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16 साल के संघर्ष को झटका: एसिड अटैक के आरोपी बरी हुए तो पीड़िता शाहीन बोली- कोर्ट ने निराश कर दिया
“जजमेंट से एक दिन पहले मैं इतना एक्साइटेड और होपफुल थी कि मैं उस रात सोई नहीं. पूरी रात बस यही सोचती रही कि कल मेरे 16 वर्षों के संघर्ष का अंत होगा और मुझे न्याय मिलेगा. जजमेंट दोपहर बाद आने वाले था लेकिन मैं सुबह ही कोर्ट पहुंच गई. पर कोर्ट के फैसले ने एक झटके में मेरी सारी उम्मीद, सारे उत्साह को रिवर्स कर दिया. अचानक से मेरी आंखों के सामने 19 नवंबर 2009 की वह शाम आ गई जब मेरे ऊपर एसिड डाला गया था. मुझे वो जलन, वो दर्द, यहां तक कि एसिड का रंग अभी तक याद है. 25 सर्जरी, आंखोंं की रोशनी और 3 साल के दर्दनाक मेडिकल ट्रीटमेंट ने भी उतनी तकलीफ नहीं दी, जितना उस न्याय व्यवस्था ने दी, जिसपर मैने डेढ़ दशक तक भरोसा किया. मेरे ही सामने मेरे आरोपियों को बरी कर दिया गया. जिस व्यवस्था से उम्मीद लगाकर मैं 16 वर्षों से लड़ रही थी उसने आखिरकार मुझे निराश किया.”
इतना बोलते- बोलते शाहीन मलिक भावुक हो जाती हैं. उनकी आंखें भर आती हैं और गला सूख जाता है. ऐसा लगता है जैसे उनके पास अपनी स्थिति को बताने के लिए शब्द नहीं हैं. दरअसल, शाहीन मालिक एक एसिड अटैक (तेजाब से हमला) सर्वाइवर और सामाजिक कार्यकर्ता हैं. 2009 में एमबीए की पढाई की दौरान उन पर हरियाणा के पानीपत में एसिड अटैक हुआ था. इस हमले मे उनकी एक आंख की रोशनी चली गई. उनका चेहरा और जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई. हमला कराने का आरोप तीन लोगों यशविंदर, बाला औऱ मनदीप पर लगा. बीते 16 साल ये मामला कोर्ट में चल रहा था.
24 दिसंबर की शाम जब लोग क्रिसमस मनाने की तैयारी कर रहे थे. तब दिल्ली की रोहिणी कोर्ट ने शाहीन मलिक की जिंदगी में ना सिर्फ निराशा भर दी बल्कि उनके 16 साल के जख्मों को कुरेद दिया. कोर्ट में सबूत के अभाव और पुलिस जांच में लापरवाही के चलते तीनों आरोपियों को बरी कर दिया गया.
आरोपी बाला पर भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी (आपराधिक साज़िश), 326 (जानबूझकर गंभीर चोट पहुंचाना) और 308 (गैर-इरादतन हत्या का प्रयास) के तहत आरोप लगाए गए थे. वहीं, यशविंदर पर धारा 364-ए (अपहरण), 376 (बलात्कार), 506 (आपराधिक धमकी) और 511 (अपराध करने का प्रयास) के तहत मुकदमा चलाया गया. जबकी मनदीप के खिलाफ भी आईपीसी की धारा 120-बी, 326 और 308 के तहत आरोप तय किए गए थे.
अपने फैसले में कोर्ट ने कहा, “अभियोजन पक्ष आरोपित व्यक्तियों के खिलाफ लगाए गए किसी भी आरोप को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है. अतः आरोपित यशविंदर, बाला और मनदीप को लगाए गए सभी आरोपों से बरी किया जाता है.”
कोर्ट ने इस पूरे मामले में पुलिस की जांच में भारी लापरवाही की तरफ इशारा किया है. जांच पर सवाल उठाते हुए कोर्ट ने कहा, “क्या जांच को जानबूझ कर पीड़िता के पक्ष को कमजोर करने औऱ आरोपियों को बचाने के लिए किया गया है?”
साथ ही कोर्ट ने पानीपत के पुलिस अधीक्षक (एसपी) को निर्देश दिया कि वे जांच में हुई चूकों की जांच करें, दोषी अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करें और 30 दिनों के भीतर उचित कार्रवाई करें.
