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चंपत कटै, मिटै सब पीरा: अयोध्या में आरएसएस की आंख-नाक-कान
1990 में जब लालकृष्ण आडवाणी पहली दफा सोमनाथ से अयोध्या की रथयात्रा पर निकले थे, लेकिन वह यात्रा बीच में ही खत्म हो गई थी. क्योंकि समस्तीपुर में लालू यादव की सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था. उस वक्त एक नाम तेजी से चर्चा में आया था- अशोक सिंघल. सिंहल विश्व हिंदू परिषद के महासचिव थे. उन्होंने आडवाणी की गिरफ्तारी के बावजूद छुपते-छुपाते अयोध्या पहुंच कर निर्धारित स्थल पर शिलापूजन किया था. इससे उन्हें काफी ख्याति मिली थी. उस समय सिंहल के एक युवा सहयोगी हुआ करते थे चंपत राय बसंल. सिंहल की वरदहस्त में बसंल लगातार विश्व हिंदू परिषद में महत्वपूर्ण बने रहे. जानकारों का कहना है कि सिंहल और बंसल दोनों का एक ही जाति (बनिया) से होना इसकी बड़ी वजह रहा. बहुतों को यह जानकारी भी किसी धक्के सी लगी है कि चंपत राय दरअसल पारंपरिक राय (भूमिहार) नहीं बल्कि बनिया हैं.
वही चंपत राय इन दिनों राम मंदिर के चढ़ावे की कथित चोरी के आरोपों से घिरे हुए हैं. कानूनी लड़ाई से आगे जब अयोध्या में मंदिर निर्माण की राह खुली तब चंपत राय बेहद ताकतवर शख्सियत के तौर पर उभरे. उनके सिर पर भारत सरकार द्वारा गठित राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव का ताज सजा. चंपत राय का कार्यकाल शुरुआत से ही अक्षमता और घपले घोटालों की चपेट में रहा. पहले जमीन के सौदों में मोटी हेराफेरी, उसके बाद मंदिर निर्माण सामग्री की खरीद फरोख्त में पैसे का अनर्गल लेनदेन और अब चंदे-चढ़ावे की चोरी का आरोप. गौरतलब है कि इन सभी कामों में चंपत राय की भूमिका सीधे तौर पर रेखांकित होती है. यह ऐसी सच्चाई है जिससे करोड़ों हिंदूओं, साधू-संतों, अयोध्यावासियों और हिंदूवादी कार्यकर्ताओं में गहरा गुस्सा गहरा और बेचैनी साफ़ महसूस की जा सकती है. हमारे चार दिनों के अयोध्या प्रवास में यह बात अलग-अलग तरीकों से जाहिर हुई.
बाबरी मस्जिद आंदोलन के समय 22 साल के रहे वीरेंद्र कुमार पांडेय से हमारी मुलाकात सरयू घाट के किनारे आरती के दौरान हुई. कुमार कहते हैं, ‘‘जो व्यक्ति राम मंदिर आंदोलन में पिछलग्गू बनकर रहा. ऐसे रीढ़विहीन शख्स को ट्रस्ट का महासचिव बना दिया गया. जो लोग जेल गए, सालों तक मुकदमा झेला, वो सब भुला दिए गए. विनय कटियार को मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा में भी नहीं बुलाया गया.’’
कुमार के साथ ही करपात्री महाराज भी बैठे हुए थे. वो लंबे समय तक अयोध्या में विश्व हिन्दू परिषद का कामकाज देखते रहे हैं. हमारी बातचीत सुनकर वो हंसते हुए कहते हैं, ‘‘आपने चम्पत राय का वो बयान सुना है जिसमें वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विष्णु का अवतार बताते हैं? जो शख्स मोदी को विष्णु का अवतार बता रहा हो, वो राम का कैसा भक्त होगा? चम्पत राय, अशोक सिंघल के प्रिय थे. वही इसे लेकर आए थे. उनका फाइल लेकर घूमता रहता था. जाति देखकर सिंहल साहब ने इसे आगे बढ़ाया.’’
