Opinion
जसवंत खालड़ा और पंजाब की दहशतगर्दी का अर्धसत्य है 'सतलुज'
पुलिस की गैर-कानूनी हिरासत में 1995 में मारे गए पंजाब के मानव अधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर बनी फिल्म ‘पंजाब 95’ चार साल की लंबी कशमकश के बाद गत 3 जुलाई को ‘सतलुज’ नाम से ओटीटी प्लेटफार्म ज़ी5 पर रिलीज़ हुई. दो दिन बाद ही ‘अगले हुक्म’ तक इसे भारत में बैन किया गया. बीती शाम इसे दुनियाभर के दर्शकों के लिए प्लेटफॉर्म से हटाने की ख़बर आई. फिल्म की समीक्षा के लिए बनाई गई कमेटी ने इसे देश की ‘संप्रभुता के खिलाफ’ बताया है.
अब पंजाब से लेकर देशभर में फिल्म को लेकर तमाम तरह की चर्चाएं तेज हो चली हैं.
हनी त्रेहन द्वारा निर्देशित इस फिल्म में दिलजीत दोसांझ, अर्जुन रामपाल, कंवलजीत सिंह, सुविंदर विक्की, जगजीत संधू और गीतिका विद्या ओहल्यान ने अदाकारी की है. यह फिल्म 2022 से सेंसर बोर्ड की मंजूरी का इंतज़ार कर रही थी. पहले इस फिल्म का नाम ‘घल्लुघारा’ रखा गया था. यह पंजाबी शब्द है, जिसका मतलब है कत्लेआम या नरसंहार. शुरुआत में सेंसर बोर्ड को इस नाम पर एतराज़ था. जिसके बाद इसका नाम बदल कर ‘पंजाब 95’ रखा गया. सेंसर बोर्ड ने इस फिल्म में 127 कट सुझाए थे. तब फिल्म निर्देशक हनी त्रेहन ने कहा था, “फिल्म जसवंत सिंह खालड़ा जी के जीवन पर है और हमें कहा गया कि उनका नाम ही निकाल दो . मतलब यह तो अपराध है.”
इस तरह यह फिल्म सेंसर बोर्ड के पास ही लटकी रही. फरवरी, 2025 में यह फिल्म अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रिलीज़ किए जाने की योजना बनी. तब इसका टीज़र भी जारी किया गया. हालांकि, बाद में इसकी रिलीज़ टाल दी गई.
इसके बाद 3 जुलाई को इसे सतलुज नाम से ज़ी5 पर रिलीज़ किया गया. तब निर्देशक हनी त्रेहन ने कहा, “इस फिल्म में न कोई कट है न ही इसके असल स्वरूप के साथ कोई समझौता किया गया है.” जसवंत सिंह खालड़ा के परिवार का भी यही कहना है कि जो फिल्म हमें दिखाई गई थी, उसी रूप में ज़ी5 पर पर रिलीज़ हुई है.”
हालांकि, कनाडा में ‘वर्ल्ड सिख ऑर्गनाइजेशन’ के संस्थापक सदस्यों में एक ज्ञान सिंह संधू बताते हैं, “कुछ महीने पहले जब निर्देशक हनी कनाडा दौरे पर आए थे तो उन्होंने कुछ लोगों को यह फिल्म दिखाई थी. मैंने भी उस समय फिल्म देखी थी. अब इस फिल्म से कुछ दृश्य हनी त्रेहन ने खुद हटा दिए हैं, जो मैंने उस समय देखे थे. वो दृश्य काफी दिलचस्प थे, जैसे तत्कालीन डी.जी.पी. केपीएस गिल का सीधे खालड़ा से मिलने और पुलिस हिरासत में खालड़ा की भयंकर मार-कुटाई का दृश्य. इसी तरह अदालती कार्यवाही के कुछ दृश्य हटा दिए गए हैं. हालांकि, मेरा मानना है कि यह फिल्म सच्चाई के नज़दीक है.” मालूम हो कि ‘वर्ल्ड सिख ऑर्गनाइजेशन’ ने ही 1995 में खालड़ा को कनाडा बुलाया था. फिल्म में भी इसका जिक्र है.
