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पहलगाम हमला: दस महीने बीते, पीड़ित परिवार अब भी सरकारी मदद की राह देख रहा
पहलगाम हमला आपको याद है? 22 अप्रैल 2025 को दक्षिण कश्मीर के मशहूर पर्यटन स्थल पहलगाम की बैसरन घाटी में हुए आतंकी हमले ने देशभर को झकझोर दिया था. इस हमले में 26 लोगों की जान गई थी. मारे गए लोगों में एक नेपाली नागरिक के अलावा भारत के अलग-अलग राज्यों से घूमने आए पर्यटक और स्थानीय लोग शामिल थे. इन्हीं में ओडिशा के बालासोर के रहने वाले प्रशांत कुमार सतपथी भी थे.
कुमार, बालासोर जिले के सेंट्रल इंस्टिट्यूट ऑफ प्लास्टिक इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (सीआईपीईटी) में अकाउंट असिस्टेंट के पद पर काम करते थे. वह पहलगाम अपनी पत्नी और बच्चे के साथ छुट्टियां मनाने गए थे. लेकिन लौटकर घर नहीं आ सके. उनके पीछे एक ऐसा परिवार रह गया, जिसकी जिंदगी उस एक दिन के बाद हमेशा के लिए बदल गई.
इस आतंकी हमले में मारे गए लोगों के परिजनों के लिए उनकी राज्य सरकारों ने मुआवजा और सरकारी नौकरी देने का वादा किया था. लेकिन घटना के लगभग दस महीने बाद भी कुछ परिवार इन वादों के पूरा होने का इंतजार कर रहे हैं.
प्रशांत कुमार की पत्नी प्रियदर्शनी आचार्य उन्हीं में से एक हैं. उनका कहना है कि “ओडिशा सरकार ने उन्हें सरकारी नौकरी देने का वादा किया था, लेकिन अब तक ऐसा नहीं हो पाया है.’’
प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन चरण मांझी, प्रशांत कुमार के गांव इसानी पहुंचकर उनके अंतिम संस्कार में भी शामिल हुए थे. पीड़ित परिवार से मुलाकात के बाद हुई प्रेसवार्ता में मुख्यमंत्री ने परिवार को आर्थिक सहायता देने और प्रियदर्शनी आचार्य को सरकारी नौकरी दिलाने का आश्वासन दिया था.
प्रियदर्शनी न्यूज़लॉन्ड्री को बताती हैं, “मई महीने में बालासोर जिला प्रशासन ने उनसे महिला एवं बाल विकास विभाग में सुपरवाइजर के पद के लिए जरूरी दस्तावेज लिए थे. साथ ही ओडिशा सरकार के जनरल एडमिनिस्ट्रेशन एंड पब्लिक ग्रीवेंस डिपार्टमेंट के एडिशनल सेक्रेटरी अंजन कुमार दास ने विभाग को पत्र लिखकर प्रियदर्शनी की नियुक्ति की सिफारिश भी की थी. हालांकि, इस सबके बावजूद नियुक्ति प्रक्रिया अब तक पूरी नहीं हो पाई है.”
प्रियदर्शनी आचार्य के पास एमबीए (फाइनेंस) की डिग्री है और 2018 से ओडिशा सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग में ब्लॉक प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर (बीपीसी) के पद पर ठेके पर काम कर रही हैं. उनका कहना है कि पति की मौत के बाद परिवार चलाना बेहद मुश्किल हो गया है और वह चाहती हैं कि उन्हें इसी विभाग में स्थाई नौकरी दी जाए.
इस मामले में जब हमने बालासोर के जिलाधिकारी सूर्यवंशी मयूर विकास से बात की तो उन्होंने कहा, “हमने जून, 2025 में ही विभाग को प्रियदर्शनी के दस्तावेज भेज दिए थे. जो अभी प्रक्रिया में हैं. साथ ही वह विभाग की एक परीक्षा में भी शामिल हो रही हैं, जिसकी वजह से उनकी नियुक्ति में देरी हो रही है.”