इसी तरह अयोध्या में सरयू पार स्थित एक आश्रम के महंत मिलते ही हनुमान चलीसा की एक चौपाई की पैरोडी गाते हुए कहते हैं, "चंपत कटै, मिटै सब पीरा. बहुत बदनामी करवा दी चंपत राय ने. उनके लालच ने रामलला को भी बदनाम कर दिया. जब तक ऊपर के लोगों पर कार्रवाई नहीं होगी तब तक हिंदुओं का जो भरोसा टूटा है वह बहाल नहीं होगा." यह टूटा हुआ भरोसा रोजाना आने वाले चंदे में गिरावट में दिख भी रहा है.
एक अंग्रेजी अख़बार के पत्रकार जिन्होंने राम मंदिर आंदोलन को शुरुआती समय से कवर किया है, कहते हैं, ‘‘चंपत राय, आंदोलन के समय क़ानूनी लड़ाइयों के लिए फाइल इकठ्ठा करते थे और हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लेकर जाते थे. इसके अलावा इनकी कोई खास भूमिका थी नहीं. मीडिया को प्रेस ब्रीफ के लिए जब कारसेवकपुरम बुलाया जाता था तब ये पत्रकारों को नाश्ता-पानी करवाते थे. पत्रकारों को जब अशोक सिंघल, प्रवीण तोगड़िया और विनय कटियार जैसे लोगों का बयान नहीं मिलता था तब इनका बयान लेते थे.’’
कारसेवपुरम अयोध्या में वो जगह है जहां वीएचपी का कार्यालय है. यहीं पर चंपत राय बैठते हैं. लंबे समय तक यहीं से राम मंदिर आंदोलन चलाया गया.
विनय कटियार हो या प्रवीण तोगड़िया इन्हें साइड लाइन करने का श्रेय भी लोग चंपत राय को ही देते हैं. करपात्री महराज कहते हैं, “यह शुरू से ही छुपा रुस्तम है. फूट डालने में माहिर है. इसी गुण को इसने आगे बढ़ने का रास्ता बनाया.”
अपनी बेबाक बयानी के लिए जाने जाने वाले विनय कटियार ने शुरुआत में तो चंदा चोरी के मसले पर बात की लेकिन बाद में उन्होंने भी चुप्पी ओढ़ ली. हमने जब विनय कटियार से बात की तो वो थोड़ा बोलते हैं और बहुत कुछ अंदर ही दबा लेते हैं. चम्पत राय का जिक्र आते ही उनकी तल्खी जुबान पर आ जाती है,‘‘अरे उसका क्या नाम ले रहे हो. कब आया वो अयोध्या. जो कमरा मैंने छोड़ा है उसी में रहता था. उसके बारे में बात न करो.’’
इसके बाद कटियार चम्पत राय पर चुप्पी साध लेते हैं. हालांकि, सारे लोग चंपत राय के बारे में नकारात्मक धारणा ही नहीं रखते. कारसेवकपुरम में स्थित चंपत राय के ऑफिस इंचार्ज सुबोध मिश्रा हमसे बातचीत में उत्तेजित होकर कहते हैं, “चंपत राय जी ने 20-20 विनय कटियार पैदा किए हैं. एक होता है नेता और दूसरा होता संगठन. चंपत जी ने संगठन को मज़बूत किया.’’
मिश्रा पलट कर मुझसे ही सवाल पूछते हैं- “हिन्दू समाज में संत क्या होता है? बार-बार यहीं सवाल दोहराने पर मैंने कहा संत वो जो सत्य के मार्ग पर चले, प्रेम, भाईचारा और शांति की बात करे. इस पर मिश्रा कहते हैं, ‘‘चम्पत जी संतों से भी ऊपर हैं. जो गुण एक संत में होना चाहिए उससे कहीं ज़्यादा उनमें हैं.’’
चंपत राय को ‘‘संतों से भी ऊपर’’ बताने वाले मिश्रा मुझे एक कागज थमाते हैं और जुलाई में उनसे मुलाकात कराने का आश्वासन देकर दूसरे कामों में लग जाते हैं. उसी समय मथुरा से आया संघ से जुड़ा एक परिवार राम मंदिर दर्शन के लिए कारसेवकपुरम पहुंचा जाता है. मिश्रा उनके ठहरने की व्यवस्था में जुट जाते हैं. कारसेवकपुरम में संघ, वीएचपी और उनसे जुड़े संगठनों के कार्यकर्ताओं के रहने-खाने की व्यवस्था है, जो आमतौर पर ‘अनुशंसा’ के आधार पर मिलती है.
