Report
असम में ‘बाहरी’ बनाम ‘असमिया’ की बहस तेज, बीजेपी उम्मीदवार विजय गुप्ता के नामांकन पर विवाद
1985 में, असम के एक मशहूर नाटक में एक हिंदी बोलने वाले व्यापारी का मज़ाक उड़ाया गया था. वह हिंदी बोलते हुए अटकता था, सांस्कृतिक बातों को आपस में मिला देता था, फिर भी वह बेफिक्र ही नजर आता था.
'बाहरी लोगों' के ख़िलाफ़ असम आंदोलन के ठीक बाद मंचित इस नाटक ने पूरे राज्य में असमिया दर्शकों का खूब मनोरंजन किया, लेकिन साथ ही यह एक गहरी चिंता को भी सामने लाया कि असमिया संस्कृति पर धीरे-धीरे 'बाहरी लोग' कब्ज़ा कर रहे हैं.
दशकों बाद, इस मज़ाकिया किरदार ने चुनावी राज्य असम में मानो अपनी एक असली छवि ढूंढ ली हो. दरअसल, एक 70 वर्षीय हिंदीभाषी व्यापारी विजय गुप्ता को भाजपा ने गुवाहाटी सेंट्रल विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाया है. गुप्ता की जड़ें उत्तर प्रदेश से जुड़ी हैं.
गुप्ता के नामांकन के बाद सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक विरोध देखने को मिल रहा है. दरअसल, असम में ‘असमिया’ कौन है, यह सवाल हमेशा संवेदनशील रहा है.
अब 1985 के उसी नाटक की एक पुरानी क्लिप फिर से वायरल हो रही है, जिस पर लोग ‘वापस जाओ, बिहारी’ जैसे कमेंट कर रहे हैं. यह गुस्सा गुप्ता की प्रवासी पृष्ठभूमि पर केंद्रित है, जबकि उनका जन्म और पालन-पोषण असम में ही हुआ है और उनका परिवार साल 1925 से यहां रह रहा है.
स्थानीय मतदाता मुकुट डेका कहते हैं, “यह शर्म की बात है कि बीजेपी जैसी पार्टी इस महत्वपूर्ण सीट के लिए कोई ‘भूमिपुत्र’ नहीं ढूंढ पाई. हम किस दिशा में जा रहे हैं?”
हालांकि, कमजोर विपक्ष के चलते भाजपा की कुल मिलाकर स्थिति मजबूत मानी जा रही है और पार्टी के लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने के आसार हैं, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद असम की राजनीति में गहरे अंतर्विरोधों को उजागर करता है.
तेजपुर विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र के प्रोफेसर चंदन शर्मा के अनुसार, “असम की जनसांख्यिकी भारत के अन्य राज्यों से अलग है. यहां विभिन्न जातीय और भाषाई समूह हैं, जिनके प्रतिस्पर्धी उप-राष्ट्रवाद हैं और संसाधनों को लेकर भी गहरी चिंताएं हैं. बीजेपी को ऐसे समूहों का ज्यादातर समर्थन मिला है, लेकिन अब उसके आधार में दरारें दिखने लगी हैं.”
कार्बी आंगलोंग की दुविधा
बीजेपी ने 2016 में ‘जाति, माटी, भेती’ के नारे के साथ सत्ता हासिल की थी, जो प्रवासियों के कारण जनसांख्यिकी में आ रहे बदलाव की चिंता पर केंद्रित था. बीते दशक में पार्टी ने विभिन्न भाषाई और लैंगिक समूहों को जनाधार के तौर पर विकसित करते हुए ‘स्वदेशी-हिंदू’ की पहचान से जोड़ा. साथ ही बंगाली मूल के मुसलमानों को ‘घुसपैठिया’ के तौर पर प्रस्तुत किया.
लेकिन असम में ‘बाहरी’ का सवाल हमेशा केवल धर्म तक सीमित नहीं रहा है. अन्य राज्यों से आए हिंदीभाषी लोग भी अक्सर ‘असमिया’ पहचान के बाहर माने जाते रहे हैं. 2019 में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों में यह तनाव फिर सामने आया, जब बांग्लादेश से आए हिंदुओं को नागरिकता देने के प्रावधान ने असमिया समुदाय को नाराज कर दिया. कुछ ने इसे भाजपा की ओर से चुनावी वादाखिलाफी की तरह भी देखा.
