Opinion
आठ दशक बाद भी गूंज रही है अंबेडकर की चेतावनी: नायक-पूजा से आगे एक बेहतर गणतंत्र का हक़दार है भारत
“भारत में पत्रकारिता कभी एक पेशा हुआ करती थी. आज यह एक व्यापार बन चुकी है. इसका नैतिक दायित्व साबुन बनाने से ज़्यादा नहीं रह गया है. यह खुद को जनता का ज़िम्मेदार सलाहकार नहीं मानती. बिना किसी स्वार्थ के खबर देना, जनहित में नीति पर एक संतुलित दृष्टि रखना, और चाहे सामने कितना ही शक्तिशाली व्यक्ति क्यों न हो, गलत रास्ता चुनने वालों को निर्भीकता से कठघरे में खड़ा करना- इन्हें पत्रकारिता अपना पहला या प्रमुख कर्तव्य नहीं मानती. किसी नायक को स्वीकार करना और उसकी पूजा करना इसका मुख्य दायित्व बन गया है. इसके तहत खबर की जगह सनसनी ने ले ली है, तर्कपूर्ण राय की जगह अंधी भावनाओं ने, और ज़िम्मेदार नागरिकों की समझ से संवाद की जगह गैर-ज़िम्मेदार भावनाओं से अपील ने.”
डॉ. भीमराव अंबेडकर ने ये शब्द जनवरी, 1943 में पुणे में कहे थे- आज से आठ दशक पहले. यह आलोचना उस दौर में महात्मा गांधी और मोहम्मद अली जिन्ना जैसे नेताओं के महिमामंडन की प्रवृत्ति को लेकर थी. लेकिन उस समय से जुड़ी यह बात आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जब भारत अपना 77वां गणतंत्र दिवस मना रहा है.
आज हमारे गणतंत्र की स्थिति यह है: एक सरकार भगदड़ जैसी त्रासदियों में मौतों की असली संख्या छिपाती है. आपके टैक्स का पैसा शासन के नाम पर प्रचार में झोंका जाता है. जिस हवा में आप सांस लेते हैं, वही आपको बीमार कर रही है. राज्य की जटिल प्रक्रियाएं आपके वोट के अधिकार को खतरे में डाल रही हैं. और जो मीडिया इन विफलताओं को उजागर करने वाला था, उसका बड़ा हिस्सा एयर-कंडीशन्ड स्टूडियो से सरकारी भाषा बोल रहा है.
हमें कल का ‘विकसित भारत’ दिखाया जा रहा है, लेकिन आज की जवाबदेही लगातार गायब होती जा रही है.
स्वतंत्र प्रेस क्या कर सकती है?
एक जवाबदेह लोकतांत्रिक गणतंत्र के लिए जागरूक नागरिक ज़रूरी हैं. पिछले एक साल में न्यूज़लॉन्ड्री ने ऐसी कई रिपोर्टें कीं, जो दिखाती हैं कि आपके संवैधानिक अधिकार खुलेआम कैसे छीने जा रहे हैं.
जब वे सच छिपाते हैं, हम उजागर करते हैं
प्रयागराज भगदड़ के बाद सरकारी आंकड़ा 30 मौतों पर आकर रुक गया. न्यूज़लॉन्ड्री ने मुर्दाघरों और अस्पतालों का दौरा किया, छिपे हुए रिकॉर्ड खंगाले, और सरकारी लापरवाही के 79 पीड़ितों की सच्चाई सामने रखी.
जब उत्तराखंड ने बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित अपने नागरिकों के बीच रहते हुए भी विज्ञापनों पर 1,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा खर्च किए, हमने रिपोर्ट किया. जब 112 करोड़ रुपये के सार्वजनिक धन के कथित गबन का मामला सामने आया, तो हमने सरकारी फाइलों में दबी आधिकारिक जांच रिपोर्ट को उजागर किया.
जब नियमों का उल्लंघन करते हुए प्रधानमंत्री के प्रचार के लिए एक इन्फ्लुएंसर को सरकारी पैसा दिया गया, हम उस कहानी को सामने लाए. जब सरकार ने चुपचाप जंगलों में व्यावसायिक प्लांटेशन की अनुमति देने के लिए सुरक्षा प्रावधान हटाए, हमने यह खुलासा भी किया.
जब आवाज़ें दबाई जाती हैं, तो हम उन्हें मंच देते हैं
लद्दाख में संवैधानिक अधिकारों की मांग कर रहे प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलीं और लोगों को हिरासत लिया गया. टीवी स्टूडियो साज़िशों की थ्योरी गढ़ते रहे, लेकिन हमने उन स्थानीय लोगों से बात की जो सच बोलने से नहीं डरे.
