Ground Report
पश्चिम बंगाल: चित भी दिल्ली पट भी दिल्ली, सिक्का दीदी का...
‘पश्चिम बंगाल में चुनाव खत्म हो चुका है’- कलकत्ते में घुसते ही पहली मुलाकात में पचास साल के अनुभव वाले किसी वरिष्ठ पत्रकार के मुंह से अगर यह बात सुनने को मिल जाए तो दिल्ली से गया आदमी क्या अंदाजा लगाएगा? चुनाव की घोषणा के महज दो हफ्ते पहले यदि सड़कों पर रमज़ान के बाज़ार की चहल-पहल के बीच चुनावी सरगर्मी नदारद हो और हर अगला शख्स तकरीबन उबासी लेते हुए आश्वस्त नजर आए, तो कोई क्या लिखेगा और क्यों?
बीते 15 मार्च को आई विधानसभा चुनाव की अधिसूचना से पहले तक पश्चिम बंगाल में केवल मौसम नहीं, सियासी माहौल भी पतझड़नुमा बना हुआ था. कम से कम कलकत्ते की फिजा से तो यह अंदाजा लगा पाना मुश्किल था कि आने वाले दिनों में क्या होने वाला है; कुछ होने वाला भी है या नहीं! नए समाजविज्ञानियों के पसंदीदा सब्जेक्ट कैब चालकों से लेकर नेता और सेलिब्रिटी तक केवल दीदी-दीदी रटते नजर आए. चुनाव बिलकुल समझ में नहीं आ रहा था. इसीलिए, अपने बंगाल प्रवास के हफ्ते भर बाद अंतत: हमें अपना पुराना प्रशिक्षण आजमाना पड़ा.
सियालदह स्टेशन से मुर्शिदाबाद जाने वाली लालगोला मेमू पकड़ने से ठीक पहले हमने हिंदी के कुछ अखबार खरीदे और उन्हें रास्ते भर बांचा. फिलहाल, बंगाल की चुनावी तस्वीर को बिना आंखों देखे दूर बैठे समझने के लिए कोलकाता से छपने वाले हिंदी दैनिकों की कुछ अतिस्थानीय सुर्खियों पर नजर डालते हैं. ये सभी हेडलाइनें फरवरी के अंत की हैं. इसमें हम एसआइआर जैसे चर्चित मामलों को नहीं ले रहे जिनकी कवरेज तकरीबन रोजाना ही हो रही थी.
चार अखबार, आठ सबक
नीचे दी गई खबरें प्रभात खबर, सन्मार्ग, विश्वमित्र, समाज्ञा दैनिकों से ली गई हैं. पहली श्रेणी राज्य सरकार के प्रति असंतोष और सड़क पर चलने वाली हलचलों से जुड़ी खबरों की है. इन्हें पढ़ने से पहली नजर में तृणमूल कांग्रेस सरकार की नकारात्मक छवि उभरती है. उदाहरण के लिए: हावड़ा में शूटआउट, प्रमोटर की हत्या, आरोपी के साथ विधायक का फोटो वायरल
हत्या की रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों पर पुलिस के सामने हुए हमले अस्थायी सिविल डिफेंस कर्मियों का प्रदर्शन, पुलिस से झड़प
रिक्त पदों पर शीघ्र नियुक्ति की मांग को लेकर आंगनबाड़ी कर्मियों का प्रदर्शन
रोड से लेकर बिल्डिंग तक गड़बड़ी, गरमाये लोग
दो अस्थायी सरकारी कर्मचारियों को काम से निकाला गया
टीएमसी विधायक रामेंदू सिंह राय के खिलाफ लगे पोस्टर
परीक्षा में बैठने की अनुमति के लिए डीएलएड प्रशिक्षु हाई कोर्ट में
32 हजार प्राथमिक शिक्षकों की बहाली को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती
चार करोड़ की विदेशी मुद्रा के साथ तीन गिरफ्तार
दूसरी श्रेणी प्रचारात्मक खबरों की है. ये खबरें राज्य सरकार की सकारात्मक छवि बनाती हैं. उदाहरण-
रमजान पर राशन कार्डधारकों को विशेष सब्सिडी पैकेज
मुख्यमंत्री ने किया जैन मानस स्तंभ का उद्घाटन
युवासाथी योजना में आवेदन 60 लाख पार