हालांकि, किसी तरह भाजपा इस विवाद को किनारे करने में कामयाब रही. लेकिन बीते साल यह मुद्दा कार्बी आंगलोंग जैसे इलाकों में फिर से उठ खड़ा हुआ. जहां कार्बी समुदाय ने ‘अवैध रूप से बसे’ लोगों को उनकी जमीन से हटाने की मांग की. इनका निशाना सिर्फ बंगाली मुसलमान नहीं, बल्कि बिहार से आकर बसने वाले लोग थे. इन्हें राज्य में भाजपा का मजबूत जनाधार माना जाता है.
तनाव तब और ज्यादा बढ़ गया जब पुलिस ने जबरन कार्बी प्रदर्शनकारियों की भूख हड़ताल खत्म करवाई, इस पूरे तनाव में दो लोगों की मौत हो गई.
कार्बी नेता होलिराम तेरांग कहते हैं, “भाजपा पहले तो सही बातें कर रही थी, लेकिन इस घटना के बाद उसे हिंदी-भाषियों का समर्थक और आदिवासियों का विरोधी, दोनों ही माना जा रहा है.”
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस उथल-पुथल से अब, दो कार्बी-बहुल ज़िलों की पांच में से कम से कम दो सीटों पर भाजपा को नुकसान पहुंच सकता है.
कार्बी आंगलोंग के एक भाजपा नेता ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, “हमने तनाव कम करने के लिए तेज़ी से कदम जरूर उठाए लेकिन फिर भी कार्बी और बिहारी, दोनों को ही यह महसूस हो रहा है कि भाजपा ने उन्हें निराश किया है. असम में लोग अपनी पहचान को लेकर बहुत सजग रहते हैं, इसलिए ये मुद्दे भविष्य में फिर से उभर सकते हैं."
जैसा कि गुवाहाटी में गुप्ता के नामांकन के साथ हुआ है.
न तो गुप्ता और न ही उनकी ज़ेन-ज़ी प्रतिद्वंद्वी कुंकी चौधरी, कोई राजनीतिक दिग्गज हैं लेकिन गुवाहाटी की यह सीट अब राज्य के सबसे चर्चित मुकाबलों में शामिल हो गई है. यह चुनाव एक ओर कांग्रेस के गौरव गोगोई और दूसरी ओर मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के बीच व्यापक राजनीतिक टकराव के रूप में देखा जा रहा है.
दिल्ली से अमित शाह और पवन खेड़ा जैसे पार्टी के राष्ट्रीय नेता भी यहां प्रचार कर रहे हैं.
ऑनलाइन कंटेंट क्रिएटर्स भी इस राजनीतिक घमासान में शामिल नजर आते हैं. वह एक के बाद एक रील बनाकर गुप्ता का मज़ाक उड़ा रहे हैं. उनके भारी असमिया लहजे की ओर इशारा कर रहे हैं, जो उस ‘बाहरी’ व्यक्ति की निशानी है, जिसे राज्य की भाषा या संस्कृति की कोई परवाह नहीं है, और जो यहां सिर्फ़ स्थानीय लोगों की कीमत पर अपना व्यावसायिक फ़ायदा उठाने आया है.
इसके विपरीत, चौधरी को एक सांस्कृतिक प्रतीक के तौर पर पेश किया जा रहा है. जो 27 साल की, साफ़-सुथरी छवि वाली, और पूरी तरह से असमिया हैं. उनका चुनाव प्रचार अक्सर ज़ुबीन गर्ग के संगीत से भरा होता है. ज़ुबीन गर्ग की हाल ही में हुई मौत ने पूरे राज्य में लोगों को गहरे भावनात्मक सदमे में डाल दिया था.
कई समर्थक उन्हें ‘असम की बेटी’ कहकर बुलाते हैं. वह उन्हें उस उम्मीद की किरण के तौर पर देखते हैं जो भाजपा की, बाहरी कॉर्पोरेट ताकतों को जगह देने की कथित इच्छा के ख़िलाफ़ खड़ी है.
मालूम हो कि कुंकी असम जातीय परिषद की उम्मीदवार हैं. यह साल 2019 के सीएए विरोधी प्रदर्शनों से बनी एक क्षेत्रीय पार्टी है, जो अब कांग्रेस की सहयोगी है.
