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पत्थरों वाला ट्रक दिल्ली पुलिस की कस्टडी में, लेकिन हाईकोर्ट में उसके वकील ने इसे प्रदर्शनकारियों से जोड़ा
न्यूज़लॉन्ड्री की खोजबीन में दिल्ली पुलिस ने पुष्टि की है कि 20 जुलाई की सुबह जंतर-मंतर के पास देखा गया पत्थरों से लदा ट्रक उसकी हिरासत में था. इस ट्रक को पुलिस ने एक सड़क दुर्घटना के बाद जब्त किया था और फिर वहां से हटाया. लेकिन न्यायालय में पुलिस की ओर से पेश वकील ने प्रदर्शनकारियों की हिंसा का जिक्र करते हुए उसी ट्रक का हवाला दिया.
https://x.com/DCPNewDelhi/status/2082134851185189135
यह ट्रक सबसे पहले 20 जुलाई को लोगों की नज़र में आया, जब 'कॉकरोच जनता पार्टी' का संसद तक मार्च होने वाला था. सीजेपी के X हैंडल से सोशल मीडिया पर एक वीडियो डाला गया, जिसमें केंद्रीय दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन के लिए तय जगह जंतर-मंतर के पास पत्थरों से लदा एक ट्रक खड़ा दिखाई दे रहा था.
https://x.com/CJP_for_India/status/2079032092030386524
प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि इस वाहन को वहां पर उन्हें फंसाने या हिंसा भड़काने के लिए जानबूझकर रखा गया था, ताकि बाद में उन्हें दोषी ठहराया जा सके. अभियान के संस्थापक अभिजीत दीप्के ने उस समय पूछा था कि क्या पुलिस "शांतिपूर्ण CJP प्रदर्शनकारियों पर पत्थरबाजी का इंतजाम" कर रही थी.
इस मार्च का अंत हिंसा के साथ हुआ, जिसमें प्रदर्शनकारी और पुलिसकर्मी दोनों घायल हुए. इसके बाद दिल्ली उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में पुलिस पर ज्यादतियों का आरोप लगाते हुए कई याचिकाएं दायर की गईं.
दिल्ली हाई कोर्ट में:
22 जुलाई को दिल्ली उच्च न्यायालय की एक डिवीज़न बेंच, जिसमें मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया शामिल थे, ऐसी ही याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी.
याचिकाओं का विरोध करते हुए दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने तर्क दिया कि ये याचिकाएं "तथ्यों को छिपाने" और सोशल मीडिया वीडियो पर आधारित थीं, जिनकी प्रमाणिकता को सहजता से स्वीकार नहीं किया जा सकता. उन्होंने कहा कि प्रदर्शन हिंसक हो गया था, और ऐसे वीडियो मौजूद हैं जिनमें पुलिसकर्मी घायल हुए हैं, पुलिस की गाड़ियां क्षतिग्रस्त हुई हैं.
उन्होंने उस ट्रक का ज़िक्र भी किया. "ऐसे वीडियो हैं जिनसे पता चलता है कि भीड़ पत्थरबाजी कर रही थी. जैसा कि याचिकाकर्ताओं ने खुद माना है, घटनास्थल पर पत्थर और ईंटों से लदा एक ट्रक मौजूद था. यह बात छिपाने के लिए कि ये पत्थर उन्होंने ही जमा किए थे, वे अब कह रहे हैं कि उन्हें पुलिस लाई थी, जिस पर पहली नज़र में विश्वास नहीं किया जा सकता. हो सकता है कि भीड़ में शामिल कुछ लोगों ने ऐसा न किया हो, लेकिन भीड़ में ऐसे अन्य तत्व भी हो सकते हैं जिन्होंने इस तरह की हरकतें की हों. माई लॉर्ड्स जानते हैं कि यदि आप किसी भीड़ या गैर-कानूनी जमावड़े का हिस्सा हैं, तो उस गैर-कानूनी जमावड़े द्वारा की गई हर हरकत के लिए आपको जिम्मेदार माना जाता है. यह एक स्थापित सिद्धांत है," उन्होंने अपनी बात रखी.
कोर्ट ने दिल्ली पुलिस और भारत सरकार को चार सप्ताह के भीतर जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया और मामले की सुनवाई के लिए 11 सितंबर की तारीख तय की.
हाईकोर्ट के सामने ट्रक के बारे में यह दावा उस समय से लगभग एक हफ़्ते पहले किया गया था, जब दिल्ली पुलिस ने सार्वजनिक रूप से पुष्टि की थी कि ट्रक उनकी हिरासत में था और उसे उन्होंने ही हटाया था.
