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महाकुंभ: प्रयागराज में नदियों के पानी पर यूपीपीसीबी और सीपीसीबी की अलग-अलग दावों वाली रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में महाकुंभ अब समाप्ति की ओर है. यूपी सरकार के मुताबिक, अब तक 55 करोड़ लोग यहां स्नान कर चुके हैं. लेकिन इस दावे के बीच नदी के पानी की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठने लगे. इन सवालों का आधार केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) द्वारा राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) को सौंपी एक रिपोर्ट बनी. रिपोर्ट में बताया गया कि महाकुंभ के दौरान प्रयागराज में नदी का पानी नहाने लायक भी नहीं था. पानी में फीकल फीकल कोलीफॉर्म यानि विष्ठा की मात्रा कई गुणा है. इस बारे में ज्यादा जानकारी के लिए न्यूज़लॉन्ड्री की ये रिपोर्ट पढ़िए.
सीपीसीबी की रिपोर्ट के आधार पर एनजीटी ने उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) को फटकार लगाते हुए नदी के पानी की गुणवत्ता ठीक करने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी मांगी.
इसी बीच उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा में दावा किया कि प्रयागराज में नदी का पानी सिर्फ नहाने ही नहीं पीने के लायक है. उन्होंने यूपीपीसीबी और सीपीसीबी के ही आंकड़ों का सुविधानजक तरीके से हवाला दिया. सीएम ने कहा कि इन दोनों की रिपोर्ट में फीकल कोलीफॉर्म की मात्रा कई अलग-अलग दिनों में तय मानक से भी कम पाई गई.
जहां सीपीसीबी की रिपोर्ट के आधार पर योगी सरकार पर सवाल खड़े हो रहे थे. वहीं, योगी के जवाब के बाद सीपीसीबी और यूपीपीसीबी के आंकड़ों को लेकर भी सवाल उठने लगे. पहले इन पर दबी आवाज़ में बात हो रही थी लेकिन अब थोड़ा तीखे तरीके से सवाल पूछे जाने लगे हैं.
सीपीसीबी के आंकड़े और सवाल
दरअसल, सीपीसीबी एनजीटी के आदेश पर महाकुंभ के दौरान प्रयागराज में सात स्थानों से नमूने लेकर पानी की गुणवत्ता की जांच कर रहा है. इनमें गंगा से पांच जगह और यमुना से दो जगहों से लिए नमूने शामिल हैं.
गौरतलब है कि सीपीसीबी की जिस रिपोर्ट को लेकर पूरा बवाल हुआ उसी में कुछ जगह फीकल कोलीफॉर्म की मात्रा <1.8 एमपीएन/100एमएल भी बताई गई है. इसका मतलब है कि पानी में इसकी मौजूदगी न के बराबर है. नियमों के मुताबिक, नहाने के पानी में फीकल कॉलिफोर्म की मात्रा 2500 एमपीएन/100एमएल से ज्यादा नहीं होनी चाहिए.
दूसरी तरफ यूपीपीसीबी की रिपोर्ट में फीकल कोलीफॉर्म की मात्रा कभी भी (साल 2022 से अभी तक) <1.8 एमपीएन/100एमएल नहीं रही. इस बात की पुष्टि यूपीपीसीबी के अधिकारी भी करते हैं, वो कहते हैं, “हमारी जांच में कभी भी गंगा या यमुना के पानी में फीकल कोलीफॉर्म का आंकड़ा ‘<1.8 एमपीएन/100एमएल’ नहीं आया है.”
केंद्र सरकार के जल शक्ति मंत्रालय की रिपोर्ट भी इस अधिकारी की बातों का समर्थन करती है. गंगा नदी की सफाई को लेकर हर साल यह रिपोर्ट जारी होती है. इसमें पानी के अंदर मौजूद फीकल कोलीफॉर्म की सालाना औसत की जानकारी होती है. उल्लेखनीय है कि ये आंकड़ा सीपीसीबी का ही होता है.
2022 की रिपोर्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, गंगा में 1.8 एमपीएन/100एमएल फीकल कोलीफॉर्म देवप्रयाग तक था. उसके बाद यह आंकड़ा बढ़ता जाता है. प्रयागराज में यह आंकड़ा 910 एमपीएन/100एमएल सालाना था.
2023 की रिपोर्ट में भी 1.8 एमपीएन/100एमएल फीकल कोलीफॉर्म सिर्फ देवप्रयाग तक ही था. प्रयागराज में फीकल कोलीफॉर्म का सालाना औसत 910 ही है.
