Newslaundry Hindi
इस बार बीएचयू में गांधी के साथ मालवीय की भी हत्या हो गई
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कला संकाय में होने वाले सालाना यूथ फेस्टिवल ‘संस्कृति’ में एक छात्र द्वारा नाथू राम गोडसे के चरित्र पर एकल नाट्य (मोनो एक्ट) का मंचन 20 फरवरी को किया गया. नाटक गोडसे द्वारा लिखे गए दस्तावेज ‘व्हाइ आई किल्ड गांधी’ (मैंने गांधी को क्यों मारा) पर आधारित है.
नाटक में गोडसे का जबर्दस्त तरीके से महिमामंडन किया गया. उसे एक बड़े देशभक्त के रूप में प्रस्तुत करते हुए गांधी की हत्या को जायज करार देने की कोशिश की गई.
नाटक के मंचन के दौरान गोडसे की भूमिका अदा कर रहा छात्र तरूण कहता है- “मानवता हिंसा के साथ आती है. राम ने रावण को मारा, राणा प्रताप से लेकर गुरु गोविंद सिंह तक सबने हिंसा की लेकिन उनको कभी अफसोस नहीं हुआ होगा. हमें भी इसका कोई अफ़सोस नही है.”
गांधी की तुलना कंस, रावण और मुगल शासकों से की गई, और बीएचयू का प्रशासन वहां मूकदर्शक बन मौजूद रहा.
यह तो आज गोडसे की मौत के लगभग साठ साल बाद समझा जा सकता है कि गांधी की हत्या का इस देश को कितना पछतावा है, विशेषकर वर्तमान परिदृश्य में इस देश को गांधी की कितनी जरूरत है.
नाटक में गांधी को भारत विभाजन का जिम्मेदार मानते हुए हत्या को राष्ट्रहित में किया गया कार्य बताया गया, जो कि स्वाभाविक ही है क्योंकि नाटक का मूल लेखक ही गांधी का हत्यारा गोडसे था.
नाटक एक समुदाय विशेष के प्रति बेइंतहा नफ़रत से भरा और घृणा फैलाने वाला भी रहा. लेकिन अफसोस बीएचयू की पढ़ी-लिखी युवा पीढ़ी जो नाटक के दौरान ऑडिटोरियम में मौजूद थी, इस पूरे वाकये पर उल्लासित होकर तालियां बजा रही थी, कलाकार का हौसला बढ़ रही थी, जोश में हुंकार रही थी.
सवाल विश्वविद्यालय प्रशासन की भूमिका पर भी उठते हैं. जो व्यक्ति बीसवीं सदी के महानतम भारतीय की हत्या का अपराधी था, जिसे इस देश की न्यायपालिका द्वारा फांसी की सजा दी जा चुकी है, उसे एक देशभक्त की भूमिका में प्रस्तुत करने का मंच क्यों दिया गया? एक हत्यारे का महिमामंडन कर बीएचयू प्रशासन अपने परिसर को धार्मिक संकीर्णता की जहालत में क्यों झोंक रहा है?
यह नाटक देश के अधिकांश हिस्सों में प्रतिबंधित है फिर इसके मंचन की इजाजत बीएचयू प्रशासन ने कैसे दी? मौके पर मौजूद शिक्षकों और प्रशासनिक अधिकारियों ने इस पर आपत्ति जताने की बजाय महिमामंडन का हिस्सा क्यों बनें?
घटना के बाद सोशल मीडिया पर इसकी चर्चा शुरू हो गयी. छात्रों का एक वर्ग इस नाटक का समर्थन करते हुए गोडसे को बतौर नायक पेश कर रहा है. ताजा ख़बर है कि नाटक का वीडियो सामने आने के बाद कुछ छात्रों द्वारा विश्वविद्यालय और जिला प्रशासन के पास शिकायत दर्ज कराई गई है.