लघु बचत योजनाओं में बंगाल शीर्ष पर
मुख्यमंत्री करेंगी कल्याणी एक्सप्रेसवे का उद्घाटन
न्यूटाउन में हो सकता है जैन मंदिर का निर्माण: मुख्यमंत्री
तीसरी श्रेणी प्रशासनिक/राजनीतिक किस्म की खबरों की है जिन्हें पढ़कर आहट लगती है कि यहां चुनाव आ रहा है:
विस चुनाव के पहले पुलिस विभाग में बड़ा फेरबदल
राम मंदिर के लिए मिट्टी लाने अयोध्या रवाना हुआ समूह
भाजपा के लिए रील बनाने पर 20 हजार रुपये
बीएलओ से मारपीट के आरोप में भाजपा नेता समेत दो गिरफ्तार
हिंसा और भ्रष्टाचार बंगाल में कैंसर की तरह फैल चुके: राज्यपाल
भांगड़ में आइएसएफ कार्यकर्ता के घर से 28 बम और बंदूक बरामद
गठबंधन पर हुमायूं कबीर ने रख दी कुछ ऐसी शर्त
खबरों के अलावा विज्ञापन पर नजर डालें तो सरकारी विभागों के सबसे ज्यादा विज्ञापन सबसे पुराने अखबार विश्वमित्र में छपे हैं (एक दिन में पांच विभागों के विज्ञापन तक). उसके बाद सन्मार्ग और समाज्ञा की स्थिति तकरीबन बराबर है. प्रभात खबर में एक भी सरकारी विज्ञापन नहीं है. इससे सुधी पाठक अंदाजा लगा सकते हैं कि सरकारी योजनाओं की खबरें सबसे ज्यादा कहां-कहां छपी होंगी और भारतीय जनता पार्टी से जुड़ी खबरें अथवा तृणमूल कांग्रेस विरोधी खबरें कहां छपी होंगी. सरकारी विज्ञापन की संख्या के हिसाब से खबरों के छपने की सूक्ष्मता इस हद तक है कि हावड़ा में हुए शूटआउट की खबर तो सब जगह है, लेकिन उसमें आरोपी की टीएमसी विधायक के साथ (वायरल) फोटो केवल प्रभात खबर में थी.
अखबारों को देखकर कोई नहीं कह सकता कि बंगाल में चुनाव खत्म हो चुके हैं. उलटे, ये सुर्खियां एक मोटा अंदाजा लगाने में मददगार हो सकती हैं कि (क) तृणमूल कांग्रेस का सामना भाजपा के रूप में दरअसल केंद्र (राज्यपाल) से है; (ख) चौंतीस साल सत्ता में रहा वाम मोर्चा मैदान से तकरीबन नदारद है; (ग) कांग्रेस पार्टी चर्चा से बाहर है; (घ) छोटे दलों पर चुनाव निर्भर दिखता है (इंडियन सेकुलर फ्रंट या आइएसएफ और हुमायूं कबीर की नई पार्टी); (च) सरकारी योजनाओं से टीएमसी मतदाताओं को साधने की कोशिश में है; (छ) राज्य सरकार के खिलाफ सरकारी कर्मचारियों में आक्रोश है; (ज) मतदाता अपने जनप्रतिनिधियों/समस्याओं से नाराज हैं; और (झ) हिंदू-मुसलमान या मंदिर-मस्जिद की राजनीति समानांतर जारी है.
अंदर बाहर दो विपक्ष
ऊपर बताए आठ सरल सबक ही पश्चिम बंगाल के चुनाव को समझने की शुरुआती कुंजी हैं. जिन्होंने हमसे कहा था कि ‘पश्चिम बंगाल में चुनाव खत्म हो चुका हैं, उनका आशय यह था कि मतदाताओं के भीतर बदलाव का कोई मूड नहीं है और नतीजा पहले से तय है.
यह बात एक हद तक सच हो सकती है क्योंकि इस चुनाव में सतह पर मुख्य विपक्षी भाजपा 2021 के मुकाबले ठंडी और रक्षात्मक दिख रही है जबकि कांग्रेस और वाम मोर्चा की स्थिति ऐसी नाजुक हो चुकी है कि वे मिलकर भी पांच सीट निकाल ले जाएं तो इसे उनकी उपलब्धि ही माना जाएगा. बाकी जो भी खिलाड़ी हैं, उनका दांव भाजपा को मजबूत नहीं तो टीएमसी को कमजोर करने के काम ही आएगा.
