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दिल्ली हाईकोर्ट ने यूट्यूबर गुलशन पाहुजा को 6 महीने जेल की सज़ा सुनाई
दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को यूट्यूबर गुलशन पहुजा को अदालत की अवमानना का दोषी पाए जाने के मामले में छह महीने जेल और दो हजार रुपये जुर्माने की सज़ा सुनाई है. बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, यह सज़ा अदालत ने पाहुजा के वीडियोज़ में और सुनवाई के दौरान की गई कुछ टिप्पणियों को न्यायपालिका के प्रति बेहद अपमानजनक पाने के बाद सुनाई है.
तीन न्यायिक अधिकारियों ने पाहुजा के यूट्यूब चैनल ‘फाइट फॉर ज्यूडिशियल रिफॉर्म्स’ पर मौजूद कुछ वीडियोज़ की ओर अदालत का ध्यान केंद्रित किया था. रिपोर्ट के अनुसार, इन वीडियोज में पाहुजा दो वकीलों शिव नारायण शर्मा और दीपक सिंह का इंटरव्यू करते हुए दिखाई दे रहे हैं. आरोप है कि इन इंटरव्यू के दौरान उन्होंने जजों और अदालतों के बारे में अपमानजनक टिप्पणियां की थी.
इसके बाद, दोनों वकीलों ने बिना शर्त माफी मांगी और स्पष्ट किया कि उन्होंने इंटरव्यू को ऑनलाइन पोस्ट किए जाने की सहमति नहीं दी थी. साथ ही उन्हें वीडियो में इस्तेमाल किए गए आपत्तिजनक थंबनेल और बैनर के बारे में भी कोई जानकारी नहीं थी. अदालत ने उनकी माफी स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ चल रही कार्यवाही को समाप्त कर दी.
रिपोर्ट के मुताबिक, पाहुजा अपनी बात पर अड़े रहे. उन्होंने अपनी टिप्पणियों को जनहित की वकालत के तौर पर पेश किया. जिसका मकसद न्यायिक सुधार और अदालती कार्यवाही की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग को बढ़ावा देना था. अदालत ने बीते 21 अप्रैल को उन्हें अवमानना का दोषी पाया था.
रिपोर्ट के अनुसार, सुनवाई के दौरान पाहुजा ने हिंदी में कुछ बयान दिए, जिनमें उन्होंने अदालतों की तुलना सीधे तौर पर ‘तानाशाही’ वाले रवैये से की. उन्होंने कहा कि उन्हें भारतीय न्याय प्रणाली से किसी भी तरह के न्याय की उम्मीद नहीं है. उन्होंने आगे कहा, "अदालतों की मनमर्ज़ी बढ़ती जा रही है और मैं किसी न्याय की उम्मीद नहीं कर रहा." उन्होंने यह भी कहा, "मनमर्ज़ी का दूसरा अर्थ तानाशाही होता है."
बार एंड बेंच के अनुसार, जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की डिवीज़न बेंच कहा, “अवमानना करने वाले को अपने इस कार्य पर कोई पछतावा नहीं है. न ही वह अपनी गलती सुधारने का कोई सुझाव देता है. बल्कि, उसका यह कहना है कि उसने जो कुछ भी किया, वह न्यायिक व्यवस्था को बेहतर बनाने के इरादे से किया था. जैसा कि हमने इस आदेश में ऊपर ज़िक्र किया है. उसने इस अदालत के सामने और भी ज़्यादा अपमानजनक बातें कहकर अपनी अवमानना को और भी गंभीर बना दिया है. ऐसे में यह साफ है कि उसे न तो अपने किए पर कोई पछतावा है और न ही वह किसी भी तरह की दया का हकदार है.”
हालांकि, इस सज़ा को दो महीने के लिए स्थगित कर दिया गया है ताकि पाहुजा को सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने का अवसर मिल सके.
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