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यूएनआई से खाली करवाई गई जमीन: दिल्ली पुलिस की पत्रकारों से बदतमीजी और जबरदस्ती पर उठे सवाल
समाचार एजेंसी यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ़ इंडिया (यूएनआई) के दफ्तर को शुक्रवार शाम दिल्ली पुलिस ने सील कर दिया. उस समय पर मौजूद रहे कर्मचारियों के मुताबिक, दफ्तर में शाम साढ़े छह बजे के पास करीब 300 पुलिसकर्मी अंदर घूस गए और जबरन सभी को बाहर निकालने लगे. इस बीच कोई कुछ समझ नहीं पाया और वहां अफरातफरी का माहौल हो गया. आरोप है कि पुलिसकर्मियों ने इस दौरान कर्मचारियों के साथ गाली गलौज और धक्कामुक्की की.
वहीं, यूएनआई ने सोशल मीडिया पर एक बयान जारी कर इसे प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला बताया है. बयान के मुताबिक, "कर्मचारियों को जबरन बाहर निकाला गया, जिनमें से कई को अपना व्यक्तिगत सामान भी ले जाने की अनुमति नहीं दी गई. दिल्ली पुलिस की टीमों द्वारा महिला पत्रकारों के साथ बदसलूकी की गई. कुछ पुलिसकर्मी नशे की हालत में थे, और गाली गलौज भी की गई."
यूएनआई के साथ 1989 से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार मनोहर सिंह न्यूज़लॉन्ड्री से कहते हैं कि यूएनआई के फाउंडेशन डे से एक दिन पहले शुक्रवार शाम को ऐसा हुआ. हम इससे बेहद दुखी हैं. 6 दशक से ज्यादा से काम करने वाली न्यूज़ एजेंसी के साथ ऐसा व्यहवार किया गया.
यूएनआई हिंदी सर्विस के ब्यूरो चीफ और डिप्टी एडिटर सिंह कहते हैं, "जिस जमीन पर यूएनआई का दफ्तर है, उसकी लीज को लेकर कोर्ट का शुक्रवार को फैसला आया. जिसमें लीज कैंसिल कर दी गई. इसकी जानकारी दफ्तर में किसी को भी नहीं थी. अचानक से दिल्ली पुलिस और पैरा मिलिट्री फोर्स के लगभग 300 जवानों का झुंड हमारे दफ्तर में घुस गया वो भी बिना किसी कोर्ट ऑर्डर के. हम लोगों को जबरन बाहर निकाल दिया गया. इस दौरान हमें पुलिस ने चेतावनी दी कि आपके पास सिर्फ 7 से 9 मिनट हैं, खाली कर दीजिए. वरना हमें निकालना आता है. इसके बाद हमारे साथ धक्कामुक्की की गई. एक-एक जर्नलिस्ट के पीछे 4 से 5 पुलिसकर्मी और सीआरपीएफ के जावन थे. इस बीच हमें कोई ऑर्डर नहीं दिखाया गया. सिर्फ माइक से बोल रहे थे कि हमारे पास इस परिसार को खाली करने का ऑर्डर है."
उन्होंने कहा, "हमें सामान तक नहीं निकालने दिया. माहौल ऐसा था कि जो लोग बाहर थे वह बाहर ही रह गए. कमर्शियल सिलेंडर नहीं मिलने के चलते आजकल हमारी कैंटीन भी बंद है. इसके चलते कुछ हमारे ऊर्दू सर्विस के साथी जो रोजा इफ्तारी के लिए बाहर गए थे, वह भी अंदर नहीं आ पाए. हमारे साथ आतंकवादियों जैसा व्यहवार किया गया. हमें लगता है यह सब पहले से सुनियोजित था. वर्तमान स्थिति के चलते अभी सभी लोगों को वर्क फ्रॉम होम दिया गया है. हमारी सर्विस प्रभावित होगी, सब्सक्राइबर्स छोड़कर जा सकते हैं. रेवेन्यू भी कमजोर होगा. अब इसका डर बना हुआ है."
