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न्यूज चैनलों द्वारा फैलायी जा रही नफरत के बजाय डिजिटल मीडिया पर क्यों लगाम लगाना चाहती है सरकार?
सुदर्शन टीवी के एक विवादित कार्यक्रम 'UPSC जिहाद' को लेकर सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने 21 सितंबर को एक बार फिर कहा कि पहले डिजिटल मीडिया पर लगाम कसने की जरूरत है. इस मामले की सुनवाई के दौरान यह दूसरी बार है जब केंद्र सरकार ने डिजिटल मीडिया पर रेगुलेशन की बात उठाई है.
सुप्रीम कोर्ट में दायर किए गए अपने हलफनामे में केंद्र सरकार ने कहा है कि डिजिटल मीडिया नफरत फैलाने के साथ-साथ हिंसा और आतंकवाद को बढ़ावा दे रही है. यह बात एक हिंदुत्ववादी एजेंडे का प्रचार करने वाले चैनल की सुनवाई के दौरान भारत सरकार कह रही थी. बात एक चैनल की नहीं है, कमोबेश अधिकतर चैनल एक खास धर्म को टारगेट करते नजर आते हैं. अभी तब्लीगी जमात मामले में भी चैनलों ने यही रुख अपनाया था. आखिर क्या वजह है कि सरकार टीवी माध्यम से उगले जा रहे जहर को रोकने के बदले डिजिटल पर पहरा लगाने की बात कर रही है? केंद्र सरकार को टीवी के द्वारा फैलायी जा रही नफरतों पर दिक्कत क्यों नहीं है.
इसका जवाब पिछले कुछ सालों में पत्रकारिता के बदले रूपरेखा में आपको देखने को मिल जाएगा. मेनस्ट्रीम मीडिया कहे जाने वाले दिल्ली के कुछ समाचार चैनलों ने केंद्र सरकार के प्रति अपनी स्वामीभक्ति दिखाई है, उसी का नतीजा है कि सरकार कोर्ट में कहती हुई नजर आती है कि टीवी और प्रिंट मीडिया के रेगुलेशन का मसला विधायिका के लिए छोड़ दें. पहली सुनवाई में सरकार ने कहा था कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के स्व-नियमन का सिस्टम पहले से ही है और अगर अदालत मीडिया नियमन पर विचार कर रही है तो उसे पहले डिजिटल मीडिया को लेकर ऐसा करना चाहिए. इससे पहले भी केंद्र सरकार अलग-अलग मौकों पर डिजिटल मीडिया के रेगुलेशन की बात कर चुकी है.
दरअसल 2014 में एनडीए सरकार आने के पहले से ही ज्यादातर टीवी न्यूज चैनलों ने नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के लिए माहौल बनाना शुरू कर दिया था. सत्ता में आने के बाद ये सभी चैनल सरकार के और करीब आते गए. सत्ता के इतने करीब आ बैठे कि इनका नाम नाम गोदी मीडिया पड़ गया. जिन्होंने सरकार से सवाल पूछने की हिम्मत की, उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया गया. वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी को जब एबीपी न्यूज छोड़ना पड़ा तो उन्होंने लिखा था कि उन्हें अपने कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी का नाम नहीं लेने और उनकी तस्वीर नहीं दिखाने को कहा गया था. ये सरकार द्वारा मीडिया पर दबाव का एक छोटा सा उदाहरण है.
एबीपी न्यूज छोड़ने के तुंरत बाद वाजपेयी ने एक और बात बतायी थी कि सरकार किस तरीके से देश भर के न्यूज चैनलों की निगरानी कर रही है. उन्होंने द वायर पर लिखा था कि 24 घंटे न्यूज चैनलों की निगरानी रखने के लिए 200 लोगों की टीम लगी रहती है. हालांकि उन्होंने बताया था कि इस निगरानी की शुरुआत यूपीए सरकार के वक्त ही शुरू हो गया थी, तब कम लोग इस काम के लिए रखे गए थे.
कॉरपोरेट और विज्ञापनदाताओं के हितों की पूर्ति करने वाले इन न्यूज चैनलों ने कुछ सालों में सरकार से सवाल करना छोड़ दिया. इसके उलट ये चैनल विपक्ष से ही दिन-रात सवाल करने लगे. मोदी भक्ति से होते हुए हर दिन प्राइम टाइम में हिंदू-मुस्लिम का जहरीला डिबेट टीवी के डिब्बे से निकलता रहा, जो बदस्तूर जारी है. स्वास्थ्य, कृषि, शिक्षा, बेरोजगारी, विज्ञान, मानवाधिकार, पलायन, विज्ञान, महिला सुरक्षा जैसे आधारभूत मुद्दे ये चैनल कब का पीछे छोड़ चुके है. सरकार से सवाल पूछना और इन्हें केंद्रीय विषय बनाना तो दूर, वे इनकी समस्याओं को कवरेज देना भी अब मुनासिब नहीं समझते.
