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कोरोना महाआपदा में फूड हैबिट का सवाल
नोवेल कोरोना वायरस (कोविड-19) महामारी ने अभूतपूर्व स्तर पर समस्याएं पैदा की हैं. यह सिर्फ स्वास्थ्य संकट भर नहीं है, बल्कि यह तमाम लोगों के लिए खाद्य संकट भी है. यदि आगे भी देशभर में खाद्य के उत्पादन और आपूर्ति में बाधा जारी रहती है तो आने वाले समय में भोजन का संकट गहरा सकता है. साथ ही इससे जुड़ी नई मुसीबतें हमारे सामने खड़ी हो सकती हैं.
इस महामारी से सिर्फ भोजन ही नहीं बल्कि जानवर, चाहे वह खेत के पशु हों या फिर जंगल के वन्यजीव, सभी बहुत ही आसानी से जुड़े हैं. ये मानव की तरह अपने शरीर में कई संक्रमण एजेंट को रहने की जगह दे सकते हैं और संक्रमण एजेंट की मेजबानी करते हुए उसे सीधा मनुष्य तक पहुंचा सकते हैं या फिर किसी संवाहक के जरिए मनुष्य में भेज सकते हैं.
मिसाल के तौर पर चमगादड़ों का उदाहरण लीजिए, जिसे कोविड-19 विषाणु के साथ ही 2014-2016 में इबोला बीमारी के प्रसार या 2002 में गंभीर श्वसन रोग सार्स महामारी के लिए जिम्मेदार माना जाता है. वहीं, 2012 में मिडिल ईस्ट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम यानी मर्स के लिए ऊंट को जिम्मेदार माना गया था.
करीब दो दशक पीछे लौटिए तो 1997 के अत्यधिक रोगजनक एवियन इनफ्लुएंजा (एच5एन1) के लिए मुर्गियां और स्वाइन फ्लू (नोवेल इनफ्लुएंजा एच1एन1) के लिए सूअर मुख्य पशु स्रोत थे.
हम जो खाते हैं, वह हमारे स्वास्थ्य को व्यक्तिगत स्तर पर प्रभावित करता है, लेकिन हमारे भोजन का उत्पादन कैसे होता है, इसके वैश्विक प्रभाव क्या हैं? यह अब काफी हद तक स्पष्ट हैं. यदि भोजन में इस्तेमाल होने वाले जीवों के पालन-उत्पादन के मामले को ही लिया जाय तो ये जीव प्रोटीन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हमें प्रदान करते हैं, उसे अब पूरी दुनिया उपभोग कर रही है.
खाने योग्य जीवों के तौर पर मुर्गे और सूअरों का पालन सबसे ज्यादा प्रचलित है. लेकिन उन्हें बेहद तंग जगहों और अस्वच्छ परिस्थितियों के बीच रखा जाता है. वहां सिर्फ और सिर्फ उनकी उत्पादकता ही मायने रखती है, हाइजीन, या वे जीव रोगों से लड़ने के लिए कितने तैयार हैं, यह सब मायने नहीं रखता.
यह स्थितियां अक्सर लाइलाज अथवा बेहद मुश्किल से काबू में किए जा सकने वाले संक्रामक एजेंट्स के पैदा होने की आदर्श जमीन तैयार करती हैं. ये बेहद कम समय में समूचे विश्व में अपने पांव फैला सकती हैं. विशेषज्ञ अतीत में इस बात को प्रकाश में ला चुके हैं कि सघन मुर्गी प्रजनन और पालन की व्यवस्था निम्न से उच्च एवियन इनफ्लुएंजा वायरस जैसे एच5 से एच7 के उप प्रकार को पैदा कर सकते हैं. ये पूरी दुनिया में मानव सेहत के लिए बेहद चिंता का विषय है.
अध्ययन बताते हैं कि चीन में एवियन इनफ्लुएंजा एच5एन1 और एच7एन9 का उद्भव किस तरह से बड़े भू- भाग पर फैल रहे सघन पोल्ट्री सेक्टर से जुड़ा हुआ था. दरअसल एवियन इनफ्लुएंजा वायरस के लिए गहन पोल्ट्री फॉर्म एक वाइल्ड रिजर्वायर की तरह था. हालांकि, इन फैक्ट्री फार्मों की समस्या वायरल महामारी या महामारी तक सीमित नहीं है, जो कुछ वर्षों के लिए बहुत अधिक ध्यान आकर्षित करते हैं और फिर हमारे भोजन के उत्पादन करने के तरीके में बिना मौलिक बदलाव किए ही एक बुरे सपने के रूप में इतिहास में दर्ज हो जाते हैं.
