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डिफेंस कॉलोनी के सिकुड़ते फुटपाथों पर सरकारी काहिली के निशान
यह रिपोर्ट सार्वजनिक स्थानों पर प्रभावशाली वर्गों द्वारा किए जा रहे अतिक्रमण और उनके प्रति सिस्टम की अनदेखी पर आधारित हमारी श्रृंखला का हिस्सा है। इस शृंखला की पिछली रिपोर्ट्स पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.
दिल्ली की गर्मियों की धूप में एक बंगले के बाहर गमलों में लगे पौधे आंखें चौंधिया रहे हैं. बूथ में एक सुरक्षा गार्ड एक बैठा है. ये दोनों उस जगह पर हैं, जहां कभी सार्वजनिक फुटपाथ हुआ करता था, जो अब अभिजात्य जीवन के सौंदर्यबोध में समा गया है.
यह दक्षिण दिल्ली की किसी भी पॉश कॉलोनी का कोई भी घर हो सकता है. लेकिन दिल्ली के अन्य हिस्सों से अलग, जहां पिछले चार महीनों में तोड़फोड़ अभियानों में ज्यादातर कमजोर तबके के अंदाजन 27,000 लोग विस्थापित हुए हैं, इस दौरान पॉश इलाकों में ऐसे अतिक्रमणों पर शायद ही कोई आधिकारिक कार्रवाई हुई हो.
जब न्यूज़लॉन्ड्री ने फुटपाथों की स्थिति का जायज़ा लेने के लिए दक्षिण दिल्ली की छह ऊंची आमदनी वाली कॉलोनियों का दौरा किया, तो सार्वजनिक अचल संपत्ति पर चुपचाप कब्जा करने के संकेत साफ़ दिखाई दिए.
इन अतिक्रमणों के पांच स्वरूप थे: निजी कार पार्किंग, फुटपाथों को काटते हुए ड्राइववे, गार्ड बूथ, अलग-अलग घरों के लिए जगह आरक्षित करने वाले बैरिकेड, और पैदल चलने की जगहों में लगे सजावटी या कंक्रीट के पौधे.
दिल्ली में कुल 1,2700 किलोमीटर लंबी आंतरिक कॉलोनी सड़कें हैं. जिनमें से सबसे बड़ा हिस्सा यानी 7,438.3 किलोमीटर, दक्षिण दिल्ली नगर निगम (एसडीएमसी) के पास है. लेकिन इसके बावजूद, आईआईटी दिल्ली के परिवहन अनुसंधान एवं चोट निवारण केंद्र द्वारा तैयार की गई भारत स्थिति रिपोर्ट 2024 के अनुसार, अपेक्षित फुटपाथ की लंबाई का केवल 56 फीसदी ही वास्तव में जमीन पर कायम है. और इसमें से भी मात्र 26 प्रतिशत ही भारतीय सड़क कांग्रेस द्वारा निर्धारित चौड़ाई और ऊंचाई के मानकों पर खरे उतरते हैं, भारतीय सड़क कांग्रेस (आईआरसी) देश में राजमार्ग इंजीनियरों की सर्वोच्च संस्था है, जिसका उद्देश्य सड़कों का विकास है. हालांकि, न्यूज़लॉन्ड्री इस बात की पुष्टि नहीं कर सका कि इस रिपोर्ट में कॉलोनी की आंतरिक सड़कों का आकलन शामिल है या नहीं.
आईआरसी फुटपाथ की न्यूनतम चौड़ाई 1.8 मीटर और कैरिजवे से ऊंचाई 150 मिमी से अधिक न होने की सिफारिश करती है. लेकिन डिफेंस कॉलोनी से गुज़रें तो आपको ऐसा कोई फुटपाथ ढूंढने में मुश्किल होगी जो इस विवरण से दूर-दूर तक मेल खाता हो.
डिफेंस कॉलोनी का कायाकल्प
यह कॉलोनी देश विभाजन के बाद स्थापित की गई थी और इसे उन भारतीय सैन्य अधिकारियों के लिए एक शरणस्थली के रूप में स्थापित किया गया था, जिन्होंने सीमा के उस पार पाकिस्तान में अपने घर खो दिए थे. सरकार ने उनके पुनर्वास के लिए दिल्ली में जमीन आवंटित की, जिसके परिणामस्वरूप एक सुनियोजित मोहल्ला बना, जिसमें एक स्थानीय बाजार, छोटे पार्क, क्लब और पांच जोन में विभाजित 1,618 आवासीय भूखंड शामिल थे.
