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वाशिंगटन पोस्ट का 'बंद होना' अमेरिका नहीं भारत के लिए भी चिंता का सबब, लेकिन क्यों?
वॉशिंगटन पोस्ट के दिल्ली ब्यूरो प्रमुख प्रांशु वर्मा को बुधवार को बताया गया कि उनका कॉन्ट्रैक्ट खत्म किया जा रहा है. वे उन लगभग 300 संपादकीय कर्मचारियों में शामिल हैं, जिन्हें जेफ बेजोस द्वारा न्यूज़रूम में की गई बड़ी छंटनी के तहत बाहर किया गया है. इस कदम से अमेरिकी अखबार की दक्षिण एशिया में मौजूदगी लगभग खत्म हो गई है.
वर्मा ने एक्स पर लिखा, “दिल टूट गया है यह बताते हुए कि मुझे वॉशिंगटन पोस्ट से निकाल दिया गया है. मेरे कई प्रतिभाशान साथियों को भी हटाया गया है, यह देखकर और दुख हो रहा है. पिछले चार साल यहां काम करना मेरे लिए गर्व की बात रही.”
वाशिंगट पोस्ट की दिल्ली स्थित साउथ एशिया टीम में अब तक तीन पत्रकार और दो प्रशासनिक कर्मचारी थे. बुधवार की इस छंटनी के बाद फिलहाल सिर्फ वर्मा को औपचारिक नोटिस मिला है, जबकि बाकी चार कर्मचारियों को अब तक यह नहीं बताया गया है कि दिल्ली ब्यूरो जारी रहेगा या नहीं. मामले से जुड़े एक सूत्र ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया, “अब तक सिर्फ प्रांशु की छंटनी की जानकारी दी गई है. यह साफ नहीं है कि अखबार दिल्ली में अपना ब्यूरो जारी रखेगा या नहीं.”
वाशिंगटन पोस्ट ने करीब 800 संपादकीय कर्मचारियों में से लगभग 300 को बुधवार को हटा दिया गया. जानकारी के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय खबरें, खेल, किताबें और स्थानीय कवरेज सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं. वे विदेशी ब्यूरो, जो कभी दुनिया भर में सत्ता से सवाल पूछते थे, अब बंद किए जा रहे हैं. इस छंटनी का संदेश साफ है: अमेरिका की सीमाओं के बाहर की दुनिया अब देश के सबसे प्रतिष्ठित अखबारों में से एक के लिए उतनी अहम नहीं रही.
गौरतलब है कि भारत के लिए यह नुकसान सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं है. नई दिल्ली में वॉशिंगटन पोस्ट, अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद, वह काम करता था जो कई भारतीय मीडिया संस्थान नहीं कर पाते थे, जैसे कि सत्ता से सवाल पूछना या खोजी रिपोर्टिंग.
बेजोस का विश्वासघात!
2019 में जेफ बेजोस ने कहा था कि वॉशिंगटन पोस्ट का प्रबंधन करना वह काम है जिस पर उन्हें 90 साल की उम्र में अपनी जिंदगी की समीक्षा करते हुए सबसे ज्यादा गर्व होगा.
लेकिन सात साल बाद उन्होंने अखबार से जुड़े कर्मचारियों की बड़े हिस्से की छंटनी कर दी, ज्यादातर विदेशी ब्यूरो लगभग ‘खत्म’ ही कर दिए, और ऐसे बदलावों की निगरानी की जिन्हें कुछ लोगों ने ब्रांड और उसकी आय को जानबूझकर कमजोर करने की प्रक्रिया बताया है.
इस हफ्ते लिए गए फैसले की वजह वित्तीय दबावों को बताया गया है. इनमें 2024 में हुए 100 मिलियन डॉलर के नुकसान, 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में समर्थन से दूरी बनाने के बाद सब्सक्राइबरों की गिरावट, और एआई टूल्स से घटते ट्रैफिक जैसे कारण शामिल हैं. इससे पहले भी 2023 में 240 कर्मचारियों को सेवरेंस पैकेज देकर हटाया गया था और 2025 की शुरुआत में करीब 100 बिजनेस भूमिकाओं में कटौती हुई थी. कुछ आकलनों के मुताबिक, कुल स्टाफ की संख्या हाल तक लगभग 3,000 के आसपास थी.