‘संत’ चम्पत राय और वीएचपी में उनका आगमन
चम्पत राय पश्चिम उत्तर प्रदेश के बिजनौर के रहने वाले हैं. शुरू से ही संघ के प्रति झुकाव रहा है. वीएचपी के मुताबिक, भौतिक विज्ञान में एमएसी करने के बाद इन्होंने 12 सालों तक अध्यापन किया. साल 1981 से पूर्ण रूप से आरएसएस से जुड़ गए.
हालांकि, इससे पहले 1975 में जब इंदिरा गांधी सरकार ने देश में आपातकाल लगाया तो चपत उसमें जेल गए. उनकी गिरफ्तारी को लेकर एक कहानी कही जाती है, ‘‘जब पुलिस चम्पत राय को गिरफ्तार करने पहुंची तो वो क्लास ले रहे थे. उन्होंने पुलिस को बोला कि अपनी कक्षा पूरी करेंगे और उसके बाद स्वयं थाने पहुंच जाएंगे. और उन्होंने ऐसा ही किया.’’
18 महीने तक जेल में रहने के बाद जब राय बाहर आए तो नौकरी छोड़कर संघ से जुड़ गए. 1981 से संघ में देहरादून के जिला प्रचारक बने. जहां 1984 तक रहे. इसके बाद एक साल के लिए सहारनपुर में जिला प्रचारक रहे. उसके बाद फिर एक साल के लिए मेरठ जिला प्रचारक रहे. 1986 में विश्व हिन्दू परिषद ने उन्हें पश्चिमी यूपी का प्रान्त संगठन मंत्री बनाया जहां ये सितंबर 1991 तक रहे. तब ये आगरा में बैठते थे. यह वहीं समय था जब राम मंदिर आंदोलन अपने उरूज पर था. अयोध्या में कारसेवकों का आना जारी हो चुका था. लाल कृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अपनी रथ यात्रा शुरू कर दी थी.
इसी बीच चंपत राय को अयोध्या भेजा गया. यहां अक्टूबर 1991 से दिसंबर 1995 तक सह क्षेत्र (उप्र) संगठन मंत्री रहे. दिसंबर 2011 में महामंत्री बने और अप्रैल 2018 से विश्व हिन्दू परिषद के उपाध्यक्ष के पद पर हैं.
1964 में स्थापना के बाद विश्व हिन्दू परिषद में पहली बार 2018 में अध्यक्ष पद के लिए चुनाव हुआ. इससे पहले अध्यक्ष का चयन आम सहमति से होता था. 2018 में संगठन के भीतर सहमति न बनने और प्रवीण तोगड़िया तथा विरोधी खेमों के बीच मतभेद बढ़ने के कारण मतदान कराया गया, जिसमें विष्णु सदाशिव कोकजे अध्यक्ष चुने गए. इसके बाद विष्णु सदाशिव कोकजे के साथ चंपत राय उपाध्यक्ष बने. ऐसे में माना जाता है कि राय, तोगड़िया के खिलाफ थे. इस चुनाव के बाद से प्रवीण तोगड़िया राजनीतिक और सामाजिक जीवन से गायब ही हो गए.
कुछ लोगों का मानना है कि यह सब नरेंद्र मोदी के बढ़ते प्रभाव की वजह से हुआ. दरअसल नरेंद्र मोदी और प्रवीण तोगड़िया के बीच लम्बे समय से राजनीतिक मतभेद रहे हैं. 2018 के शुरूआती महीने में तोगड़िया ने नरेंद्र मोदी पर आरोप भी लगाया था. तोगड़िया ने कहा कि गुजरात पुलिस उन्हें परेशान कर रही है और इसके पीछे दिल्ली के ‘‘राजनीतिक आकाओं’’ का हाथ है. उन्होंने मोदी का नाम लेते हुए पूछा कि संबंधित पुलिस अधिकारी की प्रधानमंत्री से कितनी बार बात हुई, उसके कॉल रिकॉर्ड सार्वजनिक किए जाएं.
