Obituary
रघु राय: तस्वीरें बच जाएंगी.. वह हमारे और आपके दिल में रहेंगे
पिछले महीने की ही तो बात है. दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में दानिश सिद्दीक़ी (जो अफ़ग़ानिस्तान में गोलीबारी के बीच फ़ोटो खींचते मारे गए) की याद में स्थापित पुरस्कारों का समर्पण समारोह था. जूरी अध्यक्ष के नाते अपने वक्तव्य में मैंने रघु राय के चित्रों का ज़िक्र भी किया. कि उनसे पूरे 48 साल पहले जैसलमेर में मेरी मुलाक़ात हुई थी. यह भी कि जैसलमेर में उनके साथ जावेद लईक़ साहब भी थे, जो अभी पीछे की ओर बैठे हुए हैं.
आयोजन के बाद लईक़ भाई मुझे निज़ामुद्दीन के अपने अनूठे घर में ले गए. वे आधी सदी का प्रसंग सुनकर बहुत ख़ुश थे. उन्होंने कहा, काश रघु यहां होते. लईक़ साहब के घर की छत पर बने शीशाघर में हम काफ़ी देर जैसलमेर की बातें करते रहे. वे जानते हैं कि मैं "धोरों (रेत के टीले) की धरती" यानी पश्चिमी राजस्थान से आता हूं.
जैसलमेर में रघु और जावेद भाई उस ज़माने में आनंद बाज़ार समूह से निकलने वाली पत्रिका "न्यू देहली" (संपादक खुशवंत सिंह) के लिए फ़ोटो-फ़ीचर करने आए थे. 1978 की सर्दियों की बात है. अरब का शहज़ादा बंदर पाकिस्तान के रास्ते भारत में दाख़िल हुआ. जैसलमेर के पास रामगढ़ के टीलों में अपने तम्बू गाड़ शिकार को निकलता. तब सरहद की सुरक्षा के साथ यह हल्ला भी मचा कि प्रवासी पक्षियों के अलावा शहज़ादे का समूह रेगिस्तान के दुर्लभ पक्षी गोडावन का शिकार कर रहा है. गोडावन बहुचर्चित हो गया और बाद में राज्यपक्षी घोषित हुआ.
उस शाम मैंने मूमल टूरिस्ट बंगले के बगीचे में रघु राय को लईक़ साहब के साथ देखा. पहली बार. लईक़ साहब को नहीं पहचानता था, मगर तस्वीरों की स्मृति से रघु राय को पहचान गया था. उनके काम से मैं लड़कपन में भी प्रभावित था. मैंने चुपचाप दोनों का फ़ोटो खींच लिया. बातचीत में दख़ल देने की हिम्मत नहीं हुई. वे लोग परेशान भी जान पड़ते थे. थोड़ी देर में रघु राय को मैंने रिसेप्शन पर देखा. वे अटल बिहारी वाजपेयी को ट्रंक कॉल कर रहे थे.
वाजपेयी जनता सरकार के विदेश मंत्री थे. रघु ने उन्हें बताया कि वे अपने फ़ीचर असाइनमेंट पर रामगढ़ की तरफ़ जा रहे थे. रास्ते में बीएसएफ़ ने रोक लिया. बहस हुई तो उनकी एम्बेसेडर कार के पहिए पंक्चर कर दिए. वाजपेयीजी ने क्या कहा, मालूम नहीं. लेकिन अगले ही रोज़ विदेश राज्यमंत्री समरेंद्र कुंडू का हेलिकॉप्टर जैसलमेर में उतरा. मीडिया में फ़ज़ीहत के बाद शायद यों भी केंद्र और प्रदेश में शेखावत सरकार शहज़ादे की हरकतों से विचलित थे.
जो हो, शहज़ादे के शिविर की मेरी रिपोर्टिंग (फ़्रीलांसर के नाते कलकत्ता के 'रविवार' में लिखता था) से मुझे राजस्थान पत्रिका में नौकरी मिल गई. बरसों बाद रघु भाई से भी अच्छा परिचय हुआ. उन्होंने, और लईक़ साहब ने भी मेरा- खींचा मूमल के बगीचे वाला वह (कालांतर में घिस-पिट गया) फ़ोटो मुझसे लिया.
पिछले वर्ष, जब कृशन खन्ना सौ साल के हुए, रज़ा न्यास के आयोजन में रघु भाई से ख़ूब बातें हुईं. वे बहुत सहृदय थे. उन्होंने मुझे अपनी नई किताब भेंट की, जो उनके दशकों पुराने मित्र रहे हिम्मत शाह (दूसरे ऐसे मित्र जतिन दास होंगे) की छवियों का संकलन है. शाह साहब जब नब्बे के हुए, तब भी रघु जयपुर आए थे. मैंने उन्हें मज़ाक़ में कहा कि राजस्थान में रघु राय नाम से एक होटल खुल गया है डूंगरपुर में. कोई पारिवारिक नाम रहा होगा. एक रोज़ उनका संदेश आया कि उस होटल का फ़ोटो भेजो. देखें तो सही.
पिछले सप्ताह मित्र अशोक राही के एक दोपहर-भोज में जाने-माने छविकार सुधीर कासलीवाल मिले थे. हम लोग देर तक रघु राय और उनके बड़े भाई एस पॉल के चित्रों की ख़ूबियों को याद करते रहे. हमारे घर में इन दिनों अक्सर उनकी बात चल निकलती थी, क्योंकि उनकी खींची संगीतकारों की तस्वीरों को हम घर में सजाने की योजना बना रहे थे. अशोक वाजपेयी के आलेख के साथ उन तस्वीरों की किताब को मैं रघु राय की श्रेष्ठतम कृति मानता हूं.
वे तस्वीरों में कविता करते थे. तस्वीरों में पेंटिंग रचते थे. हर तस्वीर एक संसार साथ लेकर आती. उनकी स्याह-सफेद छवियों में जीवन के हज़ारों प्रकाश और रंग नुमायां थे.
तस्वीरें रह जाएंगी. रघु कहां जाएंगे. रघु कहीं नहीं जाएंगे. वे हमारे दिल में हैं. जैसे मेरे, वैसे आपके.
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