Opinion
6 दिसंबर को नरसिम्हा राव का रिमोट कंट्रोल किसके हाथ था?
हमारे स्वयंसेवक हर पार्टी में है, हां एक में कुछ ज़्यादा हैं! - मोहन राव भागवत, 2009, केशव कुंज, दिल्ली.
अयोध्या में बीते महीने धर्म ध्वजा की स्थापना के साथ संघ का रामकाज पूरा हुआ. इस मौके पर एक बार फिर पीएम मोदी के साथ संघ प्रमुख भागवत मौजूद थे. ये मौजूदगी अनायास नहीं थी. हर बड़े अनुष्ठान में मोदी के साथ भागवत, अयोध्या और राममंदिर से संघ का भावनात्मक जुड़ाव है.
खैर मंदिर तो पूरा हुआ, होना ही था, मगर मुस्तकबिल में 6 दिसंबर 1992 की अनुगूंज अभी देर तक सुनी जाएगी. इस बहाने याद पीवी नरसिम्हा राव भी आएंगे जिन्होंने सबसे पहले मंदिर निर्माण की ज़मीन तैयार की. तत्कालीन पीएम राव उस रविवार पूजा पर ही बैठे रहे, और ढांचा ढह गया, ज़मीन समतल हो गई.
राव पर अपनी ही पार्टी में इल्ज़ाम लगा कि उनकी धोती के नीचे निक्कर है. हालांकि इल्ज़ाम जो भी लगे, सच ये है कि ब्राह्मण राव भगवान राम से पंगा नहीं चाहते थे. अपने करीबियों से राव ने खुल कर कहा -“आप बीजेपी से लड़ सकते हैं, भगवान राम से कैसे लड़ेंगे.”
अल्पमत में सरकार चला रहे राव के लिए भी राममंदिर धार्मिक से ज़्यादा राजनीतिक मसला था. इसे यूं समझिए कि प्रधानमंत्री रहते उन्होंने मान लिया था कि - “अयोध्या पर हम बीजेपी को पटखनी नहीं दे सकते”
यही नहीं मणि शंकर अय्यर से तो राव ने यहां तक कहा कि “भारत एक हिंदू राष्ट्र है, हमें इस बात को समझना होगा.”
इस बात का ज़िक्र विनय सीतापति ने नरसिम्हा राव की जीवनी ‘हाफ़ ल़ॉयऩ’ में किया है.
ये वही तर्क है जो तब बाला साहब देवरस से लेकर अब मोहन राव भागवत तक देते हैं; कि भारत तो हिंदू राष्ट्र है ही. जबकि इसका न कोई आधिकारिक ऐलान है, न संविधान इसकी स्वीकृति देता है. संविधान के मुताबिक भारत एक ‘सेकुलर और समाजवादी’ राष्ट्र है. सवाल है कि
राव की तर्क पद्धति संघ परिवार के इतनी करीब क्यों थी?
बीजेपी और संघ परिवार से उनका रिश्ता दरअसल क्या था?
वो अपने मंत्रियों से ज्यादा बीजेपी नेताओं पर भरोसा क्यों करते थे?
ये वो सवाल हैं जो आज भी गहरी पड़ताल की मांग करते हैं.
सनद रहे कि राव के प्रधानमंत्री बनते ही संघ ने उनकी तारीफ़ों के पुल बांध दिए. पांचजन्य ने उनकी तारीफ में पन्ने रंग दिए. आडवाणी उन्हें नेहरू के बाद सबसे पढ़ा-लिखा प्रधानमंत्री साबित करते रहे. वाजपेयी के साथ रिश्ता ऐसा कि राव उन्हें अपना गुरु कहते थे, और वो इन्हें लाड़ से गुरुघंटाल कह कर चिढ़ाते थे. इस बैकग्राउंड में देखिए तो 6 दिसंबर को 6 घंटे के भीतर अयोध्या में ज़मीन समतल होने का राज़ खुलने लगता है.
मुड़ कर देखें तो संघ परिवार से राव के रिश्तों की कहानी सन 1937-38 के निज़ाम विरोधी आंदोलन के साथ शुरु होती है. निज़ाम की 85 फीसदी प्रजा हिंदू और प्रशासन 15 फीसदी मुसलमानों के हाथ था. लिहाज़ा सतह के नीचे एक मुस्लिम विरोध लंबे समय से सांस ले रहा था. राव का रुझान समाजवादी था और निज़ाम आजादी के आंदोलन के ही ख़िलाफ़. ऐसे ही एक मसले में एक साथ 300 छात्रों को हैदराबाद से तड़ीपार कर दिया गया, जिनमें राव भी शामिल थे. निज़ाम के ख़िलाफ़ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण ने अब कुछ और ज़ोर पकड़ा. राव को कानून की पढ़ाई पूरी करनी थी, तो वो भाग कर नागपुर आ गए. नागपुर में ही उनका परिचय देवरस भाइयों- बाला साहब देवरस और भाऊ राव देवरस से हुआ. ये परिचय वक्त के साथ और प्रगाढ़ हुआ, जब बाला साहब सरकार्यवाह से सरसंघचालक बन गए. इसके बाद तो हैदराबाद से दिल्ली तक राव का उनसे संपर्क बना रहा.