क्या प्रवीण तोगड़िया को विहिप से अलग करने में चंपत राय की भूमिका थी. चुनाव के समय राय विरोधी पक्ष के साथ थे. इस सवाल पर तोगड़िया कहते हैं- आप जो कह रहे हैं वो सही बात है.
सिर्फ प्रवीण तोगड़िया ही नहीं. राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख चेहरा और बजरंग दल के संस्थापक विनय कटियार को भी अलग-थलग करने में राय की भूमिका रही है. इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि कटियार और चम्पत राय के बीच तीखी बहस हुई थी. इस बहस का कारण क्या था इस पर बात करने से विनय कटियार साफ इनकार कर देते हैं.
यहीं नहीं बाबरी मस्जिद गिरने के कारण अपनी सरकार गंवाने वाले बीजेपी के वरिष्ठ नेता कल्याण सिंह को 5 अगस्त 2020 को भूमि पूजन में बुलाया गया था. वो इसमें शामिल होने के लिए अयोध्या आए भी गए थे. यहां के पंचशील होटल में रुके थे. उन्होंने विनय कटियार को मिलने के लिए बुलाया. वो मिलने के लिए निकले ही थे कि सिंह का फोन आया कि कटियार जी आप ना आएं. मुझे वापस जाने के लिए बोला गया है.
उस वक़्त विनय कटियार के साथ मौजूद रहे शख्स ने बताया कि कल्याण सिंह के वापस जाने के बाद विनय कटियार भी नहीं गए. उमा भारती को भी मना किया गया. लेकिन उमा भारती ने ऐलान किया कि वो सरयू के घाट पर बैठेंगी. ट्रस्ट को लगा कि अगर ऐसा हुआ तो बड़ी किरकिरी हो जाएगी. ऐसे में उन्हें बुलाकर कोने में बैठा दिया गया. इस कार्यक्रम में लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को भी नहीं बुलाया गया था. इसके पक्ष में तर्क दिया गया कि कोरोना के कारण ऐसा किया गया.
एक वरिष्ठ हिंदूवादी नेता ने बताया कि दिल्ली के इशारे पर चंपत राय ने यह सारा काम किया.
अब चम्पत राय एक ऐसी मुसीबत हैं जो खुद के ही ‘संघर्ष’ पर दाग बन चुके हैं. हनुमानगढ़ी के महंत धरमदास कहते हैं, ‘‘चम्पत आरएसएस का आदमी है. यहां जितने मंदिर हैं सब आरएसएस के लोग चला रहे हैं. ये लोग लूट रहे हैं. मंदिर में चोर भी पाप कटाने के लिए दान करता है लेकिन इन्होंने उसमें से भी चोरी कर ली.’’
पहले भी लगा आरोप
चम्पत राय वर्तमान में चंदा चोरी के आरोपों में घिरे हैं. लेकिन ये उनपर या वीएचपी पर पहला आरोप नहीं है. वीएचपी पर पहले भी हिसाब किताब ठीक नहीं रखने का आरोप लगा है. एकबार तो चम्पत राय भी इसको लेकर सवालों में रहे हैं.
शिवसेना के नेता रहे और बाबरी मस्जिद तोड़ने के लिए गुंबद पर जो भीड़ चढ़ी थी, उसमें से एक संतोष दुबे भी थे. दुबे बताते हैं कि देशभर से श्रद्धालुओं ने सोने, चांदी और हीरे से निर्मित राम-शिलाएं अयोध्या भेजी थीं. उनका दावा है कि ये शिलाएं 2002 में रहस्यमय ढंग से गायब हो गईं. ये शिलाएं तीन दरवाजों के बीच सुरक्षित रखी गई थीं, इसलिए उनका मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में शिलाओं का गायब होना किसी एक दिन की घटना नहीं हो सकती.
राम-जन्मभूमि न्यास के प्रमुख महंत परमहंस रामचंद्र दास जब एक दिन उन शिलाओं को देखने पहुंचे, तो वे वहां मौजूद नहीं थीं. दुबे के अनुसार, इन शिलाओं की प्राण-प्रतिष्ठा हो चुकी थी और धार्मिक मान्यता के अनुसार प्राण-प्रतिष्ठित वस्तु में ईश्वर का वास माना जाता है. शिलाओं के गायब होने की जानकारी मिलने पर रामचंद्र दास बेहद आक्रोशित हो गए. उन्होंने मामले की जानकारी लेनी शुरू की और इस दौरान चम्पत राय पर भी नाराजगी जताई.