भाजपा के ठंडे दिखने का अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि वह चुनाव गंभीरता से नहीं लड़ रही. शहर से बाहर निकलें, तो जाधवपुर से लेकर हावड़ा-बैरकपुर-डान्कुनी-सिंगुर और मुर्शिदाबाद में भी भाजपा के झंडे लहराते दिख जाएंगे. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चुनावी प्रभारी तकरीबन हर जगह तैनात हैं. दूसरे, इस बार भाजपा के लिए कुछ दूसरे लोग चुनाव लड़ रहे हैं. टीएमसी के विधायक रह चुके और बेलडांगा में खेती की 50 बीघा जमीन पर बाबरी मस्जिद टाउनशिप बनवा रहे हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी, असदुद्दीन ओवैसी की एआइएमआइएम और नौशाद सिद्दीकी की आइएसएफ वे तीन ताकतें हैं जो मुस्लिम वोटों को खींचने की मंशा से मैदान में हैं. मुस्लिम वोटों का तितरफा खिंचाव मतलब टीएमसी की ओर से बिखराव- यह भाजपा के फायदे की बात है क्योंकि करीब सौ सीटें ऐसी हैं जो सीधे मुस्लिम वोटों से तय होती हैं या उनसे प्रभावित हैं.
यह भाजपा की रणनीति है या मजबूरी? उत्तरी बंगाल की चाय बागान मजदूर यूनियन के उपाध्यक्ष सुशोवन धर बताते हैं कि पिछले चुनाव तक उनके इलाके में (कूचबिहार, द्वार के इलाके) लोग भाजपा को एकतरफा वोट दे रहे थे. यहां तक कि बड़ी शिद्दत से वे लोग ‘मन की बात’ का प्रसारण तक सुनते थे. अब ऐसा माहौल नहीं रह गया है. मटुआ (नामशूद्र) बहुल इलाकों में भी भाजपा की स्थिति कमजोर हुई है जो उसका गढ़ माना जाता था. एसआइआर (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) के चलते मतदाता सूची में से कटे नामों को वापस जोड़ने के लिए सीएए (नागरिकता संशोधन) का जो वादा उन लोगों से किया गया था उसे भाजपा मैनेज नहीं कर पाई. इसके चलते भाजपा की कुल बीस-बाईस सीटें फंस गई हैं. पिछले चुनाव में उसे 77 सीटें मिली थीं और टीएमसी से वोटों की दूरी महज दस प्रतिशत के आसपास रही थी.
सुशोवन कहते हैं, ‘’मुस्लिम बहुल और प्रभावित मोटामोटी सौ सीट को अगर निकाल दो तो बचा दो सौ. दो सौ में आपको अगर बहुमत के लिए 148 निकालना है तो हिंदू इलाके में बहुत भयंकर ध्रुवीकरण करना होगा. वहां भाजपा ध्रुवीकरण कर नहीं पा रही. मुमकिन ही नहीं हो रहा. ऐसे में वह क्या करेगी? जहां हिंदू अल्पसंख्यक हैं वहां उसके लिए ध्रुवीकरण करना अपेक्षाकृत आसान है. इसीलिए बीस बाईस सीटों के नुकसान की भरपाई की कोशिश में वह सीधे सौ मुस्लिम प्रभावित सीटों पर मुसलमान वोटों के बंटवारे या हिंदू वोटों की एकजुटता की आस में है.‘’
सुशोवन कहते हैं कि पिछली बार भाजपा ने जिस कदर माहौल बनाया था कि वह सत्ता में आ रही है, उससे बंगाल के लोगों को भी शंका हो गई थी. वे कहते हैं कि इतना तय था कि जो भी आएगा वो दूसरे की पिटाई जरूर करेगा. टीएमसी जीती, लेकिन उसने भाजपा के लोगों को छुआ तक नहीं. इस चक्कर में भाजपा को कोई शहीद नहीं मिल पाया. उसके बाद से ही भाजपा दिशाहीन हो गई. वे कहते हैं, ‘उसके पास टीवी स्टार तो हैं, मोहल्ले में पिटने वाले स्टार नहीं हैं. पांच साल तक अपने कैडर को लगातार लाभार्थी बनाए रखने का उसके पास कोई तरीका नहीं है क्योंकि संगठन ऑर्गेनिक ढंग से खड़ा नहीं हो सका है. इसके अलावा, कोई तीसरी बड़ी पार्टी है नहीं जिसके कंधे पर चढ़कर वह सत्ता में आ जाए, जैसा उसने कुछ राज्यों में किया.’