शाहीन का संघर्ष
26 नवंबर 2009 की शाम जब शाहीन अपने ऑफिस की सीढ़ियों से नीचे उतर रही थी तब किसी ने उन पर एसिड डाल दिया. ऊपर ऐसिड डाल दिया. जिससे उनका चेहरा पूरी तरह झुलस गया. उस शाम को याद करते हुए वह कहती हैं, “जब मेरे चेहरे पर एसिड डाला गया तो मुझे लगा यह कोई प्रैंक कर रहा है लेकिन जब जलन होने लगी तो मुझे अहसास हुआ कि ये एसिड है.”
शाहीन को गंभीर हालत के चलते दिल्ली के एम्स में रेफर कर दिया गया. फिर वहां से अपोलो हॉस्पिटल दिल्ली. अगले दिन उनका बयान दर्ज करने पुलिस आती है. जिसके बारे में वह बताती हैं, “मैं सर्जिकल आईसीयू में थी और अगले दिन पुलिस आती है. मैं इतने शॉक में थी, मैं ज्यादा कुछ बता नहीं पाई. लेकिन एक महीने बाद, मैंने पुलिस को बता दिया कि ये किसने किया है. फिर उसके 4 साल बाद तक पुलिस मेरे पास कभी नहीं आती और जब मैं यहां से कॉल करने की कोशिश करूं तो मुझे ही डांट दिया जाता था.”
इस दौरान उनका इलाज चलता रहा और उन्हें 25 रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी से गुजरना पड़ा. उनके दाहिनी आंख में एसिड चला गया था. वह पूरी तरह खराब हो गई. वहीं, बाईं आंख को काफी मशक्कत के बाद डॉक्टर्स ने बचा लिया.
वह बताती हैं, “मैं सच बोलूं तो मैंने उम्मीद छोड़ दी थी कि अब मुझे दुनिया में न्याय मिलेगा. सबसे भरोसा उठ चुका था और मन में एक सवाल आता था कि मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ? कभी मैं एक आत्मनिर्भर लड़की थी और आज मैं बिना किसी के सहारे के कहीं आ जा भी नहीं सकती. और हमारे समाज में तो वैसे भी लड़कियों को बोझ समझा जाता है.”
फिर साल 2012 में देश में निर्भया हेल्पलाइन शुरू हुई. तब शाहीन ने हरियाणा के मुख्यमंत्री को पत्र लिखा. वह पत्र पानीपत की ज्यूडिशियल मैजिस्ट्रेट परविंदर कौर तक पहुंचा. उन्होंने शाहीन से मुलाकात की और केस को आगे बढ़ाया. साल 2014 में शाहीन मलिक के केस को दिल्ली के रोहिणी कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया और तब से उनका केस यहां चल रहा था.”
‘ब्रेव सोल्स फाउंडेशन’ के जरिए दूसरों की मदद
शाहीन मालिक एक तरफ जहां अपना केस लड़ रही थी तो दूसरी तरफ अपने जैसी अन्य पीड़िताओं की मदद भी कर रही थी. फिर चाहे उन्हें कानूनी रूप से मदद देना हो या फिर सहारा देना. उन्होंने अब तक 300 से ज्यादा पीड़िताओं की मदद की है. ये काम वह अपनी एनजीओ ‘ब्रेव सोल्स फाउंडेशन’ के जरिए करती हैं.
कोर्ट के फैसले पर शाहीन कहती हैंं, “कोर्ट ने सिर्फ मुझे निराश नहीं किया बल्कि मेरे जैसी सैकड़ों पीड़िताओं को निराश किया है. इस तरह के अटैक के बाद पीड़िता टूट जाती है. कई मामलों में तो परिवार भी साथ नहीं देता. ऐसे में बहुत संभावना होती है कि वह समझौता कर ले क्योंकि कानूनी लड़ाई लड़ना आसान चीज नहीं है. अब तक मैं पीड़िताओं से कहती थी कि कानूनी लड़ाई लड़ो, न्याय के लिए लड़ो, लेकिन अब मैं उनसे क्या कहूंगी? मैं कैसे उन्हें न्याय दिलाने की बात कहूंगी जब मुझे ही न्याय नहीं मिला?”
हालांकि, शाहीन ने हार नहीं मानी है. वह रोहिणी कोर्ट के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रही हैं. वह कहती हैं, “अब तक यह लड़ाई सिर्फ मेरी थी लेकिन अब यह लड़ाई मेरी जैसे हजारों पीड़िताओं की है. इसलिए मैं हार नहीं मानूंगी.”
कोर्ट के फैसले से पहले न्यूज़लॉन्ड्री ने शाहीन मलिक से बात की थी. दरअसल, दिसंबर की शुरुआत में शाहीन मलिक की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया में देरी और निचली अदालतों के रवैये को देखते हुए इसे ‘सिस्टम का मजाक’ कह कर संबोधित किया था. देखिए हमारी ये रिपोर्ट.
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