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यूजीसी: कागजों में सिमटे समता नियम और भेदभाव का शिकार हुए छात्रों का जातिवाद से लड़ाई का सच
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के ताजा समता संवर्धन दिशानिर्देशों (इक्विटी गाइडलाइन्स) पर फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के आदेशों पर रोक लगी हुई है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय इन नियमों के समर्थन में हो रहे प्रदर्शनों का एक प्रमुख केंद्र बनकर उभरा. प्रयागराज में बीते कुछ वक्त में छात्रों का एक बड़ा वर्ग यूजीसी के इन नियमों समर्थन में सड़कों पर उतरा और कैंपस में जातिगत भेदभाव के अपने अनुभव साझा किए.
न्यूज़लॉन्ड्री ने इस दौरान अनुसूचित जाति (एससी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) से आने वाले कई छात्रों से बात की. इन छात्रों ने ऐसे कई अनुभव बताए, जिनमें उन्हें जातिगत टिप्पणी, अपमान और मानसिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा.
हमारी ग्राउंड रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि यूजीसी के 2012 के समता नियमों, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी, 2026 में फिर से बहाल किया, अधिकांश संस्थानों में केवल कागज़ों में सिमट कर रह गए थे.
विश्वविद्यालय परिसर में न तो छात्रों को समता केंद्र के बारे में जानकारी थी और न ही कोई भेदभाव निरोधक अधिकारी सक्रिय रूप से उनकी शिकायतें सुनता दिखा.
हालांकि, जहां चर्चा जातिवाद और संस्थागत भेदभाव पर होनी चाहिए थी, वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय की तरह इलाहाबाद विश्वविद्यालय में भी बहस का केंद्र ‘ब्राह्मणवाद’ का सवाल बन गया. इस बहस में उलझकर कई लोग मूल समस्याओं से ही दूर होते दिखाई दिए.
कभी ‘पूरब का ऑक्सफोर्ड’ कहलाने वाले इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कैंपस में जातिवाद की वास्तविकता क्या है? यूजीसी नियमों को लेकर छात्रों का गुस्सा क्यों उभर रहा है? सुप्रीम कोर्ट में होने वाली आगामी सुनवाई से पहले, प्रदर्शनकारी छात्र जातिगत भेदभाव से जुड़े किन मुद्दों को अदालत के संज्ञान में लाने की कोशिश कर रहे हैं?
इन सवालों के जवाब जानने के लिए देखिए आकांक्षा कुमार की यह विस्तृत ग्राउंड रिपोर्ट.
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