वॉशिंगटन पोस्ट के एग्जीक्यूटिव एडिटर मैट मरे ने बुधवार सुबह न्यूज़रूम कर्मचारियों के साथ हुई कॉल में कहा कि कंपनी बहुत लंबे समय से भारी नुकसान झेल रही थी और पाठकों की जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रही थी. न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने बताया कि अब प्रकाशन का फोकस और ज्यादा राष्ट्रीय खबरों और राजनीति पर होगा, साथ ही बिजनेस और हेल्थ कवरेज पर जोर दिया जाएगा, जबकि अन्य क्षेत्रों पर ध्यान काफी कम हो जाएगा.
इन कटौतियों के बाद कई लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि दुनिया की सबसे अमीर शख्सियतों में शामिल जेफ बेजोस, जिनकी अनुमानित संपत्ति 261 अरब डॉलर है, आसानी से अखबार के नुकसान को सह सकते थे. तुलना के तौर पर, बेजोस की कंपनी अमेज़न मेलानिया ट्रंप पर एक डॉक्यूमेंट्री खरीदने और उसके प्रचार पर कम से कम 75 मिलियन डॉलर निवेश कर रही है. वहीं रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने एक सुपरयॉट पर करीब 500 मिलियन डॉलर खर्च किए. सिर्फ मियामी में प्रॉपर्टी खरीदने पर उन्होंने 237 मिलियन डॉलर खर्च किए, और पिछले साल अपनी शादी पर कम से कम 20 मिलियन डॉलर खर्च किए, जो उनके बाकी खर्चों के मुकाबले बेहद कम है.
कुछ लोगों ने तो इसे अखबार की “हत्या” तक करार दिया है.
‘तबाही, जो बेजोस के लिए फायदेमंद साबित हो रही है’
वॉशिंगटन पोस्ट की पूर्व स्टार व्हाइट हाउस रिपोर्टर एश्ले पार्कर ने द अटलांटिक में लिखा, “सबसे कम सनकी व्याख्या यह है कि बेजोस ध्यान ही नहीं दे रहे हैं.” उन्होंने आगे लिखा, “या फिर, जैसा कि हममें से कई लोग जो पोस्ट से गहरा लगाव रखते हैं, उन्हें डर है, यह तबाही ही योजना का हिस्सा है.”
उन्होंने लिखा, “पोस्ट ने करीब 150 साल तक का सफर तय किया है, एक स्थानीय पारिवारिक अखबार से एक जरूरी राष्ट्रीय संस्था और लोकतांत्रिक व्यवस्था के स्तंभ के रूप में विकसित हुआ है. लेकिन अगर बेजोस और लुईस इसी रास्ते पर चलते रहे, तो यह ज्यादा समय तक नहीं टिक पाएगा… पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने बार-बार न्यूज़रूम को छोटा किया है. रविवार की मैगजीन बंद कर दी, सैकड़ों कर्मचारियों को हटा दिया, मेट्रो डेस्क को लगभग आधा कर दिया है, बिना उन खराब व्यावसायिक फैसलों को स्वीकार किए जिनकी वजह से यह स्थिति बनी, या भविष्य की कोई स्पष्ट योजना बताए.”
पार्कर ने आगे लिखा, “पत्रकारिता हमेशा से एक कठिन उद्योग रही है. लेकिन मैंने खुद देखा कि कैसे बेजोस, लुईस और उनकी टीम कॉरपोरेट भाषा (‘फिक्स इट, बिल्ड इट, स्केल इट’) में बातें करती रही और ऐसे किसी कदम को शुरू भी नहीं कर पाई या कोशिश तक नहीं की, जो उनके भव्य लक्ष्यों को हासिल कर सके. उन्होंने 2025 की शुरुआत इस ‘बिग हेयरी ऑडेशियस गोल’ के साथ की कि सब्सक्राइबर संख्या 25 लाख से बढ़ाकर 20 करोड़ कर दी जाएगी, जबकि पिछले साल के अंत तक वे अपने मौजूदा हजारों सब्सक्राइबर गंवा चुके थे, और इसके लिए पत्रकारों को ही दोषी ठहरा रहे थे.”