वहीं, हिंदी, ऊर्दू और अंग्रेजी के सोशल मीडिया एडिटर साबिर हक कहते हैं, "6 बजे के करीब पैरा-मिलिट्री फोर्स, दिल्ली पुलिसकर्मी, कुछ वकील और गृह मंत्रालय के अधिकारी परिसर में कुछ इस तरह से घुसे कि कुछ समझ ही नहीं आया. अचानक से धावा सा बोल दिया. वकीलों ने हमें गालियां दीं. मुझे खुद को यूएनआई की मेन बिल्डिंग से घसीटकर निकाला, मैं गिर गया मुझे हाथ में चोट भी आई है. इसके बाद हम बाहर धरने पर बैठे तो वहां से भी मुझे घसीटकर उठाया गया. यही हमारी महिला कर्मचारियों के साथ हुआ उन्हें भी घसीटा गया."
वे सवाल करते हैं कि चार बजे के आस- पास कोर्ट का फैसला आया और 6 बजे यह सब कर दिया. ऐसा कहां होता है.
यूएनआई कार्यालय में हुई इस पुलिसिया कार्रवाई के तमाम वीडियो सोशल मीडिया पर उपलब्ध हैं. देखा जा सकता है कि भारी तादात में पुलिसकर्मी कर्मचारियों को परिसर से बाहर निकाल रहे हैं. कर्मचारियों ने कुछ वीडियो न्यूज़लॉन्ड्री के साथ भी साझा किए हैं. एक वीडियो में देखा जा सकता है कि एक अधिकारी कहते है कि कोर्ट का साफ आदेश है कि यह परिसर तुरंत आपको खाली करना होगा. इस पर साबिर हक कहते हैं कि लेकिन कोर्ट ने आपको यहां गाली देने का आदेश नहीं दिया है. इसके बाद अधिकारी माफी मांगते हुए भी नजर आते हैं.
एक अन्य वीडियो में पुलिस महिला और पुरुष कर्माचारियों को धक्का मारकर भगाते हुए नजर आ रही है. इस बीच एक महिला कर्मचारी फर्श पर तेजी से गिर जाती हैं. इसके बाद सब वहां पुलिस की इस कार्रवाई पर सवाल उठाने लगते हैं.
एजेंसी की अंग्रेजी सोशल मीडिया की हेड श्वेता मिश्रा कहती हैं कि हम लगातार पुलिस से नोटिस मांग रहे थे लेकिन उन्होंने हमें कुछ नहीं दिखाया. इस बीच उन्होंने हमारी सोशल मीडिया टीम की एक मेंबर को गाली दी. उसके बाद हमने उनसे कहा कि आप कैसे ऐसे किसी को गाली दे सकते हैं. अगर आपके पास हाईकोर्ट का ऑर्डर है और आपको यह जगह सील करनी है तो आप एक तरीके से करिए किसी को बेइज्जत नहीं कर सकते हैं.
वे आगे कहती हैं, "जो गालियां दे रहे थे उनमें से आधा दर्जन लोगों ने शराब पी हुई थी. हमारे साथ धक्कामुक्की की. हमारे कई साथियों को चोट आई है. महिला पुलिसकर्मी भी ऐसा बोल रही थीं कि इन सबको उठकर फेंक दीजिए. हमारे एडिटर को घसीटा गया है, हमारी महिला जर्नलिस्ट को जमीन पर घसीटा गया है. बताइए एक ऑफिस को सील करने के लिए दिल्ली पुलिस के साथ पैरा-मिलिट्री फोर्स भेजी गई है. वो सब मिलाकर 300 से ज्यादा लोग थे. हमारे कई साथियों को चोटें आई हैं."
यूएनआई में हुए इस पूरे विवाद को लेकर हमने कुछ रिपोर्टर्स से भी बात की.
रिपोर्टर दीपशिखा कहती हैं, "100 से 150 लोगों को निकालने के लिए 300 से ज्यादा लोग आए थे. उनके हाथ में लाठियां थीं. फिलहाल स्थिति यह है कि संपादक ने हमसे वर्क फ्रॉम होम करने के लिए कहा है. कुछ रिपोर्टर्स को स्टैट्समैन हाऊस से काम करने के लिए कहा गया है. दफ्तर को सील कर दिया गया है और बाहर एक नोटिस चस्पा कर दिया गया है."
चस्पा नोटिस पर लिखा है- "भारत सरकार आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय भूमि एवं विकास कार्यलय. नई दिल्ली की 9 रफी मार्ग स्थित संपत्ति को दिल्ली हाई कोर्ट के 20 मार्च 2026 के फैसले के अनुसार भारत सरकार ने 20 मार्च 2026 को अपने कब्जे में ले लिया है. एल एंड डीओ की अनुमति के बिना किसी भी व्यक्ति द्वारा परिसर में प्रवेश कब्जा या उपयोग करना सख्त मना है और इसके उल्लंघन पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी."
