देश्य के लिए अपने विवेक से कर सकती है. कई बार सामरिक या आपदा महत्व के लिए इस तरह के अनंत अधिकार राज्य के लिए अनिवार्य भी होते हैं और राज्य इनका इस्तेमाल करते रहे हैं.
आधुनिक राष्ट्र राज्य की संप्रभुता और स्व-प्रभुता के लिए इस डोक्ट्राइन को लगभग अपरिहार्य मान लिया गया है. हालांकि नव उदरवादी आर्थिक नीतियां देश में लागू होने के बाद इसी एक शक्ति का दुरुपयोग सबसे ज़्यादा हुआ है और खेदजनक बात है कि इनका इनका दुरुपयोग निर्बल जनता के खिलाफ उनकी संपत्ति के हक़-अधिकारों को बलात हड़पने के लिए हुआ है. इससे भी ज़्यादा अफसोसजनक बात यह रही कि इस एक शक्ति का इस्तेमाल बीते तीन दशकों में पूंजीपतियों के हितों में ही किया गया.
टोल-प्लाज़ा की अवधारणा और उसका चलन वास्तव में राज्य को मिली इस अनंत शक्ति में सेंध लगाने जैसा है. टोल पर निजी प्रभुत्व सार्वजनिक कार्यों के निजीकरण की परिणति है. इन्फ्रास्ट्रक्चर या अधो- संरचना जो कभी सार्वजनिक क्षेत्र की ज़िम्मेदारी रही है और जिसे अलग- अलग तरीकों से देश की जनता द्वारा दिये गए करों से पूरा किया जाता रहा है. अब सड़क निर्माण क्योंकि निजी कंपनियां कर रही हैं तो इसके एवज़ में टोल का अधिकार उन्हें मिल रहा है। यह टोल-प्लाज़ा असल में कॉमन गुड या सार्वजनिक- साझा संसाधनों का निजीकरण ही है. इससे स्पष्ट है कि अगर देश की सरहद के अंदर सब कुछ चल-अचल राज्य का है तो किसी हाईवे पर वसूली का अधिकार राज्य के बजाय किसी निजी व्यक्ति या कंपनी को क्यों होना चाहिए?
इस लिहाज से देखें तो यह आंदोलन वास्तव में ‘कॉमन गुड’ के निजीकरण के खिलाफ है और इसलिए सिर्फ किसानों का नहीं बल्कि सभी का आंदोलन है.
टोल प्लाज़ा ने यातायात को बहुत मंहगा किया है. आज पूरे देश में ऐसे ही मार्ग बन चुके हैं जिन्हें किसी निजी कंपनी ने बनाया है और उस पर गुजरने वालों से टैक्स वसूला जा रहा है. व्यावहारिक रूप से आज लगभग एक से डेढ़ रुपये प्रति किलोमीटर केवल इन मार्गों पर चलने के लिए हर नागरिक अदा कर रहा है. इस बात पर अक्सर यह सुना जाता है कि- ठीक है कुछ टैक्स भले लगा लेकिन रोड तो बढ़िया था. अब सवाल है कि अपने नागरिकों को अच्छी सड़क मुहैया कराना राज्य का दायित्व था और यह भी ज़रूरी नहीं था कि सड़कें ठीक वैसी ही हों जो इन निजी पूंजीपतियों ने भविष्य में टोल वसूले जाने के लिए बनायी हैं. थोड़ा कम गुणवत्ता की भी सड़कें हो सकती थीं लेकिन राज्य अपने दायित्व को निभा सकता था और अगर सड़क की मरम्मत वगैरह के लिए राजस्व जुटाने की बात भी है तो राज्य वह वसूल करता ही.
टोल-प्लाज़ा राज्य की बुनियादी शक्तियों में एक ऐसी पूंजीवादी दखल है जिससे देश के तमाम नागरिक हर रोज़ दो-चार होते ही हैं. हालांकि राज्य की संचालन की ज़िम्मेदारी के लिए चुनी गयी सरकारें खुद इन्हें लेकर बेपरवाह हैं या जान-बूझकर राज्य की अवधारणा को कमजोर कर रही हैं. यह स्पष्ट होता जा रहा है कि सरकारों पर कॉर्पोरेटी नियंत्रण अब राज्य को भी अपने मुनाफे की हवस में निगलते जा रहा है. किसान आंदोलन ने इस मूल बात को भी समझ लिया है. आखिर अनिवार्य रूप से राज्य के एकाधिकार में पूंजीपतियों को समानान्तर अधिकार कैसे दिये जा सकते हैं? इस आंदोलन के इस कदम को हालांकि एक इवेंट के तौर पर देखा गया और इसके मूल संकेतों को जैसे छिपा दिया गया. ज़रूरत इन्हें पहचानने और समर्थन देने की है.
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