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गुरुग्राम की बंगाली मार्केट में पुलिसिया दहशत के बीच पलायन
गुरुग्राम के सेक्टर 49 की बंगाली मार्केट अब खाली हो रही है. यहां पहले 500 से ज्यादा बंगाली प्रवासी मज़दूर रहते थे. अब बड़ी संख्या में लोग यहां से जा रहे हैं. अब तक करीब 400 लोग इलाका छोड़ चुके हैं. इनमें से कुछ लोग कारों में गए, कुछ ऑटो में निकले तो कई पैदल ही रवाना हुए. अपने बच्चों के साथ ये कंधों पर बैग लेकर निकल पड़े हैं.
वहीं, कुछ लोग दिन निकलने का इंतज़ार करते रहे, उनका सामान पहले से ही बंधा हुआ था. वहीं, कुछ ने अपने बैग दरवाज़े के पास रख दिए थे, ताकि अगर पुलिस फिर से आए तो वे तुरंत भाग सकें. इसका कारण?
दरअसल, गुड़गांव में चल रही "अवैध प्रवासियों" के खिलाफ कार्रवाई ने पश्चिम बंगाल से आए मुस्लिम प्रवासी परिवारों के बीच दहशत फैला दी है. ये वे लोग हैं जो वर्षों से अस्पतालों, गेटेड हाउसिंग सोसाइटीज़ और सफाई कार्यों में काम कर रहे हैं.
बंगाली मार्केट में पहली पुलिस कार्रवाई करीब एक हफ्ता पहले हुई थी, जिसमें कई लोगों को हिरासत में लिया गया.
अब इलाके की दुकानें बंद हैं और कई लोग अपनी नौकरियों से इस्तीफा देकर चले गए हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि कहीं उन्हें मनमाने ढंग से हिरासत में न ले लिया जाए, परेशान न किया जाए या देश से न निकाला जाए.
न्यूज़लॉन्ड्री से बातचीत में सफाईकर्मी रहमान ने कहा, “मैं तीन दिन से काम पर नहीं गया हूं. मेरी तनख्वाह सिर्फ 12,000 रुपये है. हर एक दिन की कमाई मायने रखती है. ये सब कुछ कोविड लॉकडाउन जैसा ही लग रहा है.”
पश्चिम दिनाजपुर से आए 54 वर्षीय निर्माण मज़दूर जमालुद्दीन ने कहा कि उन्होंने अपने बेटे को भी कुछ दिन कॉलेज न जाने की सलाह दी है, क्योंकि उन्हें पुलिस जांच का डर है.
वहीं पास में यूसुफ* नाम के एक गिग डिलीवरी वर्कर अपने घर के बाहर सांप-सीढ़ी खेलते दिखे, जबकि उनका डिलीवरी बैग एक ओर पड़ा था. उन्होंने कहा, “मैं ज़ोमैटो के लिए काम करता था, लेकिन कुछ समय से मैंने डिलीवरी लेना बंद कर दिया है. इस कार्रवाई की वजह से.”
गुरुग्राम में यह कार्रवाई ऐसे वक्त हो रही है जब कई राज्यों में बिना दस्तावेज़ वाले कथित बांग्लादेशी प्रवासियों के खिलाफ अभियान चल रहा है. इससे मानवाधिकारों और कानूनी प्रक्रिया के उल्लंघन को लेकर चिंता बढ़ रही है. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आरोप लगाया है कि बीजेपी शासित राज्यों में बंगला भाषी लोगों को निशाना बनाया जा रहा है और उन्होंने अगले सप्ताह से एक “भाषा आंदोलन” शुरू करने की घोषणा की है.
डर, ‘उगाही’ और भ्रम
बंगाली मार्केट के कई निवासी दावा करते हैं कि जिन्हें उठाया जा रहा है वे लोग वर्दी में नहीं आते बल्कि सादी पोशाक में होते हैं और खुद को पुलिस बताकर पहचान नहीं देते. कई लोगों को थाने की बजाय किसी अज्ञात स्थान पर ले जाया गया.
