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दुनिया के पंडित जसराज, बनारस के रसराज
मधुराष्टकम के मधुर सुरों के स्वामी का अवसान हुआ और संगीत मार्तण्ड पण्डित जसराज अब मेघदूतों के साथ अपनी अंतिम यात्रा पर निकल गये हैं. इसे संयोग मानिये या कालचक्र की नियति जिसने न जाने क्या सोच कर 90 वर्ष पहले भविष्य के संगीत मार्तण्ड के पृथ्वी पर आगमन के लिये 28 जनवरी का दिन चुना. ऋतुराज बसंत की क्रीड़ा अवधि का यह समय जब पूस, माघ और फाल्गुन की शीत पर सूर्य रश्मि का ताप प्रखर होना आरम्भ होता है, वही ताप अगले 90 वर्षों तक बढ़ कर ओज बना और प्रकाश पुंज में परिवर्तित हो गया.
उनकी गायकी का जादू इस कदर हावी हुआ कि अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ ने 2006 में खोजे गये एक नये ग्रह का नाम ही 'पंडित जसराज' रख दिया. उनके स्वर मंदिरों की घंटियों से साम्य स्थापित कर लेते थे, जसराजजी न सिर्फ उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव में साधिकार गायन में सक्षम हुए बल्कि उन्हें एकलौते भारतीय शास्त्रीय गायक होने का गौरव मिला जिन्होंने सातों महाद्वीपों में भारत के संगीत का लोहा मनवाया.
उनके गायन में उच्चारण की शुद्धता और स्पष्टता ने नाद ब्रम्ह को सबके लिये सुगम बनाया और अपने स्वरों को सर्वत्र स्थापित किया. लेकिन उनके द्वारा किये गये तमाम अनुष्ठानों एवं कार्यक्रमों के बीच उनके जीवन का एक अकाट्य हिस्सा है जिस पर काशी, बनारस और श्रीसंकट मोचन मन्दिर का नाम अंकित है.
श्री संकटमोचन संगीत समारोह-इस ऐतिहासिक समारोह के मुक्तांगन ने ही उन्हें रसराज की उपाधि सप्रेम भेंट की थी.और शायद यही वजह है कि वे 1974 से लेकर 2019 तक लगातार यहां आते रहे. 2020 में जब कोविड महामारी के कारण समारोह को डिजिटल स्वरुप में आयोजित किया गया तब भी पंडित जसराज ने अमेरिका से ही ऑनलाइन माध्यम से स्वरांजलि प्रस्तुत की. वे संकट मोचन दरबार में नाना प्रकार के तरीकों से व्यवहार करते थे. कभी एक बालक की तरह ज़िद करके अतिथि गृह के पहले नंबर के कक्ष को ही अपना साधना स्थल बनाते थे. कभी वे याचक की भांति हनुमानजी से सबके लिये आशीष मांगते और कभी ईश्वर के स्वरुप में भेद किये बिना राग भैरव में "मेरो अल्लाह मेहरबान" सुना कर सबको चकित कर देते थे.
इस समारोह से उनके अनुराग का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे हर वर्ष अपनी तमाम अंतरराष्ट्रीय व्यस्तताओं को दरकिनार कर यहां आते थे और कार्यक्रम में तीसरे पहर मंचासीन होते थे और सुबह की आरती तक सबको अपने सुरों के मोहपाश में बांध कर रखते थे.उनके चाहने वाले मन्दिर प्रांगण के भीतर और बाहर लाउडस्पीकरों के माध्यम से उन्हें एकनिष्ठ सुना करते थे.
उस संगीत गंगा की नाव के मांझी थे पंडित जसराज जो अपने यात्रियों को निराश नहीं करते थे. एक बार उनके ही एक कायर्क्रम में मन्दिर प्रांगण में पाला गया हिरण भीड़ को चीरता हुआ मंच के करीब तक आ गया था और पंडितजी ने अपने गले की माला उतार कर उसे पहना दी. उपस्थित जनसमूह ने अपलक इस दृश्य को काफी देर तक तक देखा था.
