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बिहार चुनाव: स्थिति ऐसी बनी कि सब कुछ अनिश्चिय की स्थिति में पहुंच गया है
कोरोना, जिससे पूरी दुनिया के साथ-साथ हिन्दुस्तान भी जूझ रहा है और जहां एक लाख से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, उस महामारी की बिहार के चुनाव में कोई भूमिका नहीं रह गयी है. हम यह भी कह सकते हैं कि मोदीजी के ‘घंटी बजाओ से बत्ती जलाओ’ वाले संदेश के बाद कोरोना के खौफ़ को कम करने में सबसे कारगर भूमिका बिहार का चुनाव निभाने जा रहा है.
कोरोना से पहले ही नहीं, बल्कि बीच कोरोना में भी जब पूरे देश से मजदूरों का पलायन हो रहा था और कुछ मजदूरों को तो अपने घर पहुंचने में दो हफ्ते तक का वक्त लग गया था, तब भी बिहार में लग रहा था कि नीतीश कुमार बिना किसी मेहनत के सत्ता में वापस लौट आएंगे. एकाएक एक पखवाड़े में जिस नीतीश कुमार को हम अपराजेय मान रहे थे, उनके बारे में कोई भी अनुमान लगाना मुश्किल सा काम हो गया है. पहले राजनीतिक विश्लेषक अनुमान लगा रहे थे कि हो सकता है चुनाव के अंत-अंत तक बीजेपी और जेडीयू का गठबंधन न हो, लेकिन स्थिति इस तरह गड्डमड्ड हो जाएगी इसका अनुमान किसी को नहीं था.
जेडीयू और बीजेपी के बीच सीटों का बंटवारा हो गया है और जेडीयू को अधिक सीटें दी गयी हैं. ऑफिशियली जेडीयू के लिए 122 सीटें छोड़ी गयी हैं जबकि बीजेपी 121 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. इसी 122 सीटों में से जेडीयू हाल में उनके मोर्चे में शामिल हुए हिन्दुस्तानी अवामी मोर्चा के जीतन राम मांझी के लिए सात सीटें छोड़ेगी. वैसे अभी तक फाइनल नहीं हुआ है लेकिन एक चर्चा यह भी है कि कुछ दिन पहले तक महागठबंधन में शामिल रहे मुकेश सहनी की पार्टी को भाजपा अपने हिस्से से कुछ सीट दे सकती है. अगर ऐसा नहीं हुआ तो कुल मिलाकर नीतीश कुमार पहली बार बीजेपी से कम सीटों पर चुनाव लड़ेंगे.
लेकिन पेंच यहां नहीं है. बिहार के चुनावी परिदृश्य को समझने वालों के लिए यह इतना बड़ा मसला नहीं है जितना कि दिखता है. वहां सबसे बड़ा मसला यह है कि आखिर केन्द्र में एनडीए गठबंधन का हिस्सा लोक जनशक्ति पार्टी बिहार में क्यों एनडीए का हिस्सा नहीं है? क्या रामविलास पासवान द्वारा स्थापित और अब पूरी तरह उनके पुत्र के हाथ से संचालित एलजेपी खुद बिहार में एनडीए से अलग हो गयी है या इसके पीछे कोई और है? क्योंकि आज के हालात में रामविलास पासवान केन्द्र में मंत्री बने हुए हैं और बिहार में नीतीश कुमार की पार्टी द्वारा लड़ी जा रही सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करने का क्या मतलब हो सकता है?
ऐसा भी नहीं है कि लोजपा ने ऐसा पहली बार किया है. 2005 के विधानसभा चुनाव में लालू यादव और रामविलास पासवान दोनों यूपीए सरकार में शामिल थे लेकिन बिहार में दोनों की पार्टियां अलग-अलग चुनाव लड़ी थीं. इसलिए चिराग पासवान के अकेले चुनाव लड़ने को किसी अनहोनी घटना के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए क्योंकि हमने बिहार में यह भी देखा है कि लोजपा के अधिकांश विधायकों को नीतीश कुमार बड़ी आसानी से अपनी पार्टी में मिलाते रहे हैं. इसलिए ऐसा नहीं है कि ठीक चुनाव के वक्त नीतीश कुमार से बदला लेने की कोशिश हो रही है.
अगर पिछले रिकार्ड को देखें तो लोजपा भले ही एनडीए का पार्ट रही हो लेकिन नीतीश कुमार ने कभी भी उसे अपनी सरकार में शामिल नहीं किया है. इसलिए यह अनहोनी घटना तो नहीं है. अनहोनी घटना महज यह है कि लोजपा सिर्फ नीतीश कुमार की पार्टी के खिलाफ अपना उम्मीदवार उतार रही है. और इसलिए शक की सुई बार-बार बीजेपी की तरफ जा रही है कि कहीं न कहीं सबकुछ उसके इशारे पर ही तो नहीं हो रहा है?