गंगा नदी को लेकर लंबे वक्त से काम करने वाले एक प्रोफेसर बताते हैं कि उनके जीवन में कभी भी उत्तर प्रदेश में फीकल कोलीफॉर्म कभी भी भी 1.8 नहीं आया है. ऐसे में सीपीसीबी की रिपोर्ट पर सवाल उठना तो लाजिमी है. तो कई सवाल खड़े हो रहे लेकिन मामला आस्था से जुड़ गया है. इसलिए जानकार इसपर लिखने से बच रहे हैं. मैं खुद भी अभी तक कुछ नहीं लिखा. अगर सरकार को ईमानदारीपूर्ण रिपोर्ट तैयार कराने का इरादा होता तो वो यह काम आईआईटी या दूसरे संसथान को देती.
सीपीसीबी के आंकड़ों पर और भी तब सवाल खड़े हो जाते हैं जब एक ही दिन के अंतर में फीकल कोलीफॉर्म के आकड़े में जमीन आसमान का अंतर नजर आता है.
उदाहरण के तौर पर देखें तो 29 जनवरी को पुराना नैनी पुल पर फीकल कोलीफॉर्म 13000 एमपीएन/100एमएल था, जो अगले ही 30 जनवरी को को ‘<1.8 एमपीएन/100एमएल’ हो गया.
ऐसे ही 12 जनवरी को श्रृंग्वेरपुर घाट पर फीकल कोलीफॉर्म ‘<1.8 एमपीएन/100एमएल’ था, अगले ही दिन 13 जनवरी को यह बढ़कर 13000 एमपीएन/100 एमएल हो गया. और एक दिन बाद 14 जनवरी को यह आंकड़ा फिर < 1.8 एमपीएन/100एमएल’ हो गया.
ऐसा ही संगम पर भी हुआ. 12 जनवरी को जहां फीकल कोलीफॉर्म 2000 एमपीएन/100एमएल था वो अगले ही दिन 13 जनवरी को ‘<1.8 एमपीएन/100एमएल’ हो गया. एक दिन बाद 14 जनवरी को यह आंकड़ा 11000 एमपीएन/100 एमएल था और 15 जनवरी को 6800 और 20 जनवरी को 49000 एमपीएन/100एमएल हो गया.
ऐसा कई बार हुआ है. एक-एक दिन के अंतराल पर आंकड़ों में काफी अंतर नजर आता है.
फीकल कोलीफॉर्म की मात्रा में एक दिन के अंतराल पर इतने बड़े अंतर को लेकर पर्यावरण पर काम करने वाले पंकज कुमार सवाल उठाते हैं. वो कहते हैं, “यूपी सरकार की बीते पांच साल की रिपोर्ट को ही उठा लें तो प्रयागराज में गंगा और यमुना के जितने भी घाट हैं, वहां पर फीकल कोलीफॉर्म 500-1000 एमपीएन/100 एमएल के बीच रहा है. कभी भी <1.8 नहीं रहा है. वैसे भी एक दिन में कभी भी फीकल कोलीफॉर्म के आंकड़ों में इतना बदलाव नहीं होता है. प्रदूषण जांच करने वाली एजेंसियां आंकड़ों के साथ मजाक कर रही हैं.’’
गौरतलब है कि यूपीपीसीबी महीनेवार नदियों की स्थिति को लेकर आंकड़े जारी करता है. न्यूज़लॉन्ड्री ने जनवरी 2022 से दिसंबर 2024 के बीच के आंकड़ों को देखा तो उसमें कभी भी गंगा नदी में किसी भी जगह पर फीकल कोलीफॉर्म <1.8 एमपीएन/100एमएल’ दर्ज नहीं है. प्रयागराज के संगम की ही बात की जाए तो यहां कम से कम 680 तक फीकल कोलीफॉर्म दर्ज किया गया.
आंकड़ों पर सवाल उठने के और भी कारण-
सिर्फ सीपीसीबी ने नहीं यूपीपीसीबी ने भी फीकल कोलीफॉर्म को लेकर आंकड़े जारी किए हैं. सीपीसीबी और यूपीपीसीबी ने जिन स्थानों से पानी की जांच की है उसमें से दो ऐसे हैं, जो दोनों की रिपोर्ट में दर्ज हैं. संगम घाट और शास्त्री ब्रिज का दोनों की रिपोर्ट में जिक्र है लेकिन आंकड़ों में भारी अंतर है.