वहीं, कनाडा में भारतीय मूल के पत्रकार गुरप्रीत सिंह बताते हैं, “हनी त्रेहन फरवरी में कनाडा आए थे. उस समय वह अपनी फिल्म को यहां बेचना चाहते थे क्योंकि भारत का सेंसर बोर्ड फिल्म को पास करने में मुश्किलें पैदा कर रहा था. फिर उन्होंने शायद यह योजना बदल दी. उस समय उन्होंने कई लोगों को यह फिल्म दिखाई थी और वह इतने दबाव में दिखे कि जब मैंने उनसे इंटरव्यू करना चाहा तो उन्होंने मुझे यह कह कर मना कर दिया कि उनकी लीगल टीम ने उन्हें विदेशी मीडिया को इंटरव्यू देने से मना किया है.”
‘ज़ी5’ ने फिल्म को हटाने के बारे जानकारी देते हुए लिखा, “मौजूदा घटनाक्रम को ध्यान में रखते हुए ‘सतलुज’ अगली सूचना तक भारत में उपलब्ध नहीं होगी . हम कानूनी प्रक्रिया के अनुसार हर उचित रास्ता ढूंढ रहे हैं ताकि इस फिल्म को जल्दी से जल्दी दोबारा अपने दर्शकों तक पहुंचाया जा सके .”
फिल्म के हटने के बाद पंजाब के राजनीतिक और समाजिक क्षेत्र से जुड़े लोगों की तीखी प्रतिक्रिया सामने आने लगी. राजनीतिक पार्टियों ने अपनी-अपनी राजनीति करनी शुरू कर दी. पंजाब में सत्ताधारी आम आदमी पार्टी ने कहानी और तथ्यों को आधार बना कर कांग्रेस, अकाली दल और भाजपा को घेरते हुए फिल्म को ओटीटी से हटाने का विरोध किया. कांग्रेस में धर्मवीर गांधी, सुखपाल खैरा, चरनजीत सिंह चन्नी, परगट सिंह जैसे नेता फिल्म का समर्थन और पाबंदी का विरोध कर रहे हैं. हालांकि, कुछ कांग्रेसी नेता चुप रहना ही सही समझ रहे हैं.
वहीं, अकाली दल, कांग्रेस की तत्कालीन बेअंत सिंह सरकार की आलोचना करते हुए जसवंत सिंह खालड़ा को अपनी पार्टी का बताते हुए इस फिल्म पर लगी रोक का विरोध कर रहा है.
शिरोमणी गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी और अकाल तख़्त के जत्थेदार भी फिल्म हटाए जाने का विरोध कर रहे हैं.
विपक्षी पार्टियों ने इस मुद्दे पर भाजपा को घेरना शुरू कर दिया है. क्योंकि केंद्र में भाजपानीत सरकार है.
हालांकि, प्रदेश में भाजपा असमंजम मे नजर आ रही है. पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष केवल ढिल्लों केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्रालय से मिल कर फिल्म पर लगी रोक हटाने की मांग कर रहे हैं. दूसरी तरफ केंद्रीय राज्य मंत्री और भाजपा नेता रवनीत सिंह बिट्टू इस फिल्म का खुल कर विरोध कर रहे हैं. एक वीडियो में तो वह इस फिल्म को ले कर पंजाब के हिन्दू समुदाय को उकसाते हुए भी नजर आ रहे हैं.
वैसे भले ही फिल्म ज़ी5 से हटा ली गयी है लेकिन पंजाब में लोगों ने एक-दूसरे को इस फिल्म की डिजिटल कॉपी बांटनी शुरू कर दी है. जिसके लिए व्हाट्एसप और अन्य एप्लीकेशन का सहारा लिया जा रहा है. इसके अलावा गांवों में गुरद्वारों या सांझी समुदायिक जगहों पर फिल्म की स्क्रीनिंग हो रही है. शिरोमणी अकाली दल और अमृतपाल सिंह की पार्टी ‘वारिस पंजाब दे’ भी लोगों को फिल्म दिखाने में जुटे हैं.
