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पीएम मोदी के विदेश दौरे पर पत्रकारों से उलझते डिप्लोमैट्स का वीडियो वायरल, जानिए क्यों?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 5 दिनों की विदेश यात्रा के दौरान नॉर्वे पहुंचे. बीते चार दशकों बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री का नॉर्वे जाना हुआ है. इस तरह यह एक ऐतिहासिक मौका था. लेकिन सोमवार को यह ऐतिहासिक मौका एक अलग वजह से चर्चा में आ गया. जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संयुक्त प्रेस वार्ता के बाद बिना किसी पत्रकार का सवाल लिए मंच से उतर गए.
इसी दौरान नॉर्वे के अख़बार डागसाविसेन की टिप्पणीकार हेले ल्युंग ने उनसे सवाल पूछने की कोशिश की हालांकि, उन्हें कोई जवाब नहीं मिला.
इसके बाद जब विदेश मंत्रालय के सचिव (पश्चिम) सिबी जॉर्ज और अन्य अधिकारी मीडिया के सामने आए. उन्होंने प्रेस के सवालों का सामना किया. हालांकि, ये प्रेस कॉन्फ्रेंस पहले से चल रही चर्चा में और इजाफा ही करती नजर आई.
दरअसल, प्रेस ब्रीफिंग शुरू होने से पहले ही हेले ल्युंग अपना रुख साफ़ कर चुकी थीं. जैसे ही प्रधानमंत्री मोदी नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गार स्टोरे के साथ मंच से नीचे उतरे, ल्युंग ने आवाज़ लगाई- “प्रधानमंत्री मोदी, आप दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस के सवालों का जवाब क्यों नहीं लेते?”
हालांकि, मोदी बिना रुके आगे बढ़ गए और सवाल अनसुना कर दिया. बाद में ल्युंग ने एक्स पर लिखा, “भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया, और मुझे इसकी उम्मीद भी नहीं थी. प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में नॉर्वे पहले स्थान पर है, जबकि भारत 157वें स्थान पर है, जहां उसकी तुलना फिलिस्तीन, यूएई और क्यूबा जैसे देशों से की जाती है. सत्ता से सवाल करना हमारा काम है.”
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा सवाल को नज़रअंदाज़ किए जाने का मामला भारत में भी राजनीतिक बहस का विषय बन गया. विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भी इस मुद्दे को लेकर प्रधानमंत्री पर निशाना साधा.
हेले ल्युंग की पोस्ट पर सीधे प्रतिक्रिया देते हुए नॉर्वे में भारतीय दूतावास ने एक्स पर लिखा कि प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा को लेकर देर शाम एक प्रेस ब्रीफिंग आयोजित की जाएगी. दूतावास ने ल्युंग को संबोधित करते हुए कहा कि वह वहां आकर अपने सवाल पूछ सकती हैं. उनका ‘स्वागत’ हैं.
प्रधानमंत्री मोदी के विपरीत, नॉर्वे के प्रधानमंत्री भारतीय पत्रकारों के एक समूह के सवाल लेने के लिए सामने आए. हालांकि, इससे पहले हेले ल्युंग ने यह कहते हुए निराशा जताई थी कि नॉर्वे के प्रधानमंत्री ने “आज भारतीय पत्रकारों के लिए समय नहीं निकाला.”
बाद में ओस्लो के रेडिसन ब्लू प्लाज़ा होटल में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में हेले ल्युंग पीछे हटने के मूड में नहीं थीं.
उन्होंने सीधा सवाल किया, “जब हम अपनी साझेदारी मजबूत कर रहे हैं, तो हमें भारत पर भरोसा क्यों करना चाहिए? क्या आप यह भरोसा दिला सकते हैं कि आपके देश में हो रहे मानवाधिकार उल्लंघनों को रोकने की कोशिश की जाएगी? और क्या भविष्य में प्रधानमंत्री भारतीय प्रेस के उचित सवालों का जवाब देना शुरू करेंगे?”
जाहिर है कि सवाल सीधा और तीखा था. लेकिन सिबी जॉर्ज ने जवाब की शुरुआत भारत की पांच हजार साल पुरानी सभ्यता, शतरंज और शून्य की खोज, योग, जी-20 में भारत की भूमिका, कोविड वैक्सीन डिप्लोमेसी और भारतीय संविधान की प्रस्तावना जैसे विषयों से की. काफी देर बाद वह मानवाधिकारों के मुद्दे तक पहुंचे.
इस दौरान ल्युंग ने बीच में टोका, जिस पर जॉर्ज ने नाराज़गी जताई.
उन्होंने कहा, “मुझे जवाब देने दीजिए. आपने सवाल पूछा है, तो मुझे जवाब देने दीजिए. कब जवाब देना है, कहां देना है और कैसे देना है- यह मेरा विशेषाधिकार है. आप सवाल पूछिए, लेकिन मुझे यह मत बताइए कि जवाब किस तरीके से देना है.”
इसी दौरान एक बार उन्होंने साफ शब्दों में कहा, “कृपया बीच में मत बोलिए. यह मेरी प्रेस कॉन्फ्रेंस है.”