उदाहरण के तौर पर देखें तो 20 जनवरी को सीपीसीबी के आंकड़ों के मुताबिक, संगम घाट पर फीकल कोलीफॉर्म 49000 एमपीएन/100एमएल था, उसी दिन यूपीपीसीबी की रिपोर्ट में 2300 एमपीएन/100एमएल दर्ज था.
इसी तरह 2 फरवरी को सीपीसीबी की रिपोर्ट में संगम पर फीकल कोलीफॉर्म <1.8 एमपीएन/100 एमएल दर्ज था तो यूपीपीसीबी की रिपोर्ट में 2300 एमपीएन/100 एमएल का जिक्र था.
28 जनवरी को सीपीसीबी ने फीकल कोलीफॉर्म की मात्रा 200 एमपीएन/100 एमएल पाई तो यूपीपीसीबी की रिपोर्ट में 2000 एमपीएन/100 एमएल दर्ज है. हालांकि, कुछ-कुछ मौकों पर दोनों का आंकड़ा एक जैसा भी रहा.
शास्त्री ब्रिज की बात करें तो 30 जनवरी को सीपीसीबी के आंकड़ों के मुताबिक, 13000 एमपीएन/100 एमएल था तो यूपीपीसीबी के आंकड़ों के मुताबिक, 3200 एमपीएन/100 एमएल दर्ज था.
2 फरवरी को सीपीसीबी की रिपोर्ट में फीकल कोलीफॉर्म <1.8 एमपीएन/100 एमएल दर्ज था तो यूपीपीसीबी की रिपोर्ट में 3200 एमपीएन/100 एमएल था.
यूपीपीसीबी ने पानी को लेकर ये रिपोर्ट एनजीटी को भी भेजी है. एनजीटी को भेजे गए इस दस्तावेज पर पर्यावरण इंजीनियर, इमरान अहमद खान के हस्ताक्षर हैं. हमने उनसे दोनों एजेंसियों के नमूनों के परिणाम में आए अंतर को लेकर सवाल पूछा. उन्होंने कहा कि इस बारे में आप मुख्य पर्यावरण अधिकारी (प्रशासन) राजेंद्र सिंह से बात करें. सिंह ने हमें इसके बाद मेंबर सेक्रेटरी संजीव कुमार से बात करने को कहा.
संजीव कुमार ने हमें बताया कि दोनों के आंकड़ों में अंतर जगह और समय के कारण संभव है. सीपीसीबी की रिपोर्ट में फीकल कोलीफॉर्म की मात्रा लगभग नगण्य (<1.8 एमपीएन/100 एमएल) को लेकर वह कुछ भी टिप्पणी करने से इनकार करते हैं. हालांकि, वह इतना जरूर कहते हैं, “हो सकता है उन्होंने सैंपल के तौर पर जो पानी लिया हो उसमें फीकल कोलीफॉर्म न हो.”
यूपीपीसीबी से जुड़े के एक अधिकारी हमें इस अंतर पर एक और जानकारी देते हैं. वो कहते हैं, “ज़रूरी नहीं है कि पानी अगर संगम से लिया गया है तो दोनों संस्थाएं एक ही जगह से नमूना लेंगी. नमूना लेने के स्थान, समय और मौसम का भी असर पड़ता है. दोनों एजेंसियों ने अलग-अलग पानी की जांच की है. ऐसे में नतीजों में अंतर आया है.”
हालांकि, पर्यावरणविद् और अर्थ वॉरियर से जुड़े पंकज कुमार के मुताबिक, “ये सही है कि नमूने लेने का असर फीकल कोलीफॉर्म की मात्रा पर पड़ता है लेकिन जिस तरह का अंतर दोनों की रिपोर्ट में है उतना तो कम से कम नहीं होता. 13000 हजार और 3000 हजार का एमपीएन/100 एमएल का अंतर है.”
आंकड़ों में अंतर को लेकर हमने सीपीसीबी में बात करने की कोशिश की. ‘गंगा के पुनर्जीवन’ का काम देखने वाले साइंटिस्ट दीनबंधु गौड़ा से कई प्रयासों के बावजूद बात नहीं हो पाई. हमने उन्हें कुछ सवाल भेज दिए हैं. अगर उनका कोई जवाब आता है तो उसे खबर में जोड़ दिया जाएगा.
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