फिल्म में जसवंत सिंह खालड़ा का रोल निभाने वाले पंजाबी के प्रसिद्ध अभिनेता और गायक दिलजीत दोसांझ लोगों की इस कारवाई का समर्थन कर रहे हैं जबकि फिल्म निर्देशक हनी त्रेहन लोगों को निवेदन कर रहे हैं कि वह ऐसा न करें क्योंकि यह एक तरह से पायरेसी है.
इस पूरे माहौल में फिल्म, जसवंत सिंह खालड़ा के कामों, उनकी सोच और पंजाब के उस दौर को याद करते हुए लोगों के अंदर फिर से कई सवाल उभरने लगे हैं .
यह फिल्म जसवंत सिंह खालड़ा द्वारा पंजाब के आतंकवाद के समय में पुलिस द्वारा गैर-न्यायिक कत्लों, जबरदस्ती लापता करने और गैर कानूनी संस्कार करने के मामलों को उजागर करने के संघर्ष को दिखाती है .
गौरतलब है कि जसवंत सिंह खालड़ा ने अपने इलाके तरन तारन, पट्टी, अजनाला और दुर्गाना (अमृतसर) के श्मशान घाटों में जून, 1984 से लेकर दिसंबर, 1994 तक की ऐसी लाशों के ब्योरे पेश किए थे, जिनके बारे उनका दावा था कि यह लाशें पुलिस की गैर-कानूनी कार्यवाई की गवाही देती हैं.
केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के मुताबिक, खालड़ा ने इस दमन के खिलाफ आवाज़ उठाई और ‘स्थानीय’ पुलिस को यह पसंद नहीं आ रहा था. तो उन्होंने खालड़ा को अगवा करने की साजिश रची और इस अपराधिक साजिश को आगे बढ़ाते हुए स्थानीय पुलिस अधिकारियों ने 6 सितम्बर 1995 को खालड़ा को उनके घर से अगवा कर लिया. उनको गैर कानूनी हिरासत में रखने के बाद क़त्ल कर लाश को हरीके (जिला तरन-तारन) में नहर में फेंक दिया .
इसके बाद खालड़ा का मामला सी.बी.आई तक पहुंचा. 1996 में सी.बी.आई ने पटियाला की अदालत में 9 पुलिस अधिकारिओं के खिलाफ चार्जशीट दायर की. जिसमें मुख्य दोषी अजीत सिंह संधू था, जो तरन तरन का तत्कालीन एसएसपी था. इनमें अन्य पुलिस वाले अशोक कुमार,सतनाम सिंह , रछपाल सिंह, जसबीर सिंह, अमरजीत सिंह, सुरिंदर पाल सिंह और डीएसपी जसपाल सिंह थे. अजीत सिंह संधू के खिलाफ आरोप तय नहीं किए जा सके क्योंकि उसने पहले ही खुदकुशी कर ली थी. बाकियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 364, 120बी और 34 के तहत मामला चला.
यह फिल्म उस समय के मुख्यमंत्री और पंजाब पुलिस के मुखिया के.पी.एस गिल की भूमिका पर भी सवाल खड़े करती है और यहां तक दिखाया गया है कि खालड़ा की हत्या गिल के इशारे पर की गयी थी, क्योंकि खालड़ा ने गिल को कई बार हिरासती मौतों के मामले में बहस के लिए चुनौती दी थी .
