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जेफरी एपस्टीन स्कैंडल और हरदीप पुरी के साथ मीडिया की ‘दाग अच्छे हैं’ वाली नौटंकी
कल पूरे दिन पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप पुरी एक चैनल से दूसरे चैनल पर घूमते रहे. हर जगह वही सफाई. वही कहानी. और वही दावा- एपस्टीन मामले में वे पूरी तरह पाक-साफ हैं. सचमुच, एक जगह तो उन्होंने ये तक कहा कि वो इस मामले में पूरी तरह बेदाग निकलेंगे.
इस हफ्ते उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद आखिरकार टीवी न्यूज़ में “एपस्टीन” शब्द सुनाई दिया. लेकिन जिस तरह सुनाई दिया, वह और भी अजीब था. कई एंकरों ने पुरी के बचाव में तर्क देने शुरू कर दिए.
एनडीटीवी की एक एंकर ने समझाया कि जेफरी एपस्टीन, भले ही एक पीडोफाइल (बच्चों के यौन शोषण का अपराधी) था, लेकिन वह साथ ही साथ पावर ब्रोकर (प्रभावशाली बिचौलिया) भी था. “पैसे तो वह पावर ब्रोकिंग करके कमा रहा था ना?” एंकर ने कहा.
फिर एंकर ने समझाया कि किसी का नाम फाइलों में आ जाने से वह अपराधी नहीं बन जाता. इसी दौरान उन्होंने राहुल गांधी का जिक्र करते हुए एक लंबा उदाहरण भी पढ़ा.
हकीकत यह है कि पुरी का नाम सिर्फ यूं ही कहीं नहीं आया था. उनकी एपस्टीन से सक्रिय बातचीत रही थी. वही एंकर आगे उनसे पूछ रही थीं कि उन्होंने एपस्टीन के द्वीपों को “एक्ज़ॉटिक” क्यों कहा था और “मज़े करने” वाली बात का क्या मतलब था.
पुरी का जवाब था- “राहुल गांधी भी वियतनाम मज़े करने जाते हैं.” बातचीत कुछ इस तरह चली:
एंकर: लेकिन किस तरह का मज़ा…
पुरी: मुझे कोई जानकारी नहीं…वो मेरे निजी परिचित नहीं हैं…मेरे उनसे उस तरह के रिश्ते नहीं हैं. मैं रीड हॉफमैन की बात कर रहा हूं.
एंकर: आपको नहीं पता था कि उस ‘एक्ज़ॉटिक’ द्वीप पर क्या हो रहा था?
पुरी: ये सब तो 2017 में सामने आया…तब तक हमारा उससे नाता खत्म हो चुका था.
एंकर: हम्म…एक और ईमेल है…इसमें भारत में निवेश और डिजिटल बूस्ट की बात है, जो अच्छी बात है.
असल मुद्दा यही है कि वह ‘अच्छी बात’ नहीं थी. एक पिडोफाइल के सामने भारत की संभावनाओं का पिच करना अच्छी बात नहीं हो सकती.
मंत्री हर चैनल पर यह भी बताते रहे कि एपस्टीन ने एक ईमेल में उन्हें ‘दो-मुंहा’ कहा था. और जैसे यह कोई नैतिक प्रमाणपत्र हो. मानो एक दोषी यौन अपराधी का हल्का-सा अपमान झेल लेना, चरित्र प्रमाण बन जाता है.
पुरी की दूसरी दलील यह है कि सार्वजनिक जीवन में आपको कई संदिग्ध लोगों से मिलना पड़ता है. उन्होंने उदाहरण दिया कि वे एलटीटीई के प्रभाकरण से भी मिले थे. लेकिन प्रभाकरण से मुलाकात शायद भारत सरकार के काम के तहत हुई होगी. वे उनसे निजी नागरिक के तौर पर भारत के रक्षाक्षेत्र के विकास की बातें करने नहीं गए होंगे.
टीवी न्यूज़रूम में जो बुनियादी बातें धुंधली की जा रही हैं, उन्हें साफ-साफ दोहराना ज़रूरी है.
जेफरी एपस्टीन यौन अपराधों का दोषी था. 2008 में उसने नाबालिग से सेक्स के लिए पैसे देने का अपराध कबूल किया था. उस समय की एक रॉयटर्स रिपोर्ट के मुताबिक, वह नाबालिग लड़कियों से नंगा होकर मसाज करवाता था और उन पर यौन हमला करने के आरोप भी थे.
