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500 रूपए किलो गैस और 800 दिहाड़ी: दिल्ली से शुरू हुआ मज़दूरों का पलायन
इजरायल, अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध का असर अब भारत के सबसे कमजोर वर्ग पर साफ दिखने लगा है. एलपीजी गैस की आसमान छूती कीमतों ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में रहने वाले प्रवासी मजदूरों की रसोई ठंडी कर दी है. दिहाड़ी पर काम करने वाले ये मजदूर अब पेट भरने और शहर में टिके रहने के बीच चुनाव करने को मजबूर हैं और यही मजबूरी उन्हें वापस गांव की ओर धकेल रही है.
दिल्ली में रहने वाले हजारों प्रवासी मजदूर, जो रोजाना 500 से 800 रूपए तक कमाते हैं, आज एक ऐसे संकट में फंस गए हैं जहां मेहनत करने के बावजूद दो वक्त की रोटी मिलना मुश्किल है. एलपीजी गैस की लगातार बढ़ती कीमतों ने उनकी जिंदगी की बुनियादी जरूरत, खाना, को ही सबसे बड़ा संघर्ष बना दिया है.
अपने परिवार के साथ 10,000 रूपए महीने पर काम करने वाली ललिता देवी अब अपने गांव बिहार लौटने के लिए मजबूर हैं. उनकी आवाज में थकान भी है और बेबसी भी. उन्होंने बताया कि पिछले चार दिनों से उनके घर में चूल्हा नहीं जला है. परिवार कच्चे चने खाकर गुजारा कर रहा था, क्योंकि एलपीजी गैस की कीमत फुटकर बाजार में 400 से 500 रूपए प्रति किलो तक पहुंच चुकी है.
गौरतलब है कि ज्यादातर प्रवासी मजदूरों के पास घरेलू गैस कनेक्शन नहीं होता. वे स्थानीय विक्रेताओं से छोटी मात्रा में गैस खरीदते हैं और यही उन्हें सबसे महंगा पड़ता है.
ललिता ने हमसे यह भी बताया कि पैसे नहीं होने की वजह से वह ट्रेन का टिकट भी नहीं ले पाई हैं.
इन हालात से हार कर घर लौटने वालों में ललिता देवी अकेली नहीं है. एनसीआर की गलियों, निर्माण स्थलों और झुग्गी बस्तियों से हर दिन ऐसे हजारों लोग अपने गांवों की ओर लौट रहे हैं. वजह एक ही है, महंगी गैस और घटती जिंदगी.
बिहार के उदय कुमार भी पत्नी और दो बच्चों के साथ वापस जा रहे हैं. उन्होंने कहा,
“सोचा था दिल्ली आकर अपने बच्चों को पढ़ाऊंगा लिखाउंगा ताकि वह मेरी तरह मजदूरी ना करें लेकिन अब वापस जा रहा हूं.”
उदय कुमार निर्माण कार्य में मजदूरी करते हैं और करीब 800 रूपए रोज कमाते हैं. वे कहते हैं, “800 रूपए कमाने वाला आदमी 400 से 500 रूपए का 1 किलो गैस भरवाएगा तो बच्चों को कैसे पालेगा. कमरे का किराया देना होता है दाल चावल सब्जियां भी खरीदनी है बच्चों की फीस देनी है यह सब 800 रूपए प्रतिदिन की कमाई में कैसे हो पाएगा.”
यह सिर्फ आर्थिक संकट नहीं है, बल्कि टूटते सपनों की कहानी है. ललिता देवी और उदय कुमार जैसे हजारों प्रवासी मजदूर, खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार से आए लोग, अब शहरों से वापस गांव की ओर लौट रहे हैं.
हमने इस रिपोर्ट में इन्हीं कहानियों को दर्ज करने की कोशिश की है. देखिए हमारी यह वीडियो रिपोर्ट.
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