इस फिल्म पर उठने वाले सवालों में सबसे बड़ा सवाल है कि इसे चार साल तक सेंसर बोर्ड का सर्टिफिकेट न मिलना. हालांकि, यह फिल्म न तो किसी तरह सिस्टम को चुनौती देती नजर आती है, न सत्ता पर सवाल करती है. इसमें तो पूरा दोष कुछ पुलिस वालों और अफसरों पर डाल दिया गया है. देश की एजेंसियों जैसे सीबीआई आदि को ईमानदारी से काम करते दिखाया गया है. उसके बाद इसका ‘ज़ी’ जैसे मंच पर आना और आ कर चले जाना. यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि राज्यों में चुनाव के नज़दीक पिछले समय में कई फ़िल्में आई हैं. जैसे केरल चुनाव के नज़दीक ‘केरल स्टोरी’ बंगाल विधान सभा के नज़दीक ‘बंगाल फाइल्स’ . इससे पहले ‘साबरमती एक्सप्रेस’, ‘कश्मीर फाइल्स’ जैसी शुद्ध प्रोपगंडा फ़िल्में बनीं हैं जिनका प्रधान मंत्री से लेकर भाजपा के लोकल नेता तक ने प्रचार किया और टैक्स भी माफ़ किये गये .
क्या ‘सतलुज’ को भी इसी नजर से देखा जाए? फिल्म में कोई धार्मिक नफरत नजर नहीं आती, यहां ज़ुल्म भी उसी धर्म पर हो रहा है और ज़ुल्म करने वाले भी ज़्यादातर उसी धर्म के दिखाए गए हैं. फिल्म कलात्मक है और दिलजीत की अब तक की सबसे अच्छी अदाकारी शायद इस फिल्म में दिखी है. लेकिन इस फिल्म का चुनाव के नज़दीक आना और चले जाना क्या इसके कोई मायने हैं ?
पंजाब के राजनैतिक, सामाजिक कार्यकर्ता और इंकलाबी मैगजीन ‘सुर्ख लीह’ के संपादक पावेल कुस्सा की टिप्पणी ध्यान मांगती है, “फिल्म बनाने वाले कारोबारी हैं, दिलजीत जैसे इस कारोबार में इस्तेमाल होने वाले कलाकार हैं. खेल तो उसके बाद शुरू होता है. कब फिल्म रोकनी है, कब सेंसर बोर्ड से मंजूरी दिलानी है, कब पाबंदी लगानी है, यह सब सरकारों और राजनीतिक पार्टियों की वोट गिनती से जुड़ कर तय होता है. ‘कश्मीर फाइल्स’ और ‘धुरंधर’ जैसी फ़िल्में योजनाबद्ध तरीके से बनाई जाती हैं. जो योजनाबद्ध नहीं भी बनाई जाती, उसका किस हालत में, कैसे इस्तेमाल करना है राजनेता हमेशा इन संभावनाओं को ढूंढ़ते रहते हैं .”
फिल्म को लेकर भाजपा, अकाली दल और ‘वारिस पंजाब दे’ द्वारा की जा रही राजनीति से यह आसानी से समझा जा सकता है .
फिल्म को लेकर दूसरा बड़ा सवाल जसवंत सिंह खालड़ा की विचारधारा पर उठ रहा है. हालांकि विचारधारा कोई भी होने या न होने से उनका काम छोटा नहीं हो जाता न ही उनकी हत्या को सही ठहराया जा सकता है. लेकिन विचारधारा व्यक्ति के संकल्प और सोच को उजागर करती है. फिल्म में उन्हें एक सिर्फ मानव अधिकार कार्यकर्ता के तौर पर दिखाया गया है. उन्हें एक मानवतावादी सोच वाले इंसान के तौर पर पेश किया गया है . असल में उनकी सोच को लेकर पंथक गुट भी दो तरह की राय रखते हैं. एक उन्हें उदार सिख और मानव अधिकार कार्यकर्ता के रूप पेश करता है तो दूसरा उन्हें कार्यकर्ता के साथ-साथ खालिस्तानी विचारधारा से प्रभावित शख्स के रूप में पेश करता है. उनके बारे में छपी दो किताबों- एक अजमेर सिंह की पंजाबी में ‘शहीद जसवंत सिंह खालड़ा’ तो दूसरी किताब गुरमीत कौर की अंग्रेज़ी में ‘द वैलियंट जसविंत सिंह खालड़ा’ में भी यही अलग-अलग नजरिया दिखाई देता है.