यह भी सही है कि बिहार में विपक्षी दलों की यह हैसियत नहीं रह गयी थी वे नीतीश की सारी असफलताओं के बावजूद उन्हें किसी भी रूप में कड़ी टक्कर दे पाएं, लेकिन यह भी उतना ही सही है कि सारी तबाही के बावजूद प्रधानमंत्री मोदी की इमेज पर पूरे गोबरपट्टी में कोई धब्बा नहीं लगाया जा सकता है. इसका कारण यह नहीं है कि प्रधानमंत्री मोदी विकास पुरुष हैं और उन्होंने देश का कायाकल्प कर दिया है. इसका कारण यह है कि मीडिया के सभी हिस्सों को जिस रूप में उसने नियंत्रण में लिया है, वहां उनके खिलाफ कहने के लिए कुछ भी नहीं है.
इतना ही नहीं, गोबरपट्टी की 223 लोकसभा सीटों में से अब भी 200 से अधिक सीटों पर बीजेपी या उसके सहयोगी दलों का कब्जा है. उन राज्यों में विरोधी दलों के पास मीडिया में बीजेपी या मोदी के खिलाफ खबर छापने की बात तो छोड़ ही दीजिए, किसी भी दल के पास यह भी हैसियत नहीं है कि वे अपने समर्थकों से भी अपनी बात कह पाएं! इसका परिणाम यह हुआ है कि मोदी की चमत्कारिक इमेज आज भी उतना ही चमक रही है जितना कोरोना से पहले थी! इसके लिए मीडिया को पूरी तरह जवाबदेह ठहराना भी गलत होगा क्योंकि बिहार में विपक्ष की भूमिका निभा रहे राजद व तेजस्वी यादव ने एक बार भी देश की हर तरह की समस्याओं के लिए मोदी के उपर सवालिया निशान नहीं लगाया.
और अब जब एकाएक चुनाव शुरू हो गया है तो एनडीए गठबंधन के खिलाफ चुनाव लड़ रहा महागठबंधन अब भी अनिश्चय की स्थिति में है कि मोदी को कितना टारगेट किया जाए. हां, तेजस्वी यादव ने लगातार नीतीश कुमार को टारगेट किया है और बिहार में नीतीश कुमार की छवि को काफी हद तक नुकसान भी पहुंचा है, लेकिन पिछले डेढ़ साल में अपवादों को छोड़कर तेजस्वी ने कभी भी प्रधानमंत्री मोदी का नाम लेकर हमला नहीं किया है. विपक्षी दलों को इससे सीधा नुकसान यह हो रहा है कि आम जनता में सारा गुस्सा बीजेपी के प्रति न होकर नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जेडीयू के खिलाफ है जबकि बिहार के जातिगत समीकरण में बीजेपी से ज्यादा बड़ी पार्टी जेडीयू है, लेकिन मुख्य विपक्षी दल की अदूरदर्शिता के कारण बीजेपी को लाभ मिलता रहा है.
चिराग पासवान का एनडीए के फोल्ड से बाहर निकलना आभासी तौर पर भारतीय जनता पार्टी को शुरुआती दौर में लाभ देता दिख रहा है. ‘लाभ देता दिखना’ का यह मतलब नहीं है कि बीजेपी गठबंधन को लाभ हो रहा है. इसका मतलब यह भी हुआ कि जेडीयू के कैडर और सपोर्टर में यह संदेश पूरी तरह साफ जा रहा है कि लोजपा के इस खेल के पीछे बीजेपी है. इसलिए जहां जेडीयू के खिलाफ लोजपा अपने उम्मीदवार खड़े कर रही है, हो सकता है वहां बीजेपी का अधिकांश वोट लोजपा को चला जाए! इसी तरह जहां बीजेपी चुनाव लड़ रही है और जेडीयू चुनाव नहीं लड़ रही है वहां उसका वोट बीजेपी को उस तरह से न पड़े जिस रूप में पहले पड़ता रहा हो!
नेता राजनीतिक गणित जितना भी कर लें, हमें इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि आम जनता परसेप्शन पर भी निर्णय लेती है. आम लोगों में चिराग पासवान के जेडीयू के प्रत्याशियों के खिलाफ चुनाव लड़ने को वह इस रूप में भी ले रही है कि इस खेल के पीछे बीजेपी है. अगर अंत तक यह परसेप्शन बना रहा तो पूरा खेल बिगड़ते देर नहीं लगेगी. आगे का खेल इस बात पर भी निर्भर करेगा कि राजद अपनी बची हुई 44 सीटों में से कितनी सीटें अतिपिछड़ों और सवर्णों को देती है! अगर उसमें से आधी सीटें भी अतिपिछड़ों को दे दिया तो कहानी कुछ और हो जाएगी.
यह सही है कि महागठबंधन और एनडीए दो बड़े ध्रुव हैं फिर भी यह पूरी तरह साफ है कि इस चुनाव में उपेन्द्र कुशवाहा, पप्पू यादव या मुकेश सहनी को लूज़र के रूप में नहीं देख सकते हैं. वे अलग तरह से बाउंस बैक करेंगे और हर गठबंधन का खेल बनाएंगे-बिगाड़ेंगे. लूज़र सिर्फ बिहार की जनता है क्योंकि यह चुनाव मुद्दाविहीन हो गया है! अगर यह चुनाव मुद्दाविहीन नहीं हुआ होता तो 15 वर्षों से लगातार शासन करने के बाद अपने चुनावी अभियान की शुरूआत करते हुए नीतीश कुमार यह नहीं कहते कि लालू यादव का 15 साल का कुशासन चुनाव का मुद्दा होगा!
(साभार जनपथ)
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