समारोह में उनकी हर प्रस्तुति उनके लिये आत्मान्वेषण थी, ऐसा लगता था मानों वे गाते-गाते कुछ खोज रहे हैं. संगीत उनके लिये प्रकृति से सीधा संवाद स्थापित करने का माध्यम था. संगीत उनके लिये सकल ब्रह्मांड के एकीकरण का द्वार था और वे सामूहिकता एवं सह अस्तित्व के पोषक थे. उनके चाहने वाले उनसे बिना डरे फरमाईश करने में सक्षम थे और वे जितना चाव से किसी सामान्य बनारसी कलाप्रेमी की मनोकामना पूरी करते थे उतने ही चाव से उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी की मांग पर हनुमद स्तवन सुनाया था.
इंदिराजी दो बार इस कार्यक्रम में मंच के सामने ज़मीन पर बैठ कर सिर्फ पंडित जसराज को सुनने आयी थीं क्यूंकि उन्हें भी इस बात का अंदाज़ा था कि इस प्रांगण में जसराज एक अलग रंग में होते थे. हनुमत दरबार में जब वे कृष्ण भक्ति से ओतप्रोत होकर सूरदास और गुरु वल्लभाचार्य के आख़िरी संवाद "आश्रय के पद" या उनका पसंदीदा "गोविन्द दामोदर माधवेति" सुनाते तो सबको काशी में ब्रजभूमि सरीखा एहसास होता था.
मंच पर पहुंचते ही "हर हर महादेव' का उद्घोष सुनने को आतुर रहने वाले पंडित जसराज इस अभिवादन के जवाब में अपना चिर परिचित "जय हो" कहकर ही आरम्भ करते थे. वर्ष 2018 में गाते हुए वे भाव विभोर होकर रोने लगे और उपस्थित जनसमूह को अपनी अस्वस्थता का हवाला देते हुए कहा कि अगर हनुमानजी की इच्छा हुयी तो अगले वर्ष अवश्य आऊंगा. इस बाबत हुयी एक अनौपचारिक बातचीत में संकट मोचन मंदिर के महंत डा विश्वम्भर नाथ मिश्र ने बताया, "उनके बड़े भाई प्रताप नारायणजी और मणिरामजी पहले से समारोह में आते रहे थे. जसराजजी 1973 में पहली बार आये और उसके बाद से वे हर वर्ष आते रहे, एक बार टिकट न मिल पाने के कारण नहीं आ पाने का मलाल भी उन्हें जीवन भर रहा."
विश्वम्भर मिश्रा के पास पंडितजी से जुड़े किस्सों का खजाना है जिसे वो सिर्फ बाताते रहना चाहते हैं. वो कहते हैं, "मेरे पितामह पंडित अमरनाथ मिश्र से और मेरे पिताजी डा वीरभद्र मिश्र से जसराजजी के आत्मीय और घरेलू रिश्ते थे. मुझे वे एक पारिवारिक थाती के रूप में मिले थे और उन्होंने जीवन भर मुझसे स्नेह रखा. कई साल उनके मल्हार राग में गाने पर अप्रैल के महीने में कुछ देर के लिये वर्षा हुयी है. एक साल उनका गायन सुनने हिरण भीड़ की परवाह किये बिना मंच तक आया है, ऐसे दर्जनों दृश्य मैंने देखा है,आपने देखा है और बनारस के सहस्त्रों लोगों ने देखा है. हर साल उनका रूप एक सा होकर भी अलग हो जाता था, विविधता में सम्पूर्णता की प्रतिमूर्ति कहिये तो अतिशयोक्ति नहीं है."
इस साल के संकट मोचन संगीत समारोह की बात करते हुए मिश्रा कहते हैं, "इस साल जब कोरोना के कारण हमने समारोह डिजिटल स्वरुप में सिर्फ सोशल मीडिया के लिये किया तो उसके पीछे भी पंडितजी का दृढ़ निश्चय ही था कि उन्होंने अमेरिका में रह कर भी हनुमद जयंती के लिये अलग से गाया और उसके 5 दिन बाद समारोह के लिए ऑनलाइन प्रस्तुति भी दिया. ऐसा अनुराग जो सुदूर अमेरिका में भी उतना ही प्रभावी था शायद सबके लिये संभव नहीं है."