न्यूज़लॉन्ड्री ने इलाके के कम से कम 20 लोगों से बात की. इन लोगों ने हमें अपने पहचान पत्र दिखाए. 15 वर्षों से यहां रह रहे पिंटू अली ने कहा, “हम यहां इतने सालों से रह रहे हैं, लेकिन ऐसा पहले कभी नहीं हुआ. ये सब कुछ नया है.”
साउथ सिटी के डी1 ब्लॉक में घरेलू सहायिका फातिमा* अपने माता-पिता, बेटी और सामान के साथ सड़क किनारे खड़ी थीं. वो पश्चिम बंगाल के मालदा लौट रही हैं.
उन्होंने बताया कि उनके पिता को कुछ दिन पहले सादे कपड़ों में आई पुलिस उठा ले गई थी लेकिन उम्रदराज़ होने के कारण छोड़ दिया. ऐसा उनका दावा है कि पिता के साथ उठाए गए आठ अन्य लोगों को “बेहद बुरी तरह पीटा गया.”
हमसे बातचीत में फातिमा* ने कहा, “मुझे मालदा में भी खाना मिल जाता है, लेकिन गुरुग्राम इसलिए आई थी ताकि अपने परिवार का पेट भर सकूं, कर्ज चुका सकूं और थोड़ा-बहुत बचा भी सकूं.”
इसी तरह 40 वर्षीय नुरुफा बीबी सी ब्लॉक में घरेलू सहायिका के तौर पर काम करती हैं. नुरुफा ने आरोप लगाया कि पिछले सप्ताह उनके पति को बिना किसी वजह के थप्पड़ मारकर हिरासत में लिया गया.
नुरुफा ने कहा, “रात के करीब 8:30 बजे वे अंदर घुस आए और पूछने लगे कि वे भारतीय हैं या बांग्लादेशी. जब मैंने अंदर जाकर उन्हें बचाने की कोशिश की, तो मुझे धक्का देकर बाहर कर दिया और दरवाज़ा बंद कर दिया.”
अपने घर के बाहर लगे नाग चंपा के पौधे की ओर इशारा करते हुए नुरुफा बताती हैं कि उन्होंने इस घर को कितने प्यार से संजोया था. इस बीच उनके पति हबीबुर रहमान अपना आधार कार्ड दिखाते हैं.
फिलहाल, यह स्पष्ट नहीं है कि कौन-कौन से दस्तावेज पुलिस के लिए स्वीकार्य हैं.
स्थानीय निवासी खालिबद्दीन अहमद ने कहा, “वे कौन से पेपर मांग रहे हैं? हमने आधार, पैन, वोटर ID सब दिखा दिए. फिर भी कहते हैं कि ये काफी नहीं है.”
कुछ लोगों ने बताया कि अफसर ज़मीन के दस्तावेज या जन्म प्रमाणपत्र मांगते हैं. मिन्नी खातून ने कहा, “हमारे पास बाकी कागज़ हैं, लेकिन ज़मीन के पेपर या बर्थ सर्टिफिकेट लाना मुश्किल होता है.”
कुछ निवासियों ने कथित उगाही के आरोप भी लगाए. 45 वर्षीय रेशमी ने दावा किया कि पुलिस हिरासत में लिए गए लोगों को छोड़ने के बदले 45,000 से 50,000 रुपये मांग रही है. कुछ लोगों ने बताया कि जो भी नकद उनके पास था, उसे छीन लिया गया और पुरुषों को नियमित रूप से पीटा जा रहा है.
एक मां अपने घायल बेटे के पास बैठी थीं, जो कथित पुलिस की पिटाई के बाद बिस्तर पर पड़ा है. उनका मानसिक रूप से विकलांग पति ज़मीन पर लेटा हुआ छत की ओर ताक रहा था. उन्होंने कहा, “हमारे पास सारे पेपर हैं, लेकिन कोई देखता तक नहीं.”