प्रेस की स्वतंत्रता पर जॉर्ज ने तर्क दिया कि भारत के मीडिया परिदृश्य के पैमाने को आलोचक समझ ही नहीं पाते. उन्होंने कहा, “आप जानते हैं दिल्ली में हर दिन कितनी ब्रेकिंग न्यूज़ आती हैं? कम से कम 200 टीवी चैनल- अंग्रेज़ी, हिंदी और कई भाषाओं में हैं.”
मानवाधिकारों के सवाल पर उन्होंने भारतीय संविधान का हवाला दिया. उन्होंने कहा, “हमारे पास ऐसा संविधान है जो लोगों के मौलिक अधिकारों की गारंटी देता है. अगर किसी के अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो उसे अदालत जाने का अधिकार है.”
उन्होंने यह भी कहा कि भारत में महिलाओं को 1947 में स्वतंत्रता के साथ ही मतदान का अधिकार मिल गया था, जो कई अन्य देशों से पहले हुआ.
अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर जॉर्ज ने समकालीन उदाहरणों के बजाय सभ्यतागत तर्क दिया. उन्होंने भारत को विविधता और सहिष्णुता पर आधारित समाज बताया, जिसने इतिहास में दुनिया भर से सताए गए समुदायों को शरण दी.
उन्होंने कहा, “भारत एक लोकतांत्रिक समाज है. हम 1947 में लोकतंत्र नहीं बने. हम सदियों, बल्कि हजारों वर्षों से लोकतांत्रिक समाज रहे हैं.”
उन्होंने आगे कहा कि भारत की विविधता ही उसकी स्वीकार्यता का प्रमाण है.
“जब भी दुनिया में कहीं उत्पीड़न हुआ, लोग भारत आए और भारतीय समाज ने सबको स्वीकार किया.”
इसके बाद उन्होंने दूसरे देशों पर परोक्ष टिप्पणी करते हुए कहा, “हमने किसी का सफाया नहीं किया, हमने जातीय सफाया नहीं किया,” और उन देशों का जिक्र किया जहां आज “सिर्फ एक धर्म” या “सिर्फ एक जातीयता” बची है.
हालांकि आलोचकों पर उनकी टिप्पणी ने सबसे ज्यादा प्रतिक्रिया बटोरी.
उन्होंने कहा, “लोगों को भारत के पैमाने की कोई समझ नहीं है. वे किसी गुमनाम और अज्ञानी एनजीओ की एक-दो रिपोर्ट पढ़ते हैं और फिर सवाल पूछने चले आते हैं.”
मोदी सरकार के दौर में विदेशी धरती पर भारतीय राजनयिकों का यह रवैया नया नहीं माना गया. ओस्लो की यह घटना भी कोई अकेला मामला नहीं थी.
हेले ल्युंग ने बाद में इस ब्रीफिंग को लेकर एक पोस्ट लिखा. जिसमें उन्होंने कहा, “मैं और मेरे सहयोगी ने मानवाधिकार उल्लंघनों और भारत पर भरोसे को लेकर सवाल पूछे. मैंने कई बार कोशिश की कि वे मानवाधिकारों के मुद्दे पर स्पष्ट जवाब दें, लेकिन मैं सफल नहीं हुई. प्रतिनिधि कोविड के दौरान भारत के प्रयासों और योग जैसी बातों पर बोलते रहे.”
इसके बाद सोशल मीडिया पर ल्युंग को भारी ट्रोलिंग और ऑनलाइन दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा. मामला इतना बढ़ गया कि उन्हें एक्स पर सफाई देनी पड़ी. उन्होंने लिखा, “मैंने कभी नहीं सोचा था कि मुझे यह लिखना पड़ेगा, लेकिन मैं किसी विदेशी सरकार की जासूस नहीं हूं. मेरा काम पत्रकारिता है, और फिलहाल मैं मुख्य रूप से नॉर्वे में काम करती हूं.”
यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया जब मोदी की विदेश यात्रा लगातार प्रेस स्वतंत्रता को लेकर उठ रहे सवालों की छाया में रही. इससे कुछ दिन पहले हेग में भी ऐसा ही विवाद हुआ था.
वहां भारत-नीदरलैंड संबंधों को रणनीतिक साझेदारी तक बढ़ाने के मौके पर हुई ब्रीफिंग में भी सिबी जॉर्ज से इसी तरह के सवाल पूछे गए.
डच अख़बार डी वोल्क्सक्रांट के पत्रकार अश्वंत नंद्राम ने पूछा था कि दोनों प्रधानमंत्रियों ने मीडिया के सवालों के लिए समय क्यों नहीं रखा. उन्होंने प्रेस स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों को लेकर चिंता भी जताई थी. वही चिंता जिसे डच प्रधानमंत्री खुद सार्वजनिक रूप से उठा चुके थे.
जवाब में सिबी जॉर्ज ने सवाल पूछने वाले की भारत को लेकर समझ पर ही सवाल खड़े कर दिए.
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