सुप्रीम कोर्ट में:
भारत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने भी उस ट्रक का जिक्र किया गया. मंगलवार को, भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाला बागची और वी. मोहना की तीन जजों वाली बेंच ने कहा कि, छात्रों के खिलाफ पुलिस की ज्यादतियों के आरोपों की स्वतंत्र जांच के लिए शुरुआती तौर पर मामला बनता है और उन्होंने जबरदस्ती कार्रवाई न करने के निर्देश दिए. बेंच ने छात्रों के खिलाफ पुलिस की ज्यादतियों से जुड़ी कई याचिकाओं पर दिल्ली सरकार और मध्य प्रदेश, बिहार, असम, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल की सरकारों को नोटिस जारी किए.
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए. याचिकाकर्ता जुनैद मलिक की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने कोर्ट का ध्यान उस ट्रक की ओर दिलाया.
तब मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, “कौन (ट्रक की) जिम्मेदारी ले रहा है और कौन नहीं? क्योंकि वे (सरकारी वकील) भी कह रहे हैं कि ट्रक को लाने वाले…. ”
इस बीच वकील वृंदा ग्रोवर ने हस्तक्षेप करते हुए पुलिस के बयान पर सवाल उठाया कि अगर इलाका भारी सुरक्षा घेरे में था, तो ऐसी गाड़ी कई पुलिस बैरिकेड्स को पार करके कैसे आ सकती थी.
सुप्रीम कोर्ट इस मामले की सुनवाई 3 अगस्त को करेगा, जिसमें बेंच आरोपों की जांच के लिए एक कमेटी या स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) बना सकती है.
बुधवार को, न्यूज़लॉन्ड्री की रिपोर्ट को पुलिस द्वारा नकारने के बाद, वृंदा ग्रोवर ने सरकार के अपने ही बयानों का हवाला देते हुए और सवाल उठाए.
https://x.com/vrindagrover/status/2082345227030008057?s=46&t=7KJxWA-ifODCsKRYO8GNgg
ग्रोवर ने X पर लिखा, "दिल्ली पुलिस, भारत सरकार के सीनियर लॉ अधिकारियों को कौन ब्रीफ कर रहा है?"
उन्होंने लिखा, "सरकार के सबसे वरिष्ठ वकीलों ने ही विरोध-प्रदर्शन वाली जगह पर ट्रक की मौजूदगी का जिक्र किया था. ये बातें भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश और दिल्ली उच्च न्यायालय के माननीय मुख्य न्यायाधीश, दोनों के सामने कही गई थीं."
CJP के प्रवक्ता: ‘हमें बताया गया कि यह NDMC का ट्रक है’
न्यूज़लॉन्ड्री की जांच में पता चला कि ट्रक शुरू से ही पुलिस की हिरासत में था. इस गाड़ी को संसद मार्च से चार दिन पहले, 16 जुलाई को संसद मार्ग पुलिस स्टेशन ने जब्त किया था, क्योंकि एक दुर्घटना में सात लोग घायल हो गए थे.
रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद पुलिस ने कहा कि 16 जुलाई को एक वैन के साथ दुर्घटना के बाद ट्रक को वाकई जब्त किया गया था, और FIR भी दर्ज की गई थी. उन्होंने कहा कि शुरू में जगह की कमी के चलते इसे सुरक्षित रखने के लिए संसद मार्ग पुलिस स्टेशन के पास खड़ा किया गया था. पुलिस ने आगे कहा कि बाद में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए इसे हटाकर दूसरी जगह खड़ा किया गया.
उन्होंने इन दावों को "पूरी तरह से बेबुनियाद" बताया कि ट्रक को जानबूझकर, जंतर-मंतर के पास या किसी राजनीतिक पार्टी के दफ्तर के बाहर तैनात किया गया था. "प्रदर्शनकारियों के खिलाफ किसी साजिश से इस गाड़ी को जोड़ने वाला कोई भी दावा, पूरी तरह से बेबुनियाद है."
CJP के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने आरोप लगाया, "20 जुलाई की सुबह जब हमने पुलिस को ट्रक के बारे में बताया, तो उन्होंने मजाक उड़ाया और कहा कि यह मलबे दोने के लिए MCD का ट्रक है."
अभिजीत दीप्के ने कहा, "20 तारीख की सुबह, पुलिस ने हमें बताया कि यह NDMC का ट्रक है."
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