शैक्षणिक संस्थान वैचारिक टकराव का अड्डा होते हैं. यहां सभी तरह के विचारों के लिए स्पेस होना चाहिए लेकिन पिछले कुछ सालों से इन्हें किसी खास विचारधारा का अड्डा बनाया जा रहा है. वर्ष 2016 में हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय में इंग्लिश पाठ्यक्रम के किसी नाटक का मंचन (जिसमें सेना के कुछ लोगों द्वारा जनता पर की जा रही हिंसा को दिखाया गया था) करने के कारण छात्रों पर राजद्रोह का आरोप लगा दिया गया. फरवरी 2016 में जेएनयू में अफजल की फांसी पर हो रही चर्चा को मीडिया और सरकार द्वारा देशविरोधी कृत्य बताया गया. आईआईटी मद्रास में अम्बेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल को देशविरोधी बताकर मुकदमा कराया गया.
ऐसे समय में बीएचयू एक ऐसा संस्थान बनकर उभरा है जहां नि:संकोच संघ का पथसंचलन, 6 दिसंबर को शौर्य दिवस और अब गोडसे के लिखे पर नाटक मंचन भी हो रहा है. इसे हर तरह का प्रशासनिक संरक्षण मिल रहा है.
बता दें कि 30 जनवरी, 2017 को कुछ छात्रों द्वारा गांधी का शहीद दिवस मनाया जाना था जिसे विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा रोक दिया गया. पिछले साल 23 मार्च को भगत सिंह का शहादत दिवस और लोहिया की जयंती मना रहे छात्रों को प्रोक्टोरियल बोर्ड द्वारा मारा-धमकाया गया. इस दौरान प्रशासन द्वारा भगत सिंह, लोहिया की तस्वीर फाड़ दी गयी और कहा गया कि “कैंपस को राजनीति का अड्डा नही बनने देंगे.”
बीएचयू देश का वह कैंपस बन गया है जहां एमए इतिहास के पाठ्यक्रम से गांधी, दादाभाई नरौजी को निकाल जिन्ना और सावरकर को शामिल किया गया है.
वो कौन लोग हैं जिनको गांधी, भगत सिंह और लोहिया से ज्यादा जरूरी सावरकर और जिन्ना लगते हैं.
हिंसा और अहिंसा एक साथ नहीं रह सकते. ठीक उसी तरह गांधी और गोडसे एक साथ नही रह सकते. पूरी तैयारी के साथ स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं और उनके विचारों की हत्या की जा रही है. ऐसे कार्यक्रमों के जरिए युवाओं को उन्मादी भीड़ में तब्दील किया जा रहा है. पाठ्यक्रमों से ख़त्म होता गांधी और सड़कों पर पैदा होते गोडसे आने वाले समय के लिए बेहद खतरनाक हैं.
महामना के आंगन में वो कौन लोग हैं जो गोडसे को अपना प्रेरक मानने लगे हैं. क्या इन लोगों को गांधी-मालवीय के अंतर्संबंधों की रत्ती भर भी जानकारी है? इसका जवाब है नहीं.
अगर वो एक बार भी मदन मोहन मालवीय और महात्मा गांधी के रिश्तों को याद कर लेते तो शायद बीएचयू कला संकाय में उठा बदसूरत, कर्कश कोलाहल, तालियां और सीटियां सुनने को न मिलती. यह बीएचयू के चेहर पर दाग जैसा है जिसे ताउम्र अब चिपके ही रहना है.
जिस गांधी को 1916 के इसी फरवरी महीने में मदन मोहन मालवीय ने बीएचयू के निमित्त स्थापना-वक्तव्य के लिए आमन्त्रित किया था, आज वहीं उसकी हत्या और हत्यारे का महिमामंडन हो रहा है. पूरे भारत में तब मालवीय को सिर्फ एक ही नाम नज़र आया जो बीएचयू की स्थापना के ऐतिहासिक महत्व को अपने व्यक्तित्व की विराटता से मुकाबला कर सकता था.
उसी बीएचयू में एक बार फिर से गांधी की हत्या हो गई एक नाटक के मंचन के दौरान, हू-हा और तालियों के बीच. लेकिन इस बार सिर्फ गांधी की हत्या नहीं हुई, इस बार मदन मोहन मालवीय की आत्मा भी मर गई.
Also Read
-
Company behind CBSE evaluation platform says complaints limited to ‘one or two cases’
-
Dharmendra Pradhan’s guide to surviving India’s exam crisis
-
I had to leave India to become a doctor. NEET exposed a system I already knew
-
DD News anchor’s latest gem: Turning a CBSE student’s grievance into Pak conspiracy
-
‘Let them drink water’: Media is burying the corporate plunder driving our climate crisis