कलेक्टर ने यह भी बताया कि इस दौरान प्रियदर्शनी को प्राइवेट क्षेत्र में नौकरी का एक प्रस्ताव भी दिया गया था लेकिन उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया क्योंकि वह संबंधित विभाग में ही स्थायी नौकरी चाहती हैं.
हालांकि, प्रियदर्शनी आचार्य ने विभाग की परीक्षा में शामिल होने के दावे को गलत बताया है. उनका कहना है कि वह किसी भी परीक्षा में शामिल नहीं हो रही हैं. प्रियदर्शनी ने कहा, “मैं साल 2018 से ठेके पर काम कर रही हूं. बीच-बीच में स्थाई नौकरी पाने के लिए अलग-अलग सरकारी नौकरियों के फॉर्म जरूर भरती रहती हूं.”
प्रियदर्शनी के मुताबिक, मई में जिला प्रशासन ने उनसे पूछा था कि वह किस विभाग में नौकरी चाहती हैं. इसके बाद उन्होंने अपने ही विभाग में स्थाई नौकरी की इच्छा जताई थी. प्रशासन की ओर से उन्हें भरोसा भी दिया गया था. उनका कहना है कि जो दूसरी नौकरियां उन्हें ऑफर की जा रही हैं, वे प्राइवेट सेक्टर की हैं . जो उनके पेशे और अनुभव से मेल नहीं खाती.
वह कहती हैं, “मैं एक सिंगल मदर हूं. प्राइवेट सेक्टर में मेरे लिए काम करना मुश्किल है. महिला एवं बाल विकास विभाग में मैं लंबे समय से काम कर रही हूं, इसलिए मैं चाहती हूं कि मुझे इसी विभाग में नौकरी दी जाए.”
प्रियदर्शनी के इस जवाब के बाद जब हमने सूर्यवंशी मयूर विकास से दोबारा संपर्क करने की कोशिश की तो उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला. हालांकि, प्रियदर्शनी को सरकार की ओर से आर्थिक मुआवजे के तौर पर 20 लाख रुपये मिल चुके हैं लेकिन नौकरी अब तक नहीं मिल पाई है.
हमने इस बारे में महिला एवं बाल विकास विभाग की कमिश्नर डॉ. मृणालिनी से भी संपर्क करने की कोशिश की. हालांकि, जब उनसे संपर्क नहीं हो पाया तो हमने उन्हें इस मामले से संबंधित कुछ सवाल भेजे हैं. ख़बर प्रकाशित किए जाने तक उनकी ओर से कोई जवाब नहीं आया है.
पहलगाम हमले में मारे गए लोगों के परिवारों की स्थिति अलग-अलग राज्यों में अलग है. महाराष्ट्र की रहने वाली असावरी जगदाले के पिता संतोष भी इस हमले में मारे गए थे. महाराष्ट्र सरकार ने उनके परिवार को भी सरकारी नौकरी और मुआवजे का आश्वासन दिया था लेकिन वह वादा पूरा नहीं हुआ. पिछले महीने जब यह मामला मीडिया में आया, तब सरकार हरकत में जरूर आई.
पहलगाम हमले के करीब एक साल बाद भी कुछ पीड़ित परिवारों के लिए सरकारी वादे और राहत की प्रक्रिया अभी तक पूरी तरह जमीन पर नहीं उतर पाई है और जिन घरों में किसी का इंतजार अब कभी खत्म नहीं होगा, वहां उम्मीद अभी भी कागजों और आश्वासनों के बीच अटकी हुई है.
मणिकर्णिका घाट से काशी विश्वनाथ कॉरिडोर तक, उजड़े (ढहा दिए गए) घरों और खामोश हो चुके मोहल्लों के बीच यह सीरीज़ बताएगी कि कैसे तोड़फोड़ की राजनीति बनारस की सिर्फ़ इमारतें नहीं, उसकी आत्मा को भी बदल रही है. बनारस पर हमारे इस सेना प्रोजेक्ट को सपोर्ट करिए.
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