पंजाब के तरन तारन जिले के खालड़ा गांव में 1952 में पैदा हुए जसवंत सिंह खालड़ा का परिवार एक देशभक्त परिवार था. खालड़ा के दादा हरनाम सिंह ने भारत के आज़ादी संघर्ष में अपना योगदान दिया था. वे गदर पार्टी के कार्यकर्ता थे. हरनाम सिंह जी कामागाटा मारू जहाज़ के 376 यात्रियों में से एक थे. उन्होंने लाहौर जेल में कैद भी काटी.
जसवंत सिंह खालड़ा विद्यार्थी जीवन में वामपंथी विचारों के थे. वह मार्क्सवादी और लेनिन ग्रुप की विचारधारा से प्रभावित थे. नौजवान भारत सभा में भी कुछ वक्त तक रहे. फिर बैंक में मैनेजर तौर पर उन्होंने नौकरी की. बैंक के एक साथी के अचानक गायब होने और उसे ढूंढने की कोशिशों ने उन्हें मानव अधिकार कार्यकर्ता बनाया. वह मानव अधिकार सभा में काम करने लगे. खालड़ा के समकालीन कुछ कार्यकर्ताओं ने बताया कि उस समय कुछ और भी मानव अधिकार संगठन पंजाब में सक्रिय थे. खालड़ा अन्य संगठनों से मिल कर चलने की जगह निजी तौर पर काम करने के ज्यादा इच्छुक थे.
पहले वह पुलिस के अन्याय और खालिस्तानियों द्वारा मारे जाने वाले लोगों, दोनों का विरोध करते थे. लेकिन फिर उन्होंने अपना ध्यान सिर्फ पुलिस द्वारा मारे जा रहे सिख नौजवानों या खालिस्तान से जुड़े नौजवानों की पुलिस द्वारा की जाने वाली हत्या पर ही केंद्रित कर लिया . बताया जाता है कि इसके पीछे वजह है कि मानव अधिकारों से जुडी कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं सिख नौजवानों की पुलिस द्वारा की हत्या में ज्यादा रुचि ले रही थीं.
खालड़ा के इलाके के और उनसे अच्छे संबंध रखने वाले पंजाबी पत्रकार गुरदयाल सिंह बल अपने लंबे लेख ‘गुरमीत सिंह पिंकी दीयां चिंघाड़ा ते पंजाब सियासत दीयां स्मृतियां दे कुझ अंश’ में लिखते हैं कि खालड़ा खालिस्तानियों द्वारा की गई कई हत्याओं को सही ठहराते थे .
1990 -92 के समय जब खालड़ा इंग्लैंड में थे तो वहां ‘लिबरेशन खालिस्तान’ नाम के पेपर में लिखा करते थे. यह खालिस्तानी विचारधारा से प्रभावित अखबार था. इसमें फरवरी, 1992 में छपा उनका लेख है “चोणां दी खेड: की एह खेड्नी चाहिदी है जां नहीं?” इसको ‘बाज़ निउज़’ ने अंग्रेज़ी में भी ‘द गेम ऑफ इलेक्शन्स शुड इट बी प्लेड ऑर नॉट?’ नाम से प्रकाशित किया गया. इस लेख में उनके खालिस्तानी विचारों के खुलकर दर्शन होते हैं. यहां वह खालिस्तान के लिए मरने वाले ‘शहीदों’ की गिनती 50 हजार बताते हैं. साथ ही वह इंदिरा गांधी को मारने वाले सतवंत सिंह और केहर सिंह को भगत सिंह और करतार सिंह सराभा से बड़ा शहीद बताते हैं. खालड़ा यह भी कहते हैं कि उनके खालिस्तान की प्राप्ति चुनाव के रास्ते नहीं होगी. याद रहे कि यह वो समय था, जब कई गर्मपंथी सिख गुटों के साथ अकाली दल ने भी 1992 के पंजाब विधान सभा चुनाव का बहिष्कार किया था .