वहीं सीनियर कॉरेस्पोंडेंट रवि कहते हैं, "सभी लोग दफ्तर में रोजमर्रा की तरह काम कर रहे थे. फिर अचानक से रफी मार्ग पर जहां हमारा दफ्तर है, वहां बैरिकैडिंग लगा दी गई. पुलिस की आवाजाही भी काफी ज्यादा हो गई. हम लोगों को लगा कि लुटियंस में तो यह सब चलता रहता है, उसी का कुछ होगा. फिर अचानक से पुलिस की छह गाड़ियां हमारे दफ्तर में घुस गईं. जबकि दिल्ली पुलिस की कुछ बसें दफ्तर के बाहर खड़ी थीं. पुलिसकर्मियों ने अंदर आते ही कहना शुरू कर दिया कि इसे खाली कर दीजिए. दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश है. इस पर हमने आदेश की कॉपी मांगी. उन्होंने कहां कि उन्हें व्हाट्सएप पर नोटिस मिला है. हमने कहा कि सरकार और कोर्ट व्हाट्सएप से नहीं चलते हैं. इसके बाद उन्होंने बदतमीजी शुरू कर दी. उस समय तीनों- हिंदी, ऊर्दू और अंग्रेजी की सर्विस के सारे लोग, सोशल मीडिया, टेक्निकल, कैमरा टीम और एडमिन आदि सभी लोग काम कर रहे थे, जिन्हें बाहर निकाल दिया."
वे आखिर में जोड़ते हैं कि ऐसा करके प्रेस की आजादी पर हमला किया गया है. हमारे सभी सिस्टम और प्रयोग के अन्य सामान सभी अंदर रह गए हैं, उन्हें सील कर दिया गया है.
यूएनआई की वर्तमान मालिक कंपनी ‘द स्टेट्समैन’ ने इस पुलिस कार्रवाई को अत्याचार और भारत में मीडिया की स्वतंत्रता पर हमला बताया है. उसने सोशल मीडिया एक्स पर एक बयान जारी कर कहा कि यूएनआई के रफी मार्फ स्थित दफ्तर पर पुलिस फोर्स का हमला ऐसा था, जो किसी एंटी टेटर ऑपरेशन को भी शर्मसार कर दे. मैनेजमेंट को बाहर छोड़ दिया गया और अंदर कर्मचारियों को पीटा गया.
क्या है विवाद की पूरी कहानी?
दरअसल, यूएनआई के 9 रफी मार्ग स्थित कार्यालय को पुलिस ने भूमि आवंटन की शर्तों के उल्लंघन के आरोप में सील किया गया है. दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि संबंधित अधिकारी तत्काल प्रभाव से विवादित संपत्ति का कब्जा लें और यह सुनिश्चित करें कि उसका उपयोग कानून के अनुसार ही किया जाए.
कोर्ट ने यूएनआई की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने 29 मार्च 2023 को लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफिस द्वारा जारी पत्र को चुनौती दी थी. इस पत्र के जरिए 2,024 वर्ग मीटर जमीन का आवंटन रद्द किया गया था.
कोर्ट ने कहा कि याचिका में कोई ठोस आधार नहीं है, इसलिए इसे खारिज किया जाता है और सभी अंतरिम आदेश भी समाप्त किए जाते हैं.
अदालत ने जिक्र किया कि यह जमीन वर्ष 1979 में कई मीडिया संस्थानों के लिए साझा दफ्तर परिसर बनाने के उद्देश्य से दी गई थी, लेकिन चार दशकों से अधिक समय गुजरने के बावजूद यहां कोई निर्माण नहीं किया गया. कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि आवंटन की शर्तों में कई बार बदलाव किए गए और प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआई) जैसे सह-आवंटियों को भी जोड़ा गया, फिर भी इस जमीन पर कोई काम नहीं किया गया.
इस पूरे मामले पर हमने एजेंसी के मैनेजमेंट डायरेक्टर विनीत गुप्ता से भी बात करने की कोशिश की. हालांकि, उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. अगर उनका कोई जवाब आता है तो उस रिपोर्ट को अपडेट कर दिया जाएगा.
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