काशी से अनुराग
बनारस आने के बाद वे संगीत मार्तण्ड या सुर शिरोमणि सिर्फ मंच पर ही रह जाते थे. मंच से इतर वे अल्हड और अक्खड़ बनारसी हो जाते थे.धोती को लुंगी की तरह समेट कर या गमछा बंडी में संकट मोचन मंदिर के प्रांगण में ही रुकने वाले पंडित जसराज हर बार बनारस आने पर काशी विश्वनाथ दर्शन अवश्य करते थे. वर्ष 2004 में ऐसे ही दर्शन के क्रम में मन्दिर से जुड़े कुछ लोगों ने उन्हें विश्वनाथ दरबार में भी एक बार संगीतमय हाज़िरी लगाने का अनुरोध किया तो वे सहर्ष तैयार हो गये और उन्होंने उसी शाम वहां भजन वंदना अर्पित की.
उनके बनारस प्रेम के बाबत डा विश्वम्भर नाथ मिश्र ने बताया,“वे बनारस किसी अन्य कार्यक्रम में आते तब भी यहीं रुकते थे, यहां से वे श्री काशी विश्वनाथ दर्शन करने जाते थे और बाकी समय यहीं रह कर साधना करते थे. उनका जाना हमारे परिवार और संगीत समारोह के लिये व्यक्तिगत शोक का विषय है. बनारस और संकटमोचन हनुमानजी के प्रति उनका लगाव उन्हें 45 से अधिक वर्षों से लगातार उन्हें यहां खींच लाता था."
करीब 50 वर्षों तक बनारस के हर सांगीतिक कार्यक्रम को करीब से देखने वाले कला मर्मज्ञ एवं वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ भट्टाचार्य का मानना है कि पंडित जसराज का बनारस के प्रति लगाव सिर्फ दार्शनिक और आध्यात्मिक रूप से ही नहीं बल्कि उन्हें विश्व स्तर पर संगीत के क्षेत्र में इस शहर की तत्कालीन गरिमा का भी भान था.
वो कहते हैं, "देखिये जिस सत्तर के दशक के आरम्भ में उन्होंने आना शुरू किया उस वक़्त बनारस में पण्डित रविशंकर, गुदई महाराज, किशन महाराज, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान, पंडित ज्योतिन भट्टाचार्य जैसे विश्व स्तर के संगीत मर्मज्ञ पहले से ही मौजूद थे. ऐसे में पंडित जसराज के पास संगीत के अलावा एक और प्रतिभा थी जो इनमें से किसी के पास नहीं थी, और वह थी उनकी जनसम्पर्क की कला और खुद को प्रस्तुत करने की शैली. उनकी इस विधा ने न सिर्फ उन्हें विदेशों तक पहुंचाया बल्कि उनकी ख्याति को बनारस के साथ जोड़ कर देखा जाने लगा क्योंकि वे खुद अपने आप को बनारस से जोड़ कर रखना चाहते थे.”
पंडित जसराज के साथ बनारस समेत उत्तर भारत के कई अन्य कार्यक्रमों में संगतकार रहे हारमोनियम वादक पंडित धर्मनाथ मिश्र उन्हें याद करते हुए कहते हैं, "मेरा सौभाग्य है कि मुझे युवावस्था में ही पटना के एक दुर्गापूजा कार्यक्रम में पहली बार जब उनके साथ संगत का मौका मिला. मैं तो उन्हें देखते ही स्तब्ध रह गया. उसके बाद कई बार अवसर मिला. आखिरी बार तीन साल पहले श्रीसंकटमोचन दरबार में संगत का मौका मिला. वह ऐसे साधक थे जिनकी आवाज़ सुन कर श्रोता शून्य में चले जाते थे. उनका जाना हम जैसे कलाकारों को आजीवन कष्ट देता रहेगा."
वैष्णव संकीर्तन परंपरा के ध्वजवाहक जसराज नवधा भक्ति के आखिरी सोपान तक समर्पित होकर गाते थे. उनकी गायकी में नवाचार, विचार और कल्पनाशीलता के साथ साधना समन्वय करके उत्फुल्ल होकर गाते थे. गंभीर मुद्रा में होठों पर मुस्कान लिये बंदिशें सुनाते पंडित जसराज अब बनारस के गौरवमयी सांस्कृतिक इतिहास के एक खंड के रूप में सिर्फ स्मृतियों में अंकित रहेंगे.
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