बंगाल में तीन दशक से नागरिक मंच के माध्यम से विस्थापन, पर्यावरण और बेदखली पर आंदोलन चलाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता नबो दत्ता की इस मामले में अलहदा राय है. वे टीएमसी का दुश्मन खुद उसी को मानते हैं. वे कहते हैं, ‘’यहां टीएमसी के खिलाफ जो बोलेगा उसका जान खत्म हो जाएगा. इसलिए चुनाव के टाइम अंदर से कौन क्या करेगा, कौन जानता है. सबको आतंकित किया है न! आसान नहीं है बोलना क्योंकि सरकार पंद्रह साल रहने के बाद आप कैसे बोलोगे कि सरकार चला जाएगा? लेकिन जाने की बहुत संभावना है.‘’
लोग भाजपा को क्या सोचकर वोट देंगे? इस सवाल पर उनका साफ मत है, ‘’सवाल एक ही है कि विकल्प क्या है, पर उस तरह का सोच के तो कोई थोड़ी वोट देता है. बुद्धो बाबू को लोग जब हटाया तो ये सोच के ममता को थोड़ी वोट दिया था कि वो विकल्प है. बस इतना था कि इसको हटाओ, फिर देखा जाएगा. उसी तरह होता है. बंगाल में इसीलिए टीएमसी को इतना कुछ करना पड़ रहा है. ये मंदिर जो बना रहा है, वो सब बीजेपी से लड़ाई लड़ने के लिए जो कुछ कर रहा है, वो लड़ाई वास्तव में बीजेपी से नहीं अपने प्रति विरोध से है. उनके संगठन के भीतर जो नेगेटिव चीज चल रहा है उसके खिलाफ ये लड़ाई है. उसको कैसे मैनेज करना है ये उसको अभी सोचना है.‘’
दत्ता जिस ‘नेगेटिव चीज’ की बात कर रहे हैं, उसकी पुष्टि ममता बनर्जी की करीबी एक सेलिब्रिटी संगीतकार करती हैं. नाम न छापने की शर्त पर वे कहती हैं, ‘टीएमसी के नेताओं का इस माहौल में कुछ चाहना न चाहना, उसकी कोई कीमत नहीं है. सब खरीदे हुए टट्टू हैं. कोई वफादार नहीं है. एक बार उन्हें लगा कि बीजेपी की हवा है तो सबसे पहले वे बीजेपी की मशीन में जाकर अपने कपड़े धुलवा लेंगे. इसी बात से दीदी परेशान हैं. उनकी पार्टी में सामान्य लोग नहीं हैं. सब गुंडे हैं. उनका राजनीतिक गिरोह है.’ वे अपनी बात को वजन देने के लिए टीएमसी से भाजपा में गए वरिष्ठ नेता मुकुल रॉय का प्रसंग छेड़ती हैं, जिनकी मौत बीती 23 फरवरी को हुई थी.
विकल्प का सवाल
पश्चिम बंगाल में विकल्प का सवाल अभी सार्वजनिक महत्व नहीं पा सका है क्योंकि आम बंगाली मतदाता बदलाव के मूड में नहीं दिखता. इस मामले में प्रवासी और बंगाली का स्पष्ट विभाजन है. उत्तर प्रदेश और बिहार के प्रवासी निरपवाद रूप से भाजपा के समर्थन में दिखते हैं, लेकिन बंगाल का आदमी भ्रष्टाचार और समस्याओं के बावजूद यथास्थिति के पक्ष में है.
विकल्प का सवाल फिलहाल केवल नॉन-पार्टी बौद्धिक और एक्टिविस्ट तबके तक सीमित है, जिसने आरजी कार बलात्कार और हत्याकांड के खिलाफ लंबे समय बाद कोलकाता की सड़कों पर जनांदोलन को जिंदा किया था. इस तबके का मानना है कि भाजपा और टीएमसी में कोई बुनियादी फर्क नहीं है, इसलिए विकल्प कोई तीसरा होना चाहिए. इसमें कॉलेज शिक्षकों, डॉक्टरों, और छात्रों का समूह मुख्य है, जिन्होंने 24 फरवरी को राजा राममोहन रॉय लाइब्रेरी के सभागार में ‘फासीवाद-तानाशाही उदारवाद के खिलाफ मंच बनाने के लिए सम्मेलन’ का आयोजन किया था.