2019 में उसकी गिरफ्तारी और मौत से कई साल पहले ही, उस पर नाबालिग लड़कियों की तस्करी और यौन शोषण के आरोप सामने आ चुके थे. कई पीड़िताओं ने गवाही दी कि वे 14, 15, 16 और 17 साल की थीं, जब उन्हें फुसलाकर शोषित किया गया.
दुनिया भर में मुद्दा सिर्फ यह नहीं रहा कि अपराध में कौन शामिल था. सवाल यह भी रहा कि किसने एक ऐसे आदमी से संबंध बनाए रखे, जिसकी आपराधिक छवि पहले से सार्वजनिक थी. यही सवाल हमारे पत्रकारों को प्राइम टाइम में पूछने चाहिए.
यह बिल्कुल साफ बात है कि एपस्टीन के ईमेल में किसी का नाम आ जाना या उससे बात कर लेना, किसी को यौन अपराधी नहीं बना देता. इससे आपराधिक दोष साबित नहीं होता. इससे अपने आप अपराध में शामिल होना साबित नहीं होता.
लेकिन इससे फैसले की समझ पर सवाल जरूर उठता है.
अमेरिका और यूरोप में जिन सार्वजनिक हस्तियों के नाम एपस्टीन से जुड़े दस्तावेज़ों में आए, उन्होंने खराब फैसले पर अफसोस जताया. कुछ ने उसके संपर्क में रहने के लिए माफी मांगी. कई मामलों में जांच शुरू हुई, क्योंकि सार्वजनिक जवाबदेही का तकाजा यही था.
भारतीय न्यूज़ एंकरों में यह गंभीरता पूरी तरह गायब दिखती है.
सार्वजनिक रिपोर्टों के मुताबिक, पुरी ने फरवरी 2015, जनवरी 2016 और मई 2017 में न्यूयॉर्क स्थित एपस्टीन के मैनहट्टन टाउनहाउस में उससे मुलाकात की. दोनों के बीच जून 2014 से जून 2017 तक कई ई-मेल हुए. पुरी जनवरी 2014 में बीजेपी में शामिल हुए और सितंबर 2017 में मंत्री बने.
अर्णब के शो में पुरी ने कहा कि पहली मुलाकात के बाद उन्हें 'अजीब-सा एहसास' हुआ था. लेकिन यह सफाई एक बड़े सवाल का जवाब नहीं देती. अगर आपको किसी व्यक्ति पर शक था, तो उससे बार-बार, गर्मजोशी से और निजी अंदाज में बातचीत क्यों हुई?
रिपोर्टेड ईमेल्स में सिर्फ निवेश की बातें नहीं हैं. उनमें अनौपचारिक लहजा भी है- कॉफी मीटिंग्स, किताबों का लेन-देन, यात्राओं का जिक्र, और यह पूछना कि वह अपने ‘एक्ज़ॉटिक द्वीप’ से कब लौटेगा. यह सब एक औपचारिक कूटनीतिक मुलाकात जैसा नहीं लगता.
हालांकि, हम फिर दोहरा देते हैं कि इन सब से कोई आपराधिक दोष साबित नहीं होता.
लेकिन ‘निजी नागरिक के तौर पर भारत की बात करना’ वाला बचाव भी अधूरा लगता है. सार्वजनिक जीवन में यह समझ जरूरी होती है कि किन लोगों से करीबी रखी जाए.
दुनिया भर में एपस्टीन कांड ने एक असहज सवाल खड़ा किया. इतने ताकतवर लोग चेतावनी के संकेत क्यों नजरअंदाज करते रहे? ऐसे व्यक्ति से जुड़ना प्रतिष्ठा पर दाग क्यों नहीं बनता था? पीड़ितों की बात क्यों नहीं सुनी गई?
लेकिन भारतीय टीवी न्यूज़ में ऐसी बहस की उम्मीद मत रखिए.
और हां, क्या हमने बताया कि बाबर बाइसेक्सुअल था? जी हां, बाबर को पुरुष भी पसंद थे. और कहा जाता है कि इस मोह ने उसे पागलपन तक पहुंचा दिया था.
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