ए-ब्लॉक कनिष्ठ अधिकारियों के लिए आरक्षित था, जिसमें 225 वर्ग गज के भूखंड थे, जबकि बी, सी और डी ब्लॉक में 325 वर्ग गज के बड़े भूखंड वरिष्ठ अधिकारियों को आवंटित किए गए थे. ई-ब्लॉक विशिष्ट था, जहां 867 वर्ग गज के और भी बड़े भूखंड थे. आवंटन 1950 के दशक में हुए थे, और अधिकांश घर 1960 के दशक की शुरुआत में बनाए गए थे. शुरुआत में बने घर आम तौर पर साधारण एक-मंजिला इमारतें थीं, जिन्हें बाद में परिवारों के बढ़ने के साथ दूसरी मंजिल और छतों पर बरसातियों के साथ बढ़ाया गया.
आज हालत ये हैं कि 65 फीसदी से ज़्यादा पुराने घरों की जगह आधुनिक बहुमंजिला इमारतों ने ले ली है. यह इलाका एक उच्च-स्तरीय बस्ती में तब्दील हो गया है, जहां अब वकील, आर्ट गैलरीज़, बुटीक, डिज़ाइनर स्टोर, युवा जोड़े, छोटे परिवार और पेशेवर लोग रहते हैं, जो इसके दिल्ली के बीच बसे होने और जिंदादिल जीवन शैली की तरफ आकर्षित होते हैं.
लेकिन डिफेंस कॉलोनी रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष मेजर रंजीत सिंह के अनुसार, कॉलोनी की सभी 110 गलियों में "एक चीज़ अपरिवर्तित बनी हुई है". और वो ये है कि, "फुटपाथ गायब हो गए हैं."
न्यूज़लॉन्ड्री ने इलाके के ब्लॉक बी, सी और ई का दौरा किया.
ब्लॉक सी: एक पूर्व शीर्ष सैन्य अधिकारी का घर
मसलन ब्लॉक सी को ही लीजिए, जिसकी सीमा कुशक नाला से लगती है, जो बारापुला जल निकासी व्यवस्था से जुड़ा है. जिस रास्ते पर पैदल रास्ता होना चाहिए था, वो या तो टूट गया है या निजी ढांचे के चलते गायब ही है.
आरडब्ल्यूए के महासचिव प्रमोद चोपड़ा का आरोप है कि व्यक्तिगत शिकायतों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है. "लोगों ने फुटपाथों पर बड़े-बड़े पेड़ भी लगा दिए हैं. अब अधिकारी कह रहे हैं कि वे उन्हें हटा नहीं सकते."
आरडब्ल्यूए सदस्यों के अनुसार, इनमें से एक शिकायत सेना के एक पूर्व शीर्ष अधिकारी के घर से जुड़ी है. उसके बाहर 2 मीटर चौड़ा ड्राइववे, एक गार्ड बूथ और 200 से ज्यादा गमले लगे हुए हैं, ये सब फुटपाथ पर ही हैं.
इसी ब्लॉक में स्थित डिफेंस कॉलोनी क्लब ने भी पैदल रास्ते के किनारे पार्किंग स्थल चिन्हित कर रखे हैं. मेजर सिंह कहते हैं, "बेशक यह एक समस्या है. यहां कोई फुटपाथ नहीं है. हमें सड़क पर चलने के लिए मजबूर होना पड़ता है. मेरे जैसे बुजुर्ग नागरिकों के लिए ये एक सही में सुरक्षा का जोखिम है."
भारत स्थिति रिपोर्ट 2024 के अनुसार, एक ऐसे शहर में जहां सड़क दुर्घटनाओं में 44 प्रतिशत से अधिक मौतें पैदल चलने वालों की होती हैं, वहां पैदल चलने लायक जगह की कमी स्थिति को और भी बदतर बना देती है.
ब्लॉक बी: सर्विस लेन पर पार्किंग स्थलों का कब्जा
आपातकालीन स्थिति में इस्तेमाल होने वाली डिफेंस कॉलोनी की सर्विस लेन की भी कुछ ऐसी ही हालत है. ब्लॉक बी में न्यूज़लॉन्ड्री ने पाया कि ये लेन खड़े दोपहिया वाहनों, सड़क किनारे चाय की दुकानों और निर्माण के मलबे से पूरी तरह से अवरुद्ध है.