भाजपा के नेतृत्व ने भी चौधरी पर निशाना साधना शुरू कर दिया है. मुख्यमंत्री सरमा, जो अपनी भड़काऊ बयानबाज़ी के लिए जाने जाते हैं, बार-बार यह आरोप लगा रहे हैं कि कुंकी ‘हिंदू-विरोधी’ हैं. उन्होंने तो प्रेस के सामने उनकी मां की कथित तस्वीरें भी लहराईं, जिनमें उन्हें ‘बीफ़ खाते हुए’ दिखाया गया था. इस हरकत ने चौधरी के समर्थन में लोगों को और भी ज़्यादा एकजुट कर दिया है.
वहीं, गुप्ता के समर्थक उनके पक्ष में खड़े हैं.
मार्च की एक बरसाती दोपहर में, गुवाहाटी के एक रिहायशी इलाके में चुनाव प्रचार शुरू होने से पहले, उनके एक सहयोगी ने उनका परिचय पार्टी के एक ऐसे मेहनती सदस्य के तौर पर कराया, जो तीन दशकों से पार्टी के लिए काम कर रहे हैं.
उन्होंने कहा, “सोशल मीडिया पर बहुत सारी बातें चल रही हैं. मैं आपको बता दूं, ये सब साज़िशें हैं. विजय गुप्ता ने सिर्फ़ 30 साल तक भाजपा के लिए ही काम नहीं किया है बल्कि उन्होंने असम के लिए काम किया है. अगर वह असमिया नहीं हैं, तो फिर कौन है?”
गुप्ता जैसे हिंदी भाषी प्रवासी असम के कई शहरों की आबादी का एक बड़ा हिस्सा हैं और राज्य में भाजपा के शुरुआती समर्थकों में से रहे हैं.
पार्टी के पुराने नेताओं में से एक सिद्धार्थ भट्टाचार्य पत्रकारों से कहते हैं, “ये ऐसे लोग नहीं हैं जो कल ही आए हैं. भाजपा के शुरुआती दिनों में गुप्ता जैसे लोग ही पार्टी के साथ खड़े थे.”
हालांकि, कुछ वरिष्ठ नेता यहां तक भी मानते हैं कि ये संतुलन बनाना आसान नहीं रहा है.
अशोक सिंघल प्रवासी मूल के एक अनुभवी भाजपा नेता हैं और अब राज्य सरकार में मंत्री हैं. वह कहते हैं, “उनके (गुप्ता) उपनाम का मतलब है कि उन्हें हर दिन खुद को साबित करना पड़ता है.”
साथ ही वह दावा करते हैं कि ये चुनौतियां विपक्षी पार्टियों ने भाजपा के सामाजिक गठबंधन को तोड़ने के लिए खड़ी की हैं लेकिन असम की जनता उनके साथ है.
वह कहते हैं, “हम एक ऐसा इंद्रधनुषी गठबंधन हैं, जो जाति, समुदाय, पंथ और भाषा की सीमाओं से परे है. इस सरकार ने यह साबित कर दिया है कि वह यहां के मूल निवासियों की पहचान की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है.”
इस सबके बावजूद उनकी अपनी ही पार्टी के कुछ सदस्य इस बारे में पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं.
गुप्ता के चुनाव प्रचार के दौरान 36 साल के एक पार्टी सदस्य कहते हैं, “भाजपा अच्छा काम करती है, और इसीलिए मैं उनके साथ हूं. लेकिन यह देखकर दुख होता है कि उन्होंने एक ऐसे उम्मीदवार को मैदान में उतारा है जो यहां दशकों से रहने के बावजूद भाषा बोलने में अभी भी अटकता है. अगर वह सही शब्द नहीं बोल पाता, तो इसका मतलब है कि उसे हमारी संस्कृति की कोई परवाह नहीं है.”
‘बाहरी’ कौन है?
भाजपा ने 1990 के दशक की शुरुआत में असम में अपनी पैठ बनानी शुरू की थी, हालांकि, चुनावी सफलता तब कोई खास नहीं थी. आखिरकार 2016 में वह सत्ता में आई, और कांग्रेस के 15 साल के शासन को खत्म कर दिया. इस दौरान, उसने ‘उत्तर भारतीयों की पार्टी’ वाली अपनी छवि भी बदल ली.