पोस्ट की एक और पूर्व रिपोर्टर लिज स्लाय ने एक्स पर लिखा कि बेजोस ने जो किया वह “एक भयावहता” है और “इसे अपराध माना जाना चाहिए.” कई अन्य पूर्व कर्मचारियों ने भी अपने अनुभव साझा किए.
अमेरिकी मीडिया वॉचडॉग मीडिया मैटर्स फॉर अमेरिका ने पहले ही कहा था कि ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में कई कॉरपोरेट मीडिया मालिकों ने अपना पक्ष चुन लिया है. “वे व्यक्तिगत पसंद और राजनीतिक सुविधा के मिश्रण से सीबीएस और वॉशिंगटन पोस्ट जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों को नुकसान पहुंचा रहे हैं.”
वॉशिंगटन पोस्ट में पुनर्गठन, प्रमुख लेखकों की छंटनी और कुछ रूढ़िवादी आवाजों की नियुक्ति जैसे फैसलों का जिक्र करते हुए रिपोर्ट में कहा गया कि इन बदलावों ने सब्सक्राइबर संख्या को काफी झटका दिया है, और मालिक नुकसान उठाने को तैयार नहीं थे, जिसके चलते छंटनी की अटकलें तेज हुईं.
रिपोर्ट में कहा गया, “लेकिन पोस्ट की धार कुंद करना और ट्रंप परिवार की जेब में पैसा पहुंचाने का रास्ता ढूंढना, बेजोस के लिए फायदेमंद साबित होता दिख रहा है. इसके बदले उन्हें ट्रंप के शपथ ग्रहण समारोह में खास सीटें, ब्लू ओरिजिन और अमेज़न वेब सर्विसेज के लिए सरकारी ठेके, और राष्ट्रपति की ओर से सार्वजनिक प्रशंसा मिली कि वे ‘वॉशिंगटन पोस्ट में असली काम करने की कोशिश कर रहे हैं, जो पहले नहीं हो रहा था.’”
अखबार के एक अन्य कर्मचारी ने द रैप से कहा कि बेजोस ने लुईस और मरे ने “कैथरीन ग्राहम की कब्र पर थूक दिया है और वॉशिंगटन पोस्ट की विरासत का अपमान किया है.” दरअसल, उनका आशय प्रकाशकों के उस साहसी कदम से था, जब उन्होंने वॉटरगेट और पेंटागन पेपर्स के प्रकाशन के दौरान सरकारी दबाव के आगे झुकने से इनकार कर दिया था. इस कर्मचारी ने कहा कि पोस्ट अब “खत्म” हो चुका है.
हालांकि, पोस्ट ने अपने बयान में कहा है कि अखबार की प्रासंगिकता के लिए ये फैसला जरूरी था. अखबार ने लिखा, “आज के कदम उन सवालों का ठोस तरीके से सामना करने और इस नए दौर के लिए द वॉशिंगटन पोस्ट को फिर से तैयार करने के बारे में हैं. यह काम कठिन है, लेकिन ज़रूरी है. पोस्ट एक अहम संस्था है, और उसका प्रासंगिक बने रहना जरूरी है.”
इसी बीच सेमाफोर की रिपोर्ट में कहा गया कि इन कटौतियों के बाद अमेरिकी मीडिया जगत के कई शीर्ष अधिकारी आगे आकर इस खाली जगह को भरने की योजना बना रहे हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, कई मीडिया कंपनियां और धनी निवेशक पोस्ट को खरीदने में दिलचस्पी दिखा सकते हैं, अगर वह कभी बिक्री के लिए उपलब्ध होता है. लेकिन जिन लोगों ने बेजोस से बात की है, उनका मानना है कि वह इसे बेचने के इच्छुक नहीं हैं.
भारत से समानता?
