सीएम मोहन यादव की तस्वीर.
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#MohanYadav: जमीन सौदों के बचाव में जाति-धर्म से लेकर सरकारी काम गिनाते ‘मोहनभक्त’

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव के परिवार के जमीनी सौदों को लेकर मंगलवार सुबह अंग्रेजी दैनिक इंडियन एक्सप्रेस में एक खोजी रिपोर्ट प्रकाशित हुई. रिपोर्ट बताती है कि साल 2023 में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद से उनके परिवार और उनसे जुड़ी रियल एस्टेट कंपनियों ने साल 2025 तक 45 करोड़ के बदले 168 एकड़ जमीन खरीदी है. अगर 2021 से देखें तो कुल ज़मीन 200 एकड़ से ऊपर है. रिपोर्ट की मानें तो यह मामला सीधे तौर जमीनी सौदों और पर हितों के टकराव (कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट) को लेकर सवाल उठाता है. 

इस रिपोर्ट के बाद राजनीतिक गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक मुख्यमंत्री मोहन यादव निशाने पर आए गए. उनकी आलोचना होने लगी. तमाम तरह के आरोप लगने लगे. लेकिन शाम होते-होते एक दिलचस्प चीज देखने को मिली. 

जहां सुबह से सोशल मीडिया पर लोग मोहन यादव को निशाने पर ले रहे थे. वहां शाम होते-होते उनके बचाव में ट्वीट्स आने लगे. कोई कह रहा था कि उनके परिजन पहले से जमीन के कारोबार से जुड़े हैं तो कोई उनके धनवान होने का तर्क दे रहा था. तो कोई धर्म के नाम पर बचाव की कोशिशों में जुट गया तो किसी ने सीधे विपक्षी दल कांग्रेस को ही निशाना बना लिया. 

जाति का कवच-कुंडल

सबसे पहले बात उस जाति की जो हिंदुस्तानियों के दिमाग से जाती ही नहीं. इस मामले में लोगों ने जातिवादी कार्ड निकाला. जैसा कि जैकी यादव ने लिखा, “...मोहन यादव जी कोई गरीब आदमी नहीं हैं, उनके पास बहुत पहले से तगड़ा पैसा है… मोहन यादव जी को उनके यादव होने की वजह से हमेशा टारगेट किया गया है. एक यादव व्यक्ति एक राज्य का CM कैसे बन गया यह बात किसी को कैसे पच सकती है.” जैकी ने जातिवाद का कार्ड तो खेल लिया लेकिन असल सवाल पर कोई जवाब नहीं दिया.   

जैकी ने अपने तर्क को ज्यादा मजबूत करने के लिए सौरभ द्विवेदी के मोहन यादव से इंटरव्यू की एक क्लिप निकाली. जिसमें यादव ने अपने व्यवसायों के बारे में बताया था. 

इंटरव्यू की इसी क्लिप का इस्तेमाल करते हुए अश्विनी यादव ने लिखा, “ये सौरभ जी ही तब जानकारी लिए थे अब दूसरे चैनल पर आकर कुछ और कह रहे हैं किसी जगह विशेष का मुद्दा उठाकर.. पता नहीं क्यों या किसके कहने या किस कारण से कह रहे हैं ये तो वो जाने पर सबको दिख रहा है कि डॉ० यादव सपन्न परिवार थे और अब मुख्यमंत्री बनने के बाद खटकने लगे हैं सबकी आंखों में…” 

बताते चलें कि सौरभ ने यह इंटरव्यू लल्लनटॉप में रहते हुए किया था. जो कि 2 मार्च, 2024 को यूट्यूब पर पब्लिश हुआ था. लेकिन आज इंडियन एक्सप्रेस की खोजी रिपोर्ट रिपोर्टर जय मजूमदार की है, न कि सौरभ की. सौरभ ने उस रिपोर्ट पर हिंदी के लिए वीडियो जरूर बनाया है. 

कुछ ने तो रिपोर्टर जय मजूदमदार को लेकर भी जातिवादी तर्क का इस्तेमाल कर दिया. जैसे कि अभिषेक यादव नामक एक यूजर ने लिखा, “इंडियन एक्सप्रेस के जिस पत्रकार ने रिपोर्टिंग किया है उसकी जाति जरूर पता करना चाहिए. उसके जाति में है, बहुजन समाज के खिलाफ नफरत रहता है.” 

‘धर्म पर हमले’ वाला बचाव 

जाति के बाद इस देश की दूसरी सच्चाई है धर्म की आड़. यहां भी कुछ ऐसा ही हुआ. सत्ता समर्थक कई सोशल मीडिया हैंडल्स की दलील थी कि 2 साल बाद होने वाले सिहंस्थ कुंभ और उज्जैन के धार्मिक नगरी होने के चलते मुख्यमंत्री यादव को निशाना बनाया गया है. 