पार्टी के एक पदाधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि लंबे समय तक यह धारणा बनी हुई थी कि भाजपा एक ‘मारवाड़ी-बिहारी’ दल है, यानी बाहरी लोगों की पार्टी है.
वह कहते हैं, “यह धारणा तब बदलने लगी जब सर्बानंद सोनोवाल जैसे नेता सामने आए. धीरे-धीरे, यह अलग-अलग जनजातियों और समुदायों की पार्टी बन गई- पहाड़ों और घाटियों, दोनों की.”
सोनोवाल के नेतृत्व में, पार्टी ने उन समुदायों को अपने पाले में किया जो पहले कांग्रेस के साथ थे, और साथ ही हिंदू प्रवासी समूहों के बीच अपना समर्थन भी मज़बूत किया.
मुख्यमंत्री सरमा का बंगाली मूल के मुसलमानों के प्रति कड़ा रुख अपनाना इसमें अहम रहा. इसने भाजपा की स्थिति को और भी मज़बूत किया है. उनकी सरकार ने बड़े पैमाने पर अतिक्रमण हटाने के अभियान चलाए हैं और बंटवारे के समय के एक कानून का इस्तेमाल करके लोगों को बांग्लादेश वापस भेजा है. यह एक ऐसा काम है, जिसके बारे में उन्होंने बार-बार कहा है कि यह सिर्फ़ उनकी सरकार ही कर पाई है.
लेकिन पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि एक ऐसे राज्य में जहां भाषाई राष्ट्रवाद की जड़ें बहुत गहरी हैं, वहां ‘बाहरी’ होने की परिभाषा को सिर्फ़ एक धार्मिक श्रेणी तक सीमित करने में जो विरोधाभास है, वह कभी न कभी फिर से सामने आने ही वाला था.
भाजपा के पदाधिकारी ने कहा, “एक पार्टी कार्यकर्ता के तौर पर, मेरा नज़रिया हिंदू है, चाहे वह बंगाली हो, बिहारी हो, या मारवाड़ी. जब तक कोई हिंदू है, हम उसी आधार पर काम करते हैं. लेकिन हमारे समर्थक ज़रूरी नहीं कि इसी तरह सोचते हों.”
असम के एक शोधकर्ता अंगशुमान चौधरी ने कहा कि पिछले एक दशक में हुए बड़े राजनीतिक बदलावों के बावजूद, ये जातीय-राष्ट्रवादी भावनाएं ‘हिंदुत्व के सामने एक वैकल्पिक राजनीतिक सोच’ पेश करती रहेंगी. लेकिन क्या यह पार्टी की चुनावी ताकत को कमजोर करने के लिए काफी होगा यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा.
दरअसल, पूरे असम में भाजपा एक ज़ोरदार चुनावी अभियान चला रही है. जिसकी वजह सिर्फ़ ‘मामा’ (मुख्यमंत्री सरमा का लोकप्रिय उपनाम) वाली छवि नहीं है बल्कि इसकी वजह साफ़ तौर पर दिख रहा विकास का एजेंडा और कई तरह की नकद लाभ योजनाएं भी हैं. 2023 में हुए परिसीमन के बाद भाजपा को एक और बढ़त मिल गई है. माना जा रहा है कि इसके चलते कई विधानसभा सीटों पर हिंदू वोट एक जगह जमा हो गए हैं.
गुप्ता की उम्मीदवारी से नाखुश गुवाहाटी के वोटर डेका कहते हैं, “हो सकता है कि भाजपा यहां और पूरे असम में जीत जाए लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने हमारे मन में एक कड़वाहट ज़रूर छोड़ दी है.”
तोरा अग्रवाल गुवाहाटी की एक स्वतंत्र पत्रकार हैं.
मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित ख़बर को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.
Also Read: महादेव के शहर में बुलडोजर के निशान
Also Read
-
The Adani rising story aided by policy changes
-
The farm failures keeping India hooked on imported oil
-
Why India cannot let the rupee float
-
South Central 78: Annamalai says bye to BJP – Reasons and what’s in store
-
‘Go Back, Godi media’: CJP protesters at Jantar Mantar had no time for TV media