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एआई न्यूज़ एंकर: मीडिया बिजनेस और उसके पूर्वाग्रहों का शिकार होती नई तकनीक
मौसम की जानकारी देने से लेकर केले के छिलकों के "औषधीय" उपयोगों की सूची बनाना हो या फिर दागिस्तान में आतंकवादी हमले की जानकारी देना, भारत में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) न्यूज़ एंकरों की संख्या में तेजी से इज़ाफ़ा हो रहा है.
मार्च, 2023 में इंडिया टुडे ग्रुप ने देश की पहली एआई न्यूज़ एंकर सना के कुछ ही हफ्तों में कई क्षेत्रीय और राष्ट्रीय न्यूज़ चैनलों ने भी अपने-अपने एआई न्यूज़ एंकर लॉन्च किए. कई जगह तो ये बहुत धूमधाम से हुआ. इतना ही नहीं, मई 2024 में सरकारी चैनल दूरदर्शन भी इस भेड़चाल में शामिल हो गया और उसने DD किसान के लिए एक नहीं, बल्कि दो एआई न्यूज़ एंकर प्रस्तुत किए.
उस समय दूरदर्शन ने इस नए बदलाव को एक ऐसे न्यूज़ एंकर के रूप में पेश किया था, जो "बिना रुके या थके 24 घंटे और 365 दिन समाचार पढ़ सकते हैं".
उनकी इन अलौकिक क्षमताओं के अलावा, न्यूज़ आउटलेट कथित रूप से किफायत के लिए एआई न्यूज़ एंकरों का रुख करते हैं.
न्यूज़लॉन्ड्री से बात करते हुए बिग टीवी के सीईओ अजय रेड्डी कोंडा ने कहा कि एआई डेवलपमेंट प्लेटफ़ॉर्म के लिए किया गया शुरुआती निवेश, "उनकी कंपनी द्वारा किसी इंसान को दिए जाने वाले भुगतान" की तुलना में "बहुत कम" था.
उन्होंने कहा, "मेरे लिए एक अच्छे (शख्स) एंकर की लागत ₹70,000-₹80,000 प्रति माह होगी, जबकि एक एआई एंकर की लागत लगभग ₹7,000-₹8,000 प्रति माह होगी." बिग टीवी ने जुलाई 2023 में भारत की पहली तेलुगु एआई न्यूज एंकर माया को पेश किया था.
एक तकनीकी कंपनी पर्सोनेट के सह-संस्थापक ऋषभ शर्मा ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि एआई एंकर विकसित करने के लिए शुरुआती रकम देना, और फिर उस मॉडल को संचालित करने के लिए मासिक सब्सक्रिप्शन शुल्क का भुगतान करना "समाचार चैनलों को आर्थिक रूप से ज़्यादा किफायती लगता" है. शर्मा की कंपनी ने इंडिया टुडे और डीडी किसान के लिए एआई एंकर विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
लेकिन समाचार संस्थानों के लिए आर्थिक फायदा लाने वाले ये एआई एंकर भी इंसानों की तरह गलतियों या समस्याओं से मुक्त नहीं हैं.
एआई निर्मित सामग्री ‘भरोसे लायक नहीं’
शर्मा की कंपनी ने जिन न्यूज चैनलों के लिए एआई एंकर विकसित किए हैं, वो सिर्फ कंप्यूटर-जनरेटेड न्यूज़ प्रस्तुतकर्ताओं पर निर्भर नहीं हैं और लगभग सभी स्तरों पर इंसानी हस्तक्षेप को अपनी प्रक्रिया में शामिल करते हैं. इसकी वजह है, एआई-जनरेटेड कंटेंट हमेशा विश्वसनीय नहीं होता.
शर्मा मानते हैं कि "एआई एंकर बहुत भ्रमित होते हैं", ऐसा वे उन घटनाओं के संदर्भ में कहते हैं जिनमें एआई ने कभी न घटित हुई घटनाओं का विवरण "तैयार कर दिया".
उन्होंने कहा कि न्यूज़रूम में लेखक और संपादक एक स्क्रिप्ट तैयार करते हैं, और इसे एआई प्लेटफ़ॉर्म पर अपलोड करके ऑडियो बनाते हैं, जिसे फिर एआई एंकर के साथ लिप-सिंक किया जाता है.
