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‘लव जिहाद’ का मामला बताया, आलोचना हुई तो ज़ी न्यूज़ ने कहा- हम सिर्फ़ दोनों पक्ष दिखा रहे थे
न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग एंड डिजिटल स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी (एनबीडीएसए) ने एक महिला की सहमति से हुई शादी को सांप्रदायिक साजिश के रूप में पेश करने पर ज़ी न्यूज़ पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है.
28 मई 2026 को एनबीडीएसए के अध्यक्ष और रिटायर्ड जस्टिस ए.के. सीकरी ने अपने आदेश में कहा कि चैनल ने उपलब्ध तथ्यों की अनदेखी करते हुए प्रसारण किया. यह मामला गाज़ियाबाद के इंदिरापुरम क्षेत्र की रहने वाली सोनिका और उनके पति अकबर से जुड़ा है.
इस मामले में उत्कर्ष मिश्रा द्वारा 11 जून 2025 को शिकायत दायर की गई थी. शिकायत के मुताबिक, ज़ी न्यूज़ ने 26 और 27 मई 2025 को प्रसारित अपने कार्यक्रमों में इस विवाह को कथित ‘लव जिहाद’ और सांप्रदायिक षड्यंत्र के तौर पर पेश किया.
हालांकि, सोनिका ने स्वयं एक वीडियो जारी कर स्पष्ट किया था कि उन्होंने अपनी इच्छा से अकबर से शादी की है और वह अपने पति के साथ जा रही हैं. वहीं पुलिस का भी कहना था कि कार्रवाई केवल लड़की के परिवार द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर और उससे जुड़ी जांच के आधार पर की गई थी.
एनबीडीएसए ने पाया कि इन तथ्यों के बावजूद चैनल ने अपने प्रसारण में ऐसे दावे और प्रस्तुतिकरण किए, जिनसे यह आभास हुआ कि मामला किसी सांप्रदायिक साजिश से जुड़ा है. प्राधिकरण ने इसे पत्रकारिता के मानकों और निष्पक्ष रिपोर्टिंग के सिद्धांतों के विपरीत माना.
इसके बाद एनबीडीएसए ने ज़ी न्यूज़ पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया और प्रसारण संबंधी दिशानिर्देशों का पालन करने की नसीहत दी.
सहमति की शादी को बना दिया ‘लव जिहाद’
एनबीडीएसए के आदेश में ज़ी न्यूज़ के उन प्रसारणों का भी उल्लेख है, जिनमें मामले को लगातार ‘लव जिहाद’ के रूप में पेश किया गया. चैनल पर चलने वाले टिकर्स में “लव जिहाद करके फंस गए भाईजान”, “भाईजान को महंगा पड़ा लव जिहाद”, “हिंदू लड़की के पीछ अकबर”, “लव जिहाद पहचान छिपाकर?”, “पड़ोस में दुकान… लव जिहाद को दिया अंजाम” और “लव जिहाद का मामला... योगी फोर्स लेगी फैसला” जैसे संदेश प्रसारित किए गए.
कार्यक्रमों के शीर्षक भी इसी तरह के थे. इनमें “यूपी लव जिहाद केस: लव जिहाद मामला! पीड़िता ने बताया पूरा सच!” और “गाजियाबाद लव जिहाद केस: गाज़ियाबाद में धर्म के धोखे पर बवाल बेहिसाब!” जैसे शीर्षक शामिल थे.
प्रसारण के दौरान एक वॉइसओवर में कहा गया, “यूपी के गाज़ियाबाद में मुस्लिम लड़के को लव जिहाद करना भारी पड़ गया”, जबकि दूसरे हिस्से में दावा किया गया कि “हिंदुओं के खिलाफ इस जिहादी साज़िश का पर्दाफाश होना चाहिए.” इस तरह की भाषा ने मामले को एक सांप्रदायिक षड्यंत्र के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि उपलब्ध तथ्यों से ऐसी कोई पुष्टि नहीं होती थी.
महत्वपूर्ण बात यह रही कि इन्हीं प्रसारणों में चैनल ने सोनिका का वह वीडियो भी दिखाया, जिसमें वह साफ़ तौर पर कह रही थीं कि उन्होंने अपनी इच्छा से शादी की है और वह अपने पति के साथ जा रही हैं. सोनिका ने वीडियो में कहा था, “मैं अपनी मर्ज़ी से अपने पति के साथ यहां से जा रही हूं.”
एनबीडीएसए ने माना कि महिला के स्पष्ट बयान के बावजूद मामले को “लव जिहाद” और “जिहादी साज़िश” जैसे शब्दों के जरिए पेश करना निष्पक्ष और जिम्मेदार पत्रकारिता के मानकों के अनुरूप नहीं था. इसी आधार पर प्राधिकरण ने ज़ी न्यूज़ पर एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया.
एनबीडीएसए के सामने बदला सुर, लेकिन प्रसारण से नहीं मिला दावा
एनबीडीएसए के समक्ष सुनवाई के दौरान ज़ी मीडिया कॉरपोरेशन लिमिटेड ने अपनी रिपोर्टिंग का बचाव करते हुए दावा किया कि उसकी कवरेज “सिर्फ़ तथ्यों के वर्णन तक सीमित थी” और उसका “मामले को सनसनीखेज़, सांप्रदायिक या पूर्वाग्रहपूर्ण बनाने का कोई इरादा नहीं था.”