हमने उस मलयालम अभिनेत्री की कहानी को उजागर किया, जिस पर कथित तौर पर किराए के अपराधियों से हमला कराया गया, और उस नन की भी, जिसने एक बिशप पर बलात्कार का आरोप लगाया- दोनों ही ऐसे मामले थे, जहां संस्थाएं ताकतवर पुरुषों को बचाने के लिए एकजुट हो गईं. राजस्थान में हमने दिखाया कि कैसे कानूनों के बावजूद दलित और आदिवासी ज़मीनें व्यवस्थित तरीके से छीनी जा रही हैं.
छत्तीसगढ़ में हमने आदिवासी ईसाइयों की पीड़ा दर्ज की- जहां कब्रें खोदी गईं, तोड़फोड़ और हमले हुए, और पुलिस मूकदर्शक बनी रही. उत्तर प्रदेश के कई शहरों में हमने तथाकथित ‘हाफ-एनकाउंटर’ की जांच की-जहां पुलिस कथित अपराधियों को पैर में गोली मारकर पकड़ती है, जो उनके संवैधानिक अधिकारों का खुला उल्लंघन है.
हमने मणिपुर पर फोकस बनाए रखा- उस गैंगरेप पीड़िता की कहानी सामने लाए जो न्याय के इंतजार में दम तोड़ गई. महाराष्ट्र में हमने हिरासत में सैकड़ों मौतों के बावजूद पुलिस की जवाबदेही पर पड़ी चुप्पी की पड़ताल की.
उत्तराखंड, गुजरात और मध्य प्रदेश में हमने दिखाया कि कैसे हिंदुत्ववादी संगठनों द्वारा अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर हमलों में राज्य की भूमिका सामने आती है.
जब आंकड़ेबाजी का खेल हो तो हम उसे सामने लाते हैं
हमने हवा की गुणवत्ता के फर्ज़ी आंकड़ों और यमुना की सफाई पर झूठ को बेनकाब किया.
बिहार में हमने लगभग 3 लाख मतदाताओं को ऐसे पतों पर दर्ज पाया जो अस्तित्व में ही नहीं थे, और विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया की खामियों पर लगातार रिपोर्टिंग की.
राजस्थान में हमने नियमों को ताक पर रखकर विधानसभा क्षेत्र से मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिशों को सबसे पहले उजागर किया. राष्ट्रीय चैनलों के लिए बहस का विषय बनने से बहुत पहले हमने मतदाता सूची की गड़बड़ियों पर रिपोर्ट करना शुरू कर दिया.
‘स्मार्ट सिटी’ गुरुग्राम में हमने कचरा प्रबंधन की उस व्यवस्था को उजागर किया, जहां 98 प्रतिशत कचरा प्रोसेस होने का दावा एक झूठ है. हमने भारत के ई-वेस्ट सेक्टर के काले सच और रीसाइक्लिंग लक्ष्यों से देश की दूरी को भी सामने रखा.
जब शोर हावी हो जाता है, हम ज़मीन पर जाते हैं
‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान टीवी चैनल बेतुके ग्राफिक्स चलाते रहे और एक स्थानीय शिक्षक को आतंकवादी कमांडर बता दिया गया. हम सीमा के पास गए-सीना ठोकने नहीं, बल्कि उस 22 वर्षीय युवक से मिलने जिसने मिसाइल हमले में अपने पिता को खो दिया, और उन 12 साल के जुड़वां बच्चों के चाचा से मिलने जिनकी मौत गोलाबारी में हुई. बिना शोर-शराबे के, हमने उनकी कहानियां बताईं.
हमारे सामने चुनाव
सच यूं ही नहीं मिलता, उसे पाने के लिए ऐसी पत्रकारिता चाहिए जो अंधेरे से डरकर पीछे न हटे, बल्कि उसे चीर दे. इस गणतंत्र दिवस पर सवाल यह नहीं है कि हमारी संस्थाएं हमारे लिए क्या करेंगी- सवाल यह है कि हम उनसे क्या मांगेंगे.
अंबेडकर के 1943 के भाषण में यह भी था, “देश के हित को नायक-पूजा के प्रचार के लिए जितनी बेरहमी से कुर्बान किया गया है, वैसा पहले कभी नहीं हुआ. भारत में नायक-पूजा कभी इतनी अंधी नहीं रही जितनी आज है. कुछ सम्माननीय अपवाद ज़रूर हैं, लेकिन वे बहुत कम हैं, और उनकी आवाज़ कभी सुनी नहीं जाती.”
82 साल बाद भी वे अपवाद सुने जाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. अपने अधिकारों की रक्षा का पहला कदम है यह जानना कि वे छीने कैसे जा रहे हैं. क्योंकि अगर हम नहीं देखेंगे, तो कोई हमें बताएगा भी नहीं.
इस गणतंत्र दिवस पर, अपने अधिकारों के लिए खड़े हों.
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