दुबे का कहना है कि राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे तथा सुल्तानपुर से सांसद रह चुके विश्वनाथ दास शास्त्री ने भी इसी घटना के बाद विश्व हिन्दू परिषद से अपना संबंध समाप्त कर लिया था. वहीं महंत अवैद्यनाथ, जो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने योगी आदित्यनाथ के गुरु थे, भी इस घटना से नाराज हुए थे. दुबे के अनुसार, उन्होंने परमहंसजी से कहा था कि इस मामले में मुकदमा दर्ज कराया जाना चाहिए.
दुबे बताते हैं, “महंत रामचंद्र दास परमहंस ने करीब तीन महीने तक मुकदमा दर्ज कराने के लिए प्रयास किए, लेकिन उनकी शिकायत पर एफआईआर दर्ज नहीं हुई. बाद में उन्होंने मुझसे मदद मांगी.” दुबे के अनुसार, उन्होंने भी लगभग दस दिनों तक कोशिश की, लेकिन वे भी मुकदमा दर्ज कराने में सफल नहीं हो सके.
जब हमने पूछा कि उस वक़्त तो अशोक सिंघल जीवित थे. उन्होंने क्या किया- इसपर दुबे कहते हैं, ‘‘सिंहल जी भी नाराज़ हुए लेकिन कुछ कर नहीं पाए. उनके हाथ से तीर निकल गया था. मैंने खुद ही दिगंबर अखाड़े में इसको लेकर उनसे पूछा था. तो उनका जवाब था, संतोष इसमें हिन्दू समाज की बदनामी के सिवा कुछ नहीं.’’
करपात्री महराज एक बड़ी बात कहते हैं, ‘‘रामचंद्र दास परमहंस जी को चम्पत राय पर पहले से ही शक था. अक्सर वो हम लोगों से कहा करते थे कि बेटा निगरानी रखना क्योंकि जो शिलायें और धन आ रहा है वो चम्पत राय ही रख रहा है. लेकिन वीएचपी वालों ने कभी भी मंदिर आंदोलन के समय मिले चंदे का हिसाब-किताब नहीं दिया.’’
जमीन विवाद
श्रीवास्तव कहते हैं, ‘‘मैं चम्पत राय को बीते 30 सालों से देख रहा हूं. ट्रस्ट में ज़्यादातर यस-मैन लोगों को रखा गया. अनिल मिश्रा की राम मंदिर में क्या भूमिका थी. उनके पास एक गाड़ी हुआ करती थी. संघ के लोग अयोध्या आते तो उसमें घुमाया करते थे. ट्रस्ट के अध्यक्ष लम्बे अरसे से बीमार हैं. निर्मोही अखाड़े वालों को कोई लेना देना नहीं है. दूसरे अन्य ट्रस्टी भी यहां कभी कभार ही आते है. यहीं दो लोग (चंपत राय और अनिल मिश्रा) ट्रस्ट को चलाते हैं.’’
श्रीवास्तव की बात में काफी हद तक सच्चाई है. न्यूज़लॉन्ड्री ने 2021 के जून महीने में अयोध्या में ट्रस्ट द्वारा जमीन खरीदने के मामले को लेकर रिपोर्ट किया, तब भी यही दोनों लोग आरोपों के घेरे में थे.
न्यूज़लॉन्ड्री ने तब पाया था कि ट्रस्ट सस्ती दरों की जमीन महंगी कीमत में खरीद रहा था. एक मामले में तो तब स्थानीय मेयर और बीजेपी नेता ऋषिकेश उपाध्याय के भांजे दीपनारायण ने एक जमीन 20 लाख में खरीदी थी. इस खरीद में अनिल मिश्रा गवाह थे. उसी जमीन को तीन महीने बाद ट्रस्ट की तरफ से चंपत राय ने खरीद लिया तीन गुणा ज्यादा रकम देकर. इस खरीद में भी अनिल मिश्रा ही गवाह थे.
