प्रतीकात्मक तस्वीर.
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'ऑफेंसिव पोस्ट' के खिलाफ कार्रवाई, जंतर-मंतर की रिपोर्टिंग भी निशाने पर?

कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का दिल्ली के जंतर-मंतर पर करीब 36 दिनों तक चला धरना- प्रदर्शन बीते 26 जुलाई को शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद खत्म हो गया. इसके कुछ ही घंटों बाद पत्रकार याकूत अली ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर सीजेपी के पूर्व प्रवक्ता विजेता दहिया का एक इंटरव्यू पब्लिश किया. दोनों ने इस बातचीत में सोनम वांगचुक को ऑनलाइन ट्रोल किए जाने को लेकर चर्चा की. गौरतलब है कि इस इंटरव्यू में न तो प्रधानमंत्री का ज़िक्र हुआ और न ही उनके खिलाफ कोई अभद्र टिप्पणी की गई. फिर भी कुछ ही मिनटों में यह वीडियो भारत में दिखाई देना बंद हो गया. 

इसके बाद अली ने अपने दूसरे इंस्टाग्राम हैंडल Notyaqut से वही वीडियो दोबारा पोस्ट किया और उसे अपने मेन अकाउंट के साथ इंस्टाग्राम के कोलैब फीचर के जरिए जोड़ा. इस बार भी वीडियो ब्लॉक कर दिया गया. उन्होंने तीसरी बार बिना किसी हैशटैग के वीडियो पोस्ट किया. यह पोस्ट करीब सात से आठ घंटे तक उपलब्ध रही, लेकिन बाद में इसे भी भारत में ब्लॉक कर दिया गया. अली को मिले नोटिस में कहा गया कि सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) अधिनियम के तहत यह पोस्ट भारत में उपलब्ध नहीं रहेगी.

यह कार्रवाई ऐसे समय में हुई जब दिल्ली पुलिस सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से प्रधानमंत्री के बारे में कथित आपत्तिजनक सामग्री हटाने का दावा कर रही है.   पुलिस का कहना है कि उसकी सोशल मीडिया टीम विभिन्न प्लेटफॉर्म्स की निगरानी कर रही है.

अब तक 450 ऐसी पोस्ट चिन्हित की जा चुकी हैं जिनमें कथित तौर पर डीपफेक या एआई से तैयार सामग्री मौजूद है. यह पुलिस कार्रवाई आंदोलन से जुड़े ऑनलाइन नैरेटिव को लेकर चल रही व्यापक लड़ाई के बीच सामने आई है. कई हफ्तों तक सीजेपी के इस आंदोलन ने इंस्टाग्राम पर कंटेंट क्रिएटर्स के सहयोग से भाजपा पर बढ़त बनाए रखी. आख़िरकार सरकार को भी उसी शैली में प्रतिक्रिया देनी पड़ी. 

आंदोलन के अंतिम दिनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी युवाओं को संबोधित करते हुए सेल्फी-स्टाइल वीडियो जारी किया. इसके बाद प्रधानमंत्री ने ऐसे और भी सेल्फी वीडियो पोस्ट किए. इनमें से एक वीडियो को फेसबुक पर मेटा ने कुछ समय के लिए ब्लॉक कर दिया था. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मेटा ने इस पर सरकार से माफी मांगी और इसे तकनीकी गड़बड़ी बताया. 

प्रधानमंत्री के वीडियो को लेकर मचे विवाद के बीच भारत में कई अन्य पोस्टों पर लगी पाबंदियां चर्चा से बाहर रह गईं. इन पोस्टों में न तो कोई अश्लील सामग्री थी और न ही कोई अपमानजनक भाषा. 

किन पोस्टों पर लगी रोक?

कंटेंट क्रिएटर ज्योति यादव ने बताया कि तीन हफ्तों के भीतर उनके कई वीडियो ब्लॉक कर दिए गए. 5 जुलाई को उन्होंने एआईएसए (AISA) मेंबर के साथ भूख हड़ताल पर बातचीत पोस्ट की थी. 23 जुलाई को उन्होंने आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह के साथ पेपर लीक मामले पर इंटरव्यू पोस्ट किया. 25 जुलाई को उन्होंने भीम आर्मी के सदस्यों के साथ इसी मुद्दे पर चर्चा का वीडियो पोस्ट डाला. इन तीनों वीडियोज़ में पहले हुए आंदोलनों, जिनमें किसान आंदोलन भी शामिल था, से जुड़े दावों का ज़िक्र किया गया था. 

एक वीडियो में भीम आर्मी के सदस्य ने 30 से अधिक एफआईआर का सामना कर रहे हिंदुत्व कार्यकर्ता पिंकी चौधरी को "नालायक" कहा था. उसने यह भी कहा था कि वह स्वतंत्रता दिवस पर उनका सामना करेगा. यह तीनों वीडियो अभी भारत में उपलब्ध नहीं हैं. हालांकि, ये वीडियो अब भी फेसबुक पर देखे जा सकते हैं.