आरजी कार आंदोलन के दौरान गिरफ्तार हुए आंदोलन का प्रमुख चेहरा रहे वाम छात्रनेता कोल्टन दासगुप्ता को सीपीएम ने इस बार पानीहाटी विधानसभा से प्रत्याशी बना दिया है. विडम्बना यह है कि जिस प्रशिक्षु डॉक्टर का बलात्कार हुआ और बाद में हत्या कर दी गई, उसकी मां को पानीहाटी से भाजपा ने चुनावी मैदान में उतारा है. बिलकुल इसी तर्ज पर भाजपा ने दो साल पहले संदेशखाली में हुए उत्पीड़न-विरोधी आंदोलन की नेत्री रेखा पात्रा को बगल की सीट हिंगलगंज से प्रत्याशी बनाया है.
टीएमसी के राज में हुए सरकार विरोधी आंदोलनों से भाजपा भले अपने प्रत्याशी खींच रही है, लेकिन आंदोलनकारी बौद्धिक तबका अब भी अपनी भावना और प्रस्ताव दोनों में भाजपा-संघ और तृणमूल विरोधी है. सुशोवन की मानें, तो बंगाल या मोटे तौर से कलकत्ते का प्रगतिशील वर्ग चुनाव के लिहाज से न तो नुकसानदायक है और न ही किसी काम का, वह केवल अपनी प्रासंगिकता ढूंढ रहा है.
जाधवपुर में रहने वाले वरिष्ठ फिल्म समीक्षक विद्यार्थी चटर्जी इसी प्रगतिशील तबके के एक प्रतिनिधि हैं जो भाजपा और टीएमसी के संघर्ष को हार्ड कम्युनलिज्म और सॉफ्ट कम्युनलिज्म के बीच की नूराकुश्ती मानते हैं. वे एक तीसरी बात कहते हैं, ‘’एक बार को भाजपा-संघ केरल जीत गया तो वहां रह जाएगा. बंगाल में एक बार घुस गया न, तो बहुत लात खाएगा. यही है बंगाल का केरल से फर्क. वैसे तो यहां वे चुनाव जीतने नहीं जा रहे, लेकिन इस बार उनकी सीटें पहले से कहीं ज्यादा बढ़ेंगी... सोचो उसके बाद क्या होगा? सोचो, घुस गया, सरकार बना लिया, तो वही उसका पहला और अंतिम सरकार होगा. फिर से आजमायी हुई दूसरी पार्टियां सामने आ जाएंगी. केरल, बंगाल के मुकाबले कहीं ज्यादा सांप्रदायिक है. ये फर्क समझने के लिए आपको बंगाल में आकर कुछ दिन रहना होगा.‘’
वे इस फर्क के पीछे 1905 से शुरू कर के बंगाल के विभाजन का लंबा इतिहास बताते हैं. उनके मुताबिक पंजाब का विभाजन बेशक बहुत हिंसक था, लेकिन वह एक बार का ‘ईवेंट’ था. उसके उलट बंगाल का विभाजन रोज घटने वाली घटना है, दैनिक जीवन का अनिवार्य तथ्य है. वे कहते हैं कि विभाजन के दौरान पंजाब में तो सरहद के दोनों ओर आबादी की पूरी अदलाबदली हुई लेकिन पूर्वी और पश्चिम बंगाल के बीच ऐसा नहीं हुआ, ‘’दोनों के बीच इतनी लंबी और खुली सीमा है कि यहां विभाजन लगातार चालू रहने वाली एक प्रक्रिया है. यहां दिन के हर पल यह जिया जाने वाला ईवेंट है.‘’ इसीलिए अगर भाजपा किसी कारण से बंगाल की सत्ता में आ भी गई तो हिंदू-मुसलमान का खेल बहुत दिन तक नहीं चलेगा.
