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14 साल का इंफ्लुएंसर, लाखों फॉलोअर्स… और अब एफआईआर: कौन है अश्वमित गौतम?

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के एक मोहल्ले में रहने वाले 14 साल के अश्वमित गौतम की दिनचर्या उनके हमउम्र बच्चों से बिलकुल अलग है. जहां उनकी उम्र के बच्चे बोर्ड परीक्षाओं के सिलेबस और क्रिकेट स्कोर की चर्चा करते हैं, वहीं अश्वमित अपनी छोटी सी चारदीवारी में देश की जीडीपी, राजनीति और विपक्षी गठबंधन के भविष्य पर मंथन करते हैं. इंस्टाग्राम पर लाखों फॉलोवर्स के साथ अश्वामित देश के गंभीर मुद्दों पर बेबाकी से अपनी राय रखते हैं. लोग उन्हें ‘छोटा रवीश कुमार’ और ‘ध्रुव राठी’ कहकर भी बुलाते हैं. हालांकि, अश्वामित का कहना है, "मुझे यह कहलाना बिल्कुल भी पसंद नहीं है, मेरा इतना प्यारा नाम है अश्वामित गौतम, मैं उसी से अपनी पहचान बनाना चाहता हूं."

बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर से प्रेरित अश्वामित गौतम का इंस्टाग्राम बायो कहता है- शिक्षा वह शेरनी का दूध है, जो पीयेगा वह दहाड़ेगा. अश्वामित भी देश की अर्थव्यवस्था, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता, जातिवाद समेत ढेरों गंभीर मुद्दों पर बेबाकी से अपनी बात रखते दिखते हैं. 

अश्वमित की कहानी सिर्फ डिजिटल प्रसिद्धि की नहीं है. अपने खुले विचारों और राजनीतिक टिप्पणियों के लिए उन्हें अपने ही मोहल्ले और रिश्तेदारों की तीखी आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है. जनवरी, 2026 में यह मामला असहमति से बढ़कर एफआईआर तक पहुंच गया. 

हाथरस में उनकी एक वायरल रील से आहत होकर एक व्यक्ति ने पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी. जिसके बाद लखनऊ पुलिस ने उन्हें भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 170,126,135 के तहत एहतियातन हिरासत में ले लिया. हालांकि, उन्हें जल्द ही रिहा कर दिया गया.

इस बारे में अश्वमित कहते हैं, “शुरुआत में डर लगा था. आज जब सुन रहे हैं कि एफआईआर हो रही है, लोग जेल में हैं तो एकदम से डर लगा था लेकिन फिर दोस्तों ने समझाया कि भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद सब ही तो जेल गए थे. यह सब तो चलता ही रहता है."

अश्वमित का लक्ष्य सिर्फ वायरल होना नहीं है. उनका सपना है अमेरिका की प्रतिष्ठित येल यूनिवर्सिटी जाना और वहां से राजनीति और पत्रकारिता की बारीकियां सीखना.

इस रिपोर्ट में हमने अश्वमित के उस छोटे से 'न्यूज़रूम' का जायजा लिया, जहां से वह हर रोज़ सत्ता से सवाल पूछते हैं. साथ ही हमने यह समझने की भी कोशिश की कि क्या हमारा लोकतंत्र इतना नाजुक है कि एक 14 साल के बच्चे की रील से उसे खतरा महसूस होने लगता है?

देखिए अश्वामित का अब तक का सफर इस रिपोर्ट में. 

मणिकर्णिका घाट से काशी विश्वनाथ कॉरिडोर तक, उजड़े (ढहा दिए गए) घरों और खामोश हो चुके मोहल्लों के बीच यह सीरीज़ बताएगी कि कैसे तोड़फोड़ की राजनीति बनारस की सिर्फ़ इमारतें नहीं, उसकी आत्मा को भी बदल रही है. बनारस पर हमारे इस सेना प्रोजेक्ट को सपोर्ट करिए.

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