Obituary
विनोद कुमार शुक्ल: कि कवि अब भी लिख रहा है...
कितनी आवाज़ें एक साथ आकाश को पुकार रही हैं कि, ‘विनोद कुमार शुक्ल का जाना एक प्रासंगिक कविता का जाना है.’ अपनी कविता के मूल स्वर, यानी ख़ालिस मनुष्यता के स्वर पर अड़े रहे इस कवि के शब्दों ने साहित्य में कुछ ऐसा शामिल किया जो इश्क़ की तरह सुकून में तब्दील होता है. हमारी पीढ़ी के लिए वे एक ऐसे कवि थे जो स्वयं में कविता थे, कविता जिसने निरंतर मनुष्यता को स्पंदित किया.
एक रचनाकार को आज अपनी रचनाशीलता बनाए रखना एक कठोर चुनौती लगती है, इधर विनोद जी अपने अंतिम समय में भी हॉस्पिटल के बेड पर लिखते रहे. एक कवि दरअसल अंतिम समय तक कवि होने का निर्वाह करता रहा. मौजूदा दौर परस्पर कविता विरोधी शक्तियों से मुठभेड़ करने का समय है, इसी दौर के वे अपनी कविता एक कविता में लिखते हैं -
‘कृतज्ञ होकर
सबसे बड़ा डॉक्टर सबसे ग़रीब आदमी का इलाज करे
और फ़ीस मांगने से डरे.
सबसे ग़रीब बीमार आदमी के लिए
सबसे सस्ता डॉक्टर भी
बहुत महंगा है.’
एक बार जब रॉयल्टी के संदर्भ में विनोद जी का एक वीडियो सामने आया था. जिसमें वे कह रहे थे कि, ‘मेरी किताबें सांस नहीं ले पा रही हैं…’ तब कुछ बातें लिखी थीं, जिन्हें यहां जोड़ रही हूं-
कवि ने नैतिकता की बात कही, वो जो नैतिकता का विरोध करता है, उसने कवि को झूठा कहा.
उसने कवि की रचना 'आदिम रंग' को नहीं समझा होगा, जिसकी पहली पंक्ति प्रश्नवाचक है, ‘आदिम रंग आदिम मनुष्य ने क्या देखा था?’
कवि को याद थी आचार्य शुक्ल की बात, 'कविता भाव योग है'. विवशता की त्रासदी में वह टक-टकी बांध देख रहा था कि आवाज़ ज़रूर आएगी पर जो जीवन से आत्मीयता को सोखते हैं, उसने कवि को झूठा कहा. जाहिर है उसने कवि की रचना 'नौकर की क़मीज़' को नहीं समझा होगा, जिसकी विषयवस्तु संवेदनाओं में गुंथी है, जिसमें उन्होंने विषमता और कुरूपता का संचय किया. कवि कहता रहा कि दृश्य कैदियों को अदृश्य होकर क्यों आहत करते हो? जो बाज़ार के व्यापारियों का सरगना था, उसने कवि को झूठा कहा, उसने कवि की रचना 'बिन डूबी धरती' को नहीं समझा होगा. कवि ने बड़ी मशक्कत से दर्ज़ कराया कि चाहे कोई कितना भी छोटा हो सब अंदर से गहरे हैं. जो अक्षम, अवैज्ञानिक, असृजनात्मक था उसने कवि को झूठा कहा. उसने कवि की रचना 'झुंड' को नहीं समझा होगा, वहां आदमी में अपनी ही मूर्ति ढहाने की शक्ति के बारे में लिखा गया है. तमाम गवाहों के चलते और सबूतों के अभाव के मद्देनजर कवि को झूठा क़रार दिया जाता है. निश्चित ही न्यायाधीश ने कवि होने का अर्थ नहीं समझा होगा, जो सबूत रखने की परंपरा को हिंसक मानता है.
मैं ‘हंस’ को दिए उनके एक साक्षात्कार (आने वाले दिनों के सफ़ीरों के नाम), जिसे कवि असद ज़ैदी ने लिए था, से एक प्रश्न-उत्तर इसलिए साझा करना चाहती हूं ताकि बता सकूं कि एक कवि को अपने देश के बच्चों से कितना प्यार था और अपने बचपने को बचा पाना उनके लिए, सब कुछ ख़त्म होने के बीच ‘एक प्रेम की कविता’ बचा लेने जैसा था.
असद ज़ैदी- जीवन के पहले 10 सालों की स्मृतियां कैसी हैं?… उस समय के आपके साथ के बच्चों में कितनों को क्या क्या याद है? कुछ अपनी और कुछ दूसरों की स्मृति को मिलाकर उस समय की क्या तस्वीर बनती है?
विनोद कुमार शुक्ल- जीवन के पहले दस सालों की स्मृतियां हीं सबसे अधिक बची स्मृति है. बहुत बड़ा परिवार था. बचपन को याद करने का कितना अच्छा उपाय है, इस उम्र में बचपना करना.
भूतनाथ के समय लगा हुआ पीपल का पेड़ तब भी था. थोड़ी तेज़ हवा चलती तो डालियां जैसे अपने हाथों से पत्तियों की ताली बजातीं खुशी प्रकट करतीं दिखतीं. पत्ती हवा में उड़कर हमारे आंगन में गिर जातीं, जिसे उठाकर हम पिपहरी बनाते. अब कुछ सालों से बच्चों के लिए लिखकर कुछ पिपहरी बजाने जैसा खुश होता हूं.
पिपहरी
पत्ती को लपेटकर
बनाते पिपहरी
फूंकते तो सीटी बजती थी
उस सीटी की आवाज़ सुनने
दो-चार पत्तियां खराब कर एक पिपहरी
क्या बना सकूंगा! जैसे
दो-चार वाक्य खराब कर
एक पिपहरी कविता.
मैं सोचती हूं, कुछ लिखकर पिपहरी बचाने जैसा ख़ुश होता कवि कितना ज़रूरी है, दुनिया को युद्ध से बचाने के लिए. हिंसा के विरोध और प्रेम में खड़ा एक कवि, जिसे मैंने एक दूसरे कवि यानी नरेश सक्सेना की आंखों से ज़्यादा देखा और समझा है. जब नरेश जी, विनोद जी के साथ होते वे पल मेरे जैसे कविता प्रेमी के लिए दुर्लभ साहित्यिक क्षण होता. अब यह दृश्य और संयोग देखने को नहीं मिलेगा. पर वे एक विचार थे, साहित्य को विनोद कुमार शुक्ल मिले, यह नव्य रूपवाद का कविता में जुड़ना अवलंबित था, जो पूरा हुआ. उन्हें नमन. वे अब भी लिख रहे हैं, मैं उनके आगामी लिखे को भी पढ़ती रहूंगी.
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