आगे सामने आया कि यह नजूल यानी सरकारी जमीन थी. जिसे बिना फ्री-होल्ड कराये खरीद-बिक्री नहीं की जा सकती है.
एक तरफ यूपी सरकार, जिन इलाकों में सर्किल दर से चार गुणा कीमत पर किसानों की जमीन खरीद रही थी उसी इलाके में ट्रस्ट 9 करोड़ की जमीन को 55 करोड़ में ख़रीदा.
ट्रस्ट की तरफ से जमीन की खरीद चम्पत राय ही कर रहे थे. सभी दस्तावेजों में खरीदार के रूप में उनका ही नाम दर्ज है. 2021 में जब जमीन में घोटाले का मामला सामने आया था तब न्यूज़लॉन्ड्री ने अलग-अलग ट्रस्टियों से बात की थी. तब भाजपा नेता और ट्रस्ट सदस्य कामेश्वर चौपाल ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया था कि फरवरी 2020 की ट्रस्ट की पहली बैठक में मंदिर निर्माण के लिए अतिरिक्त जमीन खरीदने का प्रस्ताव आया था. इसके लिए चंपत राय, अनिल मिश्रा, दीनेंद्र दास, विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र और नृत्यगोपाल दास की पांच सदस्यीय समिति बनाई गई, जिसे जमीन खरीदने और ट्रस्ट को इसकी जानकारी देने की जिम्मेदारी सौंपी गई.
हालांकि, ट्रस्ट के सदस्यों ने हमें बताया था कि चंपत राय और अनिल मिश्रा के अलावा बाकी सदस्यों को न तो जमीन खरीद की जानकारी दी गई, न कीमत बताई गई और न ही उनसे कोई सलाह ली गई. उनके अनुसार, इस पांच सदस्यीय समिति की कभी बैठक भी नहीं हुई.
विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र और कामेश्वर चौपाल अब इस दुनिया में नहीं है. अयोध्या में ट्रस्ट द्वारा की गई जमीन की खरीद पर न्यूज़लॉन्ड्री ने विस्तार से रिपोर्ट की है.
जमीन खरीद का मामला हो या मंदिर से जुड़े अन्य मामले, चम्पत राय और अनिल मिश्रा की जोड़ी सब कुछ संभालती थी. अनिल मिश्रा और उनकी पत्नी उषा मिश्रा ही राम मंदिर के उद्घाटन के समय इसके प्रमुख यजमान बने थे.
जमीनों की खरीद में हुई इस गड़बड़ी की जांच के लिए प्रदेश सरकार ने तब राधे श्याम शर्मा कमेटी का गठन किया था लेकिन आज तक उसकी रिपोर्ट सामने नहीं आई है. उनपर कोई कार्रवाई भी नहीं हुई.
राम मंदिर के निर्माण की घोषणा के बाद से वीएचपी ने चंदा इकठ्ठा शुरू कर दिया. अलग-अलग मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक फरवरी 2020 से नवंबर 2025 तक ट्रस्ट को लगभग 4,575 करोड़ का दान मिला.
इन पैसों को कब कितना खर्च किया गया इसको लेकर ट्रस्ट के लोगों को कभी-कभी जवाब दिया जाता था. एक ट्रस्टी ने हमें बताया कि सिर्फ ख़र्च बता दिया जाता है. लेकिन कहां, कैसे और क्यों खर्च हुआ यह ना वो बताते हैं और न ही कोई जानना चाहता है.
जमीन खरीद में राम मंदिर ट्रस्ट और चंपत राय ने हर तिकड़म का इस्तेमाल किया. अयोध्या में आनंद भवन नाम का एक मंदिर है. उसमें बस्ती के रहने वाले तीन पाठक भाइयों की हिस्सेदारी थी. लेकिन एक ही भाई, रमाकांत पाठक से जमीन खरीद लिया गया. जबकि इस मामले में एक हिस्सेदार ने अदालत में आपत्ति लगा रखी थी.
इस मामले के शिकायतकर्ता दिनेश पाठक बताते हैं, “कहीं से मुझे पता चल गया था कि मंदिर ट्रस्ट खरीदने वाला है. ऐसे में 19 सितंबर 2024 को मैंने आपत्ति लगा दी. इस आपत्ति की जानकारी ईमेल करके ट्रस्ट को भी भेजी थी. बावजूद इसके दो दिन बाद 21 सितंबर को ट्रस्ट की तरफ से चंपत राय ने 6 करोड़ में उसे लिखवा लिया.”