प्रमुख दक्षिणपंथी हैंडल मिस्टर सिन्हा ने ट्वीट किया कि ये संपत्तियां “न तो गुप्त हैं और न ही नई” और इनकी जानकारी पहले से ही राज्य के संपदा प्रॉपर्टी ऐप पर दर्ज है. उन्होंने लिखा, “मोहन यादव और उनका परिवार दशकों से रियल एस्टेट कारोबार में है... दिलचस्प बात इसकी टाइमिंग है... पूरा इकोसिस्टम हर बड़े हिंदू तीर्थस्थल को विवाद और भ्रष्टाचार से जोड़ने की कहानी गढ़ने की कोशिश कर रहा है.”

ध्यान दीजिए कि कैसे एक मुख्यमंत्री के परिवार के कथित भूमि अधिग्रहण की खबर को तुरंत धार्मिक भावनाओं से जोड़ दिया गया. उज्जैन के प्रसिद्ध महाकाल मंदिर का संदर्भ लाकर, सिन्हा ने हितों के टकराव के सवाल को सीधे ‘हिंदू-विरोधी साजिश’ का चोला ओढ़ाने की कोशिश की. 

लगभग शब्द-दर-शब्द यही तर्क एक अन्य बड़े हैंडल स्ट्रिंग रिवील्स ने भी दोहराया. उसने लिखा, “एक और दिन, कांग्रेस का एक और गढ़ा हुआ नैरेटिव... महाकाल को इस बहस में घसीटकर और उसकी तुलना अयोध्या से करके, बड़े हिंदू तीर्थस्थलों को विवाद और भ्रष्टाचार से जोड़ने की स्पष्ट कोशिश की जा रही है.”

इसके बाद स्ट्रिंग रिवील्स ने आईटी सेल के दूसरे पसंदीदा हथियार ‘व्हाटअबाउटरी” यानि मुद्दे से भटकाने का पासा फेंका. उसने लिखा, “अब तथ्यों की बात करते हैं. कमलनाथ के पास करीब 800 करोड़ रुपये की संपत्ति और 100 एकड़ से अधिक जमीन है. फिर उस पर कोई आक्रोश क्यों नहीं?” गौर कीजिए इस तर्क में यह सवाल पूरी तरह गायब था कि एक मौजूदा मुख्यमंत्री के परिवार ने हाल में घोषित सरकारी योजनाओं के आसपास जमीन क्यों और कैसे खरीदी.

‘टूलकिट’ का सामूहिक शोर

मोहनभक्तों ने बचाव के लिए कोई हथकंडा नहीं छोड़ा. जाति और धर्म के अलावा उन्होंने सवाल उठाने वालों पर ही सवाल करना शुरु कर दिया. दरअसल, एक्स्प्रेस की रिपोर्ट को लेकर जब कांग्रेस ने सवाल उठाने शुरू किए तो जवाबी कार्रवाई में कई प्रभावशाली अकाउंट सक्रिय हो गए. 

मेघ अपडेट्स, देसी मोजिटो और भीखू म्हात्रे जैसे बड़े फॉलोअर बेस वाले अकाउंट्स ने भी सत्ता समर्थक इकोसिस्टम का सबसे लोकप्रिय शब्द “टूलकिट” निकाल लिया.

देसी मोजिटो ने बड़े अक्षरों में लिखा, “फेक न्यूज के साथ टूलकिट एक्टिवेट हो गई है... सुबह से कई लेफ्ट-विंग अकाउंट्स एक ही तस्वीर पोस्ट कर रहे हैं. वजह यह है कि उज्जैन में अभूतपूर्व विकास कार्य और सिंहस्थ-2028 की ऐतिहासिक तैयारियां चल रही हैं. यही कारण है कि पूरा इकोसिस्टम घबराया हुआ है.”

भिकू म्हात्रे ने भी लगभग यही बात दोहराई, “फेक न्यूज टूलकिट फिर सक्रिय हो गई है... मध्य प्रदेश में कैबिनेट फेरबदल चल रहा है. वे जमीनी विकास को रोक नहीं सकते, इसलिए मीडिया ट्रायल चला रहे हैं.”

ये लोग भी अपने तर्कों को और मजबूत करने के लिए सौरभ के इंटरव्यू की उसी क्लिप को भी शेयर करने. 