#SaveThePost हैशटैग के साथ, भारत समेत दुनिया भर के ब्यूरो के पत्रकार पहले ही चेतावनी दे चुके थे कि विदेशी कवरेज में भारी कटौती हो सकती है. अंतरराष्ट्रीय स्टाफ के करीब 60 सदस्यों ने बेजोस को पत्र लिखकर कहा था कि विदेशों में रिपोर्टिंग कम करने से न सिर्फ अखबार कमजोर होगा, बल्कि जनहित की पत्रकारिता भी प्रभावित होगी.
वॉशिंगटन पोस्ट की छंटनियां सिर्फ पैसों का मामला नहीं हैं. किसी गहरे स्तर पर ऐसा लगता है कि यह संस्थान खुद ही इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं रहा कि यह पत्रकारिता क्यों जरूरी है. अमेरिकियों के अपने देश और दुनिया को देखने के नजरिये में एक साफ बदलाव दिखाई दे रहा है.
दशकों तक विदेशों में अमेरिकी पत्रकारिता उस विचार से प्रभावित रही कि अमेरिका दुनिया का नैतिक संरक्षक है. युद्धों, लोकतांत्रिक गिरावट और मानवाधिकार उल्लंघनों पर रिपोर्टिंग उसी आत्म-छवि का विस्तार थी. अमेरिका दुनिया पर नजर रखता था क्योंकि वह खुद को उसके लिए जिम्मेदार मानता था.
लेकिन अब वह विश्वास टूटता हुआ दिख रहा है.
अमेरिकी राजनीतिक वैज्ञानिक इवान ए. फेगनबाम ने लिखा, “दुनिया हर मिनट कम अमेरिका-केंद्रित होती जा रही है, जबकि अमेरिका पहले से ज्यादा खुद पर केंद्रित होता जा रहा है. यह हमारे समय का दुखद लेकिन सटीक चित्र है कि देश के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण अखबारों में से एक- जिसने खुद अमेरिका के इतिहास को आकार दिया- अब दुनिया पर रिपोर्टिंग को जरूरी नहीं मानता. यह इस बात का सटीक प्रतीक है कि हम किस मोड़ पर पहुंच चुके हैं.”
सर्वे बताते हैं कि कई अमेरिकी विदेशी खबरें बहुत कम देखते हैं. प्यू रिसर्च सेंटर की 2022 की एक रिपोर्ट के अनुसार, सिर्फ 48 प्रतिशत अमेरिकी अफगानिस्तान की राजधानी (काबुल) का नाम बता सके, और केवल 41 प्रतिशत लोग दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देश भारत का झंडा पहचान पाए. ऐसे संकेत हैं कि रिपब्लिकन पार्टी के बढ़ते अलगाववाद और ट्रंप द्वारा अमेरिकी असाधारणता की नई परिभाषा देने की कोशिशों के साथ ये रुझान और मजबूत हो सकते हैं.
वॉशिंगटन पोस्ट की विदेशी कवरेज राजनीतिक रूप से कम महत्वपूर्ण क्यों हो गई, इसका एक और कम चर्चा में रहने वाला कारण है- जनता की नाराजगी.
कई पाठकों, खासकर मिलेनियल और जेन-ज़ी के लिए, फिलिस्तीन पर अखबार की कवरेज और यूक्रेन पर उसकी नैतिक स्पष्टता के बीच का फर्क चौंकाने वाला रहा है. रूस के यूक्रेन पर हमले को सही तरह से संप्रभुता, नागरिकों और अंतरराष्ट्रीय कानून पर हमले के रूप में पेश किया गया. लेकिन गाजा पर इज़राइल के युद्ध, जिसमें बड़े पैमाने पर नागरिक मौतें, सामूहिक सजा और मानवीय संकट पैदा हुआ, उसे अक्सर नरम शब्दों और ताकतवर पक्ष का नाम लेने से बचने वाली भाषा में पेश किया गया.
तो अब साफ सवाल उठता है: औसत अमेरिकी को वॉशिंगटन पोस्ट भारत, सूडान, गाजा या कहीं और लोकतांत्रिक गिरावट पर क्या कहता है, इससे क्यों फर्क पड़े? अगर अमेरिका अब दुनिया का रखवाला नहीं रहा, तो यह पत्रकारिता कई लोगों को विलासिता या अप्रासंगिक लगने लगती है- खासतौर पर उस मतदाता को, जो अपने ही देश में संघर्ष कर रहा हो. यही वजह है कि यह सिर्फ मीडिया का संकट नहीं है, बल्कि उदार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की स्थिरता का भी सवाल है.