अधिकांश न्यूज़ आउटलेट एआई प्रेजेंटर्स से जुड़े कार्यक्रमों के लिए अमूमन इसी प्रक्रिया का पालन करते हैं.
बिग टीवी के कोंडा ने बताया, "हम आम तौर पर [अपने एआई न्यूज़ एंकर के साथ] पांच मिनट का बुलेटिन बनाते हैं, और इसकी स्क्रिप्ट लिखने और संपादित करने सहित तैयारी में लगभग दो से तीन घंटे लगते हैं."
वहीं, कुछ लोगों का मानना है कि हर कदम पर इंसानी हस्तक्षेप की जरूरत एआई न्यूज़ एंकर के मकसद को ही निरर्थक बना देती है.
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर से जुड़ी पहल- इंडियाएआई के वरिष्ठ शोधकर्ता निवाश जीवनानंदमा कहते हैं, "अगर इंसान स्क्रिप्ट लिख रहे हैं और उन्हें एआई एंकर को दे रहे हैं, तो इसका क्या मतलब है?"
एआई न्यूज एंकरों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, "यह सिर्फ एक कृत्रिम गुड़िया है, जो पहले से लिखी गई सामग्री पढ़ रही है."
ऐसे कई न्यूज़रूम जहां एआई एंकर न्यूज़ बुलेटिन और अन्य वीडियो के लिए सामग्री इकट्ठा और तैयार करते हैं, वहां भी संपादकों की एक टीम ही उसकी समीक्षा करती है.
ओडिया चैनल की एक वरिष्ठ व्यावसायिक सहयोगी लिटिशा मंगत पांडा ने बताया कि ओडिशा टीवी की लीसा, एआई फ्रेमवर्क का इस्तेमाल करके बुलेटिन के लिए स्क्रिप्ट का ड्राफ्ट तैयार करती है, रियल-टाइम अपडेट पर आधारित होने की वजह से इससे प्रोडक्शन "तेज़ और ज़्यादा दक्षता" से चलता है. हालांकि, ये सुनिश्चित करने के लिए कि कोई भ्रामक या गलत जानकारी न प्रसारित हो, सारी जानकारी का "सत्यापन और तथ्यों की जांच" की जाती है, खासकर संवेदनशील मुद्दों को लेकर इस चीज़ का विशेष ध्यान रखा जाता है. पांडा ने कहा, "संपादक हर एआई-जनरेटेड अपडेट को प्रसारित करने से पहले दो बार जांचते हैं.”
अगर एआई न्यूज़ एंकरों द्वारा तैयार की गई सामग्री की सटीकता से जुड़ी चिंताओं को एक तरफ रख भी दिया जाए, तो भी ये एंकर अभी उत्कृष्टता से मीलों दूर हैं.
बिग टीवी के कोंडा ने माना कि एआई एंकर द्वारा होस्ट किए जाने वाले बुलेटिन "बहुत नीरस" होते हैं और उनमें एक मानव प्रस्तुतकर्ता (एंकर) द्वारा स्क्रीन पर लाई जाने वाली "भावनात्मक बारीकियों" का अभाव होता है.
एआई एंकरों द्वारा समाचार पेश किए जाने के मुद्दे न्यूज़रूम की सीमाओं से कहीं आगे तक जाते हैं.
‘एआई न्यूज़ एंकर में लैंगिक पूर्वाग्रह दिखता है’
भारत में बड़ी संख्या में एआई न्यूज़ एंकर महिलाएं हैं.
मसलन, इंडिया टुडे समूह द्वारा पेश किए गए छह एआई न्यूज़ एंकरों में से पांच महिला हैं. इन पांच में से, नैना, जो भोजपुरी में समाचार प्रस्तुत करती हैं, को इंडिया टुडे द्वारा न्यूज़ बुलेटिन में “भोजपुरी भाभी” कहकर भी बुलाया जाता है.
