Video
कोटद्वार हुड़दंग के चेहरे: जिन्हें पुलिस नहीं ढूंड पाई
पिछले हफ्ते उत्तराखंड के कोटद्वार के दीपक कुमार उर्फ मोहम्मद दीपक काफी चर्चित रहे. पूरे देश में उनके जज्बे और हिम्मत को लेकर बातें हुईं. लेकिन इस पूरे प्रकरण में एक पक्ष ऐसा भी है, जिस पर बात नहीं हुई. वो है उत्तराखंड पुलिस और हिंदुत्वावादी संगठनों के प्रति नरम रुख. और यही कारण है कि इस पूरे प्रकरण से जुड़े दो सवालों के जवाब हमें अभी तक नहीं मिले हैं .
पहला सवाल जिस दीपक कुमार ने पूरे देश में इंसानियत और मानवता की मिसाल कायम की, आखिर उसी पर कोटद्वार पुलिस ने मुकदमा क्यों दर्ज किया? दूसरा सवाल- जब दीपक कुमार ने अपने जिम के बाहर हंगामा करने वालों और उन्हें धमकी देने वालों के नाम लिखित में पुलिस को शिकायत दी तो उसके बावजूद पुलिस ने दीपक की शिकायत के आधार पर बजरंग दल और बाकी हिंदुत्ववादी कार्यकर्ताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज क्यों नहीं की?
दरअसल, 31 जनवरी की शाम जब दीपक कुमार अपनी शिकायत लेकर पुलिस थाने पहुंचे तो पुलिस ने दीपक की शिकायत को अनदेखा करते हुए बजरंग दल के जिला सह संयोजक कमल पाल की शिकायत पर दीपक कुमार पर ही मुकदमा दर्ज कर दिया.
जबकि ठीक उसी शाम दीपक कुमार ने भी पुलिस को लिखित शिकायत में जिम के बाहर हमांमा करने वाले कुल 20 लोगों के नाम दिए .इसमें दीपक ने सिर्फ हंगामा करने वाले लोगों के नाम ही नहीं दिए बल्कि उनके मोबाइल नंबर भी लिखे और यहां तक कि देहरादून से जो 8 गाड़ियां आई थी, उनके भी नंबर दिए थे.
हालांकि, पुलिस ने 31 जनवरी को बजरंग दल और अन्य संगठनों द्वारा दीपक कुमार के जिम के बाहर हंगामा करने को लेकर एक मुकदमा दर्ज किया लेकिन उसमें हंगामा करने वालों को अज्ञात बताया गया. ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब दीपक कुमार ने लिखित शिकायत में उन लोगों के नाम दिए थे फिर भी पुलिस की नजर में वह अज्ञात क्यों रहे?
जब हमने इसी सवाल की पड़ताल शुरू की तो एक के बाद एक परतें खुलती चली गईं. अपनी पड़ताल में हमें पता चला कि दीपक कुमार ने जिन 20 लोगों के नाम अपनी शिकायत में दी थी, वह दरअसल विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, भारतीय जनता पार्टी, भारतीय जनता युवा मोर्चा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े हुए हैं. हमने इनमें से कई लोगों से बात भी की और उनके संगठन के बाकी लोगों ने उनकी मौके पर मौजूदगी की पुष्टि भी की.
हमारी यह रिपोर्ट कोटद्वार में पुलिस और हिंदुत्ववादी संगठनों के प्रति नरम रुख की कहानी की परत दर परत पड़ताल करती और उस सच को सामने लाती है, जिसे पुलिस छुपाना चाहती थी. यही कारण है कि हमें कोटद्वार में रिपोर्टिंग करने से रोका भी गया लेकिन फिर भी हम यह पड़ताल आप तक लेकर आ रहे हैं.
देखिए हमारी यह खास पड़ताल.
Also Read
-
Bengal’s migrant workers caught between ‘ghuspaithiya’ politics and SIR deletions
-
After 66 child deaths, a clean chit, and a ‘vanishing act’: Maiden Pharma is coming back, rebranded
-
Tuning into Kolkata’s mann ki baat
-
‘An hour too late’: Fire devastates Lucknow settlement, residents allege it was ‘deliberate’
-
Flowers, fear, and ‘apolitical’ claims: Inside the LSR campus protest