ज्योति यादव ने कहा, "मैं फ्रीलांसर हूं और अपने निजी अकाउंट पर भी कंटेंट अपलोड करती हूं. मैं एजेंडा आधारित सामग्री से अलग अच्छा कंटेंट बनाना चाहती हूं, लेकिन डर लगा रहता है कि किसी भी समय मेरा पेज भी सस्पेंड हो सकता है." 

इसी तरह सितंबर, 2022 से अपना पेज चला रहे गजेंद्र सिंह अपने पोर्टल News Diggy पर भी सामग्री प्रकाशित करते हैं. उन्होंने 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान पुलिस की पिटाई में घायल हुए एक प्रदर्शनकारी का वीडियो अपलोड किया था. अगले ही दिन उस वीडियो को भारत में प्रतिबंधित कर दिया गया. नोटिस में आईटी अधिनियम की धारा 73(3)(b) का हवाला दिया गया.

गजेंद्र सिंह ने कहा, "स्वरा भास्कर का लिया गया मेरा एक और इंटरव्यू भी भारत में उपलब्ध नहीं है. अगर हम कोई फर्जी वीडियो नहीं डाल रहे हैं तो इसमें गलत क्या है?" 

पत्रकार और कंटेंट क्रिएटर राघव त्रिवेदी ने रविवार को गाजियाबाद की एक घटना पर वीडियो पोस्ट किया. इस वीडियो में उन्होंने बताया कि सत्याम पंडित नाम के एक व्यक्ति ने सीजेपी प्रदर्शन से लौट रहे लोगों से उनका धर्म पूछकर हमला किया. त्रिवेदी ने सवाल उठाया कि जो पुलिस छात्रों पर लाठीचार्ज कर सकती है, वह प्रदर्शनकारियों पर हमला करने वालों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं कर रही. यह वीडियो समाचार मंच मॉलिटिक्स के साथ इंस्टाग्राम कोलैब पोस्ट के रूप में शेयर किया गया था. 

उनकी पोस्ट पर केवल प्रतिबंध नहीं लगाया गया बल्कि उसे प्लेटफ़ॉर्म से हटा दिया गया. हटाने के नोटिस में कहा गया कि पोस्ट में "बच्चों के साथ दुर्व्यवहार दर्शाया गया हो सकता है, भले ही उसे मीम, व्यंग्य, मज़ाक या आक्रोश व्यक्त करने के उद्देश्य से साझा किया गया हो.”

इसी बीच मॉलिटिक्स का एक और वीडियो, जिसमें आर्टिकल 19 के नवीन कुमार सरकार समर्थक मीडिया पर चर्चा कर रहे थे. इसे शनिवार को पोस्ट किया गया. शुरू में यह भी हटा दिया गया लेकिन बाद में यह फिर से बहाल कर दिया गया. 

अभिनव बिष्ट, जिनके इंस्टाग्राम फॉलोअर्स सीजेपी आंदोलन से जुड़े रील्स पोस्ट करने के बाद कुछ हजार से बढ़कर छह लाख से अधिक हो गए थे, उनका अकाउंट भी सस्पेंड कर दिया गया. कुछ घंटों बाद उनका अकाउंट बहाल कर दिया गया.

बिष्ट का कहना है कि उन्हें अब तक यह नहीं बताया गया कि उनका अकाउंट क्यों सस्पेंड किया गया था. उन्होंने नया अकाउंट बनाया तो हजारों फॉलोअर्स ने इंस्टाग्राम से उनका पुराना अकाउंट बहाल करने की मांग शुरू कर दी. 

इस बीच पश्चिम बंगाल के बारासात में सौमिक चटर्जी नाम के एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया. उनके खिलाफ एक भाजपा नेता की शिकायत पर कार्रवाई हुई. आरोप है कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर जलाकर उससे सिगरेट सुलगाने का वीडियो पोस्ट किया था. 

"क्रिएटर्स की पहुंच अचानक घट रही है"

इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (आईएफएफ) ने भी मेटा के इस कदम पर सवाल उठाए हैं. आईएफएफ ने कहा कि पूरे भारत में यूजर्स शिकायत कर रहे हैं कि दिल्ली में चल रहे छात्र आंदोलन से जुड़े रील्स और वीडियो इंस्टाग्राम पर "संवेदनशील सामग्री" के रूप में चिह्नित किए जा रहे हैं. इसमें सीजेपी के आधिकारिक अकाउंट और अनीश गावंडे द्वारा साझा की गई स्टोरीज़ भी शामिल हैं.

आईएफएफ के मुताबिक कई मामलों में स्टोरी पर "रील देखें" (See Reel) का विकल्प भी काम नहीं करता. संस्था का कहना है कि कई क्रिएटर्स अपनी पोस्ट की पहुंच में अचानक आई भारी गिरावट की शिकायत कर रहे हैं. आईएफएफ के अनुसार यह स्थिति आमतौर पर "शैडोबैनिंग" कहलाती है.

फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि पोस्ट हटवाने के लिए दिल्ली पुलिस किस कानूनी प्रावधान का इस्तेमाल कर रही है. 

पीटीआई ने दिल्ली पुलिस के एक सूत्र के हवाले से कहा, "प्रदर्शन के दौरान और उसके बाद अपलोड की गई सामग्री की समीक्षा के बाद पुलिस आपत्तिजनक पोस्ट हटाने के लिए नोटिस जारी करेगी." सूत्र के अनुसार ऐसी सामग्री की पहचान की कार्रवाई पहले से चल रही है.

इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन के संस्थापक निदेशक अपार गुप्ता ने कहा कि इस पूरी प्रक्रिया को सार्वजनिक किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा, "ऑनलाइन पली-बढ़ी डिजिटल पीढ़ी जवाबदेही की मांग इसी तरह करती है."

उन्होंने मांग की कि दिल्ली पुलिस हर नोटिस और उसके तहत इस्तेमाल किए गए कानूनी प्रावधान को सार्वजनिक करे. न्यूज़लॉन्ड्री ने इस मामले पर दिल्ली पुलिस और मेटा दोनों को सवाल भेजे हैं. यदि उनकी प्रतिक्रिया मिलती है तो इस रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा. 

निगरानी पर उठते सवाल

यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब दिल्ली हाई कोर्ट ने जंतर-मंतर पर कथित निगरानी को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया. अदालत ने याचिकाकर्ता से इस विषय पर सामान्य दिशा-निर्देशों की मांग करने को कहा. इससे पहले प्रदर्शनकारियों ने इक्षणा नाम की दिल्ली पुलिस की एक मोबाइल निगरानी वैन की तस्वीरें साझा की थीं. इस वैन में दूर तक देखने वाले टेलीस्कोपिक मस्तूल पर कैमरे लगाए गए थे. इन कैमरों से पूरे प्रदर्शन स्थल का 360 डिग्री दृश्य रिकॉर्ड किया जा सकता था. इसके अलावा ड्रोन कैमरे और मौके पर मौजूद पुलिसकर्मी भी प्रदर्शनकारियों की रिकॉर्डिंग कर रहे थे.

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार ने सरकार को भेजी रिपोर्ट में कहा है कि पुलिस और वाहनों पर हमले के मामलों में 2,873 लोगों की जांच की गई. इनमें से 989 लोगों का गंभीर आपराधिक मामलों से जुड़ा रिकॉर्ड होने का दावा किया गया है. रिपोर्ट के अनुसार, इनकी पहचान फेस रिकग्निशन कैमरों, सीसीटीवी और पुलिस तथा आम लोगों द्वारा रिकॉर्ड किए गए वीडियो के जरिए की गई. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि प्रशासन ने केवल जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति दी थी, संसद मार्च की नहीं.

पुलिस का दावा है कि उसकी जांच में पाया गया कि 20 जुलाई के संसद मार्च के दौरान हुई हिंसा में 101 हत्या के आरोपियों, 284 डकैती और लूट के मामलों में आरोपित लोगों और 92 ऐसे लोगों की पहचान की गई जिनके नाम महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों में लिप्त हैं. 

इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन ने फेस रिकग्निशन तकनीक के इस्तेमाल को लेकर दिल्ली पुलिस को पत्र लिखा है और सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत जानकारी भी मांगी है. आईएफएफ का कहना है कि आरटीआई के जवाबों से पता चलता है कि दिल्ली पुलिस के पास फेस रिकग्निशन तकनीक के इस्तेमाल के लिए कोई स्पष्ट नियम नहीं हैं. 

संस्था के मुताबिक, इस तकनीक के इस्तेमाल से पहले कोई प्राइवेसी इम्पैक्ट असेसमेंट भी नहीं किया गया. आईएफएफ का दावा है कि केवल 80 प्रतिशत समानता (सिमिलर मैच) को ही सकारात्मक पहचान मान लिया जाता है.

संस्था ने पुलिस आयुक्त को कानूनी प्रतिनिधित्व भेजकर शांतिपूर्ण प्रदर्शनों में लाइव फेस रिकग्निशन तकनीक के इस्तेमाल पर तत्काल रोक लगाने, प्रदर्शनकारियों का बायोमेट्रिक डाटा हटाने और यदि कोई नियम मौजूद हों तो उन्हें सार्वजनिक करने की मांग की है. 

आईएफएफ ने इस मामले में चार नए आरटीआई आवेदन भी दाखिल किए हैं. इनमें इक्षणा निगरानी वैन के लिए निजी कंपनी के साथ हुए अनुबंध से जुड़ी जानकारी मांगी गई है. 

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