ज्यादातर चैनलों का यही हाल है: न्यूज़18 की एआई एंकर कौर, ओडिशा टीवी की लीसा, पावर टीवी की सौंदर्या और बिग टीवी की माया, सभी समाचार एंकर महिला के तौर पर हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि एआई एंकर उन्हीं लैंगिक पूर्वाग्रहों को दिखाते हैं, जो भारत के मीडिया में पसरे पड़े हैं और उन्हीं को बल देते हैं.
न्यूज़लॉन्ड्री से बात करते हुए वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया विश्लेषक अम्मू जोसेफ ने कहा, “पारंपरिक टीवी न्यूज़ में भी महिलाओं को रिपोर्टर के बजाय एंकर के रूप में पर्दे पर आना आसान लगता है. एआई बस इन पूर्वाग्रहों की नकल कर रहा है.”
बिग टीवी के कोंडा ने जोसेफ द्वारा बताए गए पूर्वाग्रहों को स्वीकार करने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई. उन्होंने कहा, “आम तौर पर, एंकर महिलाएं होती हैं. हमारी कंपनी में भी 14 एंकर हैं- 12 महिलाएं और केवल दो पुरुष.”
उन्होंने ये दावा भी किया कि “लोगों को महिला एंकरों को समाचार पढ़ते देखना पसंद है” और उन्हें “ज्यादा आकर्षक” माना जाता है.
लितिशा मंगत पांडा ने माना कि ओडिशा टीवी की लीसा को जानबूझकर एक युवा भारतीय महिला के रूप में डिजाइन किया गया था, ताकि वो “अपनी सी ही” लग सके. “एक महिला व्यक्तित्व को सुलभ, आकर्षक और भरोसेमंद माना जाता था.”
हालांकि, विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि इस तरह के फैसले, भारतीय दर्शकों के बारे में कथित विचारों के बजाए लिंग आधारित रूढ़ियों से ज्यादा प्रभावित होते हैं.
यूट्रेक्ट यूनिवर्सिटी में समावेशी एआई संस्कृतियों की प्रोफेसर पायल अरोड़ा ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया, “यह एक सामाजिक धारणा को दिखाता है, जहां महिला आवाज़ों को ज्यादा अधीन और मिलनसार के तौर पर देखा जाता है.”
अरोड़ा फेमलैब की सह-संस्थापक भी हैं. फेमलैब, नारीवादी नजरिए से तकनीक के विकास पर रिसर्च करने वाला एक प्रोजेक्ट है. अरोड़ा बताती हैं कि एआई सहायक और एआई समाचार एंकर मुख्य रूप से महिला इसलिए हैं, क्योंकि “एआई तकनीक ऐतिहासिक रूप से पुरुष उपयोगकर्ताओं को ध्यान में रखकर डिज़ाइन की गई है.”
कई विशेषज्ञ सुंदरता के पारंपरिक मानदंडों को भी मुद्दा बताते हैं, क्योंकि महिला एआई समाचार एंकर इन्हीं मूल्यों को ध्यान में रखकर डिज़ाइन की जाती हैं.
अम्मू जोसेफ ने कहा, "एआई एंकर, पत्रकारिता कौशल के बजाय सुंदरता के पूर्वानुमानित आदर्शों पर आधारित प्रतीत होते हैं."
जोसेफ के साथ सहमति जताते हुए वरिष्ठ पत्रकार और शोधकर्ता पामेला फिलिपोस ने कहा, "भले ही आपके पास बुद्धिमान एंकर हों जो पारंपरिक सौंदर्य मानकों पर खरे नहीं उतरते, उनके खिलाफ पहले से ही पूर्वाग्रह है. एआई न्यूज एंकर, एक महिला प्रस्तुतकर्ता को कैसा दिखना चाहिए इसकी एक संकीर्ण छवि को मजबूत करते हैं; युवा, पतली, गोरी-चमड़ी और पारंपरिक रूप से आकर्षक.”
तकनीक को किस प्रकार समाज को आगे ले जाना चाहिए न कि पीछे, इस पर बात करते हुए वे कहती हैं, "अगर पत्रकारिता में एआई का प्रयोग, केवल अच्छा दिखने और लैंगिक मान्यताओं को प्राथमिकता देने में होता रहेगा तो यह न केवल पूर्वाग्रहों को चुनौती देने में विफल रहेगा बल्कि उन्हें और ज़्यादा मजबूत ही करेगा."
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