चैनल ने यह भी तर्क दिया कि “लव जिहाद” शब्द का इस्तेमाल स्थानीय लोगों द्वारा किया जा रहा था और उसने केवल इलाके में प्रचलित भाषा और दावों को रिपोर्ट किया. ज़ी न्यूज़ ने यह भी कहा कि उसने सोनिका का वीडियो बयान प्रसारित कर “विभिन्न पक्षों को मंच उपलब्ध कराया” था.
लेकिन एनबीडीएसए के सामने यह दलील चैनल के अपने प्रसारणों से मेल खाती नहीं दिखी. प्रसारण के दौरान चलाए गए टिकर्स और एंकरों की टिप्पणियां केवल स्थानीय लोगों के आरोपों को दोहराने तक सीमित नहीं थीं, बल्कि उन्होंने खुद इस विवाह को “लव जिहाद”, “जिहादी साज़िश” और “लव का जिहादी जाल” जैसे शब्दों के जरिए परिभाषित किया.
चैनल ने यहां तक सवाल उठाया कि क्या इस मामले में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार हस्तक्षेप करेगी. वहीं, वॉइसओवर और प्रस्तुति में विवाह को एक संगठित सांप्रदायिक षड्यंत्र के रूप में चित्रित किया गया.
एनबीडीएसए ने माना कि यदि चैनल केवल स्थानीय लोगों के आरोपों की रिपोर्टिंग कर रहा होता तो उसका बचाव कुछ हद तक स्वीकार्य हो सकता था. लेकिन मामले में एंकरों, वॉइसओवर और संपादकीय प्रस्तुति ने स्वयं इस घटना को “लव जिहाद” और “जिहादी साज़िश” के रूप में स्थापित करने की कोशिश की. यही वजह थी कि प्राधिकरण ने चैनल की दलीलों को पर्याप्त नहीं माना और उसके प्रसारण को पत्रकारिता के मानकों के विपरीत पाया.
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दलील भी नहीं आई काम
सुनवाई के दौरान ज़ी न्यूज़ ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) का हवाला देते हुए तर्क दिया कि शिकायत दरअसल “वैध पत्रकारिता गतिविधियों को दबाने की कोशिश” है. लेकिन एनबीडीएसए इस दलील से सहमत नहीं हुआ.
प्राधिकरण ने स्पष्ट किया कि यदि चैनल ने केवल घटना से जुड़े तथ्यों- जैसे स्थानीय विवाद, तोड़फोड़, पुलिस कार्रवाई या सार्वजनिक प्रतिक्रिया आदि की रिपोर्टिंग की होती, तो उसमें कोई समस्या नहीं थी. लेकिन विवाद रिपोर्टिंग के तथ्यों से नहीं, बल्कि उसकी प्रस्तुति और फ्रेमिंग से पैदा हुआ.
एनबीडीएसए ने अपने आदेश में कहा कि प्रसारण के दौरान चलाए गए टिकर्स और इस्तेमाल की गई भाषा “न केवल अनावश्यक थी, बल्कि बेहद गंभीर और आपत्तिजनक भी थी, खासकर तब जब महिला स्वयं प्रसारण में यह स्पष्ट और असंदिग्ध रूप से कह रही थी कि उसने अपनी इच्छा से विवाह किया है.”
प्राधिकरण ने माना कि इन प्रसारणों के जरिए ज़ी न्यूज़ ने पत्रकारिता के निष्पक्षता, तटस्थता और न्यायसंगतता के सिद्धांतों का उल्लंघन किया. साथ ही, कवरेज धार्मिक सौहार्द और सामाजिक सद्भाव बनाए रखने संबंधी दिशानिर्देशों के भी विपरीत पाई गई.
इसी आधार पर एनबीडीएसए ने चैनल पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया. साथ ही निर्देश दिया कि संबंधित वीडियो और प्रसारण सामग्री को चैनल अपनी वेबसाइट, यूट्यूब और अन्य सभी डिजिटल प्लेटफॉर्म से हटाए. प्राधिकरण ने यह भी कहा कि सभी लिंक और हाइपरलिंक हटाने के बाद सात दिनों के भीतर लिखित रूप से अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए.
भोपाल मामले में भी फटकार
यह पहला अवसर नहीं है जब एनबीडीएसए ने इस तरह की कवरेज पर आपत्ति जताई हो. एक अलग आदेश में प्राधिकरण ने भोपाल के एक कॉलेज में कथित यौन उत्पीड़न के मामले को “जिहाद” के रूप में पेश करने पर कई समाचार चैनलों को फटकार लगाई.
इस मामले में ज़ी न्यूज़ के अलावा न्यूज़18 इंडिया, एनडीटीवी और एबीबी न्यूज़ समेत कई चैनलों को निर्देश दिया गया कि वे संबंधित कार्यक्रमों और वीडियो को एक सप्ताह के भीतर अपने प्लेटफॉर्म से हटा दें.
इन दोनों आदेशों से यह संकेत मिलता है कि एनबीडीएसए ने हाल के वर्षों में सांप्रदायिक कोण जोड़कर की जाने वाली रिपोर्टिंग और तथ्यों से परे जाकर घटनाओं को धार्मिक षड्यंत्र के रूप में पेश करने की प्रवृत्ति पर कड़ा रुख अपनाया है.
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