तथ्यों के जवाब में कुतर्क

खोजी रिपोर्ट से उठे अहम सवाल को छोड़कर मुख्यमंत्री और उनके परिवार के जमीनी सौदों के बचाव में तमाम तरह के तर्क गढ़े गए. कुछ लोगों ने जब इन कुतर्कों का जवाब तथ्यों से देने की कोशिश की और #FactsOverPropganda के साथ कुछ ट्वीट कर दिए तो वहां भी सीएम के बचाव में लोग उतर आए. यहां सीएम के जमीनी सौदों का बचाव उनकी जिम्मेदारियों और प्रदेश के लिए किए कामों से होने लगा. 

जैसे कि संदीप पाठक नामक एक यूजर ने लिखा, “डॉ मोहन यादव सरकार का बड़ा कदम. एमपी में 16000 वर्ग किमी से नए युग की शुरुआत हो रही है. यह विकसित भारत 2047 के रोडमैप को साकार करेगा.”  इसके बाद उन्होंने सीएम मोहन यादव का एक्स अकाउंट मेंशन करते हैशटैग #FactsOverPropaganda का इस्तेमाल किया. लेकिन दिलचस्प बात ये है कि जो ग्राफिक्स उन्होंने इस ट्वीट के साथ इस्तेमाल किया वह पशुपालकों के लिए मध्य प्रदेश सरकार ने क्या फैसले लिए हैं, उस पर बात कर रहा था.  

इसी तरह एक अन्य यूजर आशना ने लिखा, “पर्यावरण सुरक्षा के लिए डॉ मोहन यादव सरकार की ब्लू ग्रीन डेवलपमेंट नीति. नर्मदा नदी और वन क्षेत्रों के पास निर्माण पर कड़ा प्रतिबंध रहेगा.” इन्होंने ने भी सीएम मोहन यादव का एक्स अकाउंट मेंशन करते हुए #FactsOverPropaganda का इस्तेमाल किया. लेकिन इनका ट्वीट भी तथ्य कुछ बता रहा था और ग्राफिक्स में इन्होंने बताया कि कैसे मध्यप्रदेश सरकार के प्रयासों से नवजात शिशुओं की डिस्चार्ज दर बढ़ रही है, जिससे नवजात और मातृ स्वास्थ्य के संकेतकों में सुधार हो रहा है. 

इसी तरह विकास पाठक नाम के एक यूजर ने लिखा, “मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के नेतृत्व में UIMR परियोजना विकास की नई कहानी लिख रही है. 6 जिलों, 38 तहसीलों और 2781 गांवों तक आधुनिक सुविधाएं पहुंचाकर सवा करोड़ लोगों के जीवन में बदलाव लाने का लक्ष्य सराहनीय है.” 

लेकिन विकास भी वही गलती या पैटर्न दोहराते दिखे. उनके ट्वीट में भी हैशटैग और सीएम को टैग किया गया था लेकिन ग्राफिक्स यहां भी कुछ और ही कह रहा था. विकास का ग्राफिक्स बता रहा है कि कैसे मध्य प्रदेश के बजट में 4 हजार करोड़ से ज्यादा का प्रावधान हुआ है और मई, 2026 तक 83 लाख घरों तक नल से जल पहुंच चुका है. 

इसी तरह #FactsOverPropaganda हैशटैग पर तमाम ऐसे पोस्ट्स आसानी से देखे जा सकते थे, जिनका मकसद मानो बस किसी तरह ये बताना था कि कैसे मुख्यमंत्री मोहन यादव और उनकी सरकार मध्य प्रदेश के विकास के लिए बड़े-बड़े कदम उठा रही है. 

अपने तर्क को मजबूती देने के लिए ज्यादातर लोगों ने प्रस्तावित उज्जैन-इंदौर मेट्रोपॉलिटन रीज़न परियोजना (यूआईएमआर) का जिक्र किया. मालूम हो कि इस परियोजना के तहत लगभग 16 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले विशाल मेट्रोपॉलिटन एरिया का प्रस्ताव तैयार किया गया है. इसमें इंदौर, उज्जैन, देवास, धार, शाजापुर और रतलाम जिलों की 38 तहसीलों तथा 2781 गांवों को शामिल किया गया है. 

वैसे एक्सप्रेस की रिपोर्ट भी इसी बात की ओर इशारा कर रही है कि मोहन यादव और उनके परिवार के जमीनी सौदे ज्यादातर वहां हैं, जहां या तो कोई नया प्रोजेक्ट घोषित हुआ है या होने वाला है या फिर चल रहा है. जो कि सीधे तौर पर ये सवाल उठाता है कि क्या सरकार में रहते हुए इस जानकारी का लाभ जमीन की खरीद के जरिए लिया गया. 

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