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अरुंधति रॉय: “चुनावी हार से बड़ा है जंतर मंतर का मैसेज”
अरुंधति रॉय की नई किताब ‘मेरी मां, मेरी गैंगस्टर’ उनकी मां मेरी रॉय की कहानी के बहाने उनके अपने बचपन, परिवार, रिश्तों और लेखिका बनने की यात्रा को सामने लाती है. लेकिन न्यूज़लॉन्ड्री के साथ इस बातचीत में किताब के पन्नों से आगे निकलकर मौजूदा राजनीति और छात्र आंदोलन पर भी खुलकर चर्चा हुई.
अरुंधति रॉय ने अपनी मां के साथ जटिल रिश्ते, 16 साल की उम्र में घर छोड़ने, दिल्ली में आर्किटेक्चर की पढ़ाई, दोस्तियों और अपने लेखन की शुरुआत के बारे में विस्तार से बात की. वह बताती हैं कि उनकी मां एक साथ ‘बेहद महान’ और ‘बेहद कठोर’ महिला थीं और क्यों उन्हें समझने के लिए सिर्फ मां के रूप में नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र महिला के रूप में देखना जरूरी है.
बातचीत में जंतर-मंतर के छात्र आंदोलन और शिक्षा व्यवस्था से लेकर नरेंद्र मोदी की राजनीति, राजनीतिक छवि, चुनाव, लोकतांत्रिक संस्थाओं, नर्मदा और बस्तर के आंदोलनों, पर्यावरण और सामाजिक असमानता तक कई मुद्दों पर चर्चा हुई. अरुंधति रॉय के मुताबिक, मौजूदा छात्र आंदोलन को सिर्फ परीक्षा और शिक्षा के सवाल तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता.
इस खास बातचीत में जानिए अरुंधति रॉय की मां मेरी रॉय कैसी थीं? उनके बचपन ने उनकी सोच को कैसे आकार दिया? ‘द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ के पीछे उनके परिवार और स्मृतियों की क्या भूमिका रही? और आज के भारत की राजनीति और आंदोलनों को वह किस नजर से देखती हैं?
देखिए पूरी बातचीत.
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