टीएमसी और भाजपा के बराबर विरोधी नबो दत्ता इस बात को दूसरे ढंग से समझाते हैं, ‘’एकमात्र चीज जो हिंदू और मुस्लिम को अपनी-अपनी पहचान छोड़कर एक जगह ले आई थी वो था लेफ्ट. जब तक लेफ्ट फ्रंट था यहां, हिंदू मुस्लिम का वोट बंटता नहीं था. यही एक पॉजिटिव चीज थी. आज बंटवारा हो गया है. ये गलत है. ये ज्यादा दिन चलेगा नहीं. बंगाल का जो अपना उसूल है वो ज्यादा दिन इस बात को नहीं मानेगा. बैकलैश तो जरूर होगा. इस बार नहीं तो अगली बार.‘’
हाशिये का मसला केंद्र में
सामान्यत: राजनीतिक, आर्थिक और साहित्यिक-सांस्कृतिक मसलों पर सोचने-बतियाने वाले लोगों के लिए भी इस चुनाव में सांप्रदायिकता का सवाल इसलिए केंद्रीय हो गया है क्योंकि सतह पर वही दिख रहा है. चाहे फुरफुरा शरीफ से लेकर भांगड़ तक नौशाद सिद्दीकी की पार्टी का मामूली असर हो और वाम मोर्चा के साथ उसका गठबंधन; अपने गमछों के लिए मशहूर मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में हुमायूं कबीर के फाउंडेशन की निर्माणाधीन बाबरी मस्जिद हो; कोलकाता में ओवैसी का स्वागत करते कटआउट या फिर राज्य भर में ममता बनर्जी द्वारा बनवाए जा रहे मंदिर; मतदाताओं से जुड़े अनिवार्य मुद्दे हाशिये पर जा चुके हैं जबकि केंद्र में हाशिये का मुद्दा आ चुका है- यानी धर्म, जो बंगाल के सहज मिजाज से मेल नहीं खाता.
सुशोवन बताते हैं, ‘’पहले हावड़ा के साइड में बाहर से आया कुछ लोग रामनवमी मनाता था, उपवास रखता था. भाजपा ने उसको पकड़ा. बोला, मुसलमान मुहर्रम में जुलूस निकालेगा तो हिंदू कोई चूड़ी पहन रखा है, हम भी जुलूस निकालेंगे. फिर हाथ में तलवार लेकर मोटरसाइकिल से भाजपा रामनवमी का जुलूस निकालने लगा. टीएमसी ने बदले में अपना रामनवमी शुरू कर दिया. तलवार लेकर. उसका तलवार मुसलमानों के नहीं, भाजपा की ओर था.‘’
सूबे में ममता बनर्जी द्वारा दीघा में बनवाए जगन्नाथ धाम की खास चर्चा है. कुछ जगहों पर बीते पांचेक साल में छोटे-छोटे जगन्नाथ मंदिर भी उग आए हैं. जैन मंदिरों से लेकर अलग-अलग किस्म के धार्मिक स्थल, दुर्गांगन, आदि पर्याप्त प्रचारित हुए हैं. इसी के समानांतर मुसलमानों के लिए विशेष सब्सिडी, आदि भी प्रचारित योजनाएं हैं. सुशोवन कहते हैं, ‘’हिंदुओं के लिए कोई कुछ कर ले दीदी कुछ नहीं कहेगी, लेकिन मुसलमानों के मुद्दे पर कोई दावा नहीं कर सकता.‘’
इस प्रतिस्पर्धी सांप्रदायिकता का ही नतीजा था कि हुमायूं कबीर ने जब बीते साल दिसंबर में बाबरी मस्जिद की योजना सार्वजनिक की तो ममता ने उन्हें भाजपा का एजेंट कहकर पार्टी से निकाल दिया. उसके बाद हुमायूं ने 6 दिसंबर, 2025 को बेलडांगा रेलवे स्टेशन से रेजीनगर की ओर जाने वाली सड़क पर कोई चार किलोमीटर आगे एक खेत में बाबरी मस्जिद की नींव रख दी और पलट कर ममता के ऊपर आरएआरएसएस की शह पर काम करने का आरोप लगा डाला.