उत्तर प्रदेश से आए प्रवासी मज़दूर रजनीश बीते 20 सालों से यहां रह रहे हैं. रजनीश ने कहा कि मेनस्ट्रीम मीडिया की चुप्पी उन्हें पूरी तरह से उपेक्षित महसूस कराती है.
एक पैटर्न
स्थानीय लोगों का कहना है कि ज्यादातर मामलों में सिर्फ पुरुषों को उठाया जा रहा है, जबकि महिलाओं और बच्चों को छोड़ दिया जाता है. कम से कम पांच मज़दूरों ने बताया कि गेटेड सोसाइटी में उनके मालिकों ने जुलाई की तनख्वाह एडवांस में दे दी और कहा कि वे यहां से चले जाएं.
एक घरेलू सहायिका ने कहा, “हमारी मैडम ने कहा कि गुरुग्राम छोड़ दो, नहीं तो पीटे जाओगे. अब रहना सुरक्षित नहीं है.”
निवासियों ने मकान मालिकों पर भी नाराज़गी जताई. उनका आरोप है कि हर महीने करीब 5,000 रुपये किराया और 3,000 रुपये बिजली बिल लेने के बावजूद मकान मालिकों ने कोई मदद नहीं की.
एक निवासी ने कहा कि वो बस हुक्का पीते रहते हैं और मदद मांगने पर कहते हैं कि यहां से निकल जाओ.
वर्षों की मेहनत के बाद लोग अब उसी सामान के साथ लौट रहे हैं, जो वे अपने गांव से लेकर आए थे. गुरुग्राम से सिर्फ एक साइकिल ही नया जुड़ सका.
पुलिस: ये डिटेंशन नहीं, होल्डिंग सेंटर्स हैं; 8 बांग्लादेशी पहचाने गए
न्यूज़लॉन्ड्री ने इस मामले पर गुरुग्राम पुलिस कमिश्नर कार्यालय से संपर्क किया. उन्होंने “अवैध प्रवासियों” के खिलाफ कार्रवाई की पुष्टि की लेकिन कहा कि यह “प्रशासनिक प्रक्रिया” है.
पुलिस प्रवक्ता ने कहा, “हम पहले लोगों की पहचान और सत्यापन करते हैं, अगर ज़रूरत पड़े तो उन्हें 48 घंटे तक निगरानी में रखते हैं.”
जब उनसे यह पूछा गया कि किन दस्तावेज़ों की जांच की जा रही है, तो उन्होंने कोई स्पष्ट सूची देने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा कि दस्तावेज़ फर्जी भी हो सकते हैं.”
अधिकारी ने बताया कि अंतिम पुष्टि “डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट” द्वारा होती है और अब तक 8 बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान की गई है, जिन्हें बीएसएफ को सौंपकर निर्वासित किया जाएगा.
न्यूज़लॉन्ड्री पहले ही रिपोर्ट कर चुका है कि कई लोगों को नगर निगम की इमारतों में बनाए गए अस्थायी डिटेंशन सेंटर में रखा गया है. हालांकि बुधवार को पुलिस प्रवक्ता ने ज़ोर देकर कहा कि ये “होल्डिंग सेंटर्स” हैं, डिटेंशन सेंटर नहीं.
जब उनसे यह पूछा गया कि क्या ऐसी पहचान प्रक्रिया के लिए सार्वजनिक नोटिस नहीं देना चाहिए तो उन्होंने कहा, “यह एक रूटीन प्रक्रिया है. अगर पहले से सूचना दी तो ये लोग भाग सकते हैं.
काम के नुकसान की भरपाई को लेकर पूछे जाने पर अधिकारी ने कहा, “ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जब तक यह सरकारी नियमों में न लिखा हो.”
*पहचान छुपाने के लिए नाम बदला गया है.
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