दूसरी ओर, दुनिया भर के पाठकों के मन में भी एक सवाल उठ रहा है- जब तथाकथित नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था बिखरती दिख रही है, तो किसी अखबार की वैश्विक नैतिकता की बात क्यों सुनी जाए, जब वह निर्णायक क्षणों पर खुद हिचकता हुआ नजर आता है?
भरोसे का यह क्षरण इसलिए मायने रखता है क्योंकि विदेशी रिपोर्टिंग हमेशा एक नाजुक चीज पर टिकी रही है- दूरी के बावजूद विश्वसनीयता. ज्यादातर अमेरिकी पाठक कभी गाजा, कीव, नई दिल्ली या तेहरान नहीं जाएंगे. वे वॉशिंगटन पोस्ट जैसे संस्थानों पर भरोसा करते थे. जब यह भरोसा टूटता है, तो उसकी जगह उदासीनता ले लेती है. और विदेशी ब्यूरो के लिए उदासीनता जानलेवा होती है.
इसके अलावा एक और चीज है जिसे लेकर हमें अमेरिकी पाठकों की तुलना में कहीं ज्यादा चिंतित होना चाहिए.
भारतीय पत्रकारिता में विदेशी संवाददाता हमेशा एक विवादास्पद पात्र रहे हैं. भारतीय रिपोर्टर- अक्सर मन ही मन उन्हीं नौकरियों की इच्छा रखते हुए- उनकी ऊंची तनख्वाह, पैराशूट पत्रकारिता और देश की जमीनी हकीकत से उनकी अनभिज्ञता पर तंज कसते रहे हैं. कई बार भारतीय अखबार जिन खबरों को पहले सामने लाते हैं, वही कुछ हफ्तों बाद किसी पश्चिमी मीडिया में “खोज” के रूप में सामने आती हैं और विश्व का ध्यान बटोर लेती हैं. इस आलोचना का एक हिस्सा जायज भी है.
विदेशी संवाददाता कई बार जाति को गलत समझते रहे हैं, राजनीति की जटिलता को सपाट बना देते हैं, अंग्रेजी बोलने वाले अभिजात वर्ग पर जरूरत से ज्यादा निर्भर रहते हैं, और पश्चिमी दर्शकों के लिए भारत को लेकर पुराने स्टीरियोटाइप दोहराते रहे हैं- ‘बंदरों का आतंक’ जैसी कहानियां कभी खत्म नहीं होतीं. वे उन खबरों तक देर से पहुंचे, जिनके साथ भारतीय पत्रकार वर्षों से जूझते रहे. और हां, कई बार उन्हें बहुत ज्यादा वेतन मिला, लेकिन जानकारी कम रही.
फिर भी, इन तमाम खामियों के बावजूद, वे एक अहम काम कर रहे थे- खासकर आज के दौर में.
भारत का मीडिया इकोसिस्टम पहले ही सरकार के साथ एक अनकहे समझौते पर चल रहा है. टीवी न्यूज का बड़ा हिस्सा सरकारी प्रचार की भाषा बोलता है. प्रिंट मीडिया के बड़े हिस्से में भी सत्ता के प्रति नरमी और स्वघोषित-सेंसरशिप सामान्य हो चुकी है. ऐसे माहौल में विदेशी पत्रकारिता एक अहम भूमिका निभाती थी.
बेजोस प्रकरण में मीडिया स्वामित्व की एक चेतावनी भी छिपी है. भारत में भी इस पर बहुत लिखा गया है कि ऐसे मॉडल संपादकीय स्वतंत्रता को कैसे प्रभावित करते हैं. जैसे बेजोस ने इसका मालिक बनने पर गर्व जताया था, वैसे ही भारत के एक अरबपति ने उस टीवी नेटवर्क को खरीदने के बाद, जो नरेंद्र मोदी सरकार की आलोचना करने वालों में गिना जाता था, “लक्ष्मण रेखा” की बात की थी. लेकिन बाद में चैनल की बदली हुई संपादकीय दिशा से साफ हुआ कि यह ‘लक्ष्मण रेखा’ कैसे कदम दर कदम लांघी जा रही है. उसी समूह के अन्य अधिग्रहण भी मल्टी-प्लेटफॉर्म मीडिया मौजूदगी बनाने की कोशिश को दिखाते हैं.
