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लखनऊ: पुलिसकर्मी ने 'तोड़ डाले' पत्रकार के दोनों हाथ, 4 दिन बाद भी एफआईआर दर्ज नहीं
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में मामूली कहासुनी के बाद एक वर्दीधारी (पुलिसकर्मी) ने 50 वर्षीय पत्रकार के दोनों हाथ फ्रैक्चर कर दिए. यह घटना पास की एक दुकान में लगे सीसीटीवी और पत्रकार की गाड़ी में लगे डैशकैम में रिकॉर्ड हो गई. सीसीटीवी फुटेज में साफ दिख रहा है कि एक वर्धीधारी पत्रकार की गाड़ी का दरवाजा खोलता है और फिर उन्हें लात मारने लगता है. इस दौरान वह पत्रकार के दोनों हाथों को मोड़ देता है.
इस मामले में पीड़ित पत्रकार शमीम अख्तर का कहना है कि इस घटना के बाद उन्होंने 112 नंबर पर पुलिस को कॉल कर मदद मांगी. दो पुलिसकर्मी मौके पर भी पहुंचे लेकिन तब तक आरोपी मौके से फरार हो चुका था.
यह घटना रविवार 15 मार्च शाम करीब पौने पांच बजे इंदिरा नगर थाना इलाके की है.
झगड़े की वजह
पत्रकार शमीम अख्तर अपनी कार से नानी होटल के सामने चंदन रोड की ओर मुड़ रहे थे. तभी सामने से आ रही एक कार से वह हल्का सा टकरा गई. हालांकि, शमीम का दावा है कि उन्हें इसका अंदाजा नहीं लगा.
वह न्यूज़लॉन्ड्री से बताते हैं, "इसके बाद वर्दी पहने एक शख्स ने पीछे से आकर मुझे गालियां देनी शुरू कर दीं और बदतमीजी करने लगा. उसका आरोप था कि मैंने उसकी गाड़ी को टक्कर मार दी है. इसके बाद उसने मुझपर हमला कर दिया. जिसके चलते मेरे दोनों हाथों में फ्रैक्चर है."
पत्रकार अख्तर का कहना है कि वह इंदिरा नगर थाने के कई चक्कर काट चुके हैं लेकिन पुलिस एफआईआर दर्ज करने को तैयार नहीं है. इसके चलते उन्होंने उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल, उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग, पुलिस उपायुक्त पूर्वी जोन लखनऊ और पुलिस आयुक्त कार्यालय लखनऊ में लिखित शिकायत की है.
उन्होंने कहा, "घटना के बाद जब मैं थाने गया तो पुलिस ने मेरा मेडिकल तक नहीं कराया और जांच करने की बात कहते रहे. इसके बाद मैं खुद ही राम मनोहर लोहिया अस्पताल गया और अपना मेडिकल कराया. जहां मेरे दोनों हाथों में फ्रैक्चर की पुष्टि हुई."
वह भारी मन से पूछते हैं कि एक पुलिसवाले में किसी के हाथ तोड़ने की हिम्मत कहां से आई या फिर वर्दी पहनकर आदमी इतना बेलगाम हो जाता है?
वह कहते हैं, “ये तो इत्तफाक है कि जहां यह घटना हुई वहां सीसीटीवी लगा था और मेरी खुद की गाड़ी में भी डैशकैम था. जिससे उसकी गुंडागर्दी रिकार्ड हो गई."
पुलिस ने क्या बताया?
इस मामले में न्यूज़लॉन्ड्री ने इंदिरा नगर थाना के एसएचओ अजय नारायण सिंह से बात की. उनका कहना है कि वे इस दौरान छुट्टी पर थे और उन्होंने बीते दिन यानी 17 मार्च को ही ड्यूटी ज्वाइन की है. इस दौरान उनका चार्ज एसआई ब्रजेश संभाल रहे थे. इसलिए इस घटना के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है.
इसके बाद हमने एसआई ब्रजेश से बात की. ब्रजेश दावा करते हैं कि 7 से 15 मार्च तक वह खुद छुट्टी पर थे. जब हमने पूछा कि इस बीच थाना कौन संभाल रहा था तो ब्रजेश ने हमें एसएचओ से ही बात करने को कहा.
इसके बाद हमने क्षेत्रीय एसीपी अनिंद्य विक्रम सिंह से बात की. उन्होंने बताया कि इस मामले में पुलिस जांच कर रही है. वीडियो और तस्वीरों के आधार पर आरोपी को ढूंढा जा रहा है. साथ ही उन्होंने कहा कि घटना में आरोपी पुलिसकर्मी के लिए जो नाम लिया जा रहा है, उस शनि नाम का इंदिरा नगर थाने में कोई पुलिसकर्मी नहीं है.
आरोपी के वीडियो फुटेज वायरल हैं तो अभी तक एफआईआर क्यों नहीं हुई है? हमारे इस सवाल पर एसीपी फिर से जांच की बात दोहराते हैं और कहते हैं कि डॉक्टर से बात करेंगे और फिर एफआईआर दर्ज करेंगे.
वहीं, पत्रकार अख्तर कहते हैं कि उन पर समझौते का दवाब बनाया जा रहा है. अख्तर ने हमें कुछ ऑडियो भी साझा किए हैं. जिनमें उनसे समझौते की गुजारिश की जा रही है.
ऐसी ही एक रिकार्डिंग में एक शख्स खुद को थाना महानगर से बताते हुए कॉल करता है. वह अख्तर से कहते हैं, “आपका जो हमारे साथ के लड़के से विवाद हुआ है, उसे माफ कर दीजिए. हम उसे लेकर आपके पास आ रहे हैं.”
साथ ही वह दावा करते हैं कि कथित पुलिसकर्मी इंदिरा नगर थाने में ही तैनात है.
मालूम हो कि कि पत्रकार अख्तर द लखनऊ ऑब्जर्वर नाम से अंग्रेजी मैगजीन निकालते थे. साथ ही द लखनऊ पोस्ट नाम से ऑनलाइन प्लेटफार्म चलाते थे. उनका कहना है का वह फिर से इस मैग्जीन को लॉन्च कर रहे हैं. फिलहाल वह फ्रीलांसर के तौर पर काम कर रहे हैं.
इस पूरे मामले पर उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब के अध्यक्ष रविंद्र कुमार सिंह कहते हैं कि ऐसी किसी घटना की उन्हें जानकारी नहीं है. वे कहते हैं, “इस घटना का लखनऊ में कोई जिक्र नहीं है. दूसरी बात जब उन्हें कोई जानता ही नहीं है तो फिर उनके लिए कौन विरोध करेगा. वे पत्रकार हैं भी या नहीं इसकी भी कोई जानकारी हमें नहीं है."
मणिकर्णिका घाट से काशी विश्वनाथ कॉरिडोर तक, उजड़े (ढहा दिए गए) घरों और खामोश हो चुके मोहल्लों के बीच यह सीरीज़ बताएगी कि कैसे तोड़फोड़ की राजनीति बनारस की सिर्फ़ इमारतें नहीं, उसकी आत्मा को भी बदल रही है. बनारस पर हमारे इस सेना प्रोजेक्ट को सपोर्ट करिए.
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