लेकिन जब ये तथाकथित मेनस्ट्रीम मीडिया अपने को जनहित के मुद्दे से दूर करने लगी, उसी दौरान डिजिटल मीडिया का विस्तार भी हो रहा था. पिछले छह से सात सालों में डिजिटल माध्यम के जरिये कई सारे स्वतंत्र पत्रकारिता संस्थान खड़े हुए, जो सरकार से सवाल पूछ रहे थे. सरकार की नीतियों को सामने लाने, दावों की पड़ताल करने और ग्राउंड रिपोर्टिंग के मामले में डिजिटल मीडिया ने टीवी न्यूज चैनल और अखबार की तुलना में शानदार काम किया है. शायद इसलिए पिछले कुछ सालों में डिजिटल स्पेस के पत्रकारों को भी मेनस्ट्रीम में मिलने वाले पुरस्कारों से सराहा गया है. बिना किसी कॉरपोरेट सपोर्ट और विज्ञापन के ये काम अब भी जारी है. शायद यही सरकार को खल रही है.
टीवी मीडिया के जरिये फैलने वाले सांप्रदायिकता के कारण आम लोगों ने भी कहना शुरू कर दिया कि पत्रकारिता का स्तर गिर चुका है. वे लगातार आधे-अधूरे तथ्यों को और एक खास नजरिये के साथ दर्शकों की ब्रेनवाशिंग में लगे हुए हैं. अभी हाल में रोजगार और कृषि विधेयक को लेकर काफी हंगामा हुआ, इन सब पर चैनलों में रिपोर्टिंग पर सरकारी फरमान से पहले ही साइलेंट हो जाने का चलन बढ़ गया है. लेकिन डिजिटल स्पेस बढ़ने के बाद आलोचनात्मक रिपोर्टिंग बढ़ती चली गई. पहले जो एक्सक्लूसिव खबरें टीवी किया करते थे, वो अब डिजिटल कर रहे हैं. अपने कम संसाधनों के बावजूद लगातार आरटीआई के जरिये या रिपोर्टिंग के जरिये हो, आम लोगों की बातों को सामने लाने का जिम्मा डिजिटल ने ले लिया है. जिस तरह की क्रिटिकल रिपोर्टिंग हो रही हैं, वैसा शायद ही अख़बारों और न्यूज चैनलों में हो रहा हो.
दिल्ली-एनसीआर से चल रहे कुछ डिजिटल प्लेटफॉर्म मसलन द वायर, द क्विंट, न्यूजलॉंड्री, न्यूजक्लिक, स्क्रोल, मीडियाविजिल जैसे संस्थानों ने बिना किसी विज्ञापन के बेहतरीन काम किया. इसके अलावा गांव कनेक्शन, परी, बीबीसी हिंदी, इंडिया स्पेंड, जनचौक जैसे संस्थान लगातार जमीनी रिपोर्टिंग में लगे हुए हैं. अखबार और टीवी की तुलना में आज डिजिटल प्लेटफॉर्म ही किसी मुद्दे पर डिटेल्ड रिपोर्ट हर दिन दे पा रहे हैं. हालांकि इन संस्थानों की पहुंच टीवी के मुकाबले काफी कम है, लेकिन धीरे-धीरे ये शहर से होते हुए गांवों तक भी पहुंच रहे हैं और इन संस्थानों की स्टोरियों का असर भी पड़ रहा है.
ये सब ऐसी वेबसाइट हैं जिसकी चर्चा ज्यादा होती है. इसी तरीके से हर राज्य के कुछ डिजिटल प्लेटफॉर्म हैं जो इसी तरीके से रिपोर्टिंग कर रहे हैं. साल 2017 में गोरखपुर के बीआरडी हॉस्पिटल में बच्चों की मौत पर गोरखपुर न्यूज़लाइन नाम की एक छोटी सी लोकल वेबसाइट लगातार स्टोरी कर रही थी. वेबसाइट पर खबर छप रही थी कि अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी है, सरकार ध्यान नहीं दे रही है. लेकिन रीच कम होने से अधिकतर लोगों का ध्यान नहीं गया.
इसका एक बड़ा कारण इंटरनेट की पहुंच है और न्यूज को कंज्यूम करने का परंपरागत ढांचा भी है. ट्राई की द इंडियन टेलिकॉम सर्विसेज परफार्मेंस इंडिकेटर्स मार्च 2020 की रिपोर्ट के मुताबिक, देश की 55% आबादी इंटरनेट का इस्तेमाल करती है. बिहार जैसे राज्य को देखें तो वहां सिर्फ 30 फीसदी आबादी ही इंटरनेट का इस्तेमाल कर रही है. दूसरी चीज यह है कि इंटरनेट के जरिये ज्यादातर खबरें आम लोगों तक पहुंच रही हैं, वो भी उन्हीं टीवी चैनलों और अखबारों के डिजिटल संस्करण की हैं.