अपनी तमाम कमियों के बावजूद, पोस्ट ने वह काम किया जो भारतीय मीडिया के लिए दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है. गहराई वाली खोजी रिपोर्टों के जरिए, जिन्हें घरेलू मुख्यधारा मीडिया अक्सर नहीं कर पाता, पोस्ट ने भारतीय सरकार के साथ लगातार टकराव का रिश्ता बनाए रखा. उनकी वह रिपोर्ट खास तौर पर उल्लेखनीय थी, जिसमें बताया गया कि बीजेपी और हिंदुत्व समूहों ने “150,000 सोशल मीडिया कार्यकर्ताओं के विशाल तंत्र” के जरिए सांप्रदायिक तनाव भड़काने और चुनावों को प्रभावित करने का काम किया. 2023 में उन्होंने ओटीटी प्लेटफॉर्मों पर खास तरह का कंटेंट दिखाने के लिए दबाव बनाने को लेकर भी रिपोर्टिंग की.
2025 के अंत में पोस्ट ने ‘मोदी के उद्योगपति सहयोगी की मदद के लिए भारत सरकार का 3.9 अरब डॉलर का प्लान’ शीर्षक से एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें आरोप लगाया गया कि भारतीय अधिकारियों ने मई में लगभग 3.9 अरब डॉलर के निवेश को एलआईसी के जरिए अडानी के कारोबारों की ओर मोड़ने का प्रस्ताव तैयार किया और आगे बढ़ाया. इस खबर से सरकार में हलचल मच गई और आधिकारिक स्तर पर कड़े खंडन सामने आए. वहीं, 2021 में कोविड-19 की ‘डेल्टा वेव’ पर उनकी कवरेज ने ऑक्सीजन संकट और मौतों की ‘कम गिनती’ की सच्चाई को उजागर किया.
ये खबरें यहां मायने रखती थीं. उन्होंने भारतीय पत्रकारों को साहस और सहारा दिया. नागरिक समाज को मुद्दे दिए. अंतरराष्ट्रीय मंचों पर असहज सवाल खड़े किए. सरकार को याद दिलाया कि कहीं न कहीं कोई देख रहा है.
लेकिन इस तरह के फैसलों से यह निगरानी कम हो रही है. और हमेशा की तरह, एक्स पर बैठे कुछ सरकारी समर्थक इससे खुश हैं.
जैसे-जैसे पश्चिमी मीडिया अंदर की ओर सिमट रहा है और उदार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था कमजोर पड़ रही है, भारत जैसे देशों का आकलन लोकतांत्रिक मानकों से कम और रणनीतिक उपयोगिता से ज्यादा किया जाएगा जैसे कि बाजार का आकार, जियो पॉलिटिक्स, चीन के साथ संतुलन और हथियारों के सौदे आदि.
इस लिहाज से, वॉशिंगटन पोस्ट द्वारा दुनिया से अपना दायरा समेटना सिर्फ अमेरिका के ज्यादा आत्म-केंद्रित होने की कहानी नहीं है. यह दुनिया को आईना दिखाने वाले एक और अहम किरदार को खोने का इशारा भी है.
अरबपति आपके लिए नहीं खड़े होते, चाहे वॉशिंगटन में बेजोस हों या दिल्ली में कोई और. उनके लिए मुनाफा जनता और जनहित से ज्यादा मायने रखता है. लेकिन हमने वर्षों तक रिपोर्टिंग करके दिखाया है कि इसका न्यूज़रूम पर क्या असर पड़ता है. इसका एकमात्र असली उपाय आपके हाथ में हैं: सब्सक्राइब कीजिए, स्वतंत्र पत्रकारिता जैसे न्यूज़लॉन्ड्री का समर्थन कीजिए, और यह साबित कीजिए कि पाठकों की ताकत किसी भी अरबपति से बड़ी होती है.
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