कलकत्ते से बेलडांगा बमुश्किल दो सौ किलोमीटर दूर है, लेकिन दिलचस्प है कि बाबरी को बनाए जाने की घटना राजधानी में चर्चा का विषय नहीं बन सकी. ठीकठाक पढ़े-लिखे लोगों ने इसे हलके में लिया. बेशक दिल्ली तक इसकी खबरें छपीं, लेकिन हुमायूं कबीर को बहुत से बहुत ‘खुराफाती’ कह कर कलकत्ता और दिल्ली के विद्वानों ने टाल दिया. इसकी एक वजह तो यह थी कि किसी ने बेलडांगा जाकर बाबरी निर्माण स्थल को देखने की जहमत नहीं उठाई. दूसरे, इस बात को कोई शायद हवा भी नहीं देना चाह रहा था. नतीजा यह हुआ है कि केंद्रीय बलों की सुरक्षा पाए हुमायूं की पार्टी अबकी एमआइएम के साथ गठबंधन में सारी सीटों पर प्रत्याशी खड़ा कर रही है. उधर, सोशल मीडिया पर चुटकुले चल रहे हैं कि बाबरी बनवाने वाले आदमी को केंद्र की भाजपा सरकार सुरक्षा दिलवा रही है.
बाबरी परियोजना कितनी बड़ी और कितनी अहम हो सकती है बंगाल के सामाजिक सौहार्द के लिए, इसका अंदाजा वहां जाकर ही लगता है. फिलहाल अधिग्रहित कुल 32 बीघा जमीन में मस्जिद के अलावा वहां एक अस्पताल, कॉलेज, स्कूल और कई होटल बनने हैं. नींव खोदी जा चुकी है. एक स्थायी दफ्तर भी बना हुआ है जहां चंदा इकट्ठा किया जा रहा है. कुछ स्टॉल लगे हैं जिन पर ‘आइ लव बाबरी’ छपी हुई टीशर्ट, मग, लॉकेट, और कई किस्म के सजावटी सामान बिक रहे थे. दफ्तर के मैनेजर हसन ने हमें बताया कि दो-तीन साल में सब बनकर तैयार हो जाएगा. उनके मुताबिक चंदे की कोई कमी नहीं हो रही है, पैसा रोज बोरों में भरकर आ रहा है.
सैकड़ों करोड़ के इस प्रोजेक्ट ने यहां सड़क खेती और बाग की जमीनों के दाम आसमान पर पहुंचा दिए हैं. सड़क के उस पार तो अभी से ही जमीनें बिक चुकी हैं और होटल बन रहे हैं. वापसी में टोटोवाला बता रहा था कि कोई दस-पंद्रह लाख कट्ठा जमीन का दाम पहुंच गया है.
सुशोवन कहते हैं, ‘’बंगाली मुसलमान कभी शहरी नहीं थे. गांव के थे. अभी तो नौकरी के लिए वो लोग केरल तक चले जाते हैं, वो अलग बात है. इसलिए बंगाली मुसलमान को आप नफरत का प्रतीक बना नहीं पाओगे. क्या बोलोगे? लुंगी पहन के घूमता है? बस में भाड़ा नहीं देता है? बिना हेलमेट का घूमता रहता है? ये सब तो खुन्नस है न. क्या आरोप लगाओगे? लेकिन अब आप बाबरी वाबरी दिखाना चालू करोगे तो मुसलमानों से नफरत का एक प्रतीक खड़ा हो जाएगा न!’’
चुनाव की घोषणा से पहले हुमायूं से तीन बार मिलने वाले सीपीएम नेता मोहम्मद सलीम को लेकर भी शिकायतें है, जिनके सामने हुमायूं ने गठबंधन की शर्त रख दी थी कि सीपीएम खुद को वाम मोर्चा से अलग कर ले. सीपीएम पहले आइएसएफ के साथ भी ऐसा एक प्रयोग कर चुकी है, जिसकी छवि मुसलमानों की पार्टी के रूप में बन चुकी है, भले ही उसके नाम में सेकुलर लगा है. फुरफुरा शरीफ के एक धार्मिक संप्रदाय से निकली पार्टी आइएसएफ में कुछ साल पहले लेफ्ट के बहुत से लोग घुस आए थे. जब लोकसभा चुनाव में लेफ्ट के साथ उसने गठजोड़ करने में आनाकानी की तो लेफ्ट के लोग बाहर निकल आए. उसके बाद से आइएसएफ का दायरा और संकीर्ण हो गया.
भांगड़ से आइएसएफ के इकलौते विधायक नौशाद से फोन पर बातचीत और फुरफुरा शरीफ जाने के बावजूद उनसे मुलाकात संभव नहीं हो पाई, लेकिन एक छोटी सी पार्टी के सियासी वजूद के पीछे की मजहबी ताकत का अंदाजा जरूर लगा. नौशाद के घर पर भी केंद्रीय सुरक्षा बल के जवान तैनात मिले.
