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सरकारी विज्ञापनों में 26% बढ़ोतरी: मीडिया पर सरकार की पकड़ और मजबूत
भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने देश भर के अख़बारों को दिए जाने वाले विज्ञापन की दर 26 प्रतिशत बढ़ा दी है. इससे पहले 2019 में 25 प्रतिशत और 2013 में 19 प्रतिशत की बढ़ोतरी सरकार ने की थी.
अगर हम पिछले पांच सालों में भारत सरकार द्वारा प्रिंट मीडिया को दिए गए कुल विज्ञापन की बात करें तो यह 851 करोड़ रुपये के करीब बनता है.
अखबारों को विज्ञापन देने का पैमाना क्या है, यह तय कौन करता है और कैसे तय होता है कि किस अखबार को कितना विज्ञापन मिलेगा. विज्ञापन का रेट तय करने के लिए सूचना प्रसारण मंत्रालय एक रेट स्ट्रक्चर कमेटी का गठन करता है. यह कमेटी अख़बारों का खर्च, कागज़ की कीमत और कुछ अन्य तथ्यों को ध्यान में रखकर विज्ञापन की नई दरों को तय करती है.
बता दें कि भारत में मीडिया विज्ञापन डिस्ट्रीब्यूशन का काम अब सीबीसी यानी सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ कम्युनिकेशन देखता है. पूर्व में इसे डीएवीपी यानी डायरेक्टरेट ऑफ एडवरटाइजिंग एंड विजुअल पब्लिसिटी के नाम से जाना जाता था.
भारत सरकार के विज्ञापन इसी के जरिए जारी होते है. और यह जो रेट तय करती है अमूमन उसी दर को राज्य सरकारें भी लागू करती हैं.
विज्ञापन की पात्रता पाने के लिए अख़बारों का सीबीसी में सूचीबद्ध होना जरूरी है. इसके कुछ नियम और शर्तें निर्धारित हैं. विज्ञापन किसे मिलेगा इसके लिए सलाहकार समिति का एक पैनल गठित होता है. विज्ञापन पात्रता की अंतिम मंजूरी यही समिति देती है.
सूचीबद्ध होने के बाद भी कुछ वजहों से अख़बार के विज्ञापन रोके जा सकते हैं. मसलन दूसरे अख़बारों की खबरें, संपादकीय या लेख जस का तस छापना या फिर अखबार की प्रसार संख्या की गलत जानकारी देने पर विज्ञापन रोका जा सकता है. इस तरह के कुछ और नियम भी हैं. लेकिन हकीकत ये है कि अक्सर करोड़ों का विज्ञापन पाने वाले बेहद छोटे या गुमना से अखबार इन नियमों का उल्लंघन करते हैं.
विज्ञापन की कीमत में 26 प्रतिशत वृद्धि का असर क्या होता है? सरकारी विज्ञापनों का असर अपरोक्ष रूप से खबरों पर पड़ता है. जो पैसा देता है, उसके दावे प्रमुखता से अखबारों में छपते हैं. सरकार की बात को अंतिम सत्य मान लिया जाता है. क्योंकि जो खर्चा देगा उसी की चर्चा होगी. अगर कोई अख़बार सरकार की आलोचना करता है तो उसका विज्ञापन रोक दिया जाता है. इस तरह से विज्ञापन अखबारों को नियंत्रित करने का हथियार बन गया है.
अखबारों के विज्ञापन की कीमत में 26 प्रतिशत वृद्धि का मतलब अखबारों की सरकार पर निर्भरता और बढ़ेगी, अखबारों पर सरकारी प्रोपगैंडा फैैलाने का दबाव और बढ़ेगा. इस तरह जनता के पैसे का अरबों रुपया सरकारी प्रोपगैण्डा पर खर्च होगा.
इसकी कीमत चुकाएगी जनहित की पत्रकारिता. न्यूज़लॉन्ड्री इस समस्या का आसान सा उपाय लेकर आया है. जब सरकारें विज्ञापन की कीमतों में 26 प्रतिशत बढ़ोतरी करके मीडिया पर शिकंजा कस रही हैं तब न्यूज़लॉन्ड्री अपनी सब्सक्रिप्शन की कीमतों में 26 प्रतिशत की कटौती का ऑफर ले आया है. ताकि आप आसानी से जनहित की पत्रकारिता में निवेश कर सकें और मीडिया को पूरी तरह से सरकारी चंगुल में फंसने से बचा सकें.
अपके खर्चे वाली न्यूज़लॉन्ड्री की पत्रकारिता अब 26 प्रतिशत डिस्काउंट पर उपलब्ध है. इस मौके को लपक लीजिए क्योंकि जनता के खर्च से चलने वाला मीडिया, जनता के प्रति जवाबदेह होगा. हम आपकी और लोकतंत्र के हित की खबरें आप तक लाते रहेंगे. ये हमारा वादा है.
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