दरअसल सघन और गहन कृषि उत्पादन का विस्तार एक जीर्ण प्रकृति वाले जीवाणु संबंधी रोग महामारी तक भी जाता है, जिसे एंटीमाइक्रोबियल रसिस्टेन्स कहते हैं. यह एक ऐसी अवधारणा है जिसमें अत्यंत साधारण संक्रमण को भी ठीक करना एक बड़ी चुनौती होती है. यदि हम इस तरह से होने वाली मानवीय मौतों की उपेक्षा करेंगे तो अभी आंत, श्वसन और मूत्रनली के संक्रमण से हर साल दुनिया में 7,00,000 लोग मरते हैं. अनुमानित है कि 2050 तक करीब एक करोड़ लोग इस तरह के संक्रमण से मरेंगे.
यह इसलिए होता है क्योंकि एंटीबायोटिक का उपयोग बैक्टीरिया को प्रतिरोधी बनाता है और अति प्रयोग इसे काफी तेज करता है. हालांकि, अंधाधुंध एंटीबायोटिक का उपयोग गहन कृषि पद्धतियों का अभिन्न हिस्सा है, जिसके दो कारण हैं. एक कारण एंटीबायोटिक दवाओं का नियमित रूप से स्वच्छता और जैव-सुरक्षा के लिए सस्ते विकल्प के रूप में उपयोग किया जाना है ताकि पूरे समूह को बीमारियों से बचाया जा सके और इस प्रकार उत्पादकता के नुकसान को भी टाला जा सके.
दूसरा कारण यह है कि मुर्गियों को तेजी से बढ़ने के लिए एंटीबायोटिक से भरपूर फीड उपलब्ध कराया जाता है, जो हमारे देश में आसानी से उपलब्ध होता है. इन दोनों ही मामलों में एंटीबायोटिक मानवों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं. यह उनके उपचार को खतरे में डालना है.
कोई आश्चर्य नहीं है कि वैश्विक पशु क्षेत्र में पशुओं का इलाज करने के बजाए गैर जिम्मेदाराना तरीके से एंटीबायोटिक उत्पादों का इस्तेमाल किया जाता है. यह फार्म के जरिए साल्मोनेला, कैंपीलोबेक्टर और ई-कोलाई के कारण अक्सर होने वाले खाद्य जनित बैक्टीरिया रोगों को बढ़ाने वाला होता है. लेकिन इन सबके बावजूद इनका बड़े पैमाने पर उत्पादन लगातार बढ़ रहा है. शायद स्वाइन फ्लू महामारी के बाद और भी तेजी से, जिसमें अनुमानित तौर पर 5,75,000 मौतें महामारी के पहले साल में हुई थीं.
कोविड-19 का मौजूदा संकट फिर से हमें चुनाव करने के लिए मजबूर करता है. इस बार, हमें भोजन के साथ अपने रिश्ते को ध्यान से सोचना चाहिए, चाहे वह जानवर से हो या गैर-पशु स्रोतों से. इस संबंध पर भी विचार करना चाहिए कि हम जो भोजन करते हैं उसका उत्पादन कैसे होता है और इसका प्रभाव उपभोक्ता के अलावा उत्पादक और पर्यावरण पर क्या पड़ता है.
सवाल यह है कि क्या हम अधिक कीमत देने को तैयार हैं अथवा सवाल पूछना जारी रखेंगे जो हमें खाद्य उत्पादन के स्थायी तरीकों की ओर बढ़ने में मदद करें? क्या एक लचीली व्यवस्था से मिलने वाला स्थानीय, विविध पोषण से बेहतर भोजन, कुपोषण और पारिस्थितिक गिरावट की हमारी समस्याओं का वास्तविक जवाब नहीं है?
इसके इतर, क्या हम सरकारों से यह मांग नहीं करते हैं कि वह कंपनियों को पैकेट फूड में अत्यधिक नमक, चीनी और वसा के इस्तेमाल से रोके. इन जंक फूड में ऐसे रसायन भी होते हैं, जो हमारे रसोई घरों में इस्तेमाल नहीं किए जाते. ये रसायन मोटापा, गैर संचारी रोगों जैसे डायबिटीज, उच्च रक्तचाप और हृदय रोगों की महामारी का ईंधन हैं.
(डाउन टू अर्थ से साभार)
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