1995 में जसवंत सिंह खालड़ा को जिस ‘वर्ल्ड सिख ऑर्गनाइजेशन’ ने कनाडा बुलाया था. उसका एक हिस्सा भी खालिस्तानी विचारधारा का हिमायती रहा है. कनाडा के टोरंटो शहर के एक पत्रकार और रेडियो होस्ट ने अपना नाम न छापने की शर्त पर बताया, “असल में इस संस्था में 30-35 परिवारों का ही वर्चस्व रहा है. फिल्म में इस संस्था द्वारा खालड़ा को बुलाने को बहुत बड़ी बात बता कर पेश किया गया है. जो कि इतनी बड़ी बात नहीं है. यहां इंडिया से आने वाले महमानों को आम ही हम अपने संसद सदस्यों से मिला देते हैं. यह संस्था शुरू में खालिस्तानी विचारों की खुल कर हिमायत करती थी, बाद में इसने अपना काम लीगल और मानव अधिकार मुद्दों तक सीमत कर लिया. उस समय खालड़ा जी को ‘वर्ल्ड सिख ऑर्गनाइजेशन’ के संस्थापक सदस्य सुखविंदर सिंह हंसरा जी ने बुलाया था. हंसरा खालिस्तानी विचारों से जुड़े थे लेकिन हिंसा में यकीन नहीं रखते थे. उस समय उनके मीडिया समूह अनखीला पंजाब रेडियो की दूसरी वर्षगांठ का समय था .”
इसी मीडिया समूह ने जसवंत सिंह खालड़ा के साथ उस दौरान एक साक्षात्कार किया. होस्ट इंदरजीत सिंह बल तो अपने कार्यक्रम की शुरुआत में खालिस्तान का प्रचार करते दिखे साथ ही खालड़ा ने भी यहां खालिस्तान के विचार को समर्थन दिया. साथ ही जरनैल सिंह भिंडरावाले को लेकर खालड़ा ने कहा, “संत जरनैल सिंह भिंडरावाले, इस सदी में होने वाले कौमी हीरो में से एक हैं… मेरे ख्याल से उनकी कुर्बानी ने हमें भारत के साथ अपने (सिखों के) संबंधों को दोबारा परिभाषित करने के लिए जागृत किया है.”
इस दौरान खालड़ा ने भाजपा और शिव सेना की कट्टरता की आलोचना करते हुए भारत के लोकतंत्र और धर्म निरपेक्ष होने पर सवाल खड़ा किया.
खालड़ा का दूसरा वीडियो, उनके टोरंटो के गुरुद्वारा में दिए भाषण का मिलता है जिसके अंश को फिल्म में शामिल किया गया है.
गुरमीत कौर, अपनी किताब में खालड़ा के बारे में लिखती हैं, “जब बाबरी मस्जिद तोड़ी गई तो खालड़ा ने इसके विरोध में भूख हड़ताल की और अकाली दल से इस्तीफा दे दिया था.”
हालांकि, खालड़ा के नज़दीकी दोस्त और उनको अगवा किए जाने के चश्मदीद गवाह राजीव सिंह रंधावा इस तथ्य की पुष्टि नहीं करते. वह बताते हैं कि खालड़ा ने बाबरी मस्जिद के तोड़े जाने का विरोध किया था पर अकाली दल से इस्तीफा देने वाली वाली बात सही नहीं है. वह कहते हैं कि अकाली दल तो खालड़ा ने 1994 में ज्वाइन किया था. खालड़ा अकाली दल के मानव अधिकार विंग के महासचिव थे. रंधावा बताते हैं कि इस गुरचरन सिंह टोहड़ा को छोड़ किसी अकाली नेता ने इस मानव अधिकार विंग को भाव नहीं दिया.