इन सबके बावजूद, वैकल्पिक संस्थान स्वतंत्र तरीके से अपना काम कर रहे हैं और सरकार की खामियों को सामने ला रहे हैं. ये अपना इम्पैक्ट भी छोड़ रहे हैं, इसलिए सरकार की नजरों में ये खटक भी रहे हैं. सबसे खास बात यह है कि इनमें से कई संस्थान फ्रीलांस पत्रकारों को भी मौका दे रहे हैं जो टीवी या अखबार में नहीं होता है. इसलिए ये पत्रकार भी पूरी आजादी से खबरों को लिख रहे हैं. सिटिजन जर्नलिज्म जैसी अवधारणा साकार हो रही है. द क्विंट ही माय रिपोर्ट के जरिये आम लोगों के द्वारा बनाए गए वीडियो या लिखी गई सामग्री को अपनी वेबसाइट पर जगह दे रहा है. इसलिए कहीं से भी मोबाइल वीडियो के जरिये किसी घटना की रिपोर्ट हो जा रही है, जो सरकार के लिए नया सिर दर्द जैसा भी है.
सरकार ने टीवी चैनलों, अखबारों और सोशल मीडिया के जरिये जिस तरीके से अपना प्रचार तंत्र मजबूत किया, उसके बरक्स इन डिजिटल माध्यमों से उतनी ही जबरदस्त पत्रकारिता भी हुई है. शायद इसलिए सरकार ने इन सालों में इन माध्यमों को कमजोर करने का भरसक प्रयास भी किया. साल 2018 में द क्विंट के दफ्तर और इसके मालिक राघव बहल के घर पर आयकर विभाग का छापा पड़ा. 2017 में द वायर के खिलाफ केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बेटे जय शाह ने मानहानि का मुकदमा दर्ज कराया. इसी साल अप्रैल महीने में उत्तर प्रदेश सरकार ने द वायर के संस्थापक सिद्धार्थ वरदराजन के खिलाफ केस दर्ज किया था. यूपी पुलिस जून महीने में स्क्रोल की एग्जीक्यूटिव एडिटर सुप्रिया शर्मा के खिलाफ भी एक रिपोर्ट को लेकर केस दर्ज कर चुकी है. लॉकडाउन के दौरान ही कई राज्यों में पत्रकारों के खिलाफ केस दर्ज हुए.
पिछले साल सरकार डिजिटल मीडिया को रेगुलेट करने के लिए एक ड्राफ्ट बिल का प्रस्ताव लेकर आई थी. अब सुप्रीम कोर्ट में इसकी पैरवी इसी का एक्सटेंशन माना जा सकता है. डिजिटल अभी तक सरकारी दबाव से मुक्त हैं क्योंकि इनके पास विज्ञापन ना पाने की मजबूरियां नहीं है. इनमें से अधिकतर प्लेटफॉर्म के संस्थापक पेशे से पत्रकार ही हैं और इन्हें जनता पैसे दे रही है. स्वतंत्र पत्रकारिता जनता के पैसे से ही मजबूत हो सकता है. धीरे-धीरे ये मजबूत भी हो रहा है. बिहार में फेसबुक/यूट्यूब के जरिये जनता जंक्शन नाम से एक प्लेटफॉर्म पत्रकारिता कर रहा रहा है. छोटी टीम है, संसाधन कम हैं. लेकिन वे लोगों से चंदा मांग कर अपने खर्चों को जुटाने की अपील कर रहे हैं. अच्छी बात है कि लोग उन्हें पैसे दे भी रहे हैं. ऐसे उदाहरण हर क्षेत्र में देखने को मिल रहे हैं.
इसके अलावा सरकार की तरफ से प्रोपेगैंडा का जो विस्तार हुआ, उसे भी डिजिटल माध्यम ने जोरदार तरीके से काउंटर दिया. ऑल्ट न्यूज जैसी वेबसाइट सिर्फ फैक्ट चेक करने के लिए बनी है और लगातार नेताओं के झूठ के साथ-साथ फेक न्यूज को भी एक्सपोज कर रही है. हालांकि अब फैक्ट चेक के काम को अधिकतर मीडिया संस्थानों ने व्यवसायिक नजरिये से भी अपना लिया है. इसलिए जो काम टीवी न्यूज ने छोड़ दिया, डिजिटल ने धारदार तरीके से उस पर काम किया और यही सरकार के लिए परेशानी का सबब है.
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