एमसी मेहता बनाम भारत मामले में 2019 के एक फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि दिल्ली परिवहन विभाग की पार्किंग नियमों की नीति के अनुसार, ऐसी लेन "एंबुलेंस, दमकल गाड़ियों, पुलिस वाहनों आदि जैसे आपातकालीन वाहनों की बेरोकटोक आवाजाही के लिए निर्धारित होनी चाहिए. इस लेन पर पार्किंग की अनुमति नहीं होगी."
लेकि ब्लॉक बी में, पूरी 750 मीटर लंबी सर्विस लेन स्टॉल या खड़ी गाड़ियों से भरी हुई थी, इनमें से कुछ गाड़ियां लेन के बगल में स्थित एक निजी अस्पताल में जाने वाले लोगों की भी थीं. एक स्टॉल विक्रेता ने तो अगले साल मार्च तक काम करने के अपने नगर पालिका लाइसेंस की ओर भी इशारा किया.
सिंह आरोप लगाते हैं, "एमसीडी आधे घंटे के लिए आती है, कुछ चीज़ें साफ करती है और चली जाती है. फिर वे कहते हैं कि इसे लागू करना पुलिस का काम है."
ई ब्लॉक में, 'निवासी अतिक्रमण में शामिल'
आरडब्ल्यूए महासचिव चोपड़ा के अनुसार, ई-1 से ई-5 तक का क्षेत्र हरित पट्टी से घिरा है. न्यूज़लॉन्ड्री ने पाया कि इस पर कारों और ड्राइववे का अतिक्रमण है.
अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि इस क्षेत्र की इमारतों को इन ड्राइववे के लिए मंज़ूरी मिली है या नहीं. एमसीडी कार्यालय के एक अधिकारी का कहना है, "इस तरह की जानकारी देना मुश्किल है क्योंकि रिकॉर्ड इतने क्रमबद्ध नहीं हैं."
आरडब्ल्यूए के आरोपों और क्षेत्र में अतिक्रमण के निशानियों के बारे में पूछे जाने पर एंड्रयूज गंज की पार्षद अनीता बैसोया, जो डिफेंस कॉलोनी का भी प्रतिनिधित्व करती हैं, कहती हैं कि एमसीडी कार्रवाई करने की कोशिश करती है. "हम कॉलोनी की अंदर की सड़कों से अतिक्रमण हटाने की कोशिश करते हैं, लेकिन निवासी खुद अतिक्रमण में शामिल हैं. हम उन्हें कब तक रोक सकते हैं?... कॉलोनी में बहुत से प्रभावशाली लोग रहते हैं और वे विभाग में उच्च पदों पर बैठे लोगों से संपर्क करते हैं, और इसलिए अतिक्रमण जारी रहता है."
अवैध पार्किंग के बारे में पूछे जाने पर सर्कल के ट्रैफिक प्रभारी रविंदर सिंह कहते हैं, "कॉलोनियों के अंदर अवैध पार्किंग के लिए चालान जारी करने का कोई प्रावधान नहीं है" और ट्रैफिक पुलिस "स्थानीय पुलिस द्वारा किसी विशेष क्षेत्र में कार्रवाई करने की सूचना देने के बाद ही" चालान जारी करती है.
हालांकि, इस रिपोर्ट में कई मिसालें दी गई हैं, लेकिन ऐसे अतिक्रमणों की सटीक मानक अभी भी पता नहीं हैं, क्योंकि एमसीडी ने सार्वजनिक जमीन पर अतिक्रमणों का विस्तृत, और कॉलोनी-वार डेटा साझा करने से इनकार कर दिया है. एक आरटीआई के जवाब में कहा गया कि "इस कार्यालय में ऐसी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है.”
न्यूज़लॉन्ड्री ने डिफेंस कॉलोनी पुलिस स्टेशन के एसएचओ संजय शर्मा, एसडीएमसी के अतिरिक्त आयुक्त जितेंद्र यादव और डीसीपी ट्रैफिक (दक्षिण) कुशल पाल सिंह से टिप्पणी के लिए संपर्क किया. अगर उनकी ओर से कोई जवाब आता है तो उसे इस रिपोर्ट में जोड़ दिया जाएगा.
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