खालड़ा की पत्नी परमजीत कौर भी अकाली दल पर यह आरोप लगती हैं कि प्रकाश सिंह बादल ने 1997 में सत्ता में आते ही फर्जी मुकाबलों की जांच करने के मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया था. परमजीत ने 1999 में गुरचरन सिंह टोहड़ा के सरब हिन्द अकाली दल की टिकट पर तरन तारन और 2019 में पंजाब एकता पार्टी की तरफ से खडूर साहिब लोकसभा का चुनाव लड़ा लेकिन दोनों बार कामयाब न हो सकी .
फिल्म लावारिस लाशों की सही गिनती को लेकर भी सवालों में है. फिल्म में लावारिस लाशों की गिनती 25 हजार बताई गई है. हालांकि, यह तथ्यों से पूरी तरह मेल नहीं खाती. असल में खालड़ा ने उस समय अपने इलाके में 2097 लाशों की शिनाख्त की थी. उनका एक मोटा अंदाज़ा था जिसको उन्होंने पक्का मान कर प्रचार किया कि यह गिनती पूरे पंजाब में 25 हजार से ऊपर ही होगी. लेकिन यह तथ्य ध्यान रखना जरूरी है कि जसवंत सिंह के इलाके में ही उस दौर में सब से ज्यादा पुलिस द्वारा झूठे मुकाबले बनाए गए थे. जानकारी के मुताबिक, पूरे पंजाब में पुलिसिया जुल्म के जो मामले सामने आए उनमें से 27 फीसदी इसी इलाके के थे.
एडवोकेट रविंद्र सिंह बैंस एक टीवी डिबेट में कहते हैं, “खालड़ा की शिनाख्त की गई 2097 लवारिस लाशों के सिवा मानव अधिकार कार्यकर्ता राम नारायण ने 2700 को ढूंढा था. जसवंत और सुखवंत नाम के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने ऐसे 5500 मामले खोज निकाले. सतनाम बैंस ने 6600 केस ढूंढे.”
हालांकि, बैंस द्वारा दिए यह सभी आंकड़े मिला कर भी 25 हजार नहीं बनते. साथ ही ऐसे मामले कितने होंगे, जिनका इनमें दोहराव हो वह कहना भी मुश्किल है.
फिल्म को लेकर उठने वाले कई सवालों के बावजूद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि यह पंजाब के काले दिनों के दौर की याद दिलाती है. यहां हुकुमती जुल्म हुआ, खालिस्तान के नाम पर मासूम नौजवान सिखों का कत्ल हुआ. पर यह उस दौर का एक पक्ष है.
दूसरा पक्ष यह है कि खालिस्तान की सोच रखने वालों ने निर्दोष लोगों को बसों से बाहर निकाल कर उनकी पहचान देख कर मारा. कई पंजाब के ऐसे हीरे लोग भी मारे गए जो खालिस्तानी ताकतों का भी विरोध करते थे और राज्य के ज़ुल्म का भी विरोध करते थे. अवतार सिंह पाश, बलदेव सिंह मान, जैमल सिंह पडदा , दीपक धवन जैसे लोगों को कौन भूल सकता है, जिन्होंने कौमी एकता के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी. इसी दौर में नाटककार गुरशरन सिंह का नाम भी आता है, जिन्होंने उन काली अंधेरी रातों में हुकुमती ज़ुल्म और साम्प्रदायिक ताकतों का विरोध किया और लोगों को अपने नाटकों के जरिए भाईचारा बनाए रखने का आह्वान किया. उस समय इन लोगों ने ही फिजा में ये नारे गुंजाए- “हिन्दू-सिख को आपस में लड़ने नहीं देना, सन संताली फिर से बनने नहीं देना.”
उस दौर में ऐसे मानव अधिकार कार्यकर्ता और संगठन भी थे, जिन्होंने धर्म से ऊपर उठकर ज़ुल्म को ज़ुल्म कहा और क़त्ल को क़त्ल कहा, फिर चाहे वह उसका दोष पुलिस के सिर हो या खालिस्तानियों के. उनकी कहानी को पढ़े, समझे और देखे बिना पंजाब के उस दौर को समझना मुश्किल है.
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