जीत-हार के बीच पतली लकीर
चूंकि बंगाल में ममता बनर्जी का सिक्का मुसलसल चल रहा है, तो सवाल है कि टीएमसी की सरकार अगर बच गई तो आगे क्या होगा. ममता बनर्जी ने केंद्र की राजनीति में अपनी आकांक्षाओं को खुलकर जाहिर कर दिया है. उन्होंने साफ कह दिया है कि बंगाल चुनाव में जीत के बाद उनका अगला पड़ाव दिल्ली होगी. यदि ऐसा है, तो चुनाव के बाद बंगाल का क्या होगा?
कुछ लोगों का साफ मानना है कि बंगाल को लेकर आरएसएस किसी जल्दी में नहीं है. बंगाल चुनाव में संघ की ओर से प्रभारी रह चुके एक नेता अनौपचारिक बातचीत में बताते हैं कि आरएसएस बंगाल को खींच कर लंबी दौड़ में खेलने की योजना बना रहा है. उसकी रणनीति है कि ममता को इतना धक्का दो सांप्रदायिक राजनीति की ओर ताकि सबसे पहले वामपंथ की जमीन यहां खत्म हो सके. वे कहते हैं कि असल सवाल वामपंथ के ईकोसिस्टम का है जो अब तक कायम है. उसे एक बार खत्म कर दिया जाए तो भाजपा को रोकना संभव नहीं होगा. यानी बंगाल में भाजपा आए या टीएमसी रहे, लंबी दौड़ का नतीजा एक ही होना है. बस समय का फेर है.
जीत या हार के महीन अंतर को पाटने में ममता की चलाई दर्जन भर योजनाएं फिलहाल सक्षम दिख रही हैं. इसकी गवाही समूचे सूबे में लगे सरकारी शिविरों के बाहर और भीतर लोगों की भारी भीड़ दे रही है. फिर भी, नबो दत्ता की मानें तो ‘’ममता सबसे ज्यादा नाकाम इसलिए होंगी क्योंकि बुद्धो बाबू से लड़ाई लड़ के उनको जो सुविधा मिली थी डेमोक्रेटिक स्पेस की, उस स्पेस को पंद्रह साल में उन्होंने खत्म कर दिया है. बंगाल में दिल्ली वाला पीएमओ मॉडल चल रहा है. यहां सब कुछ सीएमओ है.‘’
सवाल बस इतना है कि मतदाताओं को डेमोक्रेटिक स्पेस चाहिए या योजनाओं के हजार-डेढ़ हजार रुपये और मंदिर-मस्जिद! सीटों के शुद्ध गणित के हिसाब से देखें तो पश्चिम बंगाल का चुनाव वास्तव में खत्म हो चुका लगता है. रसायन के हिसाब से देखें तो चुनाव अभी शुरू होने को है. ममता अगर आगामी 4 मई को अपनी सरकार बचा पाने में सफल रहीं, तो उसका श्रेय उन्हें नहीं बल्कि विपक्ष की कमजोरी के खाते में जाएगा. यदि वे सरकार नहीं बचा पाईं तो उसकी कई वजहें हो सकती हैं, जिनमें एक बड़ी वजह खुद उनका अपना कार्यकाल है जिसमें उन्होंने अपने विरोधियों की तर्ज पर मतदाताओं और लोगों से बरताव किया है. यानी, 2026 की लड़ाई ममता बनर्जी की खुद से है, अपनों से है और बंगाल के मूल मिजाज से है.
पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी के विधानसभा चुनाव घोषित हो चुके हैं. इस बार की चुनावी कवरेज एक बड़ा और दो-तीन टीमों का साझा प्रयास है: श्रीनिवासन जैन विशेष इंटरव्यूज़ और ज़मीनी रिपोर्ट लेकर आ रहे हैं; 'द न्यूज़ मिनट' दक्षिण भारत से आपको हर सियासी अपडेट देगा और 'अनदर इलेक्शन शो' के साथ-साथ हमारे रिपोर्टर, बंगाल और असम की गहराई से पड़ताल करेंगे. इन कहानियों को आप तक लाने में हमारे चुनावी सेना प्रोजेक्ट को सहयोग करें.
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