संघ के लिए अयोध्या विवाद शुरु से कितना महत्वपूर्ण था, इसे बाला साहब देवरस के एक बयान से समझिए. अयोध्या-फैज़ाबाद के वरिष्ठ पत्रकार के. पी. सिंह ने कई जगह लिखा है, जब चंद्रशेखर के धमकाने के बाद अशोक सिंहल उनके फॉर्मूले पर सहमत हो गए, तो देवरस ने उन्हें फटकार लगाते हुए कहा- “तुम मान कैसे गए, अरे ये विवाद ही हमें दिल्ली की गद्दी तक पहुंचाएगा.”
नरसिम्हा राव जब प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने आर के खांडेकर को अपना ओएसडी बनाया. खांडेकर से राव का परिचय नागपुर से ही था, जो खुद को बाल स्वयंसेवक बताते थे. हालांकि. खांडेकर जब दिल्ली आए तो महाराष्ट्र के कांग्रेसी मंत्रियों की टीम का हिस्सा बन कर. पहले यशवंत दादा चव्हाण और फिर वसंत साठे. मगर जब राव ने उन्हें अपना ओएसडी बनाया तो आर. के. खांडेकर को राव का आर. के. धवन कहा जाने लगा. ‘92 में खांडेकर संघ-बीजेपी और राव के बीच संपर्क सेतु थे. राव ने खांडेकर के अलावा भी कुछ लोग इस काम के लिए रख छोड़े थे, मसलन आईपीएस किशोर कुणाल. किशोर कुणाल को पटना के महावीर मंदिर के पुनरोद्धार के लिए जाना जाता था. उनके रिश्ते वीएचपी से भी अच्छे थे, लिहाज़ा राव ने उन्हें ‘क्राइसिस मैनेजमेंट’ टीम में रखा.
प्रख्यात पत्रकार नीरजा चौधरी अपनी किताब ‘हाऊ प्राइम मिनिस्टर्स डिसाइड’ में किशोर कुणाल के हवाले से एक बड़ी बात लिखती हैं. कुणाल ने राव को सलाह दी कि ढांचा बचाना है तो ऑर्डिनेंस जारी कर अयोध्या को वैटिकन का दर्जा दीजिए, कानून व्यवस्था केंद्र के हाथ. राव ने रात को उनकी बात पूरी गंभीरता से सुनी, ज़बानी आर्डिनेंस तैयार करने का आदेश भी दे दिया. मगर सुबह होते ही सन्नाटा साध गए.
बकौल किशोर कुणाल, राव उसी स्थान पर मंदिर बनाना चाहते थे जहां दिसंबर, 1949 से रामलला विराजमान थे. हालांकि, ढांचा ढहने के बाद वो मुस्लिम लीडरशिप को भरोसा दिला रहे थे कि मस्जिद फिर बनवाएंगे. मगर तब तक मुसलमानों का भरोसा कांग्रेस से उठ चुका था. उस वक्त के बिखरे मुसलमान आज तक लौट कर कांग्रेस के पास नहीं आए.
अफसरों की कोटरी ने बार-बार राव पर राष्ट्रपति शासन लगाने का दबाव बनाया. अफसरों को लग रहा था कि वो सचमुच ढांचा बचाना चाहते हैं. मगर राष्ट्रपति शासन के खिलाफ़ राव के पास इतने तर्क थे, जितने ख़ुद बीजेपी और कल्याण सरकार के पास नहीं थे. राष्ट्रपति शासन को वो जम्हूरियत और जुडिशियरी दोनों के खिलाफ़ मान रहे थे, जबकि अपनी खुद की अल्पमत सरकार वो झारखंड मुक्ति मोर्चा से जोड़-तोड़ के आरोपों के बीच चला रहे थे.
सुरक्षा बल 6 दिसंबर से पहले फैज़ाबाद पहुंच चुके थे, मगर राव उन्हें भी फ्री हैंड देने को तैयार नहीं थे. वो यूपी पुलिस और पीएसी को ही आगे रखना चाहते थे.
दैनिक जागरण के लिए रिपोर्टिंग कर रहे वरिष्ठ पत्रकार राघवेंद्र दुबे बताते हैं कि यूपी की फोर्स तो अचानक हिंदू हो गई. पूर्व डीजीपी श्रीश चंद दीक्षित ने मस्जिद का बैरिकेड पार किया तो पुलिस वाले उनकी मदद में जुट गए. कुछ जवान इतने उत्साहित हो गए कि गुंबद पर चढ़े कारसेवकों की ओर रस्से फेंकने लगे. एक डीएसपी तो सैल्यूट की मुद्रा में खड़े होकर हनुमान चालीसा का पाठ ही करने लगे.
ख़ैर बात राव की, जो 6 दिसंबर 1992 तक तक कुछ तय नहीं कर पा रहे थे. तकरीबन 5 से 6 घंटे तक पिक्चर से ही आउट रहे. अचानक शाम 6 बजे की कैबिनेट बैठक के बाद इतने एक्टिव हुए कि धड़ाधड़ फ़ैसले लेने लगे.
क्या इसलिए कि तब तक ढांचा गिराने का टारगेट पूरा हो चुका था?
बहरहाल, अयोध्या पर इसी चुनी हुई चुप्पी और अनिर्णय के चलते कुछ लोग ये भी कहते हैं – अगर वाजपेयी आख़िरी नेहरूवियन थे तो नरसिम्हा राव संघ परिवार के पहले प्रधानमंत्री. आप क्या कहते हैं?
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