पाठक कहते हैं, ‘‘आपत्ति होने के बाद भी ट्रस्ट ने जमीन लिखा ली. अब उस पर उनका कब्ज़ा भी है. शायद उनको लगा होगा कि जो होगा देख लेंगे. लेकिन हम अपना हक़ कैसे छोड़ सकते हैं.’’
यह इकलौता मामला नहीं है. राम मंदिर से पांच सौ मीटर की दूरी पर राम निवास मंदिर है. इसे भी छल से चम्पत राय के जरिए ट्रस्ट ने खरीद लिया. इसके मालिक हरिशंकर सफरीवाला ने हमें बताया कि जमीन के असली मालिक की जगह वहां नियुक्त पुजारियों से 15 बीघा जमीन ट्रस्ट ने अपने नाम करा ली. जमीन की खरीद के दस्तावेज के मुताबिक ‘बैनामा बिला कब्ज़ा’ इस जमीन की रकम 5.80 करोड़ तय हुई, जिसमें से 60 लाख दे दिया गया.
इस जमीन के खरीद के जो कागज हैं, उनमें बताया गया है कि इसको लेकर अलग-अलग न्यायालयों में विवाद लंबित हैं. बावजूद इसके ट्रस्ट ने विवादित जमीन खरीद ली.
इस जमीन के असली मालिक होने का दावा करने वाले सफरीवाला कहते हैं, ‘‘इस मंदिर को पुजारी बेच ही नहीं सकते हैं. इसे बेचने का अधिकार उन्हें था ही नहीं लेकिन ट्रस्ट ने जबरदस्ती करके जमीन अपने नाम करा ली और कब्ज़ा कर लिया.’’
ट्रस्ट द्वारा जमीन खरीद की जांच के लिए बने कमेटी ने आज तक अपनी रिपोर्ट नहीं सौंपी है.
चम्पत राय का कुर्ता
राम मंदिर एक राजनीतिक अखाड़े से बना धर्म स्थल है. इसको लेकर सालों तक क़ानूनी लड़ाई हुई. हिंसा हुई. देशभर में दंगे हुए. इन दंगों में सैकड़ों लोगों की जाने गई. राम मंदिर की यात्रा ने भारतीय समाज में हिन्दू-मुस्लिम की खाई को और गहरा कर दिया.
लेकिन इसी आंदोलन के एक ‘सिपाही’ रहे चम्पत राय बताते हैं कि उनका कुर्ता अयोध्या के मुसलमान सिलते हैं.
दिसंबर 2025 के कानपुर में दिए अपने भाषण में राय ने कहा, ‘‘अयोध्या में तीन हज़ार मंदिरों में भगवान के कपड़े सिलने वाले मुसलमान हैं. मेरे सारे कपड़े मुसलमान सिलते हैं. यहां मुसलमान की एक दुकान है. उसके यहां कपड़े दे आओ कि चम्पत राय का है तो नाप देने की भी ज़रूरत नहीं पड़ती है.’’
हालांकि, अब चम्पत राय एक ऐसी मुसीबत हैं जो खुद के ही ‘संघर्ष’ पर दाग बन चुके हैं. हनुमानगढ़ी के महंत धरमदास कहते हैं, ‘‘चम्पत आरएसएस का आदमी है. यहां जितने मंदिर हैं सब आरएसएस के लोग चला रहे हैं. ये लोग लूट रहे हैं. मंदिर में चोर भी पाप कटाने के लिए दान करता है लेकिन इन्होंने उसमें से भी चोरी कर ली.’’
चम्पत राय फिलहाल ट्रस्ट से इस्तीफा दे चुके हैं. उनके साथ अनिल मिश्रा ने भी इस्तीफा दे दिया है. यह राम के नाम हुई धोखाधड़ी से निपटने का पहला कदम है. अभी ऐसे बहुत से कदमों की जरूरत है, और हमारा अनुभव कहता है कि जहां इस तरह के प्रभावशाली और सियासी लोग शामिल होते हैं वहां न्याय के कदम लड़खड़ा जाते हैं.
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